यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Wednesday 23 June 2010

मणिपुर : वे 65 दिन, जिन्होंने जिंदगी को नरक बना दिया

आखिर नगा संगठनों ने बिना शर्त नाकेबंदी खत्म करने की घोषणा क्यों की? वजह साफ है कि नगालैंड होकर गुवाहाटी से आए मणिपुर के लाखों वाहनों से बीच रास्ते में एनएससीएन टैक्स वसूलता है. सामान लदे प्रत्येक ट्रक से एक हजार से लेकर पंद्रह सौ तक की रकम जबरन वसूली जाती है. पिछले लगभग ढाई माह से नाकेबंदी के चलते एनएससीएन इस अवैध वसूली से वंचित था.



कभी राज्य सरकार की अनावश्यक जिद तो कभी केंद्र सरकार का विरोधाभासी रवैया, कभी नगा संगठनों की हिंसक धमकियां तो कभी इशाक मुइवा का राजनीतिक खेल, मणिपुर आखिर कब तक इन दोराहों के बीच झूलता रहेगा. नगा संगठनों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर करीब ढाई महीने से चल रही नाकेबंदी को बंद करने की घोषणा भले कर दी हो, लेकिन मणिपुर में हालात सामान्य होने में अभी भी काफी वक्त लगेगा. पहला तो नाकेबंदी खत्म होने को लेकर ही कई विरोधाभासी बयान आ रहे हैं, ऊपर से इसके चलते स्थानीय लोगों की रोजाना की जिंदगी नारकीय होकर रह गई है. खाने-पीने की चीजें हों या जीवन की अन्य आधारभूत जरूरतें, माओ गेट होकर सामानों की आपूर्ति ठप्प होने से लोगों का जीना मुहाल हो चुका है. राज्य के अंदरूनी इलाकों में लोग दवाओं के अभाव में मर रहे हैं तो पेट्रोल-डीजल की कीमत भी आसमान छूने लगी है.



15 जून को मणिपुर के मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 39 (इंफाल-दिमापुर) और 53 (इंफाल-सिल्चर) की 65 दिनों से चली आ रही नाकेबंदी को खत्म करने की घोषणा आखिरकार ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर (एनएसएएम) ने कर दी. हालांकि यह फैसला अस्थायी है. नाकेबंदी का कारण था, ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (एडीसी) का चुनाव. पांच पहाड़ी जिलों में इस चुनाव को लेकर नगाओं को आपत्ति थी. वे एडीसी के कामकाज से खुश नहीं थे. नए नियमों के तहत एडीसी के वित्तीय अधिकारों में कटौती की जा रही है. इसलिए चुनाव का विरोध करते हुए इकोनॉमिक ब्लॉकेड का फैसला लिया गया था. मामला तब और गरमा गया, जब नगा नेता इशाक मुइवा ने मणिपुर के उख्रूल जिले के अपने पैतृक गांव सोमदाल में प्रवेश की अनुमति देने की मांग की. ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर का समर्थन करते हुए नगा स्टूडेंट फेडरेशन ने भी नगालैंड से मणिपुर आने वाली गाड़ियां रोक दीं. साथ में राष्ट्रीय राजमार्ग 39 की भी नाकेबंदी कर दी. इतना ही नहीं, राजमार्ग 59 को भी इन संगठनों ने जाम कर दिया. बीते 14 जून को नगा संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर अस्थायी तौर पर नाकेबंदी खत्म करने का फैसला लिया. वहीं दूसरी तरफ ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर और ऑल स्टूडेंट्‌स एसोसिएशन ऑफ मणिपुर ने एक बयान में कहा है कि आर्थिक नाकेबंदी तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक सरकार पुलिस कमांडो और अर्द्धसैनिक बलों को राज्य के नगा आबादी वाले इलाकों से नहीं हटाती है. साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि मणिपुर सरकार इन संगठनों के प्रमुख डेविड कोरो और सैमसन रेमई के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट को भी वापस ले. सरकार ने पिछले हफ्ते इन दोनों नेताओं को अति वांछित घोषित करते हुए इन पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया था.



