यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday, July 19, 2013

सरकारी कर्मचारी करते हैं ड्रग्स का काला कारोबार

भारत-म्यांमार सीमा पर ड्रग्स लेकर जाते लोगों के पकड़े जाने का सिलसिला थम ही नहीं रहा है. ड्रग्स का यह काला और जानलेवा कारोबार धीरे-धीरे अब पूरे पूर्वोत्तर तक पहुंच चुका है. सबसे दु:खद और आश्‍चर्यजनक बात तो यह कि इस कारोबार में सरकारी तंत्र भी लिप्त है और उसके सबूत भी मिल रहे हैं. भारतीय सेना एवं मणिपुर पुलिस के जवान और मंत्रियों-राजनेताओं के बेटे आदि सभी इस कारोबार में बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी कर रहे हैं. जब सेना के लोग इस काले कारोबार में लिप्त पाए जा रहे हैं, तो ऐसे में पूर्वोत्तर में लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट पर भी सवाल खड़े होते हैं. कहीं सेना के लोग इस एक्ट की आड़ में तो यह सब नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह एक्ट उन्हें काफी अधिकार देता है?

बीते 26 मई को थौबाल ज़िले में पुलिस ने दो लोगों को बड़ी मात्रा में ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया, जिसकी क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 2.50 करोड़ रुपये आंकी गई. ड्रग्स की इस खेप के साथ पकड़े गए वांजिंग निवासी टी बोकुल और थौबाल निवासी एम डी ताजुद्दीन शाह पुलिस अधिकारी हैं. उक्त दोनों पुलिस अधिकारी एक सरकारी जिप्सी पर ड्रग्स की यह खेप लेकर नगालैंड से मणिपुर की तरफ़ आ रहे थे और वह भी बाकायदा यूनिफॉर्म में! जिप्सी में इफिड्रिन बाइउसेट नामक टैबलेट से भरे तीन बॉक्स लदे थे, बाद में टैबलेटों की कुल संख्या 3,19,200 पाई गई. पूछताछ में पता चला कि ड्रग्स की यह खेप सीमावर्ती शहर मोरे (मणिपुर) होते हुए म्यांमार (बर्मा) जानी थी. 

ह इस काले कारोबार से जुड़ी एक छोटी-सी घटना है. इससे बड़ी और हैरान करने वाली घटना तो यह है कि मणिपुर के पलेल नामक जगह से बीते 24 फरवरी को इंफाल में तैनात कर्नल रैंक के डिफेंस पीआरओ अजय चौधरी का 25 करोड़ रुपये के ड्रग्स के साथ पकड़ा जाना. अजय चौधरी के साथ छह अन्य लोग भी थे, जिनमें उसका असिस्टेंट आर के बब्लू, असिस्टेंट मैनेजर इंडिगो- ब्रोजेंद्रो, हाउपू हाउकिप, मिनथं डोंगेल, मिलान हाउकिप एवं साइखोलेन हाउकिप शामिल थे. साइखोलेन हाउकिप वर्तमान कांग्रेसी विधायक टी एन हाउकिप का बेटा है. अजय चौधरी भी ड्रग्स लेकर मोरे जा रहा था. ग़ौरतलब है कि भारत-म्यांमार मार्ग पर केवल 77 दिनों के अंदर 19 ड्रग्स कारोबारी गिरफ्तार किए गए, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं. जानकार बताते हैं कि क़रीब 90 प्रतिशत ड्रग्स म्यांमार से भारत में आता है. म्यांमार से भारत में ड्रग्स लाने के लिए चार रूट इस्तेमाल किए जाते हैं, तामु (म्यांमार)-मोरे-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर, न्यू सोमताल (एक गांव, भारत-म्यांमार सीमा)-सुगनु-चुराचांदपुर-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर, खैमान (म्यांमार)-बेहियांग-चुराचांदपुर-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर और सोमराह (म्यांमार)-तुइसांग (उख्रूल ज़िला मणिपुर)-खारासोम-जेसामी-कोहिमा (नगालैंड)-डिमापुर. इन चारों रूटों में सबसे ज़्यादा ड्रग्स मणिपुर-नगालैंड होते हुए भारत लाया जाता है.



स सिलसिले में हाल के दिनों की सबसे बड़ी घटना है, मोरे कमांडो के पूर्व ऑफिसर-इन-चार्ज एवं सब-इंस्पेक्टर आर के बीनोदजीत की गिरफ्तारी, जिसके पास से बरामद ड्रग्स की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 3.64 करोड़ रुपये आंकी गई. बीनोदजीत को बीते 8 मई को गिरफ्तार किया. उसने 11 पुलिसकर्मियों को यह ड्रग्स ट्रांसपोर्ट करने का ऑर्डर दिया था, जो इसे बर्मा की ओर ले जा रहे थे. फिलहाल बीनोदजीत एवं उसके 11 मणिपुर पुलिस कमांडो साथी जेल में हैं. इस ड्रग्स की डिलीवरी मोरे में होनी थी. मोरे मणिपुर-म्यांमार की सीमा पर बसा एक छोटा-सा बाज़ार है और यह भारत का एक व्यापारिक केंद्र भी है. जबसे इंडो-म्यांमार ट्रेड एग्रीमेंट लागू हुआ, तबसे यहां व्यापार के क्षेत्र में काफी तेजी आ गई. रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुएं म्यांमार से भारत लाकर बेची जाती हैं. इसके बाद उन्हें पूर्वोत्तर और अन्य भारतीय बाज़ारों में बेचा जाता है. ऐसे में सवाल यह है कि ऐसी जगह पर तैनात पुलिसकर्मियों का ड्रग्स के साथ पकड़ा जाना आख़िर क्या साबित करता है?

सी तरह बीते 29 मई को नार्कोटिक अफेयर्स बॉर्डर पुलिस (एनएबीपी) ने लंफेल के सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी इरोइसेम्ब गेट से लगभग 50 लाख रुपये क़ीमत की 25 किलो इफिड्रिन टैबलेट्स के साथ तीन लोगों को धर दबोचा. इससे पहले एक जनवरी को 1.5 करोड़ रुपये का ड्रग्स इंफाल एयरपोर्ट से पकड़ा गया था, लेकिन उसे कौन ले जा रहा था, इसका पता ही नहीं चल सका. कई सामाजिक संगठनों ने इस मामले में किसी सरकारी आदमी की संलिप्तता का शक जताया था. ड्रग्स के इस काले कारोबार का पूर्वोत्तर पर विपरीत असर पड़ रहा है. इस मामले में पूरे पूर्वोत्तर में नगालैंड का दिमापुर सबसे आगे है, जबकि दूसरे नंबर पर मणिपुर का चुराचांदपुर ज़िला है. इन दोनों स्थानों पर आप खुलेआम ड्रग्स की खरीद-फरोख्त और उसका सेवन होते देख सकते हैं. यहां एचआईवी पॉजिटिव कई नवयुवक मिलेंगे, जो बहुत खराब हालत में हैं. सुबह से लेकर शाम तक, पूरे दिन टैबलेट्स खाना और सीरिंज के जरिए ड्रग्स लेना उनका एकमात्र काम है. वे जो सीरिंज अपने दोस्तों को लगाते हैं, उसे दोबारा किसी को भी लगा देते हैं, इससे एचआईवी पॉजिटिव होने की आशंका ज़्यादा रहती है. जाहिर है, उत्तर-पूर्व में चल रहे ड्रग्स के इस काले कारोबार को अगर समय रहते नहीं रोका गया, तो यह उग्रवाद से भी ज़्यादा बड़ी समस्या बन जाएगा.

Thursday, July 18, 2013

मनमोहन के असम पर बाढ़ की मार

मनमोहन सिंह खुद को असम का बेटा मानते हैं, लेकिन असम में बाढ़ से निपटने के लिए न तो आज तक कोई दीर्घकालीन योजनाएं बन सकी हैं और न ही प्रभावित लोगों के लिए भोजन, पेयजल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कोई व्यवस्था है. लोग खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को मजबूर हैं, लेकिन पीएम को कोई फर्क नहीं प़डता, क्योंकि वे गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए पीएम नहीं बने हैं, वे तो अमीरों के लिए पीएम बने हैं!



सम इन दिनों बाढ़ की चपेट में है. ब्रह्मपुत्र नदी का जलस्तर ख़तरे के निशान के ऊपर पहुंच गया है, इसलिए उसमें सभी तरह की नावों का परिचालन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है. क़रीब 250 गांव बाढ़ की चपेट में हैं. राज्य के नौ ज़िलों, धेमाजी, गोलाघाट, जोरहाट, कामरूप, करीमगंज, लखीमपुर, मोरिगांव, शिवसागर एवं तिनसुकिया में क़रीब 75,000 लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. 5,000 हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न है. अनाज के साथ-साथ साग-सब्जी भी बाढ़ की शिकार हो गई है. छोटे-बड़े 30,000 से ज़्यादा जानवर बाढ़ के पानी में बह गए हैं. मोरिगांव जिले के जेंगपुरी इलाके में एक 12 वर्षीय किशोर की मौत हो जाने की ख़बर है. लमदिंग-बडरपुर रेलवे डिवीजन बाढ़ से प्रभावित होने के कारण वहां सामान लाना-ले जाना संभव नहीं है. इसलिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सही समय पर न होने से उनकी क़ीमतें आसमान छू रही हैं. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इन ज़िलों में धारा 144 लागू कर दी गई है.

सम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निर्वाचन क्षेत्र है और वह स्वयं को असम का बेटा मानते हैं. देश में कहीं बा़ढ, तो कहीं सूखा, तो कहीं भयंकर आपदा से लोग परेशान हैं, लेकिन सच पूछिए तो इससे सरकार और सरकार के नुमाइंदे प्रधानमंत्री को कोई फर्क नहीं प़डता, जबकि प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि सिर्फ हवाई सर्वे कर लेने से प्रभावित लोगों की पी़डा दूर नहीं हो सकती. प्रधानमंत्री खुद आपदा प्राधिकरण के अध्यक्ष हैं, लेकिन उत्तराखंड की आपदा हो या असम में बा़ढ की मार, यानी हर स्तर पर यह सरकार कुछ नहीं कर पाई. आपदा और आपदा के बाद की बदइंतजामी लोगों ने अपनी आंखों से देखी. लोगोें ने यह भी देखा कि सरकार और सरकार के उच्चस्थ पदों पर बैठे लोग कैसे घटनास्थल पर जाकर लाशों के साथ राजनीति करते रहे. सरकार घटनास्थल पर राहत एवं बचाव कार्य तेज करने, खाद्य सामग्रियों की आपूर्ति, आपदा के बाद लाशों के स़डने के कारण महामारी न फैले, इसे रोकने के बदले हर जगह भाषणबाजी और बयानबाजी से ही काम चलाती रही. ऐसे सरकार के होने और न होने से क्या फायदा. आखिर मनमोहन सिंह कैसे कह सकते हैं कि उन्हें असम की चिंता है. वह किस हक के साथ कह सकते हैं कि वह असम के बेटे हैं?



सम में हर साल बाढ़ से करोड़ों रुपये का नुक़सान होता है, लेकिन राज्य एवं केंद्र सरकार ने आज तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाए. बाढ़ से निपटने के लिए कोई दीर्घकालीन योजना भी नहीं बन सकी. राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई राहत न मिलने के कारण बाढ़ पीड़ित खुले आसमान के नीचे दिन काट रहे हैं. बाढ़ में अपना घर-गृहस्थी गंवाने वाले लोग भोजन, पेयजल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से भी परेशान हैं.

ड़ोसी राज्य मेघालय, अरुणाचल प्रदेश एवं नगालैंड में भी मूसलाधार बारिश के कारण ब्रह्मपुत्र नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. यदि समय रहते ठोस क़दम न उठाए गए, तो शहरों में भी बाढ़ का पानी प्रवेश कर सकता है. गुवाहाटी में बाढ़ का पानी प्रवेश भी कर गया है. सबसे ज़्यादा बदतर स्थिति धेमाजी की है. जोरहाट के निमातीघाट एवं गोलाघाट के नुमलीगढ़ में ब्रह्मपुत्र और धनश्री नदी का पानी ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहा है, इसलिए ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे 150 से अधिक परिवार घर छोड़कर चले गए हैं. बाढ़ की चपेट में आए 9 ज़िलों के 16 राजस्व क्षेत्रों के लोग काफी प्रभावित हुए हैं. कई इलाकों में सड़कों, पुलों एवं तटबंधों को काफी क्षति पहुंची है. इसके चलते राज्य के कई संपर्क मार्ग बंद पड़े हैं.

केंद्रीय मौसम विज्ञान विभाग की चेतावनी के बाद राज्य सरकार ने शोणितपुर, लखीमपुर, गोलाघाट एवं बरपेटा में रेड अलर्ट जारी कर दिया है. मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इन ज़िलों में अगले कुछ दिनों तक 488 मिलीमीटर तक मूसलाधार बारिश होने की संभावना है. मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बीते 3 जुलाई को खानापाड़ा स्थित अपने सरकारी आवास पर एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें जल संसाधन मंत्री राजीव लोचन पेगु, मुख्य सचिव पी पी वर्मा समेत जल संसाधन, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, वित्त, लोक निर्माण विभाग के आला अधिकारी मौजूद थे. बैठक में राज्य में बाढ़ और भू-कटाव की स्थिति पर भी चर्चा की गई. ग़ौरतलब है कि निमातीघाट, मोरिगांव, लखीमपुर, ढेकुवाखाना एवं बरपेटा की बेकी नदी में भू-कटाव लगातार जारी है. धेमाजी के ज़िला कार्यक्रम अधिकारी (आपदा प्रबंधन) के लुहित गोगोई ने बताया कि ज़िले में पांच राहत शिविर खोले गए हैं, जिनमें 850 लोगों को आश्रय दिया गया है.


धर, गोलाघाट ज़िले में काजीरंगा नेशनल पार्क के पास एक हाथी एवं एक हिरण के भी मारे जाने की ख़बर है. एक सींग के लिए प्रसिद्ध अपर असम का काजीरंगा नेशनल पार्क और लोवर असम की पोविटोरा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी भी बाढ़ की चपेट में है. वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि 430 स्न्वॉयर किलोमीटर इलाके में फैले काजीरंगा नेशनल पार्क का 70 प्रतिशत और 38.80 स्न्वॉयर किलोमीटर इलाके में फैली पोविटोरा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाढ़ की चपेट में है. यहां के वन्यजीव ऊंचे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं. ये दोनों पार्क पिछले कई सालों से बाढ़ की मार झेल रहे हैं. ग़ौरतलब है कि 1988, 1998, 2004 एवं 2008 में भी यहां भीषण बाढ़ आ चुकी है, जिनमें कई लोगों की जानें चली गईं और काफी लोग बेघर हो गए थे. बाढ़ के चलते काजीरंगा नेशनल पार्क में 1988 में 1203 और 1998 में 652 जानवरों की मौत हो चुकी है.

Tuesday, July 9, 2013

इनर लाइन परमिट राज्य के हित में नहीं

पलायन देश के हर हिस्से का एक मुद्दा है. पूर्वोत्तर के राज्यों में मज़दूरों की कमी है, साथ ही प्रशिक्षित पेशेवरों की भी, जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, सीए आदि. ऐसे में इनर लाइन परमिट (आईएलपी) अल्प विकसित पूर्वोत्तर के विकास में बाधा साबित होगा. अवैध पलायन (बांग्लादेश, नेपाल एवं बर्मा से आने वालों को) बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के जरिए रोका जा सकता है और उसके लिए इनर लाइन परमिट की ज़रूरत नहीं है. अगर मणिपुर में इनर लाइन परमिट लागू हुआ, तो कल त्रिपुरा, असम एवं मेघालय में भी इसकी मांग उठेगी और उससे देश की एकता एवं अखंडता प्रभावित होगी.


बीते साल 13 जुलाई को राज्य विधानसभा में इनर लाइन परमिट लाने का निर्णय लेने के बाद भी उसके कार्यान्वित न होने की वजह से ज्वाइंट कमेटी ऑफ इनर लाइन परमिट सिस्टम ने कई क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं. एक जून से मणिपुर में बाहरी लोगों का आना रोकना और उन्हें वापस भेजना शुरू कर दिया गया है. नेशनल हाइवे 39 पर गुवाहाटी से आ रही गाड़ियों को सेकमाई एवं कंलातोंबी के बीच रोककर 60 बाहरी लोगों को वापस भेज दिया गया. बाहरी लोगों को लेकर आने वाली गाड़ियों पर एक महीने की रोक लगाई गई है. मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी ने तो आईएलपी को लेकर ज्वाइंट कमेटी को धमकी दी है. उन्होंने कहा कि सरकार खुद इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है.

इनर लाइन परमिट क्या है?
इनर लाइन परमिट ब्रिटिश शासनकाल में बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगूलेशन, 1873 के तहत बनाया गया था. इसके अंतर्गत नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम आते हैं. इसके अनुसार, भारत के किसी भी राज्य के नागरिक इन राज्यों पर बिना परमिट नहीं आ सकते. इनर लाइन परमिट का उद्देश्य यह है कि एक विशेष रक्षा एवं शांति प्रक्रिया द्वारा प्रदेश के आदिवासियों का अस्तित्व बचाना. यह परमिट राज्य सरकार द्वारा जारी किया जाता है. इसमें प्रावधान यह है कि बाहरी लोगों को यहां की ज़मीन नहीं बेची जा सकती और न ही बाहरी लोगों से शादी ही की जा सकती है.
इनर लाइन परमिट की मांग कितनी सही?
अब तक मणिपुर में इनर लाइन परमिट इसलिए नहीं था, क्योंकि यहां आज़ादी के पहले राजा-महाराजाओं का शासन था, न कि ब्रिटिश का. मणिपुर पूर्वोत्तर का एक छोटा राज्य है, जिसकी आबादी 25 लाख के आसपास है. 1961 से 2011 तक मणिपुर में आए बाहरी लोगों, यानी पुरुषों, महिलाओं एवं बच्चों की संख्या 7,04,488 हो गई है. यह कुल जनसंख्या का 30.71 प्रतिशत है. यह आंकड़ा 2011 की जनगणना के अनुसार है. बाहर से आने वाले लोग दो तरह के हैं. एक तो भारत के दूसरे राज्यों, यानी बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल, राजस्थान एवं गुजरात से आए लोग, दूसरे वे, जो नेपाल, बर्मा एवं बांग्लादेश के हैं. बहरहाल, हमें मणिपुर में बाहर, यानी भारत के भीतर से आए बाहरी लोगों (मयांग) के आने का कारण जानना होगा. पहला कारण है व्यवसाय. दूसरा, रेलवे लाइन बिछाने के लिए मज़दूरों का आना. तिपाइमुख डैम का काम, बीआरटीएफ में नेपालियों की भर्ती एवं दक्षिण भारतीयों का मणिपुर रायफल्स में शामिल होना आदि. यह सही है कि इन्हीं कारणों से मणिपुर में बाहरी लोगों की संख्या बढ़ गई है, लेकिन सवाल यह है कि इन बाहरी लोगों की यहां के आर्थिक विकास में अहम भागीदारी है, चाहे वे मज़दूर हों या व्यवसायी. इंफाल का ख्वाइरम्बल बाज़ार बाहरी लोगों द्वारा चलाया जाता है. यह सही है कि विदेशियों, जैसे बांग्लादेशी, नेपाली एवं बर्मी लोगों की अवैध घुसपैठ रुकनी चाहिए, लेकिन अपने ही देश के लोगों को मिले संवैधानिक अधिकार (देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने, व्यवसाय करने की छूट) का हनन आख़िर किस आधार पर किया जा सकता है. क्या मणिपुर भी महाराष्ट्र की तर्ज पर काम करना चाहता है, जहां लाखों उत्तर भारतीय मुंबई की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं, लेकिन कुछ शरारती एवं राजनीतिक तत्व उन्हें वहां से भगाने की बात करते हैं?

सवाल यह है कि आज मणिपुर अगर बाहरी लोगों का प्रवेश रोकता है, तो कल देश भर में फैले मणिपुर के लोगों के प्रति बाकी राज्यों और वहां के निवासियों के मन में दुर्भावना उपजने से कौन रोकेगा? हाल में एसएमएस के जरिए फैली अफवाह की वजह से कर्नाटक समेत कई जगहों से रातोरात उत्तर-पूर्व के लोगों को शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था. क्या उस कृत्य को जायज ठहराया जा सकता है, हरगिज नहीं. भारत का संविधान हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपने जीवनयापन के लिए भारत के किसी भी कोने में जा सकता है, रह सकता है. वहीं इनर लाइन परमिट की मांग करने वाली ज्वाइंट कमेटी उसके समर्थन में कुछ कारण गिनाती है, मसलन, बाहरी लोगों के चलते स्थानीय संस्कृति एवं भाषा पर कुप्रभाव पड़ रहा है. ड्रग्स का अवैध व्यापार और अपराध राज्य में बाहरी लोगों द्वारा होता है. लेकिन क्या सचमुच वास्तविक स्थिति यही है? आज मणिपुर के युवा, जो बाहर जाकर पढ़ाई करते हैं, क्या उनके रहन-सहन के स्तर में बदलाव नहीं आया है? बर्मा, थाईलैंड एवं चीन से तस्करी के जरिए ड्रग्स मणिपुर आते हैं, क्या इन सबके पीछे बाहरी लोगों का हाथ है? केंद्र ने अभी हाल में मुसलमानों के विकास के लिए 300 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं, जिसका साफ़ मतलब यह है कि वहां मुसलमान पिछड़ेपन का शिकार हैं. सवाल यह है कि क्या इसके लिए भी बाहरी लोग ज़िम्मेदार हैं? नहीं, ऐसा नहीं है. इसलिए कमेटी की यह मांग ओछी राजनीति और क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित है, जिसे कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता. राज्य सरकार को इस देश विरोधी, संविधान विरोधी एवं जन विरोधी क़दम के ख़िलाफ़ सख्त से सख्त क़दम उठाने चाहिए और इस मांग को खारिज करना चाहिए.


इनर लाइन परमिट वाले राज्यों की स्थिति
नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम में इनर लाइन परमिट चलता है, लेकिन इन तीनों राज्यों की स्थिति में यह परमिट कोई बेहतरी नहीं कर सका. नगालैंड सबसे ज़्यादा मनमानी करता है. इनर लाइन परमिट के चलते ही मणिपुर से नगालैंड जाकर बसे लोगों को नदी से मछलियां पकड़ने और खेतों से साग-सब्जी तोेड़कर खाने पर जुर्माना देना पड़ता है. यही स्थिति मिजोरम की है. वहां बाहरी लोग जब तक मजिस्टे्रट से डोमिसाइल, आईडी प्रूफ या परमिट नहीं लेते, तब तक वे रह नहीं सकते. अरुणाचल प्रदेश में रबड़, मोम, हाथी दांत और वन उत्पाद आदि लेता हुआ कोई बाहरी आदमी पकड़ा जाता है, तो इस परमिट के प्रावधानों के अनुसार, राज्य सरकार की तरफ़ से उसे सजा भी हो सकती है. मिजोरम अपने यहां आने वाले प्रत्येक बाहरी व्यक्ति से 120 रुपये लेता है. अगर समयावधि बढ़ानी है, तो 20 रुपये का फॉर्म अलग से भरना पड़ता है.


सरकार बनाम ज्वाइंट एक्शन कमेटी

बीते 20 मई को मुख्यमंत्री इबोबी ने कमेटी के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की, जिसमें सरकार को कमेटी की ओर से सकारात्मक जवाब की अपेक्षा थी, लेकिन कमेटी ने विरोध करते हुए धमकी दे डाली. सरकार की ओर से कहा गया कि अगर इनर लाइन परमिट लागू हुआ, तो यह भारत को तोड़ने जैसा काम होगा, इसलिए कमेटी अपने क़दम वापस ले, वरना सरकार चुप नहीं बैठेगी. कमेटी का जवाब था कि मणिपुर और आदिवासियों को बचाने के लिए वह किसी से भी टकरा सकती है. पड़ोसी राज्यों, यानी नगालैंड, मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश में इनर लाइन परमिट लागू है, तो क्या उसमें भारत तोड़ने जैसी बात नहीं है. और अगर यह परमिट वहां चल रहा है, तो मणिपुर में क्यों नहीं?

Friday, March 22, 2013

अपनों की ही गुगली से परेशान गोगोई


गैरों पे करमअपनों पे सितम...आजकल असम कांग्रेस के कई विधायक मन ही मन यह लाइन दोहरा रहे होंगे. उनके निशाने पर हैं हैटट्रिक बना चुके मुख्यमंत्री तरुण गोगोई. वजह है, कांग्रेस का एआईयूडीएफ की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना. नतीजतन, पहली बार गोगोई को अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है. 


असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अपने 12 साल के शासनकाल में पहली बार पार्टी विधायकों के विरोध का शिकार होना पड़ रहा है. गोगोई अब तक असम कांग्रेस के न केवल निर्विवाद नेता थे, बल्कि उनके विरोध में उंगली उठाने वाला कोई भी नहीं था. लेकिन हाल में उनकी पार्टी के नेताओं ने ही उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. यह मामला तब उठा, जब कांग्रेस एवं ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के बीच नज़दीकियां बढ़ीं. पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंदन सरकार के आवास पर सीएम हटाओ खेमे की बैठक हुई, जिसमें 26 विधायकों ने हिस्सा लिया. इनमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, केंद्रीय मंत्री पवन सिंह घाटोवार आदि प्रमुख थे. इन विरोधियों में वे लोग भी हैं, जिन्हें राज्य मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है. सरकार खुद को मंत्री न बनाए जाने से नाराज चल रहे थे और मुख्यमंत्री बनाम हिमंत का मामला गरमाते ही वह सक्रिय हो गए और उन्होंने अपने आवास पर बैठक बुलाने का दुस्साहस तक कर डाला.

गोगोई विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों का कहना है कि वह उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं. यही नहीं, सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी उन्हें महत्व देने को तैयार नहीं हैं. विकास कार्यों के लिए पूंजी का आवंटन अभी तक नहीं हुआ है. राज्य की सभी योजनाएं राज्यमुखी न होकर गोगोईमुखी हो गई हैं. चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों की उपेक्षा सबसे अहम मुद्दा है. गोगोई जनजातियों की समस्याओं के निराकरण में दिलचस्पी नहीं लेते. जनजाति बहुल इलाकों में हाथियों एवं बाघों का उपद्रव जारी है. इस समस्या से गोगोई वाकिफ है, मगर वह हमेशा कन्नी काटते रहते हैं. बीते 11 मार्च को वित्तीय वर्ष 2013-14 का बजट पेश किए जाने के बाद से उक्त विधायक और भी नाराज हैं.

राज्य के चाय बगानों में काम करने वाले लोगों की संख्या 80 लाख से भी अधिक है, लेकिन बजट में उनके लिए केवल 24 करोड़ रुपये ही निर्धारित किए गए हैं, जबकि यह धनराशि अधिक होनी चाहिए. इस संदर्भ में विधायकों ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा है. वहीं अल्पसंख्यकों के लिए 500 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं. वरिष्ठ विधायक रामेश्‍वर धनवार ने कहा कि गोगोई को यह अच्छी तरह मालूम होना चाहिए कि चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों के लोग जन्म से ही कांग्रेस के साथ रहे हैं. गोगोई ने उनके साथ धोखाधड़ी की है. ऐसे कई मामलों को लेकर विधायकों में असंतोष है. विधायकों ने कहा कि वे अपनी नाराजगी के बारे में शीघ्र ही हाईकमान को भी अवगत कराएंगे. दूसरी बात, आरोप है कि गोगोई नए विधायकों को नज़रअंदाज करते हैं. नए विधायक कहते हैं कि मुख्यमंत्री गोगोई उनकी अनदेखी करते हैं, इसलिए आलाकमान से शिकायत के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है. 

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के समर्थन में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें 52 विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं. असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुवनेश्‍वर कलाता सहित पार्टी के अधिकांश पदाधिकारी गोगोई के साथ हैं. पूर्व मंत्री अंजन दत्त ने गोगोई को अपना समर्थन देकर सबको चौंका दिया. बहरहाल, गोगोई बीते 11 मार्च को दिल्ली पहुंचे और उन्होंने सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, असम प्रदेश कांग्रेस के केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह से मुलाकात भी की. हाईकमान से मुलाकात के बाद राज्य मंत्रिमंडल में बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, मगर ऐसा हुआ नहीं. केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह ने स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा को कारण बताओ नोटिस भेजा है. वजह यह कि डॉ. शर्मा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा न्यूज लाइव की प्रबंध निदेशक हैं. कांग्रेसी नेताओं, मंत्रियों एवं विधायकों ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पिछले पंचायत चुनाव के दौरान इस चैनल ने राज्य सरकार और कांग्रेस के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया था. यही नहीं, निराधार और एक खास उद्देश्य से प्रेरित ख़बरें प्रसारित करके कांग्रेस को चुनाव में काफी नुकसान भी पहुंचाया गया था. 

न्यूज लाइव की भूमिका से मुख्यमंत्री तरुण गोगोई काफी क्षुब्ध हैं. इसलिए उन्होंने सोनिया गांधी को लिखे अपने एक पत्र में चैनल पर दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया था. मुख्यमंत्री के इस पत्र के बाद बीते 27 फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश के तहत राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने मंत्री डॉ. शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया. 

विरोधी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
गोगोई कहते हैं कि सूबे की जनता और पार्टी हाईकमान का आशीर्वाद उनके साथ है. लोग उनके ख़िलाफ़ बगावत करके भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते. उन्होंने कहा कि उनकी नीयत साफ़ है और जब तक पार्टी एवं हाईकमान की मर्जी रहेगी, वह प्रदेश की जनता की सेवा करते रहेंगे. उन्होंने विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों को चेतावनी देते हुए कहा कि वह साफ़ नीयत के साथ पार्टी हाईकमान के निर्देश पर अब तक प्रदेश के विकास एवं जनता के हितों की रक्षा के लिए सेवाभावना से काम करते आए हैं. ऐसे में, उनके ख़िलाफ़ अगर कोई मंत्री-विधायक षड्यंत्र रचता है, तो उससे उनके चेहरे पर किसी तरह की कोई शिकन आने वाली नहीं है. 

गोगोई विरोधी नेता
डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, मंत्री
राजू साहू, संसदीय सचिव
जीवनतारा घटोवार, संसदीय सचिव
आबू ताहेर बेपानी, संसदीय सचिव
बलिन चेतिया, संसदीय सचिव
ओकिबुद्दीन अहमद, संसदीय सचिव
प्रदान बरुआ, संसदीय सचिव
चंदन सरकार, संसदीय सचिव
सुमित्रा पातिर, संसदीय सचिव
राजेंद्र प्रसाद सिंह, संसदीय सचिव
हेमंत ताल्लुकदार, विधायक
पीयूष हजारिका, विधायक
पल्लवलोचन दास, विधायक
जयंतमल्ल बरुआ, विधायक
राजेन बरठाकुर, विधायक
हाबुल चक्रवर्ती, विधायक
जावेद इस्लाम, विधायक
शिवचरण बसुमतारी, विधायक
कमललाक्ष दे पुरकायस्थ, विधायक
संजयराज सुब्बा, विधायक
रूपज्योति कुर्मी, विधायक
सुष्मिता देव, विधायक
विनोद सैकिया, विधायक
कृपानाथ मल्लाह, विधायक

Monday, March 11, 2013

ज़िंदगी से प्यार करती हूं, जीना चाहती हूं


अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की ज़रूरत है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों से अनशन कर रहीं शर्मिला अपने लिए नहीं, बल्कि आपके लिए लड़ रही हैं. आपके लिए, यानी उस समूची मानव जाति की गरिमा बचाने के लिए, जो आज हर ताकतवर की नज़र में इंसान से कमतर बन चुकी है.

 इरोम शर्मिला चनु किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, क्योंकि वह पिछले 12 वर्षों से आमरण अनशन पर हैं. वजह, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट 1958 को मणिपुर से हटाने की मांग. सरकार शर्मिला को किसी तरह जिंदा रखने की कोशिश कर रही है, नाक के जरिए उनके शरीर में खाना पहुंचाया जा रहा है. शर्मिला लगातार जेल में बंद हैं, आरोप है, आत्महत्या का प्रयास. अब इसे सरकार और समाज की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा, क्योंकि हर एक साल के बाद शर्मिला को अदालत में पेश किया जाता है. बीते 3 मार्च को सरकार ने शर्मिला को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया. यह मामला 5 अक्टूबर, 2006 को सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफसपा) हटाने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए उनके आमरण अनशन से संबंधित है. उस दौरान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट आकाश जैन ने 40 वर्षीय शर्मिला के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत एफआईआर दर्ज की थी. शर्मिला ने कोई अपराध करने से इंकार करते हुए कहा कि उनका अहिंसक प्रदर्शन था. उन्होंने अदालत से कहा, मैं आत्महत्या नहीं करना चाहती हूं. मेरा प्रदर्शन अहिंसक है. मानव की तरह जीवन जीना मेरी मांग है. मैं ज़िंदगी से प्यार करती हूं, अपनी ज़िंदगी लेना नहीं चाहती, लेकिन न्याय और शांति भी चाहती हूं. सरकार मेरे ऊपर इस तरह का आरोप क्यों लगा रही है? मैं तो गांधी जी के मार्ग पर चल रही हूं, मगर आश्‍चर्य! गांधी के ही देश में अहिंसा को जगह नहीं दी जा रही है! अदालत ने इस मामले में अभियोजन पक्ष को सबूत पेश करने के लिए 22 मई की तारीख तय की है. गौरतलब है कि मणिपुर में भी उन्हें इसी आरोप के तहत जेल में रखा जाता है.

बहरहाल, जिन क्षेत्रों में अफसपा लागू है, वहां के निवासियों को हिंसा नहीं, बल्कि शांति चाहिए और सरकार एवं राजनीतिक नेताओं को उनके अहिंसक विरोध की आवाज़ सुननी चाहिए. सवाल यह उठता है कि सरकार उन्हें एक इंसान के मौलिक अधिकार देने से खौफ क्यों खाती है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का पालन करने वाली शर्मिला एक साधारण महिला हैं. वह एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के लिए ज़रूरी अधिकारों की मांग कर रही हैं. शर्मिला का अनशन 2 नवंबर, 2000 से तब शुरू हुआ था, जब इंफाल से 10 किलोमीटर दूर स्थित नंबोल नामक स्थान पर एक बस स्टैंड पर सवारी का इंतज़ार कर रहे 10 लोगों को भारतीय सेना ने बेरहमी के साथ गोलियों से भून दिया था. मारे गए लोगों में दो बच्चे और औरतें भी शामिल थे. यह ख़बर अगले दिन अख़बारों में छायाचित्रों के साथ शर्मिला ने पढ़ी. दिन था गुरुवार. हर गुरुवार को शर्मिला उपवास करती थीं. उस दिन जो संकल्प लेकर शर्मिला ने उपवास शुरू किया, वह आज तक जारी है.

शर्मिला ने चाणक्यपुरी स्थित मणिपुर टिकेंद्रजीत भवन में मणिपुर से आकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि जीवन में पढ़ाई बहुत ज़रूरी है. आप इतनी दूर से आकर यहां पढ़ाई कर रहे हैं. मां-बाप तमाम कष्ट झेलकर आपको पैसा भेजते हैं, इसलिए पढ़ाई केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि एक योग्य इंसान बनने के लिए करनी चाहिए. उन्होंने अपनी अधूरी रह गई पढ़ाई के बारे में कहा कि मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर सकी. मणिपुर के राजनीतिक नेतृत्व पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि वह केवल वोटबैंक की राजनीति करता है. पैसा कमाना नेताओं का धर्म बन गया है. हाल में इंफाल एयरपोर्ट पर एक नेता पुत्र बीस करोड़ रुपये के ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था. उन्होंने मणिपुर की स्थिति पर निराशा जताई. शर्मिला को सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.

अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में लोगों की आलोचना को नकारते हुए शर्मिला ने कहा, मैं भी औरों की तरह इंसान हूं. अपने बारे में सोचने और अपनी निजी ज़िंदगी जीने का मुझे पूरा अधिकार है. अपने मन की मैं खुद मालिक हूं. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा काला क़ानून है, जिसने लोगों से जीने का अधिकार छीन लिया है. एक तरफ़ तो केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश करती है, तो वहीं दूसरी तरफ़ अफसपा जैसा काला क़ानून लागू करके दोहरी नीति अपनाती है. अगर सचमुच पूर्वोत्तर में शांति कायम करने के लिए अफसपा ज़रूरी है, तो फिर बीते 12 सालों में पूर्वोत्तर, खासकर मणिपुर में शांति क्यों नहीं स्थापित हो सकी, सिवाय अलगाव की भावना को बढ़ावा
देने के.

Tuesday, March 5, 2013

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

यूं तो पूर्वोत्तर में कार्यरत अधिकतर अलगाववादी संगठन धीरे-धीरे शांति के रास्ते पर आने के लिए तैयार हो रहे हैं और सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकार इसका स्वागत भी कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इन छिटपुट संगठनों के समर्पण से क्या मणिपुर में शांति स्थापित हो जाएगी, क्या सरकार ने कभी इस समस्या की जड़ तलाशने की कोशिश की है? अलगाववादियों के समर्पण से क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि अब नए लोग आतंकवाद के रास्ते पर नहीं चलेंगे?


पिछले कई सालों से गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा मणिपुर में सक्रिय अलगाववादी संगठनों के साथ शांति वार्ता की जा रही है और उसके परिणाम भी अब दिखने लगे हैं. बीती 13 फरवरी को तीन अलगाववादी संगठनों ने इंफाल में त्रिपक्षीय सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. ये संगठन हैं यूआरएफ, केसीपी (लम्फेल) और केवाईकेएल (एमडीएफ). इन तीनों संगठनों के कुल 197 कैडर हैं, जिनमें यूआरएफ के 90, केसीपी (लम्फेल) के 40 और केवाईकेएल (एमडीएफ) के 67 शामिल हैं. इस मौ़के पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ़ से ज्वाइंट सेक्रेटरी-मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स नार्थ-ईस्ट इंचार्ज शंभू सिंह, प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम सुरेश बाबू, राज्य के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, कई मंत्री एवं अधिकारी मौजूद थे. यूआरएफ की तरफ़ से चेयरमैन ख्वाइराकपम गोपेंद्रो उर्फ लानहैबा एवं सेक्रेटरी पुयाम मंगियाम्बा मैतै एलाइज रुहिनी मैतै, केसीपी (लम्फेल) की तरफ़ से चीफ ऑफ आर्मी ब्रोजेन मैतै उर्फ सिटी मैते एवं ज्वाइंट सेके्रटरी ताइबंगानबा उर्फ दिलीप और केवाईकेएल (एमडीएफ) की तरफ़ से प्रेसिडेंट मैस्नाम अथौबा एवं जनरल सेक्रेटरी लाइमयुम रोनेल शर्मा उर्फ अचौबा ने हस्ताक्षर किए. 


सहमति
ज्ञापन के अनुसार कैडरों को सही रास्ते पर चलने और नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. हर कैडर को दो साल तक प्रतिमाह 4000 रुपये बतौर वेतन दिए जाएंगे और हर कैडर के नाम ढाई लाख रुपये का फिक्स डिपॉजिट किया जाएगा, उन्हें न केवल वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार उन्हें क़र्ज़ भी देगी. उनकी क्षमता-योग्यता के अनुसार उन्हें पैरामिलिट्री फोर्स में नौकरी भी दी जाएगी. इससे उनकी चरमराई हुई ज़िंदगी दोबारा पटरी पर आ सकेगी. उक्त कैडर किसी असामाजिक एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे. अगर वे ऐसा करेंगे, तो क़ानून के अनुसार उन्हें दंड दिया जाएगा. मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह ने कहा कि भटके हुए युवा फिर शांति के रास्ते पर वापस आ रहे हैं, उनका स्वागत है. उन्होंने बाक़ी अलगाववादी गुटों से भी अपील की कि वे मुख्य धारा में वापस आएं. एमपी टी मैन्य ने कहा कि राज्य में शांति स्थापित करके ही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. 

तीनों
संगठनों ने समर्पण के वक्त कई हथियार भी सौंपे, जिनमें 3 एके-56 रायफल्स, 12 एके-47 रायफल्स, 3 नाइन एमएम रायफल्स, एक प्वाइंट-32 रायफल, 11 नाइन एमएम कारबाइन, 35 नाइन एमएम पिस्टल, 34 7.65 पिस्टल , आठ प्वाइंट-32 पिस्टल, एक नाइन एमएम रिवाल्वर, आठ लेथोट गन, सात एसबीएल, एक एयर पिस्टल, एक शार्ट गन, तीन आरपीजी, दो एम-16, दो एम-4, एक एसलर, पांच गे्रनेड और बंदूक. हथियारों की कुल संख्या 138 है. 

मणिपुर
की समस्याएं अलग हैं. राज्य के युवाओं को रोज़गार चाहिए, लेकिन सरकार रोज़गार मुहैया नहीं करा रही है, जिसके चलते युवाओं को सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल करना आसान हो गया है. बेरोज़गार युवा जल्द ही अलगाववादियों के झांसे में आ जाते हैं. एक दूसरी बात, जो मणिपुर के लोगों को सबसे ज़्यादा खलती है, वह है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा). वर्षों से इसे हटाने की मांग की जा रही है. इसके लिए इरोम शर्मिला पिछले 12 सालों से अनशन पर बैठी हैं. जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी ने इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था, बावजूद इसके सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. राज्य के लोगों का मानना है कि सरकार उनके साथ दोहरा रवैया अपना रही है. दिल्ली में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता दो-चार दिन अनशन करता है, तो सरकार उसके साथ बात करने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन मणिपुर में बारह साल से अनशन जारी है. अगर सरकार के पास इस एक्ट को लागू करने का सही तर्क है, तो वह उस पर भी चर्चा करा सकती है. जब सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी ही इस एक्ट को हटाने की सिफारिश करती है, तो फिर भी सरकार उसे क्यों नहीं मानती? बहरहाल, जब तक मणिपुर के युवाओं को रोज़गार नहीं मिलेगा, तब तक कुछ लोगों द्वारा समर्पण कर देने मात्र से शांति स्थापित नहीं हो सकती. सरकार को सबसे पहले रोज़गार का सृजन करना चाहिए. अगर युवाओं को रोज़गार मिलेगा, तो अलगाववादी संगठन ख़ुद-ब-ख़ुद कमज़ोर हो जाएंगे, लोगों का नज़रिया बदलेगा और सरकार पर विश्‍वास और बढ़ेगा. मणिपुर के विकास के लिए सरकार को विशेष योजनाएं बनानी होंगी, क्योंकि विकास ही समस्याओं का समाधान कर सकता है.

केंद्र एवं राज्य सरकार ने अगर एमओयू में शामिल बातों का सही तरीके से पालन न किया, तो फिर हमारा संगठन भूमिगत भी हो सकता है. इसलिए सरकार ईमानदारी बरते.  
अथौबा, चेयरमैन, केवाईकेएल (एमडीएफ).

हम लोग हथियार छोड़ चुके हैं और चाहते हैं कि शांति के साथ केंद्र एवं राज्य सरकार के विकास कार्यों में अपनी भागीदारी सुनिश्‍चित करें.  सिटी मैतै उर्फ नाउरेम ब्रोजेन मैतै, आर्मी चीफ, केसीपी (लम्फेल).

शांति हम सभी के अंदर है. इसे आपसी सामंजस्य के द्वारा ही क्रियान्वित किया जा सकता है.  लानहैबा उर्फ ख्वाइराकपम गोपेंद्रो,चेयरमैन, यूनाइटेड रिवोल्यूशनरी फ्रंट (यूआरएफ).


अलगाववादी बनने के कारण
कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे, तब मणिपुर को भी आज़ाद किया गया था, लेकिन यह आधा सच है. पूरा सच यही है कि भारत सरकार ने 21 सितंबर, 1949 को एक बंद कमरे में मणिपुर के राजा बोधचंद्र से मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करा लिए थे. 1964 में यूएनएलएफ नामक एक संगठन बनाया गया, जिसका मकसद एक स्वतंत्र राज्य की मांग करना था. 1978 में पीएलए का गठन हुआ. उसके बाद प्रीपाक, केवाईकेएल, केसीपी एवं एमपीएलएफ आदि कई संगठन निकल कर सामने आए. इनमें से यूएनएलएफ, पीएलए एवं प्रीपाक आदि आज भी एक स्वतंत्र राज्य के पक्षधर हैं. कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं, जो भटकाव के शिकार लोगों से मिलकर बनी हैं. युवाओं द्वारा अलगाववाद की ओर रुख़ करने के पीछे कई कारण हैं. राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है, जिसकी वजह से पढ़े-लिखे युवक गलत रास्ता अपनाने के लिए बाध्य हो जाते हैं. दरअसल, छोटी और साधारण सरकारी नौकरी के लिए भी कम से कम तीन से पांच लाख रुपये की रिश्‍वत देनी पड़ती है, थोड़ा बड़ा पद हो तो 15 से 20 लाख रुपये तक. यह भी कोई ज़रूरी नहीं कि नौकरी मिलेगी. इंफाल शहर में बीए-एमए पास किया हुआ युवक चेहरा ढककर रिक्शा चलाता है. बेरोजगारी से हताश होकर पढ़े-लिखे नौजवान अलगाववाद के रास्ते पर चलने लगते हैं. उनके हाथों में कलम की जगह बंदूक आ जाती है. तीसरा कारण, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) के तहत शक के आधार पर किसी की भी तलाशी ली जा सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और ऐसा होता भी है. इस एक्ट की आड़ में राज्य में कई फर्जी मुठभेड़ें हुईं. आज भी देश में सरकारी और ग़ैर सरकारी दबाव के कारण कई मामले खुलकर सामने नहीं आ पाए, लेकिन एक सच यह भी है कि कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं ने सच्चाई बताने की हिम्मत दिखाई. ज़ाहिर है, बिना गुनाह के गिरफ्तार या प्रताड़ना के शिकार हुए युवाओं में बदले की भावना पनपती है. चौथा कारण यह कि केंद्र सरकार केवल मणिपुर ही नहीं, पूरे पूर्वोत्तर से कटी हुई है. दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनाने के सिवाय कुछ नहीं होता. आज भी कई योजनाएं कागजों पर तो हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के गांवों में उनका कोई नामोनिशान नहीं है. प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण नेता विदेश यात्राओं में तो लगातार व्यस्त रहते हैं, लेकिन वे पूर्वोत्तर में साल में एक बार भी दौरा करना उचित नहीं समझते. इससे राज्य के लोगों को उपेक्षा का एहसास होता है.