यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday, August 22, 2009

रेयाज भैया

रेयाज भैया को मैं काफी दिनों से जानता हूं. उनके साथ प्रभात खबर, पटना संस्‍करण में काम किया. वे एक सक्रिय और निष्‍पक्ष पत्रकार हैं. उनकी कविताओं में भारत की युवा पीढी का सबसे सार्थक प्रतिनिधित्‍व झलकता है. उनके बारे में ज्‍यादा बताना उचित नहीं लगता. उनकी कविता और लेख पढकर आप खुद निर्णय ले सकता है. पेश करता हूं उनकी कविताएं और आलेख.


क्रान्ति के लिए जली मशाल
क्रान्ति के लिए उठे क़दम !

भूख के विरुद्ध भात के लिए
रात के विरुद्ध प्रात के लिए
मेहनती ग़रीब जाति के लिए
हम लड़ेंगे, हमने ली कसम !

छिन रही हैं आदमी की रोटियाँ
बिक रही हैं आदमी की बोटियाँ

साक्षी

कुछ शब्‍द
उनके लिए
जो नंदीग्राम में मार दिए गए
कि मैं गवाह हूं उनकी मौत का

कि मैं गवाह हूं कि नई दिल्‍ली, वाशिंगटन
और जकार्ता की बदबू से भरे गुंडों ने
चलायीं गोलियां, निहत्‍थी भीड पर
अगली कतारों में खडी औरतों पर.

मैं गवाह हूं उस खून का
जो अपनी फसल
और पुरखों की हड्डी मिली अपनी जमीन
बचाने के लिए बहा.

मैं गवाह हूं उन चीखों का
जो निकलीं गोलियों के शोर
और राइटर्स बिल्डिंग के ठहाकों को
ध्‍वस्‍त करतीं.

मैं गवाह हूं
उस गुस्‍से का
जो दिखा
स्‍टालिनग्राद से भागे
और पश्चिम बंगाल में पनाह लिए
हिटलर के खिलाफ.

मैं गवाह हूं
अपने देश की भूख का
पहाड की चढाई पर खडे
दोपहर के गीतों में फूटते
गडेरियों के दर्द का
अपनी धरती के जख्‍मों का
और युद्ध की तैयारियों का.

पाकड पर आते हैं नए पत्‍ते
सुलंगियों की तरह
और होठों पर जमी बर्फ साफ होती है.

यह मार्च
जो बीत गया
आखिरी वसंत नहीं था
मैं गवाह हूं.


शामिल
(सु के लिए,जिसके लिए यह कविता लिखी गई और जिसने इसे संभव बनाया)


तुम कहोगी
कि मैं तो कभी आया नहीं तुम्‍हारे गांव
सलीके से लीपे तुम्‍हारे आंगन में बैठ
कंकडों मिला तुम्‍हारा भात खाने
लाल चींटियों की चटनी के साथ
तो भला कैसेट जानता हूं मैं तुम्‍हारा दर्द
जो मैं दूर बैठा लिख रहा हूं यह सब?

तुम हंसोगी
मैं यह भी जानता हूं

तुम जानो कि मैं कोई जादूगर नहीं
न तारों की भाषा पढनेवाला कोई ज्‍योतिषी
और रमल-इंद्रजाल का माहिर
और न ही पेशा है मेरा कविता लिखना
कि तुम्‍हारे बारे में ही लिख डाला, मन हुआ तो

मैं तुम्‍हें जानता हूं
बेहद नजदीक से
जैसे तुम्‍हारी कलाई में बंधा कपडा
पहचानता है तुम्‍हारी नब्‍ज की गति
और सामने का पेड
चीह्न लेता है तुम्‍हारी आंखों के आंसू

मैं वह हूं
जो चीह्नता है तुम्‍हारा दर्द
और पहचानता है तुम्‍हारी लडाई को
सही कहूं
तो शामिल है उन सबमें
जो तुम्‍हारे आंसुओं और तुम्‍हारे खून से बने हैं

दूर देश में बैठा मैं
एक शहर में
बिजली-बत्तियों की रोशनी में
पढा मैंने तुम्‍हारे बारे में
और उस गांव के बारे में
जिसमें तुम हो
और उस धरती के बारे में
जिसके नीचे तुम्‍हारे लिए
बोयी जा चुकी है बारूद और मौत

सुनाओ कि तुम्‍हारा गांव
अब बाघों के लिए चुन लिया गया है
तुमने सुना-देश को तुम्‍हारी नहीं
बाघ की जरूरत है
बाघ हैं बडे काम के जीव
वे रहेंगे
तो आएंगे दूर देश के सैलानी
डॉलर और पाउंड लाएंगे
देश का खजाना भरोगा इससे

सैलानी आएंगे
तो ठहरेंगे यहां
और बनेंगे इसके लिए सुंदर कमरे
रहेंगे उनमें सभ्‍य नौकर
सुसज्जित वर्दी में
आरामदेह कमरों के बीच
जहां न मच्‍छर, न सांप, न बिच्‍छू
बिजली की रोशनी जलेगी
और हवा रहेगी मिजाज के माफिक

...वे बाघ देखने आएंगे
और खुद बाघ बनना चाहेंगे
तुम्‍हारे गांव में कितनी लडकियां हैं सुगना
दस, बीस, पचास
शायद नाकाफी हैं उनके लिए
उनका मन इतने से नहीं भर सकेगा

जो बाघ देखने आते हैं
उनके पास बडा पैसा होता है
वे खरीद सकते हैं कुछ भी
जैसे खरीद ली है उन्‍होंने
तुम्‍हारी लडकियां
तुम्‍हारा लोहा
तुम्‍हारी जमीनें
तुम्‍हारा गांव
सरकार
...वह जमादार
जो आकर चौथी बार धमका गया तुम्‍हें
वह इसी बिकी हुई सरकार का
बिका हुआ नौकर है
घिनौना गाखरू
गंदा जानवर
ठीक किया जो उसकी पीठ पर
थूक दिया तुमने

आएंगे बाघ देखने गाडियों से
चौडी सडकों पर
और सडकें तुम्‍हारे बाप-दादों की
जमीन तुमसे छीन कर बनाएगी
और तुम्‍हारी पीठ पर
लात मार कर
खदेड देगी सरकार तुम्‍हें
यह
तुम भी जानती हो

पर तुम नहीं जानतीं
दूसरी तरु है बैलाडिला
सबसे सुंदर लोहा
जिसे लाद कर
ले जाती है लोहे की ट्रेन
जापानी मालिकों के लिए
अपना लोहा
अपने लोहे की ट्रेन
अपनी मेहनत
और उस पर मालिकाना जापान का

लेकिन तुम यह जानती हो
कि लोहा लेकर गई ट्रेन
जब लौटती है
तो लाती है बंदूकें
और लोहे के बूट पहने सिपाही
ताकि वे खामोश रहें
जिनकी जगह
बाघ की जरूरत है सरकार को