केंद्र सरकार ने लगातार बिगड़ती स्थिति से निपटने के लिए अर्द्धसैनिक बल के 2000 से ज्यादा जवान भेजने का निर्णय लिया था. 65 दिनों की नाकेबंदी ने मणिपुर की हालत नरक से भी बदतर बना दी. चारों तरफ मायूसी और उदासी छाई हुई है. इन 65 दिनों के दौरान मणिपुर में महंगाई इतनी बढ़ गई कि आम लोगों का जीना मुहाल हो गया. पेट्रोल का दाम 300 रुपये लीटर तक पहुंच गया और रसोई गैस का दाम 1500 रुपये प्रति सिलेंडर. राजधानी इंफाल के मुख्य अस्पताल और नर्सिंग होम बंद पड़े रहे. ऑक्सीजन और दवा की कमी से मरीजों का इलाज नहीं हो पाया. शिशु आहार, रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले सामानों का घोर संकट हो गया. दाम तो बढ़े ही, सामान मिलना भी मुश्किल हो गया. बीते 65 दिनों के दौरान मणिपुर के लोगों ने एक ऐसी नारकीय जिंदगी जी, जिसे बयां करना खासा मुश्किल है. स्थानीय नागरिक जय सिंह के अनुसार,एक तो रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के दाम लगातार आसमान छू रहे थे, ऊपर से वे सहज मुहैया भी नहीं थीं. महिलाओं को घर का चूल्हा जलाने के लिए लाख जतन करने पड़ते थे.

केरोसिन पहले 40 रुपये लीटर था, मगर नाकेबंदी के दौरान वह 100 रुपये प्रति लीटर हो गया. नाकेबंदी के चलते खाने-पीने का सामान, पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस एवं दवाइयां आदि पर्याप्त मात्रा में न पहुंच पाने की वजह से जिंदगी मानों थम सी गई थी. मणिपुर की सड़कों पर वाहनों की कतार खड़ी थी, क्योंकि उनमें पेट्रोल नहीं था. कुछ सार्वजनिक वाहन अगर चल भी रहे थे तो किराया तीन गुना वसूला जा रहा था. विनय सिंह ने बताया कि उन्हें अपने वाहन में पेट्रोल भराने के लिए तीन किमी लंबी लाइन लगानी पड़ी.

डीजल की कमी ने किसानों को खेतीबारी से दूर कर दिया. मणिपुर ड्राइवर वेलफेयर एसोसिएशन ने कहा कि अगर नाकेबंदी खुल भी गई तो भी वे अपनी गाड़ियां नहीं चलाएंगे, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि रास्ते में क्या होगा. उन लोगों ने कहा कि सुरक्षा का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, तब तक उनका चलना संभव नहीं है. वजह, नाकेबंदी के दौरान कई ट्रकों को राजमार्ग पर जला दिया गया, खाई में धकेल दिया गया और ड्राइवरों पर भी हमला किया गया. हालांकि राज्य सरकार ने इस मामले में हरसंभव कोशिश की. राज्य सरकार के मंत्री रंजीत सिंह के नेतृत्व में नेशनल हाइवे 53 पर रुके 377 ट्रकों को सुरक्षाबलों के साथ इंफाल तक लाया गया. इस काफिले में पेट्रोल-डीजल से भरे 25 टैंकर, रसोई गैस से लदे तीन और रोजमर्रा के सामानों से लदे 334 ट्रक और 15 यात्री बसें शामिल थीं. कार्गो हेलीकॉप्टर से भी तेल भरे ट्रक लाए गए. बावजूद इसके आम लोगों की जरूरतें पूरी नहीं की जा सकीं.

गौरतलब है कि यह नाकेबंदी ज्यादा उग्र इसलिए भी हो गई, क्योंकि नगा नेता मुइवा को मणिपुर जाने से रोक दिया गया. राज्य सरकार ने उन्हें मणिपुर आने से सख्त मना कर दिया. सरकार का कहना था कि पिछले 40 सालों के दौरान मुइवा अपने पैतृक गांव नहीं आए तो अब क्यों जाना चाहते हैं और वह भी नगा वार्ता विफल होने के बाद. शायद राज्य सरकार को लगा कि नगा संगठनों को एकजुट करने की साजिश की जा सकती है और इससे भविष्य में हिंसा का दौर फिर से शुरू होने की आशंका हो सकती है. मुइवा की मणिपुर यात्रा का कार्यक्रम राजनीति से प्रेरित था. अगर वह केवल अपने पैतृक गांव जा रहे होते तो सरकार मान भी लेती, मगर उन्होंने नगा बहुल इलाकों में जाकर बैठकों को संबोधित करने की योजना बनाई थी. इसी वजह से यह मामला उलझता चला गया. 2005 में भी एनएसएएम के इकोनॉमिक ब्लॉकेड का समर्थन करते हुए एनएसएफ ने नगालैंड के हिस्सों में मणिपुर जाने वाले वाहनों को रोककर मणिपुरी लोगों को संकट में डाल दिया था. अत्याधुनिक हथियारों से लैस उक्त संगठनों के लोग माउ से दिमापुर के बीच हमेशा यात्रियों को तंग करते हैं. लूटपाट, गाड़ी जलाना एवं लोगों को सताना आदि घटनाएं आएदिन होती रहती हैं. इन्हीं कारणों से मणिपुर में 14 जनवरी का दिन हर साल ड्राइवर डे के रूप में मनाया जाता है, इन नगा संगठनों के जुल्मों के विरोध में.

