यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday 22 March 2013

अपनों की ही गुगली से परेशान गोगोई


गैरों पे करमअपनों पे सितम...आजकल असम कांग्रेस के कई विधायक मन ही मन यह लाइन दोहरा रहे होंगे. उनके निशाने पर हैं हैटट्रिक बना चुके मुख्यमंत्री तरुण गोगोई. वजह है, कांग्रेस का एआईयूडीएफ की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना. नतीजतन, पहली बार गोगोई को अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है. 


असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अपने 12 साल के शासनकाल में पहली बार पार्टी विधायकों के विरोध का शिकार होना पड़ रहा है. गोगोई अब तक असम कांग्रेस के न केवल निर्विवाद नेता थे, बल्कि उनके विरोध में उंगली उठाने वाला कोई भी नहीं था. लेकिन हाल में उनकी पार्टी के नेताओं ने ही उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. यह मामला तब उठा, जब कांग्रेस एवं ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के बीच नज़दीकियां बढ़ीं. पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंदन सरकार के आवास पर सीएम हटाओ खेमे की बैठक हुई, जिसमें 26 विधायकों ने हिस्सा लिया. इनमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, केंद्रीय मंत्री पवन सिंह घाटोवार आदि प्रमुख थे. इन विरोधियों में वे लोग भी हैं, जिन्हें राज्य मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है. सरकार खुद को मंत्री न बनाए जाने से नाराज चल रहे थे और मुख्यमंत्री बनाम हिमंत का मामला गरमाते ही वह सक्रिय हो गए और उन्होंने अपने आवास पर बैठक बुलाने का दुस्साहस तक कर डाला.

गोगोई विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों का कहना है कि वह उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं. यही नहीं, सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी उन्हें महत्व देने को तैयार नहीं हैं. विकास कार्यों के लिए पूंजी का आवंटन अभी तक नहीं हुआ है. राज्य की सभी योजनाएं राज्यमुखी न होकर गोगोईमुखी हो गई हैं. चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों की उपेक्षा सबसे अहम मुद्दा है. गोगोई जनजातियों की समस्याओं के निराकरण में दिलचस्पी नहीं लेते. जनजाति बहुल इलाकों में हाथियों एवं बाघों का उपद्रव जारी है. इस समस्या से गोगोई वाकिफ है, मगर वह हमेशा कन्नी काटते रहते हैं. बीते 11 मार्च को वित्तीय वर्ष 2013-14 का बजट पेश किए जाने के बाद से उक्त विधायक और भी नाराज हैं.

राज्य के चाय बगानों में काम करने वाले लोगों की संख्या 80 लाख से भी अधिक है, लेकिन बजट में उनके लिए केवल 24 करोड़ रुपये ही निर्धारित किए गए हैं, जबकि यह धनराशि अधिक होनी चाहिए. इस संदर्भ में विधायकों ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा है. वहीं अल्पसंख्यकों के लिए 500 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं. वरिष्ठ विधायक रामेश्‍वर धनवार ने कहा कि गोगोई को यह अच्छी तरह मालूम होना चाहिए कि चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों के लोग जन्म से ही कांग्रेस के साथ रहे हैं. गोगोई ने उनके साथ धोखाधड़ी की है. ऐसे कई मामलों को लेकर विधायकों में असंतोष है. विधायकों ने कहा कि वे अपनी नाराजगी के बारे में शीघ्र ही हाईकमान को भी अवगत कराएंगे. दूसरी बात, आरोप है कि गोगोई नए विधायकों को नज़रअंदाज करते हैं. नए विधायक कहते हैं कि मुख्यमंत्री गोगोई उनकी अनदेखी करते हैं, इसलिए आलाकमान से शिकायत के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है. 

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के समर्थन में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें 52 विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं. असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुवनेश्‍वर कलाता सहित पार्टी के अधिकांश पदाधिकारी गोगोई के साथ हैं. पूर्व मंत्री अंजन दत्त ने गोगोई को अपना समर्थन देकर सबको चौंका दिया. बहरहाल, गोगोई बीते 11 मार्च को दिल्ली पहुंचे और उन्होंने सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, असम प्रदेश कांग्रेस के केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह से मुलाकात भी की. हाईकमान से मुलाकात के बाद राज्य मंत्रिमंडल में बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, मगर ऐसा हुआ नहीं. केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह ने स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा को कारण बताओ नोटिस भेजा है. वजह यह कि डॉ. शर्मा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा न्यूज लाइव की प्रबंध निदेशक हैं. कांग्रेसी नेताओं, मंत्रियों एवं विधायकों ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पिछले पंचायत चुनाव के दौरान इस चैनल ने राज्य सरकार और कांग्रेस के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया था. यही नहीं, निराधार और एक खास उद्देश्य से प्रेरित ख़बरें प्रसारित करके कांग्रेस को चुनाव में काफी नुकसान भी पहुंचाया गया था. 

न्यूज लाइव की भूमिका से मुख्यमंत्री तरुण गोगोई काफी क्षुब्ध हैं. इसलिए उन्होंने सोनिया गांधी को लिखे अपने एक पत्र में चैनल पर दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया था. मुख्यमंत्री के इस पत्र के बाद बीते 27 फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश के तहत राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने मंत्री डॉ. शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया. 

विरोधी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
गोगोई कहते हैं कि सूबे की जनता और पार्टी हाईकमान का आशीर्वाद उनके साथ है. लोग उनके ख़िलाफ़ बगावत करके भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते. उन्होंने कहा कि उनकी नीयत साफ़ है और जब तक पार्टी एवं हाईकमान की मर्जी रहेगी, वह प्रदेश की जनता की सेवा करते रहेंगे. उन्होंने विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों को चेतावनी देते हुए कहा कि वह साफ़ नीयत के साथ पार्टी हाईकमान के निर्देश पर अब तक प्रदेश के विकास एवं जनता के हितों की रक्षा के लिए सेवाभावना से काम करते आए हैं. ऐसे में, उनके ख़िलाफ़ अगर कोई मंत्री-विधायक षड्यंत्र रचता है, तो उससे उनके चेहरे पर किसी तरह की कोई शिकन आने वाली नहीं है. 

गोगोई विरोधी नेता
डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, मंत्री
राजू साहू, संसदीय सचिव
जीवनतारा घटोवार, संसदीय सचिव
आबू ताहेर बेपानी, संसदीय सचिव
बलिन चेतिया, संसदीय सचिव
ओकिबुद्दीन अहमद, संसदीय सचिव
प्रदान बरुआ, संसदीय सचिव
चंदन सरकार, संसदीय सचिव
सुमित्रा पातिर, संसदीय सचिव
राजेंद्र प्रसाद सिंह, संसदीय सचिव
हेमंत ताल्लुकदार, विधायक
पीयूष हजारिका, विधायक
पल्लवलोचन दास, विधायक
जयंतमल्ल बरुआ, विधायक
राजेन बरठाकुर, विधायक
हाबुल चक्रवर्ती, विधायक
जावेद इस्लाम, विधायक
शिवचरण बसुमतारी, विधायक
कमललाक्ष दे पुरकायस्थ, विधायक
संजयराज सुब्बा, विधायक
रूपज्योति कुर्मी, विधायक
सुष्मिता देव, विधायक
विनोद सैकिया, विधायक
कृपानाथ मल्लाह, विधायक

Monday 11 March 2013

ज़िंदगी से प्यार करती हूं, जीना चाहती हूं


अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की ज़रूरत है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों से अनशन कर रहीं शर्मिला अपने लिए नहीं, बल्कि आपके लिए लड़ रही हैं. आपके लिए, यानी उस समूची मानव जाति की गरिमा बचाने के लिए, जो आज हर ताकतवर की नज़र में इंसान से कमतर बन चुकी है.

 इरोम शर्मिला चनु किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, क्योंकि वह पिछले 12 वर्षों से आमरण अनशन पर हैं. वजह, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट 1958 को मणिपुर से हटाने की मांग. सरकार शर्मिला को किसी तरह जिंदा रखने की कोशिश कर रही है, नाक के जरिए उनके शरीर में खाना पहुंचाया जा रहा है. शर्मिला लगातार जेल में बंद हैं, आरोप है, आत्महत्या का प्रयास. अब इसे सरकार और समाज की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा, क्योंकि हर एक साल के बाद शर्मिला को अदालत में पेश किया जाता है. बीते 3 मार्च को सरकार ने शर्मिला को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया. यह मामला 5 अक्टूबर, 2006 को सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफसपा) हटाने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए उनके आमरण अनशन से संबंधित है. उस दौरान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट आकाश जैन ने 40 वर्षीय शर्मिला के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत एफआईआर दर्ज की थी. शर्मिला ने कोई अपराध करने से इंकार करते हुए कहा कि उनका अहिंसक प्रदर्शन था. उन्होंने अदालत से कहा, मैं आत्महत्या नहीं करना चाहती हूं. मेरा प्रदर्शन अहिंसक है. मानव की तरह जीवन जीना मेरी मांग है. मैं ज़िंदगी से प्यार करती हूं, अपनी ज़िंदगी लेना नहीं चाहती, लेकिन न्याय और शांति भी चाहती हूं. सरकार मेरे ऊपर इस तरह का आरोप क्यों लगा रही है? मैं तो गांधी जी के मार्ग पर चल रही हूं, मगर आश्‍चर्य! गांधी के ही देश में अहिंसा को जगह नहीं दी जा रही है! अदालत ने इस मामले में अभियोजन पक्ष को सबूत पेश करने के लिए 22 मई की तारीख तय की है. गौरतलब है कि मणिपुर में भी उन्हें इसी आरोप के तहत जेल में रखा जाता है.

बहरहाल, जिन क्षेत्रों में अफसपा लागू है, वहां के निवासियों को हिंसा नहीं, बल्कि शांति चाहिए और सरकार एवं राजनीतिक नेताओं को उनके अहिंसक विरोध की आवाज़ सुननी चाहिए. सवाल यह उठता है कि सरकार उन्हें एक इंसान के मौलिक अधिकार देने से खौफ क्यों खाती है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का पालन करने वाली शर्मिला एक साधारण महिला हैं. वह एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के लिए ज़रूरी अधिकारों की मांग कर रही हैं. शर्मिला का अनशन 2 नवंबर, 2000 से तब शुरू हुआ था, जब इंफाल से 10 किलोमीटर दूर स्थित नंबोल नामक स्थान पर एक बस स्टैंड पर सवारी का इंतज़ार कर रहे 10 लोगों को भारतीय सेना ने बेरहमी के साथ गोलियों से भून दिया था. मारे गए लोगों में दो बच्चे और औरतें भी शामिल थे. यह ख़बर अगले दिन अख़बारों में छायाचित्रों के साथ शर्मिला ने पढ़ी. दिन था गुरुवार. हर गुरुवार को शर्मिला उपवास करती थीं. उस दिन जो संकल्प लेकर शर्मिला ने उपवास शुरू किया, वह आज तक जारी है.

शर्मिला ने चाणक्यपुरी स्थित मणिपुर टिकेंद्रजीत भवन में मणिपुर से आकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि जीवन में पढ़ाई बहुत ज़रूरी है. आप इतनी दूर से आकर यहां पढ़ाई कर रहे हैं. मां-बाप तमाम कष्ट झेलकर आपको पैसा भेजते हैं, इसलिए पढ़ाई केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि एक योग्य इंसान बनने के लिए करनी चाहिए. उन्होंने अपनी अधूरी रह गई पढ़ाई के बारे में कहा कि मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर सकी. मणिपुर के राजनीतिक नेतृत्व पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि वह केवल वोटबैंक की राजनीति करता है. पैसा कमाना नेताओं का धर्म बन गया है. हाल में इंफाल एयरपोर्ट पर एक नेता पुत्र बीस करोड़ रुपये के ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था. उन्होंने मणिपुर की स्थिति पर निराशा जताई. शर्मिला को सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.

अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में लोगों की आलोचना को नकारते हुए शर्मिला ने कहा, मैं भी औरों की तरह इंसान हूं. अपने बारे में सोचने और अपनी निजी ज़िंदगी जीने का मुझे पूरा अधिकार है. अपने मन की मैं खुद मालिक हूं. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा काला क़ानून है, जिसने लोगों से जीने का अधिकार छीन लिया है. एक तरफ़ तो केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश करती है, तो वहीं दूसरी तरफ़ अफसपा जैसा काला क़ानून लागू करके दोहरी नीति अपनाती है. अगर सचमुच पूर्वोत्तर में शांति कायम करने के लिए अफसपा ज़रूरी है, तो फिर बीते 12 सालों में पूर्वोत्तर, खासकर मणिपुर में शांति क्यों नहीं स्थापित हो सकी, सिवाय अलगाव की भावना को बढ़ावा
देने के.

Tuesday 5 March 2013

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

यूं तो पूर्वोत्तर में कार्यरत अधिकतर अलगाववादी संगठन धीरे-धीरे शांति के रास्ते पर आने के लिए तैयार हो रहे हैं और सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकार इसका स्वागत भी कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इन छिटपुट संगठनों के समर्पण से क्या मणिपुर में शांति स्थापित हो जाएगी, क्या सरकार ने कभी इस समस्या की जड़ तलाशने की कोशिश की है? अलगाववादियों के समर्पण से क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि अब नए लोग आतंकवाद के रास्ते पर नहीं चलेंगे?


पिछले कई सालों से गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा मणिपुर में सक्रिय अलगाववादी संगठनों के साथ शांति वार्ता की जा रही है और उसके परिणाम भी अब दिखने लगे हैं. बीती 13 फरवरी को तीन अलगाववादी संगठनों ने इंफाल में त्रिपक्षीय सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. ये संगठन हैं यूआरएफ, केसीपी (लम्फेल) और केवाईकेएल (एमडीएफ). इन तीनों संगठनों के कुल 197 कैडर हैं, जिनमें यूआरएफ के 90, केसीपी (लम्फेल) के 40 और केवाईकेएल (एमडीएफ) के 67 शामिल हैं. इस मौ़के पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ़ से ज्वाइंट सेक्रेटरी-मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स नार्थ-ईस्ट इंचार्ज शंभू सिंह, प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम सुरेश बाबू, राज्य के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, कई मंत्री एवं अधिकारी मौजूद थे. यूआरएफ की तरफ़ से चेयरमैन ख्वाइराकपम गोपेंद्रो उर्फ लानहैबा एवं सेक्रेटरी पुयाम मंगियाम्बा मैतै एलाइज रुहिनी मैतै, केसीपी (लम्फेल) की तरफ़ से चीफ ऑफ आर्मी ब्रोजेन मैतै उर्फ सिटी मैते एवं ज्वाइंट सेके्रटरी ताइबंगानबा उर्फ दिलीप और केवाईकेएल (एमडीएफ) की तरफ़ से प्रेसिडेंट मैस्नाम अथौबा एवं जनरल सेक्रेटरी लाइमयुम रोनेल शर्मा उर्फ अचौबा ने हस्ताक्षर किए. 


सहमति
ज्ञापन के अनुसार कैडरों को सही रास्ते पर चलने और नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. हर कैडर को दो साल तक प्रतिमाह 4000 रुपये बतौर वेतन दिए जाएंगे और हर कैडर के नाम ढाई लाख रुपये का फिक्स डिपॉजिट किया जाएगा, उन्हें न केवल वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार उन्हें क़र्ज़ भी देगी. उनकी क्षमता-योग्यता के अनुसार उन्हें पैरामिलिट्री फोर्स में नौकरी भी दी जाएगी. इससे उनकी चरमराई हुई ज़िंदगी दोबारा पटरी पर आ सकेगी. उक्त कैडर किसी असामाजिक एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे. अगर वे ऐसा करेंगे, तो क़ानून के अनुसार उन्हें दंड दिया जाएगा. मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह ने कहा कि भटके हुए युवा फिर शांति के रास्ते पर वापस आ रहे हैं, उनका स्वागत है. उन्होंने बाक़ी अलगाववादी गुटों से भी अपील की कि वे मुख्य धारा में वापस आएं. एमपी टी मैन्य ने कहा कि राज्य में शांति स्थापित करके ही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. 

तीनों
संगठनों ने समर्पण के वक्त कई हथियार भी सौंपे, जिनमें 3 एके-56 रायफल्स, 12 एके-47 रायफल्स, 3 नाइन एमएम रायफल्स, एक प्वाइंट-32 रायफल, 11 नाइन एमएम कारबाइन, 35 नाइन एमएम पिस्टल, 34 7.65 पिस्टल , आठ प्वाइंट-32 पिस्टल, एक नाइन एमएम रिवाल्वर, आठ लेथोट गन, सात एसबीएल, एक एयर पिस्टल, एक शार्ट गन, तीन आरपीजी, दो एम-16, दो एम-4, एक एसलर, पांच गे्रनेड और बंदूक. हथियारों की कुल संख्या 138 है. 

मणिपुर
की समस्याएं अलग हैं. राज्य के युवाओं को रोज़गार चाहिए, लेकिन सरकार रोज़गार मुहैया नहीं करा रही है, जिसके चलते युवाओं को सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल करना आसान हो गया है. बेरोज़गार युवा जल्द ही अलगाववादियों के झांसे में आ जाते हैं. एक दूसरी बात, जो मणिपुर के लोगों को सबसे ज़्यादा खलती है, वह है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा). वर्षों से इसे हटाने की मांग की जा रही है. इसके लिए इरोम शर्मिला पिछले 12 सालों से अनशन पर बैठी हैं. जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी ने इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था, बावजूद इसके सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. राज्य के लोगों का मानना है कि सरकार उनके साथ दोहरा रवैया अपना रही है. दिल्ली में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता दो-चार दिन अनशन करता है, तो सरकार उसके साथ बात करने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन मणिपुर में बारह साल से अनशन जारी है. अगर सरकार के पास इस एक्ट को लागू करने का सही तर्क है, तो वह उस पर भी चर्चा करा सकती है. जब सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी ही इस एक्ट को हटाने की सिफारिश करती है, तो फिर भी सरकार उसे क्यों नहीं मानती? बहरहाल, जब तक मणिपुर के युवाओं को रोज़गार नहीं मिलेगा, तब तक कुछ लोगों द्वारा समर्पण कर देने मात्र से शांति स्थापित नहीं हो सकती. सरकार को सबसे पहले रोज़गार का सृजन करना चाहिए. अगर युवाओं को रोज़गार मिलेगा, तो अलगाववादी संगठन ख़ुद-ब-ख़ुद कमज़ोर हो जाएंगे, लोगों का नज़रिया बदलेगा और सरकार पर विश्‍वास और बढ़ेगा. मणिपुर के विकास के लिए सरकार को विशेष योजनाएं बनानी होंगी, क्योंकि विकास ही समस्याओं का समाधान कर सकता है.

केंद्र एवं राज्य सरकार ने अगर एमओयू में शामिल बातों का सही तरीके से पालन न किया, तो फिर हमारा संगठन भूमिगत भी हो सकता है. इसलिए सरकार ईमानदारी बरते.  
अथौबा, चेयरमैन, केवाईकेएल (एमडीएफ).

हम लोग हथियार छोड़ चुके हैं और चाहते हैं कि शांति के साथ केंद्र एवं राज्य सरकार के विकास कार्यों में अपनी भागीदारी सुनिश्‍चित करें.  सिटी मैतै उर्फ नाउरेम ब्रोजेन मैतै, आर्मी चीफ, केसीपी (लम्फेल).

शांति हम सभी के अंदर है. इसे आपसी सामंजस्य के द्वारा ही क्रियान्वित किया जा सकता है.  लानहैबा उर्फ ख्वाइराकपम गोपेंद्रो,चेयरमैन, यूनाइटेड रिवोल्यूशनरी फ्रंट (यूआरएफ).


अलगाववादी बनने के कारण
कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे, तब मणिपुर को भी आज़ाद किया गया था, लेकिन यह आधा सच है. पूरा सच यही है कि भारत सरकार ने 21 सितंबर, 1949 को एक बंद कमरे में मणिपुर के राजा बोधचंद्र से मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करा लिए थे. 1964 में यूएनएलएफ नामक एक संगठन बनाया गया, जिसका मकसद एक स्वतंत्र राज्य की मांग करना था. 1978 में पीएलए का गठन हुआ. उसके बाद प्रीपाक, केवाईकेएल, केसीपी एवं एमपीएलएफ आदि कई संगठन निकल कर सामने आए. इनमें से यूएनएलएफ, पीएलए एवं प्रीपाक आदि आज भी एक स्वतंत्र राज्य के पक्षधर हैं. कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं, जो भटकाव के शिकार लोगों से मिलकर बनी हैं. युवाओं द्वारा अलगाववाद की ओर रुख़ करने के पीछे कई कारण हैं. राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है, जिसकी वजह से पढ़े-लिखे युवक गलत रास्ता अपनाने के लिए बाध्य हो जाते हैं. दरअसल, छोटी और साधारण सरकारी नौकरी के लिए भी कम से कम तीन से पांच लाख रुपये की रिश्‍वत देनी पड़ती है, थोड़ा बड़ा पद हो तो 15 से 20 लाख रुपये तक. यह भी कोई ज़रूरी नहीं कि नौकरी मिलेगी. इंफाल शहर में बीए-एमए पास किया हुआ युवक चेहरा ढककर रिक्शा चलाता है. बेरोजगारी से हताश होकर पढ़े-लिखे नौजवान अलगाववाद के रास्ते पर चलने लगते हैं. उनके हाथों में कलम की जगह बंदूक आ जाती है. तीसरा कारण, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) के तहत शक के आधार पर किसी की भी तलाशी ली जा सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और ऐसा होता भी है. इस एक्ट की आड़ में राज्य में कई फर्जी मुठभेड़ें हुईं. आज भी देश में सरकारी और ग़ैर सरकारी दबाव के कारण कई मामले खुलकर सामने नहीं आ पाए, लेकिन एक सच यह भी है कि कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं ने सच्चाई बताने की हिम्मत दिखाई. ज़ाहिर है, बिना गुनाह के गिरफ्तार या प्रताड़ना के शिकार हुए युवाओं में बदले की भावना पनपती है. चौथा कारण यह कि केंद्र सरकार केवल मणिपुर ही नहीं, पूरे पूर्वोत्तर से कटी हुई है. दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनाने के सिवाय कुछ नहीं होता. आज भी कई योजनाएं कागजों पर तो हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के गांवों में उनका कोई नामोनिशान नहीं है. प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण नेता विदेश यात्राओं में तो लगातार व्यस्त रहते हैं, लेकिन वे पूर्वोत्तर में साल में एक बार भी दौरा करना उचित नहीं समझते. इससे राज्य के लोगों को उपेक्षा का एहसास होता है.