सुगना, तुमने सचमुच हिसाब
नहीं पढा
मगर फिर भी तुम्‍हें इसके लिए
हिसाब जानने की जरूरत नहीं पडी कि
सारा लोहा तो ले जाते हैं जापान के मालिक
फिर लोहे की बंदूक अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे की ट्रेन अपनी सरकार के पास कैसे
लोके बूट अपनी सरकार के पास कैसे

जो नहीं हुअ अब तक
जो न देखा-न सुनाओ कभी
ऐसा हो रहा है
और तुम अचक्‍की हो
कि लडकियां सचमुच गायब हो रही हैं
कि लडके दुबलाते जा रहे हैं
कि भैंसों को जाने कौन-सा रोग लग गया है
कि पानी अब नदी में आता ही नहीं
कि शंखिनी ओर ढाकिनी का पानी
हो गया है भूरा
और बसाता है, जैसे लोहा
और लोग पीते हैं
तो मर जाते हैं

तुम्‍हारी नदी
तुम्‍हारी धरती
तुम्‍हारा जंगल
और राज करेंगे
बाघ को देखने-दिखानेवाले
दिल्‍ली–लंदन में बैठे लोग

ये बाघ वाकई बडे काम के जीव हैं
कि उनका नाम दर्ज है संविधान तक में
ओर तुम्‍हारा कहीं नहीं
उस फेहरिस्‍त में भी नहीं
जो उजडनेवाले इस गांव के बाशिंदों की है.

बाघ भरते हैं खजाना देश का
तुम क्‍या भरती हो देश के खजाने में सुगना
उल्‍टे जन्‍म देती हो ऐसे बच्‍चे
जो साहबों के सपने में
खौफ की तरह आते हैं- बाघ बन कर

सांझ ढल रही है तुम्‍हारी टाटी में
और मैं जानता हूं
कि मैं तुम्‍हारे पास आ रहा हूं
केवल आज भर के लिए नहीं
हमेशा के लिए
तुम्‍हारे आंसुओं और खून से बने
दूसरे सभी लोगों की तरह
उनमें से एक

हम जानते हैं
कि हम खुशी हैं
और मुस्‍कुराहट हैं
और सबेरा हैं
हम दीवार के उस पार का वह विस्‍तार हैं
जो इस सांझ के बाद उगेगा

हम लडेंगे
हम इसलिए लडेंगे कि
तुम्‍हारे लिए
एक नया संविधान बन सकें
जिसमें बाघों का नहीं
तुम्‍हारा नाम होगा, तुम्‍हारा अपना नाम
और हर उस आदमी का नाम
जो तुम्‍हारे आंसुओं
और तुम्‍हारे खून में से था

जिसने तुम्‍हें बनाया
और जिसे तुमने बनाया
सारी दुनिया के आंसुओं और खून से बने
वे सारे लोग होंगे
अपने-अपने नामों के साथ
तुम्‍हारे संविधान में

जो जिये और फफूंद लगी रोटी की तरह
फेंक दिये गये, वे भी
और जिन्‍होंने आरे की तरह
काट डाला रात का अंधेरा
और निकाल लाये सूरज

जो लडे और मारे गये
जो जगे रहे और जिन्‍होंने सपने देखे
उस सबके नाम के साथ
तुम्‍हारे गांव का नाम
और तुम्‍हारा आंगन
तुम्‍हारी भैंस
और तुम्‍हारे खेत, जंगल
पंगडंडी,
नदी की ओट का वह पत्‍थर
जो तुम्‍हारे नहाने की जगह था
और तेंदू के पेड की वह जड
जिस पर बैठ कर तुम गुनगुनाती थीं कभी
वे सब उस किताब में होंगे एक दिन
तुम्‍हारे हाथों में

तुम्‍हारे आंसू
तुम्‍हाना खून
तुम्‍हारा लोहा
और तुम्‍हारा प्‍यार

... हम यह सब करेंगे
वादा रहा.

(शंखिनी और ढाकिनी : छत्‍तीसगढ की दो नदियां
बैलाडिला : छत्‍तीसगढ की एक जगह, जहां लोहे की खाने हैं और जहां से निकला लोहा उच्‍च गुणवत्‍ता का माना जाता है. दो दशक से भी अधिक समय से यह लोहा बहुत कम कीमत पर जापानी खरीद ले जा रहे हैं.)


जारी...

Wednesday, August 5, 2009

23 जुलाई : मणिपुर के एक और खूनी दिन

उस मासूम बच्चे को क्या पता था कि वह दिन (22 जुलाई 09) उसका अंतिम दिन और वह अपनी मां से हमेशा-हमेशा के लिए बिछड जाएगा. इस काले दिन ने उस मासूम को अनाथ बना दिया, जिसकी कमी उसे जिंदगी भर खलती रहेगी.

घटना स्‍थल से रवीना को उठाती हुई पुलिस
22 जुलाई की सुबह 10.30 बजे इंफाल शहर के बीटी रोड में कमांडो द्वारा फ्रिस्किंग किया जा रहा था. जाहिर है कि इंफाल राजधानी है तो सेक्युीरिटी भी जबरदस्तव होंगी. हाल ही में एसेम्बेली की बैठक में मणिपुर के सीएम ओक्रम इबोबी ने आदेश पारित करने के अनुसार इंफाल शहर में बडी संख्याि में सेक्युइरिटी तैनात की जाए. इसलिए राहगीरों से छानबीन की जा रही थी. उरिपोक की तरफ से एक संदिग्‍ध आदमी उसी तरफ आ रहा था, जिस तरफ कमांडो द्वारा चेकिंग की जा रही थी. उसे रोकने पर बंदूक निकाल कर उसने गोली चलाई और गोली चलाते हुए भागने लगा. जवाबी कार्रवाई में मणिपुर कमांडो ने भी गोली चलानी शुरू कर दी. और उसे मार गिराया. इस गोली बारी में पांच और लोग घायल हो गए. दो को गंभीर चोटें आईं. उसी वक्त अपने तीन साल के बेटे के साथ बाजार में खरीदारी करने आई एक औरत अपने बेटे के सामने जान गंवा बैठी. वह गर्भवती थी. उसका नाम थोकचोम रबीना था, उम्र 23 सा‍ल. उस मासूम जान को क्यां पता होगा कि उसका वह दिन अपनी मां के साथ अंतिम दिन है.

घायलों को अस्‍पताल में ले जाते हुए परिजन

बिलखते परिजन

अपनी मां की तस्‍वीर पर फुल अर्पित करता बच्‍चा

मृतक रवीना

असंतोष जनता किसको जिम्‍मेदारी ठहरायेगी. मुख्‍यमंत्री की इफीजि जला कर प्रदर्शन करती हुई


निर्दोष लोगों को मारने में खाली यही होता है जो प्रदर्शन सडक जाम और इफीजि जलाना उसका नतीजा कुछ नहीं होता

इस घटना के कुछ दिन बाद तहलका में इस घटना को लेकर तेरेसा रहमान की स्‍टोरी आई 12 फोटो के साथ. उस स्‍टोरी और फोटो के छपने के बाद पूरे प्रदेश की जनता जल उठी. प्रदेश सरकार के बयान झुठे निकले. सरकार की नींद उड गई. मामला शांत करने को तैयार हो गए थे मगर घटना की पोल खोलने के बाद जनता शांत नहीं हो सकी. तहलका में छपी स्‍टोरी और तस्‍वीर हैं- तहलका के वेब पेज हैं- http://www.tehelka.com/story_main42.asp?filename=Ne080809murder_in.asp








तलका में ये स्‍टोरी आने से पहले लोग शांत था और समझता था कि वाकई में एनकाउंटर हुआ था. मगर तहलका ने जब घटना की पोल खोली तब प्रदेश की जनता हत्‍यारों को सजा दिलवाने के लिए सडक पर उतरी. फोटो से साफ साफ दिखाया गया कि एनकाउंटर नहीं हुआ जानबुझ कर गोली चलाई थी.




उस घटना को एक कार्टूनिस्‍ट ने इस तरह पेश किए


इस तरह की घटना मणिपुर में आम है. हर दिन कहीं न कहीं घटती रहती है. कई मासूम और निर्दोष जानें बिना वजह की चली जाती हैं. संदिग्धक एक आदमी को मारने के लिए कई निर्दोष लोगों की जान गंवानी पडी हैं. यह सही नहीं है कि एक के लिए भीड में अंधाधुंद गोली चलाना और उसका नतीजा निर्दोष जानों को भुगतना. किसको शिकायत करोगे. जिससे शिकायत करनी थी वो तो गूंगा और बहरा की तरह आंखों में पट्टी बांध कर बैठे हैं. किसी की शिकायत सुनते नहीं है. दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही मणिपुर की हालत पर काबू पाने के लिए शासक वर्ग न कोई समझने की कोशिश करते और नही पहल. पिछले 20 सालों से मणिपुर में अशांति फैली हुई है. आतंकवादियों को कुचलने के नाम पर कई निर्दोषों की जानें चली गईं. किसी के मां, बेटे, पिता, भाई-बहन आदि मारे गए. इतनी बेरहम झेलने के बाद भी आज तक किसी भी संस्थाु या कोई भी आदमी आगे नहीं आए. चुपचाप अत्याजचार झेलता रहा. जो आवाज उठाना शुरू हुई, वह भी आत्मआहत्या के आरोप में जेल में समय काट रही है. आखिर किसकी जिम्मेदारी है.
उस घटना को लेकर मुख्यहमंत्री ओ इबोबी कहते हैं कि मारने के सिवाय कोई चारा नहीं है. यह एक अभिभावक और नेतृत्वह की राय नहीं है. शायद उनको पता नहीं है कि मारने से आतंकवादी जड से मिटा नहीं पाएंगे. उसके लिए पहल करना होगा. आतंकवादी का जड को समझना होगा और उसको दूर करने की योजना बनानी होगी. जब तक कारण को नहीं समझेंगे और निदान नहीं करेंगे तब तक आतंकवाद मिटाना मुश्किल है. उनको आठ-दस सालों से माहौल देखते आ रहे हैं. वे मुख्यामंत्री हैं. इसपर सरकार क्यां करना चाहिए, उनको समझना चाहिए. मासुमों की चीख कब तक सुनते रहेंगे. यह जनता को उपेक्षा का एक नमुना है. शोकाकुल परिवार को तो सांत्वचना देंगे और मरहम लगाएंगे. इससे घाव भरेगा. लेकिन कब तक सांत्वलना देते रहेंगे. एक दिन तो पूरे प्रदेश से एक ही आवाज निकलेगी – हमें आजादी चाहिए.

मणिपुर एसेम्बतली की बैठक में मुख्यनमंत्री ने आतंकवादी को लेकर इस तरह भाषण पेश किया-
इस राज्य‍ में असंख्यक आतंकवादियों ने पैसे के लिए किए जा रहे हत्या और हमले से आम जनता बर्दाश्तस नहीं कर पा रही है. आज इंफाल शहर में जो घटना घटी है वह एक दुखद है. इस राज्यद में जो भी आतंकवादी गुट हैं सभी मणिपुरी हैं. सरकार उनको मारना नहीं चाहती है. मगर अब जो भी घटना घट रही है वह सब बर्दाश्तै के बाहर है. उन्हों ने आगे कहा कि इस राज्यद के सात विधानसभा क्षेत्र (एसेम्बाली सेग्मेंैट 7) से अफसपा हटाना केंद्र की पसंद के विपरीत था. अफसपा हटाने के बाद इंफाल शहर में हो रही इस तरह की घटना को देख कर केंद्र सरकार का मानना है कि राज्यट सरकार आतंकवादियों को प्रोत्सा हन दे रही है. केंद्र सरकार नाराज जताती है कि राज्या सरकार आतंकवादियों को बचा रही है. इसके साथ इस राज्य. के आतंकवादियों द्वारा पैसे की मांग करना, धमकी देना और लूटपाट की घटनाओं से केंद्र सरकार भी इस मसले में गंभीर नहीं है. आतंकवादी समस्याट को खात्म् के लिए बातचीत करने को कहने पर मजाकीय लहजे में कहा कि कौन सा आतंकवादी गुट से बातचीत करनी है. केंद्र सरकार ने कहा कि राज्यन सरकार इस विषय में बहुत ढीला-ढाला डील कर रही है. कोई भी आतंकवादी गुट जब तक पैसा कमाते रहेंगे तब तक बातचीत करने को तैयार नहीं होंगे. केंद्र सरकार का विश्वा स है कि तब उन लोगों को बातचीत करने को तैयार होंगे जब यातना देंगे. अब तो देखना यह है कि आतंकवादी शासन करेंगे या सरकार.

Monday, August 3, 2009

मीर, मैं तुम्‍हारे सिरहाने बोल रहा हूं



उन तमाम बच्चों के लिए, जो अमरीकी आर्थिक प्रतिबंध के कारण मारे गए)

तुम्हारे दु:खों को मैं जानता हूं
तुम्हारे आंसू मेरे चेहरे को भींगो रहे हैं
मैं जानता हूं
तुम अभी-अभी रोते-रोते सोये हो
फिर भी
मैं तुम्हारे सिरहाने बैठ कर बोल रहा हूं, मीर!
बहुत उदास है रात,पसरा है मातमी सन्नाटा
कहीं से कोई आवाज नहीं,कोई पुकार भी नहीं
मैं बताना चाहता हूं
कल तक जहां घास के मैदान थे
अब वहां कब्रें हैं, (जहां सोये हैं बच्चे
जो कभी नहीं जागेंगे
वे इराकी हैं,फिलिस्ती नी हैं, सर्बियाई हैं, अफगानी हैं
मीर उन बच्चोंम की कब्रें उदास सी निर्जन पडी हैं
उन पर घास उग आए हैं
उन पर किसी ने फूलों के गुच्छे नहीं रखे
कहीं कोई मोमबत्ती नहीं जल रही
प्रार्थना का कोई स्विर नहीं सुनाई पड रहा है
कहीं उनके लिए एक मिनट का मौन नहीं रखा गया
उनके लिए मर्सिया नहीं पढा गया
उन्होंथने जो जीवन खोया
उसकी कोई पहचान बाकी नहीं है.
मीर! वे मरे नहीं, मारे गए.
उन्हेंथ उनकी मां की गोद से दूर कर दिया गया
उनकी धरती से दूर कर दिया
उनकी हवा से दूर कर दिया गया
उनकी रोटियां छीन ली गईं
दवाइयां छीन ली गईं
उनके खिलौने,उनकी धरती, उनकी हवा पर
प्रतिबंध लगाए गए.
मीर,आज जो लाखों बच्चे कब्रों में सोये पडे हैं
कल तक, उनका अपना आकाश था, अपने गीत थे,
अपना शहर था
घास के मैदान थे, घाटियां थीं, उनके घर थे, चूल्हें थे
उनकी नींद थी और उनके सपने थे
इस उदास रात में जागो, मीर!
देखो बच्चोंा की कब्रें हैं, जो दिख रही हैं
नहीं दिख रहे हैं तो वे जो इनके हत्याहरे हैं
जो प्रतिबंध लगाते हैं और मौत देते हैं.
मीर कितनी रातें कितने गम कितनी बातें बीत गईं
उनके दर्द की दास्तां कहते-कहते, बादल भी रो गए
भले ही उनकी मौत का जिक्र
शहंशाहों की गलियों में न हो
लेकिन अपने आंसुओं से तर, चेहरे के साथ जागो, मीर!
और एक दीप उन बच्चोंट की कब्रों पर जला दो
जो अभी-अभी रोते-रोते सो गए हैं.

-सत्येंद्र कुमार
सौजन्य - जन-ज्वार

Saturday, July 18, 2009

बोलबम के जयघोष के बीच श्रावणी मेला शुरू

सावन की रिमझिम फुहार व बोलबम के जयघोष के बीच 7 जुलाई मंगलवार को देवघर के श्रावणी मेला शुरू हो गया. शरुआत का आयोजन कांवरिया पथ पर झारखंड के प्रवेश द्वार दुम्मा में मुख्यु अतिथि राज्यकपाल के सलाहकार टीपी सिंह ने परंपरागत वैदिक मंत्रोच्चोरण के साथ फीता काट कर उदघाटन किया. राज्यलपाल के सलाहकार सह मंदिर प्रबंधन बोर्ड के अध्य क्ष सिन्हा ने कहा कि श्रद्धालुओं को सुगम दर्शन कराने के साथ देवघर आने पर एक सुखद अनुभूति हो, इसकी व्यकवस्थात की गई है, ताकि कांवरिया यहां से अविस्म रणीय याद लेकर जाएं. मेले के पहले दिन में 50 हजार श्रद्धालुओं ने जल चढा.



झारखंड के देवघर में लगने वाले इस मेले का सीधा वास्ता बिहार के सुल्तारनगंज से है. यही गंगा नदी से जल भरने के बाद बोलबम के जयघोष के साथ कांवरिए नंगे पाव से 105 किमी देवघर की यात्रा आरंभ करते हैं. इस बार पहली बार हुआ है कि बिहार के सुल्ताएनगंज में जिला प्रशासन की लचर व्य वस्थार के कारण मंच तैयार होने के बावजूद मेले का उदघाटन नहीं किया. पहली बार मेला बिना उदघाटन ही शुरू हो गया. विभागीय मंत्री इसको प्रशासनिक चूक मानते हैं. सबसे बडी गलती तो यह है कि मंत्रियों और प्रमुख लोगों को आमंत्रण ही नहीं मिल सका. यह दुर्भाग्यट है कि इतने बडे मेले के लिए आमंत्रण तक पहुंचा नहीं पाए. बावजूद हजारों कांवरियों ने अजगैबीनाथ व अन्यि घाटों पर पवित्र गंगा में डुबकी लगा कर जल उठाया. हर साल डाक बमों को प्रमाण पत्र दिया जाता है. इससे मंदिर में उन लोगों को पहले जल चढाने का मौका मिलता था, मगर इस बार जिला प्रशासन ने प्रमाण पत्र नहीं दिया. कांवरियों ने हंगामा भी किया, फिर भी प्रमाण पत्र नहीं दिया. इसके बाद गुजरात, नागपुर, मथुरा और सुदूर नेपाल सहित अन्या राज्यों से पहुंचे डाक कांवरिए बिना प्रमाण पत्र के ही बाबा के दरबार की ओर चल पडे. बिहार के मुख्यामंत्री नीतीश कुमार ने झारखंड के राज्यरपाल सैय्यद सिब्तेह रजी को फोन पर बात की कि पुराने जमाने से चली आ रही डाक बमों की परंपरा पर छेडछाड न हो.

एक महीना तक चलनेवाला यह मेला महाकुंभ से भी कम नहीं है. हम रोज कांवरियों की भीड लाखों से भी पार कर जाती है. सोमवार में अन्य दिनों की अपेक्षा जल चढाने के लिए देश भर से शिव भक्तों का तांता लगा रहता है. लंबी कतारें, ऐसी लंबी जो तीन-चार दिनों तक लगी रहती हैं. लाइन में ही लोग सो जाते हैं. मंदिर पहुंचते-पहुंचते कई दिन लगता है. मगर उनके पास न श्रद्धा की कमी है और न ही ताकत की.



वैसे कुछ वर्ष पहले इस मेले पर जल चढाने की होड रहती थी, वह अब उतनी नहीं है. आज के बदलते परिवेश में धर्म की अवधारणा ध्वलस्तढ होती गई है. उपभोक्तानवादी इस दौर में लोग खाली सुख-सुविधा पाना चाहता है, लेकिन उसी को पाने में भी पूजा-पाठ का अलग महत्वन रहता है. इस मायने में देवघर स्थित शिवलिंग का अपना अलग महत्वे है, क्योंनकि इसको मनोकामना लिंग भी कहा गया है. यह देश के 12 ज्योितिर्लिंगों में से एक माना जाता है. यह वैद्यनाथधाम से भी जाना जाता है. वैसे देवघर के शिवलिंग के बारे में एक प्रचलित कथा है. रावण ने शिव जी की अराधना की, तो भगवान शिव प्रसन्नक होकर रावण के प्रत्यलक्ष दर्शन दिए. भगवान शिव जी ने रावण को वरदान मांगने को कहा. रावण ने यह वरदान मांगा कि शिव लिंग को लंका ले जाएं. भगवान ने रावण को वह वरदान दे दिया और एक शर्त बताया कि बीच में शिवलिंग कभी मत रखना. अगर किसी भी स्थिति से कहीं नीचे रख दिया, तो उसी जगह पर ही मैं रहूंगा. इस शर्त पर शिवलिंग को रावण ने ले आए. देवताओं को शिवजी के रावण को दिया हुआ वरदान से चकित और निराश हुए. इससे बचाने के लिए भगवान विष्णुे ने एक साधु के रूप में अवतरित होकर आए. भगवान विष्णुए ने रावण को पैशाव जोर से लगवाया. मगर शिवलिंग को सौंपने के लिए कोई नजर नहीं आ रहा था. अंत में भगवान विष्णु के अवतरित उस साधु की नजर आई. रावण साधु को शिवलिंग सौंप कर पैशाब करने गए. विष्णुव भगवान ने रावण को पैशाब खत्मर ही होने नहीं दिया. इधर, साधु ज्याएदा समय शिवलिंग को पकड नहीं पाने से जमीन में रख कर चले गए. काफी देर के बाद पैशाब खत्मि होकर रावण उस साधु के पास आए. उनकी नजर नहीं आई. शिवलिंग तो जमीन पर रखा हुआ है. रावण यह देख कर चौंक गए साथ में नाराज भी, क्यों कि जो शर्त शिवजी ने बताई थी, वह निभा नहीं पाया. रावण ने शिवलिंग को उठाने की कोशिश की, मगर उठा नहीं पाए. अंत में नाराज होकर मुट्ठी से शिवलिंग को मारी थी. तभी से उसी जगह पर ही शिवलिंग बस गए. उसी जगह को आज बाबाधाम के नाम से जाना जा रहा है और रावण ने जो पैशाब किया था उसी जगह को शिब गंगा, एक पोखड के रूप में हो गए. उसी शिवगंगा पर श्रद्धालु मंदिर प्रवेश करने से पहले डुबकी लगाते हैं. मेले के मौके पर देवघर पूरे दिन-रात बोलबम से गुंजायमान हो उठता है. हर गली-मुहल्ले में भक्तिमय माहौल व्या प्तव है.



देवघर के इस श्रावणी मेले के साथ बाजार का अर्थशास्त्र भी जुडा है. मेले का दरमियान देवघर में कई अनगिनत छोटी और बडी दुकानें खुलती हैं. पूजा-पाठ में आवश्य क चीजें जैसे फूल, बेलपत्र और अगरबत्तीघ वगेरह बेचने वाली दुकानें तक पूरे सावर महीने में 40 से 50 हजार कमाती हैं. इसके अलावा कई बडी दुकानें कपडे, चूडा, मिठाई, पेडा, लोहे के सामान, सिंदूर और चुडियों की हैं, जो पूरे सावन में अधिक से अधिक पैसा कमाते हैं, इसके अलावा बाहर से आए दुकानदार भी इस मेले में अधिक कमाते हैं. मुख्यि रूप से बंगाल, उडीसा, यूपी आदि राज्यों से लोग मेले के दौरान सामान बेचने आते हैं. पूरे महीने खरीदारी चलती रहती है. इस तरह सिर्फ श्रावणी मेले में पांच सो करोड की खरीदारी इन वस्तुाओं की होती है. साथ में कांवरियों के साथ कुछ वस्तु्एं साथ में ले जाना आवश्य क होता है जो कि एक हजार रुपए की खरीदारी होती है. जैसे टार्च, अगरबत्तीय, गंजी-बनियान, तौलिया, चादर, दो जल पात्र, मोमबत्ती और माचीस आदि. इसके अलावा कांवरिए रास्तें में चाय, ठंडे पेय, खाद्य आदि पर भी प्रति कांवडिया चार पाच दिनों में दो सौ से ढाई सौ रुपएा तक खर्च करता है. कुल मिला कर श्रावणी मेले का अर्थशास्त्रआ करीब एक हजार करोड का है. मगर दुख की बात है कि इस मेले में कई बडी कंपनी करोडों कमाती है. जैसे टी सीरिज है जो कि कांवरियों के गाने फिल्म और एल्बेम की सीडी काफी मात्रा में बेचती है. मगर श्रद्धालुओं के लिए कांवरिया पथ में सुविधा मुहैया कराने के लिए एक भी रुपए खर्च नहीं करती. सावन खत्म् होते ही अपना सामान समेट कर चलती है. सुल्ताानगंज से देवघर की दूरी 105 किमी है. इसमें सुइया पहाड जैसे दुर्गम रास्तेो और नंगे पांव गुजरने में नुकीले पत्थार पांव में चुभने वाली कई जगह शामिल हैं. मगर शिवभक्तोंह को इसके परवाह नहीं करते. कई दिन-रात बिना खाए थकते नहीं हैं. उनके मुंह से एक ही आवाज निकलती है बोल बम, बोलबम का नारा है बाबा एक सहारा है. भक्तैजनों की श्रद्धा अद्भुत है. गंगा जल भरते हुए पैदल 105 किमी की दूरी तय करके शिवजी के ज्योातिर्लिंग पर जल चढाना एक साधारण आदमी की वश की बात नहीं है. वहीं आदमी कर सकता है, जिसे भोलेनाथ का आशीर्वाद हो.


अब बिहार सरकार की नजर इस धार्मिक यात्रा पर पडी. राज्यर सरकार ने इस वर्ष कांवरियों के लिए कच्चीह सडक का निर्माण प्रारंभ कराया है. खुशी की बात तो यह है कि इस कार्य के पूरा होने के बाद सुल्ताानगंज से देवघर की दूरी 17 किमी कम हो जाएगी और नंगे पांव से यात्रा सुगम होगी. श्रावणी मेला को और आकर्शण बनाने के लिए हरिला जोडी और शिवगंगा को दर्शनीय स्थ ल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई है. इससे बाबा के दर्शन के साथ तीर्थ यात्री मनोरंजन के साथ पर्यटक स्थ ल का भी आनंद उठा सकेगा. त्रिकुट रोप वे का भी कार्य शुय होनेवाला है. टेक्निकल स्वीहकृति मिल गई है. वहीं हरिशरणम कुटिया को पार्क के रूप में विकसित करेंगे. झारखंड पर्यटन विभाग ने देवघर में इस बार मोबाइल बेस्डय सूचना प्रणाली स्थातपित किया है. इससे लोगों का एसएमएस के जरिए पर्यटन की जानकारी मिलेगी. मेले को सुव्यलवस्थित करने मेला प्राइज़ का गठन और श्रावणी मेले को राष्ट्रीएय मेले का दर्जा देने के लिए देवघर के विधायकों का प्रयास जारी है. लोगों का मानना है कि मेला प्राइज़ के गठन से न सिर्फ सुल्ता नगंज से लेकर बासुकिनाथधाम तक मेले का एक समान विकास हो पाएगा, बल्कि श्रावण महीने में विभिन्नब जिलों के प्रशासन खास कर, देवघर भागलपुर और दुमका के जिला प्रशासन पर पडने वाले अतिरिक्त‍ बोझ भी कम होगा और जिले के विकास कार्य भी प्रभावित नहीं रहेगा. यह कहने में गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में यह उम्मी द की जा सकती है कि कांवरिए सुगम यात्रा के साथ बाबा को जल चढा सकेंगे.



मेले में आते हैं भांति-भांति के बम
सुल्तानगंज से देवघर तक 105 किमी की पैदल कांवरयात्रा में तरह-तरह के बम होते हैं. अधिकतर ऐसे कांवरिए होते हैं, जो साधारण पात्रों में जल भर कर उठते-उठते, सोते-जागते, खाते पीते दो से चार दिनों में अपनी कांवर यात्रा पूरी करते हैं. इन्हें साधारण बम कहा जाता है. दूसरे होते हैं खडा कांवर बम, जो रास्तेा में कही भी न तो जमीन पर अपना कांवर रखते हैं और न ही कांवर स्टैंबडों में. ऐसे में बम प्राय: एक सहायक लेकर चलते हैं और उनके आराम के वक्तर सहायक व्यवक्ति ही कांवर अपने कंधे पर रखता है. तीसरे होते हैं डाक बम, जो जल भरने के बाद लगातार चल कर 24 घंटे में देवघर पहुंच कर बाबा का जलाभिषेक करते हैं. ऐसे बम कांवर नहीं रखते हैं, बल्कि छोटे पात्रों में जल भर कर इसे पीठ पर लटका लेते हैं. इन्हेंे हर जगह विशेष सुविधा प्राइज़ होती है. दंडी बम रास्ते भर दंड देते हुए आते हैं और यह सबसे माना जाता है, जब माहवारी बम प्रत्येजक महीने पैदल आकर बाबा को जल चढाते हैं.

Thursday, July 2, 2009

विशेष कानून : अगाथा ने भी मिलाया शर्मिला से सुर

पूर्वोत्तर की दो शीर्ष महिलाएं आपस में मिलीं. दोनों ने एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटे थे. कई दिनों से आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट-1958 के चलते मणिपुर में व्याप्त आशांति का जायजा लेने केंद्र की सबसे युवा सांसद अगाथा संगमा पिछले दिनों तीन दिनों की यात्रा पर मणिपुर आई थी. जेएन अस्पताल के विशेष तौर पर सुरक्षित वार्ड में इस एक्ट के विरोध में जिंदगी और मौत से लड़ रही इराम शर्मिला से मुलाकात की.



इस मुलाकात में शर्मिला ने मणिपुर से यह कानून हटाने में अगाथा की मदद की आस लगाई. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को रद्द करवाने को लेकर पिछले आठ साल से अनसन पर बैठी इरोम शर्मिला से मुलाकात के बाद पत्रकारों को संबोधित करती हुई अगाथा ने कहा कि इस काले कानून को रद्द करने को केंद्र सरकार से वह मांग जरूर करेंगी. उन्होंने कहा कि वह जनता को आश्वाशन देती हैं कि जितना हो सके, इस मुद्दे को प्राथमिकता देंगी. उसके कुछ ही समय बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस मसले पर मुलाकात कर अनशन पर बैठी शर्मिला को बचाने की अपील की. उनकी इस मुलाकात से प्रदेश की जनता को उम्मीद है कि पिछले कई सालों से प्रदेश में इस कानून के सहारे जो मनमानी की जा रही है, उसका अंत होगा. यूपीए सरकार की सबसे युवा मंत्री अगाथा संगमा ने लिखित ज्ञापन देकर शर्मिला की जिंदगी बचाने की मांग की.
अगाथा की इस मुलाकात से प्रदेश में कई सालों से आस लगा रही जनता को उम्मीद की नई किरण दिखी हैं. इसकी वजह यह है कि कई सालों से शर्मिला के इस संघर्ष को किसी राजनेता या किसी अधिकारी ने न तो जानने की कोशिश की और न ही इस मामले का जायजा लिया. इस मसले पर केंद्र सरकार ने हर वक्त कठोर कदम उठाए हैं. केंद्र यह मानने को तैयार नहीं है कि पूर्वोत्तर राज्यों से विशेष सशस्त्र बल कानून हटाया जाए. इस मामले को लेकर राज्य सरकार का रुख भी वैसा ही है, जैसा केंद्र का है. राज्य सरकार कई मुद्दों पर मजबूर हो जाती है और केंद्र के इशारों का इंतजार करती रहती है.



मणिपुर की जनता तो इस कानून को जंगल का कानून मानती है, जिसके मुताबिक कभी भी किसी को मार गिराया जा सकता है. इस कानून को लोग बेहद खराब नजर से देखते हैं. 2004 में कथित तौर पर असम रायफल्स के जवानों ने सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी की हवालात में बलात्कार के बाद हत्या कर दी थी. उसके विरोध में समूचे प्रदेष में आग लग गई, जो अभी भी सुलग रही है. इस कानून को लेकर शर्मिला का मानना है कि इस दुनिया में मनमानी से कोई किसी को मार नहीं सकता. यह सोचने-समझने वाले मनुष्य की दुनिया है, जानवारों को नहीं. शर्मिला देश के शासक वर्ग से यह सवाल पूछ रही है कि जंगलराज के भीतर कब तक आम आदमी बिना डर के जी सकता है? शर्मिला कहती हैं कि यह भूख-हड़ताल तभी खत्म होगी, जब सरकार वगैर किसी शर्त के आर्म्ड फोर्सेस स्पेच्चल पावर एक्ट को हटाएगी. आतंकवादी समस्या पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक आंतरिक और स्थाई समस्या है. इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या है विशेष सशस्त्र बल कानून 1958, जिसको हथियार बनाकर आतंकवाद को कुचलने के नाम पर निर्दोष लोगों पर जुल्म हो रहे हैं. इससे आमजन का अमन-चैन छिन रहा है.
अगाथा की शर्मिला से मुलाकात को लोगों ने बहुत सराहा. मणिपुर की आम जनता ने इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य न देख कर उनकी संजीदगी देखी. उनको ऐसा लगा कि परिवार की कोई बहन अपनी बड़ी बहन से मिल रही हो. गौरतलब है कि असम रायफल्स के जवानों ने 2000 में 10 निर्दोषों को मार दिया था. इसके विरोध में ही शर्मिला आमरण अनशन पर बैठ गई. उसी वक्त राज्य सरकार ने इंफाल शहर के कई विधानसभा क्षेत्रों से यह कानून हटा दिया था. केंद्र के मना करने के बावजूद मणिपुर सरकार ने एक प्रयोग के तौर पर कुछ खास इलाकों में इस एक्ट को रद्द करना शुरू किया था. कानून-व्यवस्था अगर दुरुस्त रही, तो इस एक्ट को अन्य जगहों से भी हटाने की घोषणा राज्य सरकार ने की. मगर शर्मिला ने इस एक्ट को राज्य से पूरी तरह से हटाने की मांग की. इस बात को लेकर वह अड़ी रहीं. उल्लेखनीय है कि कइस एक्ट के विरोध में मणिपुर से लेकर उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों और देच्च के कुछ हिस्सों में अप्रिय घटना घटने के बाद केंद्र सरकार ने जस्टिस जीवन रेड्डी के नेतृत्व में एक समिति बनाई. समिति ने भी इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था. दूसरी तरफ शर्मिला को बचाने के लिए पिछले छह महीने से शर्मिला बचाव समिति पीडीए कांप्लेक्स, इंफाल में अनशन कर रही है. इस अभियान में सिने एक्टर्स गिल्ड मणिपुर के सदस्यों ने भी जून 28 से शिरकत करने का फैसला किया. कुल मिला कर अगाथा संगमा की मणिपुर यात्रा और इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात से लगता है कि राज्य से इस काले कानून को हटा दिया जाएगा.

क्या है आर्म्ड फोर्स स्पेच्चल पावर एक्ट?

आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट को 11 सितंबर 1958 को संसद में पारित किया गया था. यह पूर्वोत्तर के राज्यों - अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे अच्चांत क्षेत्रों में सेना को विशेष ताकत देने के लिए पारित किया गया था.

यह कानून लागू होने वाले इलाके में सेना क्या-क्या कर सकती है.

1.भले ही मौत का कारण बने, फिर भी इसके तहत किसी पर देखते ही गोली चलाई जा सकती है.
2.इस एक्ट के अनुसार किसी को भी शक के आधार पर ही वारंट के बिना भी जबरदस्ती गिरफ्‌तार किया जा सकता है.
3.किसी को गिरफ्‌तार करने के लिए सेना किसी भी इलाके की तलाच्ची ले सकती है.

इस एक्ट के विरोध में कौन-कौन

पूरे देश के सौ से भी अधिक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एच्चिया से भी आए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इंफाल में विरोध प्रदर्शन कर इस एक्ट को हटाने के लिए संघर्ष कर रही शर्मिला का समर्थन किया. भारत की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं इस एक्ट का समर्थन करती हैं. वे हैं - आशा परिवार, नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इंफोरमेच्चन, राइट टू फूड कैंपेन, असोसिएशन ऑफ पैरेंट्स ऑफ डिसअपियर परच्चंस, नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्‌यूमन राइट्स, एकता पीपल्स यूनियन ऑफ ह्‌यूमन राइट्स, इंसाफ लोकराज संगठन, हिंद नव जवान एकता सभा, ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमन असोसिएशन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन, फोरम फॉर डेमोक्रेटिक इनिसिएटिव्स और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी 'मार्क्सवादी-लेनिनवादी' आदि

विदेशों से भी समर्थन

केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठनों और एनआरआई ने भी इस एक्ट का विरोध किया है. द पीस कॉलिच्चन ऑफ पीपल ऑफ साउथ एशिया, फ्रेंड्स ऑफ साउथ एशिया, एनआरआई फॉर ए सेकुलर एंड हारमोनिअस इंडिया, पाकिस्तान ऑर्गेनाइजेशंस, पीपल्स डेवलपमेंट फाउंडेशान, इंडस वैली थिएटर ग्रुप और इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड सेकुलर स्टडीज.

Sunday, June 21, 2009

18 जून मणिपुर के इतिहास में एक यादगार दिन


केंद्र सरकार और एनएससीएन आईएम के बीच युद्ध विराम यानी सीज फायर की खबर जब मणिपुर पहुंची, उससे पहले से ही प्रदेश की जनता इस बात की उम्मीद लगा चुकी थी. 2001 के 18 जून को केंद्र सरकार और एनएससीएन आईएम के बीच युद्धविराम लागू कराने वाली जगहों को बढ़ाने में मणिपुर भी शामिल था. लेकिन यु+द्ध विराम हो, इससे पहले यह खबर इंफाल पहुंच गई. यह खबर पूरे राज्य में बवंडर की तरह फैल गई. मणिपुर की कई संस्थाओं ने इसे मानने से इंकार कर दिया. अमुको, एमसु, निपको, एमकिल, ईपसा, यूपीएफ आदि ने मिल कर इस निर्णय को वापस लेने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के इरादे से आम हड़ताल की घोषणा कर दी, जो 15 जून की रात से लागू होकर 18 जून तक चला. हड़ताल की शुरुआत में केंद्र के सत्ताधारियों सहित राज्य में शासन कर रहे नेताओं का पुतला दहन कर इन संस्थाओं ने अपना विरोध जताया. हड़ताल का चौथा दिन, 18 जून. यह दिन राज्य के इतिहास में काला दिन साबित हुआ. इस दिन में कई मासूमों की जान चली गई. इस दिन भोर में ग्रेटर इंफाल के इलाके में रहनेवाली जनता ने जगह-जगह नुक्कड़ पर इकट्ठा होकर बैठक करना शुरू किया. भारी तादाद में लोगों के सड़क पर निकलने से राज्य के बाकी हिस्से के लोग भी जोश से भर गए और निर्भय होकर अपने-अपने घरों से निकल पडे+. रक्षाकर्मियों ने भीड़ को भगाना शुरू किया. मगर लोग घर तो नहीं गये, हां और ज्यादा आक्रोच्च से जरूर भर गये. भीड़ और ज्यादा सड़को पर निकल आई.

भीड़ ने जनसैलाब की शक्ल अख्तियार कर ली. पुलिस ने उन पर काबू पाने के लिए टियर ग्यास और ब्लेंक फायर करना शुरू किया. आक्रोच्च से भरी भीड़ ने जवाबी हमला करते हुए पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू किया. विच्चाल संख्या में मौजूद पुलिस फोर्स ने भीड़ को नियंत्रित करने की नाकाम कोच्चिच्च की. लेकिन वांगखै और नोंगमैबुंग के रास्ते से आए लोग आगे बढ़ते-बढ़ते राज्यपाल के बंगले के सामने जा पहुंचे. उरिपोक, सगोलबंद और टिडीम रोड के रास्ते से आए लोग एक साथ होकर राज्यपाल बंगले के सामने जा धमके.

इतनी बड़ी तादाद में जमी भीड़ ने राज्यपाल से बात करने का प्रस्ताव रखा. बात करने का मौका न मिलने पर जनता और भी आक्रोच्चित हो गई. इतनी बड़ी भीड़ को रोकने की इन सेक्यूरिटी पार्सोनेल के पास शक्ति नहीं थी. और भीड़ थी कि लगातार बढ़ती ही जा रही थी. राजभवन के सामने होम मिनिस्टर और प्राइम मिनिस्टर का पुतला जलाया गया. आक्रोच्चित भीड़ ने राजनेताओं और उसके आवास को जलाकर राख कर दिया. विशेष बल आने पर भी स्थिति नियंत्रण नहीं हो पाई. गुस्साए लोगों ने कैशामपात स्थित मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी के ऑफिस को जला दिया. ऑफिस कंपलेक्स के अंदर स्थित कैंटिन भी जल कर राख हो गई. बीटी रोड स्थित मणिपुर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ऑफिस, रूपमहल टेंक स्थित समता पार्टी का ऑफिस और सीपीआई का ऑफिस आदि को भी जलाने की कोच्चिच्च की. पिपल्स रोड स्थित एमपीपी के ऑफिस भी जलाकर राख कर दिया. ऑफिस जलाने के बाद गुस्साए लोगों ने मणिपुर लेजिस्लेटिव असेंबली को निशाना बनाया और उसे जलाना शुरू किया.


इतना ही नहीं सीआरपीएफ से लैस मणिपुर के मुख्यमंत्री के बंगले के पश्चिम गेट को तोड़कर भीड़ अंदर घुस गई और तोड़-फोड़ मचा कर रख दिया. साथ में सामान को जलाने भी लगे. मुख्यमंत्री आवास के कंफरेंस हॉल और पड़ोसी कमरे जल कर राख हो गए. उस वक्त मुख्यमंत्री दिल्ली में थे. आगे एमएलए क्वार्टर में लोगों ने घुस कर यूनियन मिनिस्टर ऑफ स्टेट का
क्वार्टर, कई मंत्री के क्वार्टर और प्लानिंग विभाग के ऑफिस आदि एक-एक कर जला डाले.
जवाबी कार्रवाई करते हुए सीआरपीएफ ने भी अंधाधुंध गोली चलाई. उसमें 13 लोगों की मौत तत्काल घटना स्थल पर ही हो गई. शाम तक मरने वालों की संख्या 18 हो गई. मुख्यमंत्री का बंगला जलाने के बाद से ही सीआरपीएफ ने गोली चलाना शुरू कर दिया था. उस घटना में दो एक्स एमएलए जल मरे थे. साथ में और भी सरकारी संपत्तियां जलीं. इसके बाद मणिपुर घाटी के तीन जिले में कफ्‌र्यू लगा दिया गया. सड़क पर जो कोई भी दिखे, उसे गोली मारने का आदेच्च दे दिया गया.


इस तरह मणिपुर की अखंडता बचाने के लिए 18 जानों ने 18 जून 2001 को कुरबानी दे दी. अखंडता तोड़ने के बदले हम अपनी जान दे देंगे. शांति पसंद मणिपुर की जनता केंद्र सरकार को कई बार मणिपुर में सीज फायर लागू नहीं करवाने के लिए अपनी मांग प्रस्तुत कर चुकी है. बावजूद इसके केंद्र सरकार ने नगालैंड के साथ मिल कर सीज फायर एक्सटेंट करने की जो घोषणा की थी, उसी का नतीजा था 18 जून 2001 की यह अमानवीय घटना. हर साल 18 जून को लोग इसे एक सामाजिक पर्व की तरह मनाते हैं. इस दिन का इतिहास जब तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेगा, तब तक मणिपुर के अखंडता कोई तोड़ नहीं सकता. इस विश्वास के साथ लोग इस दिन को एक लोकोत्सव की तरह मनाते हैं.

दिल्‍ली नहीं आना चाहिए था

पटना से एक पुराने मित्र दिल्‍ली आए थे. दिल्‍ली में शुरू में टिकने के लिए मुश्किलें सामना करना स्‍वाभाविक बात है. उसने पुराने मित्रों से संपर्क किया और उन लोगों के पास जाकर राय-परामर्श लिया. एक बुजुर्ग साथी ने उनसे कहा कि यार अभी दिल्‍ली नहीं आना चाहिए था तुमको. पटना में ही रहना चाहिए था. अभी तो मंडी का दौर है. मैं तो यही राय दूंगा कि आप पटना में ही रहिए. उस पुराने मित्र ने हमको फोन किया. आप कहां है. मैंने अपना पता बताया तो बोले कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूं. मैंने कहा कि हम मिलते हैं कनाटप्‍लेस में. अगले दिन कनाटप्‍लेस में मिले रिगेल के सामने. सामने पार्क में बैठकर पुरानी यादों को ताजा किया. और दिल्‍ली के माहौल के बारे में बातचीत करने लगे. इस दरमियान उसने हमको पूरी कहानी बताई. मैं मन ही मन सोचने लगा कि जब आदमी संकट में पड जाते हैं तो उसकी मदद करने में क्‍यों लोग कंजुस करता है. मदद की बात तो छोडिए. कोई दिल्‍ली आकर नौकरी के बारे में राय परामर्श लेता है तो लोगों को ये लगता है कि नौकरी उनसे ही मांगने आ रहा है. और कहने लगता है कि यार तुमको दिल्‍ली आना नहीं चाहिए था. अभी समय खराब चल रहा है. अरे भैया कौन सा समय कब सही चलता है. मनके जीते जीत मनके हारे हार. आप अच्‍छे सोचते हैं तो अच्‍छा है. खराब सोचते हैं तो खराब. लोग खुद भी बढता नहीं है और दूसरों को भी बढने नहीं देता है. सामने कोई बढता है तो लोगों को अच्‍छा नहीं लगता. किसी को दिल्‍ली में आकर आपने आपको आगे बढाने के लिए कोशिश करना कितनी अच्‍छी बात है. खाली दिल्‍ली की बात नहीं है कोई भी बडे शहरों में जाकर खुद के और परिवार के लिए कुछ करना बहुत हिम्‍मत की बात तो है. हर आदमी से इस तरह नहीं होता है. दिल्‍ली में नौकरी का ऑप्‍सन जितना मिल रहा है उतना कोई और शहर में नहीं मिलता होगा. मेरा मानना है कि दिल्‍ली आना ही चाहिए था. मंडी में ही कीमत बढती है. लोग कहने लगता है कि मंडी का दौर चल रहा है. मंडी का दौर में ही नौकरी की तलाश आसानी होती है. मैं उम्‍मीद करता हूं कि लोग खुब संघर्ष करें. और आगे बढे.