मुइवा मणिपुर में जन्मे हैं, मगर वह नगालैंड में रहकर नगा बहुल इलाकों को एक साथ मिलाकर वृहद नगालैंड (नगालिम) बनाने की मांग करते रहे हैं. प्रस्तावित नगालिम में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर की जमीनें भी शामिल हैं. मणिपुर के लोग असम, बांग्लादेश और मंडेला आदि अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, मगर उन्हें इकट्ठा करके एक अलग राज्य बनाने की मांग किसी भी लिहाज से जायज नहीं है. इसमें मुख्य बात यह है कि नगाओं के लिए पृथक राज्य की मांग कर रहे मुइवा इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि राज्य की हर नगा जाति उनकी इस मांग की समर्थक है. मुइवा अपनी प्रतिष्ठा को नजरअंदाज करते हुए नगालैंड में रह कर मणिपुर पर कब्जा जमाना चाहते हैं. वह अगर अपने गुणों और कौशल का सही इस्तेमाल करते तो हर जाति-समुदाय के लोग उन्हें सम्मान देते. एनएससीएन (आईएम) भी मणिपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग 39 पर निर्भर रहता है. गौरतलब यह है कि नगा संगठन एनएससीएन के लोग नगालैंड होकर गुवाहाटी से आने वाले मणिपुर के लाखों वाहनों से बीच रास्ते में अवैध वसूली करते हैं. इससे उन्हें करोड़ों रुपये की आमदनी होती है. सामान लदे प्रत्येक ट्रक से एक हजार से लेकर पंद्रह सौ रुपये तक वसूले जाते हैं. अगर कोई ट्रक बिना पैसा दिए चला जाए तो उसके मालिक से दोगुनी रकम वसूली जाती है. पिछले लगभग ढाई माह से नाकेबंदी के चलते एनएससीएन इस अवैध वसूली से वंचित था.

23 लाख की आबादी वाले राज्य मणिपुर में नगा ईसाई धर्मावलंबी हैं, जबकि मणिपुरी (मैतै) वैष्णव संप्रदाय में हिंदू लोग हैं. मैतै घाटी में और नगा पहाड़ियों में रहते हैं. मैतै लोग चावल की खेती करते हैं. नगालैंड में नगा जनजाति बहुमत में है, वहीं मणिपुर में नगा अल्पसंख्यक हैं. नगा नेताओं का कहना है कि नगाओं की स्वतंत्रता और उनके हकों को मणिपुरियों ने दबा रखा है. मगर सवाल यह है कि कौन से मणिपुरियों ने नगाओं को दबा कर रखा है? उच्च शिक्षा पाने में कौन बाधा उत्पन्न कर रहा है? नौकरी में भी नगाओं को आरक्षण की सुविधा है. आखिर यहां कौन उनका हक मार रहा है? विकास कार्यों में भी सबकी समान हिस्सेदारी रही है.
उधर केंद्र सरकार भी मणिपुर संकट के प्रति संवेदनशील नहीं दिख रही है. लोग सवाल करने लगे हैं कि कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार जितनी संवेदनशील है, उतनी मणिपुर को लेकर क्यों नहीं? मणिपुर भी भारत का एक अहम हिस्सा है. जानकारों का मानना है कि अगर केंद्र सरकार मणिपुर के मौजूदा संकट पर शीघ्र ध्यान नहीं देती है तो एक बड़ा जनांदोलन खड़ा होने में देर नहीं लगेगी. जाहिर है, यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा.