यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday, May 14, 2011

खांडू की मौत से उपजे सवाल

बीते 30 अप्रैल को हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की असामयिक मृत्यु हो गई. इससे भी ज़्यादा दु:ख की बात यह है कि इस तरह की दुर्घटनाएं बार-बार हो रही हैं. इस हादसे से पहले भी कई वीवीआईपी हेलीकॉप्टर दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं, लेकिन यह दुर्घटना एक साथ कई सवाल खड़े कर रही है. मालूम हो कि अरुणाचल की सीमा चीन से लगी हुई है. चीन सीमा से सटे होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं का अभाव है. अपने कड़े रुख के कारण खांडू चीन की आंखों की किरकिरी बने हुए थे. खांडू ने बीते 30 अप्रैल की सुबह पवन हंस हेलीकॉप्टर कंपनी के यूरोकाप्टर बी-8 से उड़ान भरी थी. उड़ान भरने के 20 मिनट बाद ही यह हेलीकॉप्टर लापता हो गया और उसका संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया. इसी बीच किसी अज्ञात सेटेलाइट फोन से ़खबर आई कि खांडू को ले जा रहा हेलीकॉप्टर भूटान के सीमावर्ती क्षेत्र में उतर गया है, लेकिन बाद में इसकी पुष्टि नहीं हुई. यह किसका सेटेलाइट फोन था, इस पर भी अभी रहस्य बना हुआ है. अरुणाचल जैसे दुर्गम क्षेत्र में पवन हंस कंपनी के हेलीकॉप्टरों के बार-बार दुर्घटनाग्रस्त होने के बावजूद सरकार सबक क्यों नहीं ले रही है? पिछले दिनों तवांग में पवन हंस का एक और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें 17 लोगों की मौत हो गई थी. उसके बाद पवन हंस कंपनी की सेवा और लापरवाही को लेकर कई सवाल भी उठे थे. यही नहीं, पूूर्वोत्तर की विभिन्न राज्य सरकारें भी कई बार शिकायत कर चुकी थीं. बावजूद इसके इस इलाक़े में पवन हंस कंपनी की हेलीकॉप्टर सेवा जारी रहना कई तरह के संदेह पैदा करता है. तवांग जैसे बीहड़ क्षेत्र में मुख्यमंत्री को ले जाने वाले पवन हंस हेलीकॉप्टर में केवल एक इंजन लगा होना लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण है. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि पवन हंस कंपनी का रिकॉर्ड इतना खराब होने के बावजूद उसके एक इंजन वाले हेलीकॉप्टर की सेवा क्यों ली गई? लगातार पांच दिनों तक सेना, सीमा सड़क संगठन, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, एसएसबी और अरुणाचल पुलिस के क़रीब 3 हज़ार जवान हेलीकॉप्टर खोजने के अभियान में जुटे रहे. यही नहीं, वायुसेना के सुखोई-30 विमानों-हेलीकॉप्टरों और इसरो ने भी इस अभियान में का़फी मेहनत की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. सारे प्रयास धरे के धरे रह गए. बाद में ग्रामीणों ने शवों और हेलीकॉप्टर के मलवे को देखा और उन्होंने ही अरुणाचल नियंत्रण कक्ष को इसकी सूचना दी. उसके बाद सुरक्षाबल वहां पहुंचे और शवों की पहचान हुई. दोरजी का शव क्एला और लोबोथांग के बीच पाया गया. इस दुुर्घटना में जान गंवाने वालों में खांडू के अलावा पायलट जे एस बब्बर, कैप्टन टी एस मामिक, खांडू के सुरक्षा अधिकारी एशी कोडक और तवांग के विधायक त्सेवांग धोंडप की बहन एशी ल्हामू भी शामिल थे. अरुणाचल की जनता द्वारा पवन हंस कंपनी के कार्यालय में तोड़फोड़ करना स्वाभाविक था. केंद्र सरकार को तत्काल प्रभाव से पवन हंस की सेवा बंद कर देनी चाहिए, साथ ही इस कंपनी को काली सूची में डाल देने की ज़रूरत है. इस बात की जांच होनी चाहिए कि अनुभवहीन पायलटों के कारण तो ऐसी घटना नहीं हुई? केंद्र सरकार को इस दिशा में गंभीरता से क़दम उठाना होगा. खांडू से पहले भी विभिन्न विमान दुर्घटनाओं में अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौत हो चुकी है. वर्ष 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी भी नल्लामल्ला की पहाड़ियों में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से मारे गए थे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधवराव सिंधिया, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जी एम सी बालयोगी, कांग्रेस के युवा नेता संजय गांधी और पूर्व केंद्रीय इस्पात मंत्री मोहन कुमार मंगल की मौत भी इसी प्रकार हुई थी.

बांग्लादेश युद्ध और दोरजी


56 वर्षीय दोरजी खांडू मोनपा जनजाति के थे. उनके परिवार में चार पत्नियां, चार पुत्र और दो पुत्रियां हैं. दोरजी एक ज़मीनी कार्यकर्ता थे. वह अपनी मेहनत के बल पर राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. खांडू ने अपना राजनीतिक सफर राज्य के दूरदराज इलाक़ों में स्कूल खोलने और पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित कराने में मदद करने वाले स्थानीय नेता के रूप में शुरू किया था. वह बौद्ध धर्म मानते थे. दो-दो बार मुख्यमंत्री पद संभालने वाले खांडू सात साल तक सेना की ़खु़िफया शाखा से जुड़े रहे. 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान उल्लेखनीय सेवा के लिए उन्हें स्वर्ण पदक से नवाजा गया. तीन मार्च, 1955 को तवांग में जन्मे खांडू 1980 में अंचल समिति के सदस्य बने. इसके बाद उन्होंने दूरदराज के गांवों में सामाजिक कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया. उन्होंने अपने गृह ज़िले में पेयजल, बिजली एवं संचार सुविधाएं पहुंचाने और स्कूल स्थापित कराने में अहम भूमिका निभाई. 1983 में वह वेस्ट कामेंग डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के उपाध्यक्ष बने और 1990 में मुक्तो क्षेत्र से निर्विरोध विधायक चुने गए. 2007 में वह गेगांग अपांग की जगह मुख्यमंत्री बने.

Monday, May 9, 2011

गृहमंत्री जी, मणिपुर के बच्चे मुस्कुराते नहीं हैं!


मणिपुर में मुझे तमाम बातें खास लगीं। ऐसी बातें जिन्हें आप पढ़ कर या देख कर जान तो सकते हैं, लेकिन जिन्हें महसूस करने के लिए आपको वहां जाना ही पड़ेगा। सच ये हैं कि मुझे वैसा कोई कड़वा अनुभव नहीं हुआ, जैसा आमतौर पर उत्तर भारत में रहने वालों के दिमाग में रहता है। लेकिन फिर भी चीजें कहीं न कहीं वैसे ही हैं, जैसे हम समझते हैं।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली थी कि वहां के बच्चे आपको देख कर मुस्कुराते नहीं। आप कितने ही बच्चों को देख कर अलग-अलग बार अलग-अलग जगहों पर इसकी कोशिश करके देख लें। आप निराश होंगे। वे आपको देख कर डरते तो नहीं, लेकिन असहज जरूर हो जाते हैं। वे आपको ऐसा आदमी समझते हैं, जो उनकी और उनके परिवार, गांव और समाज की मुश्किलें नहीं समझ सकता। सौभाग्य से सलाम भाई मेरे साथ था, इसलिए मुझे कुछ बच्चों से जुड़ने का मौका मिला। लेकिन सच यही है कि बौद्ध लामाओं से दिखने वाले ये बच्चे जब मुस्कुराहट की भाषा में बात नहीं करते, तो एक भारतीय होने, विकास करने और दुनिया में पहचान बनाने की भावना अजीब सी लगने लगती है।

दूसरी खास बात महिलाओं की जिंदगी को लेकर मैंने महसूस की। कितनी मुश्किलें हैं उनकी जिंदगी में और कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं वे। आप उन्हें वहां आते-जाते देख कर ही जान सकते हैं। गाढ़े लाल रंग (मैरून) का फनेक (पेटीकोट जैसा पहनावा) और गुलाबी रंग का दुपट्‌टा डाल कर वे दिखने में बेहद खूबसूरत लगती हैं। उनका आत्मविश्वास संतुलन अनुशासन और सबसे बढ़ कर चेहरे पर गरिमा। मणिपुर के बच्चों के चेहरों पर जो दर्द मासूमियत और अजनबीपन है, वह जैसे महिलाओं के चेहरों पर विस्तार पा गया है। दिल्ली में आप उन्हें हल्का और चीप समझ कर उन पर भद्दे कमेंट कर कितना बड़ा अपराध करते हैं – इसका एहसास आपको मणिपुर में उनकी असली जिंदगी देख कर ही होगा।

ऐसा नहीं कि उत्तर प्रदेश या उत्तर भारत के गांवों में (मैं लखनऊ का हूं) महिलाएं मेहनत नहीं करतीं या उनमें कम गरिमा है, लेकिन उनके साथ हम अपने ही देश में बड़े शहरों में खास कर राजधानी दिल्ली में उतना घटिया बर्ताव भी तो नहीं करते।

वे घर का सारा काम करती हैं। पहाड़ पर चढ़ कर लकड़ियां काट कर लाती हैं। रोजी-रोटी के लिए मछलियां पकड़ती हैं। पीठ पर एक कपड़े से बच्चे को बांध कर साइकिल चलाती हैं। खूब पैदल चलती हैं और जरूरी होने पर टैक्सी भी लेती हैं।

एक घटना याद आ रही है। एक दिन मैं और सलाम भाई टैक्सी से लौट रहे थे, इंफाल से। टैक्सी में अंदर सीट नहीं थी। इसलिए हम पीछे की जगह पर खड़े होकर जा रहे थे। रास्ते में एक महिला ने हाथ हिला कर टैक्सी रुकवायी और अंदर जगह न होने की बात जान कर भी कुछ कहे बगैर पीछे हमारे साथ खड़ी हो गयी। टैक्सी चल पड़ी। मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह महिला खूब सजी-धजी हुई थी और शायद किसी शादी में जा रही थी। उसने मेकअप भी कर रखा था। उसे पीछे खड़े होकर जाने में कोई झिझक नहीं हुई। यह है उनकी जिंदगी और हिम्मत। हमारे यहां शादी में जाने वाली महिलाएं उस दौरान कितने दिखावे की दुनिया में रहती हैं, ये हम सब जानते हैं। बाद में सलाम भाई ने बताया कि यहां ये कॉमन बात है। चाहे शादी में जाना हो, या कहीं और। अगर जगह नहीं है, तो वह पीछे खड़ी होकर भी जाएगी।

हम अगर ये जानना चाहें कि मणिपुर के लोगों का हमारे प्रति और भारत के प्रति चिढ़ने वाला नजरिया क्यों है, तो ये कोई मुश्किल काम नहीं है। बशर्ते हम ईमानदारी से अपने और उनके हालात को जानें। उनको, खास कर दिल्ली में तो चिंकी पिंकी या फिर नेपाली कह कर अपमानित करने से क्या वे हमको इज्जत देंगे? वो उसी दृष्टि से देखेंगे, जो हम उनको देखते हैं। सबसे बड़ा कारण तो अफसपा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) है। इस कानून ने वहां के लोगों की जिंदगी को तबाह कर दिया है। इस कानून की वजह से वहां के लोग उत्तर भारतीयों को मयांग (बाहरी आदमी) कह कर पुकारते हैं।

मैं दिल्ली में रहता हूं और मेरे पास पानी लेने के लिए यहां चार तरह के इंतजाम हैं। किचन में एक टंकी है। एक बाथरूम में, एक टॉयलेट में और एक बेसिन में। मणिपुर के गांवों में कहीं भी टंकी तो दूर, सरकारी नल भी नहीं है। हर घर के पास एक पोखर है, जिसमें बारिश का पानी इकट्‌ठा किया जाता है। सबकी कोशिश होती है कि पोखर के पानी को साफ रखें। वहां कुत्ते नहीं दिखते, शायद इसलिए कि वे पानी को गंदा कर सकते हैं। गाय भी कम पाली जाती है। लोगों को चाय पीने की आदत नहीं है। सुबह मछली-चावल खाने के बाद लोग देर शाम को खाना खाते हैं। बीच में चाय-नाश्ते की कोई आदत नहीं। दिन भर काम करना और रात को जल्दी सो जाना।

सड़कें यहां जरूर बनी हैं और सड़कों पर आर्मी की ओर से रात में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सफेद लाइटें जगमगाती रहती हैं, लेकिन सच यह है कि ये लाइटें नाउम्मींदी के गहरे अंधेरे की तरह हैं। क्योंकि घरों में बिजली एक दिन आती है, अगले दिन नहीं आती। यूपी के गांवों में जिस तरह से सरकारी नल लगवाना या शौचालय बनवाना आसान हो गया है, उसे देख कर आप खुद से ही सवाल पूछेंगे कि पानी, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों से महरूम रखे गये इन लोगों का कुसूर आखिर क्या है?

यहां प्राकृतिक खूबसूरती है। शांत माहौल है। लोग मेहनती हैं। उनके चेहरे पर मेहनत और आत्मसम्मान की गरिमा है, लेकिन वे दिल से खुश नहीं है। खुश शायद हम उत्तर भारत यूपी, बिहार और दिल्ली के लोग भी नहीं हैं, लेकिन हमारे लिए इसकी वजहें दूसरी हैं। हम शहरों की ओर भाग रहे हैं। हम जाति-धर्म, दहेज और दिखावों में जकड़े हुए लोग हैं, जो मौकों को दूसरों से छीनना चाहते हैं। हमारे साथ सरकारें उस तरह का बर्ताव हर्गिज नहीं कर रहीं, जैसा नार्थ ईस्टा के साथ किया जा रहा। उनका गुस्सा बिल्कुल जायज है। आखिर क्यों वे आपसे घुले मिलें, क्यों आपको अपनी मुसीबतों का साझीदार बनाएं, इसलिए कि आप उन्हें आदिवासी, पिछड़ा और हिंसक करार दे कर उनके अधिकारों से महरूम कर दें? आपकी दया का पात्र बन कर वे नहीं जीना चाहते। उनका भी एक इतिहास है। ये देश उनका भी उतना ही है, जितना आपका। इसके बावजूद आप चाहते हैं कि आप उनका साथ ऐसा बर्ताव करें, जैसे वे किसी दूसरे देश से आये हैं या इस देश में आपसे कम दर्जे के नागरिक हैं।

- दीपक भारती (deepakbharti2008@gmail.com)

मैं मणिपुरी हूं और मणिपुर में जंगल का कानून चलता है

मैं एक मणिपुरी हू। और इस नाते महसूस करता हूं कि मणिपुर के लोग खुद को भारत से कटा हुआ और अजनबी महसूस करते हैं। उन्हें जब कोई इंडियन कहता है तो उन्हें ये थोपा हुआ लगता है। वजह सिर्फ इतनी है कि आप जैसा बर्ताव करेंगे, वैसा ही
असर होगा।

मणिपुर में उस कानून का राज है, जो जंगल में रहने वाले जानवरों के लिए होता है। यानी जंगल का कानून। मसलन, अफसपा। इस कानून के तहत किसी को भी गोली मारना, पकड़ कर जेल में डाल देना और महिलाओं का बलात्कार करना एक आम घटना है। सेना के जवान जवाब देते हैं कि वह आतंकवादी था, इसलिए ये सब किया है। मुख्यमंत्री ने यहां तक कहा था कि मारने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। लेकिन सच तो सामने आ ही गया था कि आतंकवादी के नाम पर लोगों पर जुल्म ढाये जा रहे हैं। तहलका ने 12 तस्वीरें छाप कर पर्दाफाश कर दिया था।

सब के पास समानता का अधिकार है। भारत जितना हिंदी भाषियों का है, उतना ही अहिंदीवासियों का भी है। रही बात राजनीति की तो मणिपुर में कांग्रेस की सरकार है। यह दूसरी बार बनी है। मगर, प्रदेश की सरकार ने मानो आंख-कान बंद कर लिये हैं। प्रदेश की सरकार ही ध्यान नहीं दे रही है, तो केंद्र सरकार क्या करेगी। इन दस सालों में आज तक किसी भी बड़े नेता या अधिकारी ने इनकी समस्यााओं पर गौर करना मुनासिब नहीं समझा। यह कभी नहीं हुआ। आंकड़ों में दिखता कुछ और है और जमीनी हकीकत कुछ और। इसका जीता जागता उदाहरण है इरोम शर्मिला का अनशन।

इरोम के अनशन को दस साल हो गये। अफसपा के खिलाफ। आज तक केंद्र की तरफ से कोई पहल नहीं हुई। न किसी ने जानने-समझने की कोशिश की। उसका अनशन अभी भी उम्मीद की आस लिए जारी है। अगर पूर्वोत्तर राज्यों खास कर मणिपुर को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाना है तो सरकार को अपनी सोच और नजरिये में बदलाव लाना होगा। उनकी समस्याओं को समझना और सुनना होगा। उनके करीब जाकर दिल में जगह बनानी होगी

-एस. बिजेन सिंह (sbijensngh@gmail.com)

Tuesday, March 22, 2011

इस सत्याग्रह से कौन पिघला?

पिछले एक दशक से मणिपुर घाटी की एक युवा महिला का अनशन जारी है। पुलिस और डॉक्टर प्लास्टिक टच्यूब के जरिए भोजन देकर उन्हें जीवित रखे हुए हैं। इन दस सालों का बड़ा हिस्सा उन्होंने अस्पताल में पुलिस के कड़े पहरे के बीच बिताया है। एक दुर्लभ साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकारा कि अस्पताल में अगर उन्हें किसी चीज की सबसे ज्यादा कमी खलती है तो वह है अपने लोगों का साथ। बीते एक दशक से उन्होंने अपनी मां का चेहरा नहीं देखा है। उन्होंने अपनी निरक्षर मां के साथ यह अनुबंध कर लिया है कि जब तक वे अपने राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित नहीं कर लेतीं, तब तक एक-दूसरे से भेंट नहीं करेंगी।

इरोम शर्मिला की जिद यह है कि जब तक भारत सरकार मणिपुर से आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पॉवर्स) एक्ट 1958 (एएफएसपीए) को वापस नहीं लेती, तब तक वे अपना अनशन जारी रखेंगी। पुलिस बार-बार उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है, जिसके लिए अधिकतम सजा एक साल की कैद है। हर बार रिहाई के फौरन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया जाता है। अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध की ऐसी मिसाल दुनियाभर में कोई और नहीं है। इरोम शर्मिला एक ऐसे कानून को वापस लेने की मांग कर रही हैं, जो उनके अनुसार वर्दीधारियों को बिना किसी सजा के भय के बलात्कार, अपहरण और हत्या करने के अधिकार मुहैया करा देता है। वर्ष 1958 में यह कानून इस लक्ष्य के साथ लागू किया गया था कि नगालैंड में सशस्त्र विद्रोहों का प्रभावी सामना करने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों को अधिक शक्तियां प्रदान की जा सकें। 1980 में यह कानून मणिपुर में भी लागू हो गया।

1 नवंबर 2000 को असम रायफल्स अर्धसैन्य बल ने मणिपुर घाटी के मालोम कस्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों को गोलियों से भून डाला। इनमें एक किशोर लड़का और एक बूढ़ी महिला भी थी। हादसे की दर्दनाक तस्वीरें अगले दिन अखबारों में छपीं। 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और कवयित्री इरोम शर्मिला ने भी ये तस्वीरें देखीं। असम रायफल्स ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आत्मरक्षा के प्रयास में क्रॉस फायर के दौरान ये नागरिक मारे गए, लेकिन आक्रोशित नागरिक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे। इसकी अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि असम रायफल्स को एएफएसपीए के तहत ओपन फायर के अधिकार प्राप्त थे। शर्मिला ने शपथ ली कि वे इस कानून के अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त कराने के लिए संघर्ष करेंगी। उनके सामने अनशन के अलावा और कोई चारा नहीं था। उन्होंने अपनी मां का आशीर्वाद लिया और 4 नवंबर 2000 को अनशन की शुरुआत की। एक दशक बीतने के बाद भी कानून यथावत है और शर्मिला का अभियान भी जारी है।

इस दौरान एक बार रिहाई की क्षणिक अवधि में वे दिल्ली पहुंचने में सफल रहीं। उन्होंने अपने आदर्श महात्मा गांधी की समाधि पर आदरांजलि अर्पित की, लेकिन जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली के एक अस्पताल में कुछ समय बिताने के बाद उन्हें फिर इम्फाल के हाई सिक्योरिटी अस्पताल वार्ड में भेज दिया गया, जहां वे अब भी हैं। महात्मा गांधी का विश्वास था कि अहिंसक सत्याग्रह के जरिए अत्याचारियों के मन में संवेदनाएं जगाई जा सकती हैं, लेकिन बीते एक दशक में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि इस युवा महिला के सत्याग्रह ने भारतीय राजनीतिक तंत्र की संवेदनाओं को झकझोरा हो। वर्ष 2004 में भारत सरकार ने इस बात की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए क्या इस कानून में संशोधन की आवश्यकता है या उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 2005 में आयोग ने अनुशंसा की कि कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और इसके कई प्रावधानों को अन्य कानूनों में समायोजित कर लिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार ने आयोग की इस अनुशंसा की अनदेखी कर दी।

शर्मिला द्वारा अनशन प्रारंभ किए जाने के बाद घाटी की कई महिलाओं ने अहिंसक प्रतिरोध के कई अन्य स्वरूप ईजाद किए। वर्ष 2004 में राजनीतिक कार्यकर्ता थंगियम मनोरमा के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। घाटी में जनाक्रोश चरम पर पहुंच गया। मणिपुरी महिलाएं असम रायफल्स के मुख्यालय कांगला फोर्ट के द्वार पर एकत्र हुईं और निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली एक महिला तुनुरी ने बताया यह दृश्य देखकर सैनिक शर्मसार होकर फोर्ट में लौट गए। निर्वस्त्र महिलाएं आधे घंटे तक विरोध प्रदर्शन करती रहीं। अगले दिन इस प्रदर्शन के समाचारों ने पूरे देश का ध्यान मणिपुर की स्थितियों की ओर खींचा। सरकार ने असम रायफल्स को ऐतिहासिक कांगला फोर्ट खाली कर देने का आदेश दिया। रायफल्स के मुख्यालय को घाटी के दूरस्थ क्षेत्रों में स्थापित कर दिया गया और न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। लेकिन असम रायफल्स ने मनोरमा के साथ किए गए बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या को एक तरह से उचित ठहराते हुए बयान जारी किया कि वह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की एक आतंकवादी थी।

वर्ष 2008 के बाद से रोज लगभग सात से दस महिलाएं इरोम शर्मिला के साथ एक दिन का उपवास कर रही हैं। इम्फाल में मेरी भेंट इन प्रदर्शनकारी महिलाओं से हुई। वे अपने परिजनों से दूर रहकर शिविरों में जीवन बिताते हुए अपनी नायिका शर्मिला के आंदोलन को जारी रखे हुए हैं। इरोम शर्मिला के अनशन और कारावास के दस वर्ष पूरे होने पर देशभर से सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार इम्फाल में एकजुट हुए। यहां हमने कविता, गीत, नृत्य और चित्रकला की अद्भुत प्रस्तुतियां देखीं, जो मणिपुर के लोगों के आंदोलन की नायिका इरोम शर्मिला के प्रति आदरांजलि थी।

इम्फाल में अपने अस्पताल के वार्ड से इरोम शर्मिला लिखती हैं : मेरे पैरों को मुक्त कर दो उन बंधनों से/जो कांटों की बेड़ियों की तरह हैं/एक तंग कोठरी के भीतर/कैद हैं मेरे तमाम दोष और अवगुण/और मैं/एक पक्षी की तरह.


हर्ष मंदर
लेखक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।
साभार - भास्‍कर (22;3;2011)

Tuesday, March 1, 2011

और मत रखो अंधेरे में, देखने दो मुझे

स्‍त्री को दुर्बल कौन समझते हैं? जो कहते हैं कि स्‍त्री शारीरिक रूप से दुर्बल है, वे गलत कहते हैं. वे झूठ बोलते हैं. आज भी अगर एक नर और एक नारी शिशु को भरे तालाब में छोड दिया जाए तो जिस शिशु की मौत होगी, वह नर शिशु ही होगा. यदि नारी शिशु का फेफडा या हृदय नर शिशु से ज्‍यादा शक्तिशाली है यदि प्रतिरक्षा या जिंदा रहने की क्षमता नारी शिशु में अधिक है, तो कैसे एक झटके में यह राय दे दी जाती है कि स्‍त्री दुर्बल, कोमल, भीरु और जालवंती होती है.

मेरी इच्‍छा है कि सुबह से दोपहर, दोपहर से रात तक अकेली घूमती रहूं. नदी के किनारे, गांव के मैदान में, रोशनी में, शहर के फुटपाथ पर, पार्क में, अकेली, सिर्फ अकेली चलती रहूं. बहुत इच्‍छा होती है कि सीताकुंड पहाड पर जाउं. मन करता है एक दिन अचानक बिहार के सालवन में जाकर पूरी दोपहर बिताउं. मन करता है कि सेंट मार्टिन के समुद्र में उतर कर गांगचील (एक समुद्री पक्षी) का खेल देखूं. इच्‍छा होती है कि गहन उदासी भरे क्षणों में घास पर लेटेलेटे आकाश देखती रहूं. मन करता है कि संसद भवन की किसी सीढी पर अकेली बैठी रहूं, किसी खुशनुमा शाम में पेड से पीठ टिकाये यों ही अलसायी खडी रहूं, क्रिसेंट झील के पानी में पूरी शाम पांव डुबोय पडी रहूं और फिर अचानक शीतलक्षा नदी में नौकाविहार करूं.

मैं जानती हूं, बहुत अच्‍छी तरह जानती हूं कि यदि मैंन अपनी इच्‍छाएं पूरी करने लगूं तो मुझ पर लोग पत्‍थर बरसायेंगे, थूकेंगे, धिक्‍कारेंगे. मुझे अपमानित होना पडेगा, बलात्‍कार का शिकार होना पडेगा. मुझे कोई पागल कहेगा, कोई बदचलन कहेगा. य‍द्यपि यही सब करते हुए किसी पुरुष को किसी के व्‍यंग्‍यबाण से आहत नहीं होना पडता. किसी पुरुष के साथ अपहरण, धोखाधडी, बलात्‍कार, हत्‍या जैसे हादसे नहीं गुजरते. हादसे सिर्फ स्‍त्री के साथ ही गुजरते हैं. पूछा जाता है- स्‍त्री एक हमसफर पुरुष के क्‍यों घूमती है? पुरुष स्‍वभाव की विचित्रताएं उसे शोभा देती है, लेकिन एक स्‍त्री फुटपाथ पर क्‍यों टहलेगी, क्‍यों पेड की छांव में खडी रहेगी, कैसे सीढी पर अकेली बैठी रहेगी और क्‍यों घास पर लेटेगी? स्‍त्री के लिए ऐसी तमाम इच्‍छाएं पालना उचित नहीं है. स्‍त्री को तो घर पर बैठे रहना चाहिए. उसके लिए घर में रोशनदान की व्‍यवस्‍था है. उस रोशनदान की भेदती हुई जो रोशनी और हवा उसके शरीर में लगती है, क्‍या वही जिंदा रहने के लिए काफी नहीं है.

हां, काफी है. जिंदा रहने के लिए उतनी हवा-रोशनी काफी है. सभी पुरुष, स्‍त्री के सिर्फ जिंदा रहने तक को ही पसंद करते हैं, क्‍योंकि स्‍त्री की उन्‍हें जरूरत है. भाग के लिए, वंशबेल को बनाए रखने के लिए. स्‍त्री के वगैर न तो पुरुष का भोग संभव है और नही वंश रक्षा. स्‍त्री के बिना पुरुष के लिए अधिकार जताने, ताकत आजमाने, उंचे स्‍वर में बोलने और शारीरिक बल दिखाने की कौन सी जगह रह जाएगी ! उपरवाले अपने ही बनाए नीति-नियमों के मुताबिक नीचेवालों का शोषण करते हैं. सबल हमेशा दुर्बल पर चढाई रकता है उच्‍चवर्ग हमेशा मौका ढूंढता है- निम्‍नवर्ग या निर्धनों को फूंक कर उडा देने का. इसीलिए स्‍त्री पर हमेशा से पुरुष का अधिकार चला आया है- उसके जी भर उपभोग और उससे प्‍यास बुझाने का, उसे आहत करने का. स्‍त्री निम्‍न श्रेणी का प्राणी है, दुर्बल है, असहाय, असंगत, शरणार्थी है. इसीलिए स्‍त्री को जिंदा बनाए रख कर उस पर चढाई करने की इच्‍छा सभी सज्‍जनों में रहती है.

जैसे पिंजडे में पंछी के लिए भी रोशनी आने की व्‍यवस्‍था रहती है, उसको समय पर दाना-पानी दिया जाता है, चंद शब्‍द सिखाये जाते हैं, वैसे ही स्‍त्री के लिए भी किया जाता है. स्‍त्री के लिए भी एक रोशनदान का इंतजाम रहता है, सुबह-शाम खाना दिया जाता है और कुछ तयशुदा सामाजिक व्‍यवहार सिखाया जाता है. स्‍त्री को उसकी सीमित बातचीत, सीमित राह, सीमित खान-पान, सीमित इच्‍छाओंे और सीमित सपनों के बारे में सम्‍यक ज्ञान दिया जाता है. पिंजडे में बंद पंछी की ही तरह स्‍त्री खुले आकाश, खुले मैदान, वन-जंगल और अनंत हरियाली के आनंद से वंचित रहती है.

स्‍त्री को दुर्बल कौन समझते हैं? जो कहते हैं कि स्‍त्री शारीरिक रूप से दुर्बल है, वे गलत कहते हैं. वे झूठ बोलते हैं. आज भी अगर एक नर और एक नारी शिशु को भरे तालाब में छोड दिया जाए तो जिस शिशु की मौत होगी, वह नर शिशु ही होगा. यदि नारी शिशु का फेफडा या हृदय नर शिशु से ज्‍यादा शक्तिशाली है यदि प्रतिरक्षा या जिंदा रहने की क्षमता नारी शिशु में अधिक है, तो कैसे एक झटके में यह राय दे दी जाती है कि स्‍त्री दुर्बल, कोमल, भीरु और जालवंती होती है.

दरअसल ये सब स्‍त्री पर आरोपित किए गए सामाजिक विशेषण हैं. स्‍त्री यदि विवेक-बुद्धि से परिचालित होने और ममत्‍व या प्‍यार धारण करने की अधिक क्षमता रखने के कारण हिंसक युद्ध में नहीं कूदती, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह अबला है. आदिम युग में स्‍त्री-पुरुष दोनों नोंच खसोट कर ही जीव-जंतुओं का मांस खाते थे. कहीं भी यह प्रमाणित नहीं हुआ कि स्‍त्री दुर्बल है, इसलिए वह नोच कर नहीं खा सकती. स्‍त्री का गर्भवती होना पडता है, इसलिए गर्भरक्षा के उद्देश्‍य से उसे कम परिश्रम का भी अभ्‍यस्‍त होना होता है. शिकार पर कम जाना पडता है. छीना-झपटी कम करनी पडती है. देहबल की अपेक्षा वह बुद्धि के द्वारा जीवन निर्वाह करती है. संतान के प्रति उसमें ममता पनपती है. प्‍यार के सामने वह झुक जाती है, उसमें डूब जाती है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि स्‍त्री दुर्बल, डरपोक और लाजवंती है.

स्‍त्री को डरना एवं लज्‍जालु होना पुरुष प्रधान समाज ने सिखाया है क्‍योंकि भयभीत एवं लज्‍जालु रहने पर पुरुषों को उसपर अधिकार जताने में सुविधा होती है. इसीलिए डर और लज्‍जा को स्‍त्री का आभूषण कहा जाता है. समाज में कुछ ही लोग होंगे जो निर्भीक और लज्‍जाहीन स्‍त्री को समाज बुरा नहीं कहते हों.

चूंकि डर एवं लज्‍जा को ही स्‍त्री का मुख्‍य गुण समझा जाताह ै चूंकि स्‍त्री के लिए सीमित रास्‍ता ही निर्धारित किया जाता है, इसीलिए यदि वह रास्‍ते में गलियारे में रेस्‍तरां में अकेले चलती या बैठती है तो लोग उसकी ओर हैरत से देखेंगे, सीटी बजाएंगे, उससे सट कर खडे होंगे और परखेंगे कि यह लडकी वेश्‍या तो नहीं क्‍योंकि वेश्‍या के अलावा कोई भी लडकी निडर होकर नहीं चलती. वेश्‍या के अलावा पूरे शहर में कोई भी अकेला, स्‍वच्‍छंद, सीमा लांघ कर रास्‍ते में नहीं निकलता.

जो स्त्रियां घर पर बैठी रहती है जो अभिभावक या पुरुषों के साथ निरापद घर से बाहर जाती हैं या अकेले ही मान्‍य सीमा के अंदर घूम फिर कर जरूरत पूरी करते हुए घर लौट आती है, समाज उन्‍हें भली औरत का दर्जा देता है. इस भद्रता का अतिक्रमण करने पर स्‍त्री को वेश्‍या कह कर गाली दी जाती है. पुरुष गण वेश्‍या को गाली जरूर देते हैं, लेकिन वेश्‍या के बगैर उनका काम भी नहीं चलता. अपने स्‍वार्थ के लिए उन्‍होंने खुद ही अपने दायरे में वेश्‍यालय खोल रखे हैं.

पुरुष वेश्‍या न कह दें, इसलिए स्‍त्री दोपहर के समय किसी खुले मैदान में अकेले नहीं घूमती. इच्‍छा होने पर भी वह चंद्रनाथ पहाड नर नहीं जाती. चाह कर भी स्‍त्री नदी तट से लगे हिजला पेड की छाया में बैठ कर दो एक पंक्तियां गा नहीं सकती. इच्‍छा के बावजूद निर्जन फुटपाथ पर अकेले नहीं चलती. स्‍त्री वेश्‍या संबोधन से बहुत डरती है, इससे वह अपने को बहुत बचा कर रखती है. पुरुष को नजरों में खुद को आकर्षक बनाए रखने के लिए स्‍त्री साज-सिंगार करती है. आंखों में गालों और होठों पर रंग चढाती है. पूरी दुनिया में श्रृंगार के प्रसाधनों का उत्‍पादन जिस रफ्तार से बढ रहा है मुझमें यह क्षमता नहीं है कि मैं इसका अंदाजा भी लगा पाउं वेश्‍याएं श्रृंगार करती हैं असामाजिक ग्राहक की आशा में और भद्र महिलाएं सजती है सामाजिक ग्राहक की आशा में उद्देश्‍य दोनों का ही ग्राहक पाना है. जिसे जितना अच्‍छा ग्राहक मिलता है उसको इस लोक की सुविधाएं भी उतनी ही अधिक मिलती है. स्‍त्री को वे सुविधाएं दे रहे हैं, खाने पीने पहनने ओढने को दे रहे हैं, इसीलिए स्‍त्रीके पैरों में वे जंजीरें पहनाते है. वैसे ही जैसे बकरी को मैदान में चरने के लिए छोड कर उसके गले की रस्‍सी को एक खूंटे से बांध दिया जाता है. स्‍त्री को गाय, बकरी, भेड की तरह ही एक नपे तुले दायरे में चलने फिरने दिया जाता है. पुरुष वर्ग रस्‍सी से बंधी स्‍त्री का स्‍वाद भी पाना चाहता है और उस्‍सी तुडाई हुई स्‍त्री का भी मुख्‍य रूप से पुरुष रसना को तृप्‍त करने के लिए ही स्‍त्री को एक बार घर में बंदी होना पडता है तो एक बार घर छोडना पडता है. स्‍त्री आखिर स्‍त्री ही है, चाहे वह वेश्‍या हो या कुलवधू कष्‍ट झेलने के लिए ही उसका जन्‍म हुआ है.

समाज की स्त्रियां पुरुषों के डंक मारने के डर से, इस डर से कि लोग उसे बुरा कहेंगे, चाहत के बावजूद एक बार महास्‍थानगढ घूमने नहीं जा सकतीं, श्रीमंगल के चाय बागान में निर्द्धंद्ध होकर टहल नहीं सकतीं. ब्रह्मपुत्र के पानी में खुशी से तैर नहीं सकती, संदरवन में पूर्णिमा की चांदनी नहीं नहा सकतीं. एकांतिक मानुष जीवन. यह जीवन वह मन मर्जी से नहीं जी सकती. इस जीवन को वह मनुष्‍य के पास, आकाश और नक्षत्रों के पास, जल और हवा के पास, हरे भरे जंगलों के पास, निर्जन नदी के पास लाकर नहीं पहचान सकती. वह अपने सभी अरमानों, सभी चाहतों और सपनों के घर को जला कर पुरुष के घर को आलोकित करती है.

स्‍त्री के इस अर्थहीन जीवन के प्रति शोक-संताप से भरी हुई मैं लज्जित हूं. पाठकगण, आप में यदि इंसानियत नाम की कोई चीज है तो इस पर आप भी लज्जित हों.

-तस्‍लीमा नसरीन

Tuesday, February 15, 2011

पूर्वोत्‍तर में शांति के लिए जरूरी है वार्ता

गुरुवार को उल्‍फा और केंद्र सरकार के बीच पहले दौर की वार्ता एक सुखद संकेत के साथ पूरी हो गई. वैसे यह तो महज आरंभ है. अब तक उल्‍फा ने अपनी मांगों की सूची तैयार नहीं की है और वे मुद्दे सामने नहीं आए हैं जिन पर वार्ता होनी है. अभी बहुत किया जाना बाकी है लेकिन वार्ता के लिए ठोस जमीन तैयार लगती है. पहले दौर की वार्ता के बाद दोनों पक्षों ने जो विचार व्‍यक्‍त किए वे उत्‍साहवर्द्धक हैं, यानी दोनों पक्ष वार्ता आगे बढ़ाने का आग्रह व्‍यक्‍त कर रहे हैं. वार्ता के बाद उल्‍फा और गृह मंत्रालय के बयानों से साफ लगता है कि दोनों पक्ष बातचीत के माध्‍यम से इस समस्‍या के सम्‍मानजनक राजनीतिक समाधान के लिए उत्‍सुक हैं. यही बात वार्ता के भविष्‍य के प्रति आश्‍वस्‍त करती है.

केंद्र सरकार और उल्‍फा के बीच आरंभ हुई वार्ता यदि एक सम्‍मानजनक समझौते तक पहुंच पाती है तो तीन दशक से जारी पूर्वोत्‍तर के उग्रवाद पर इसका दूरगामी प्रभाव पडेगा. उल्‍फा असम का सबसे ताकतवर और दबंग भुमिगत उग्रवादी संगठन है. पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों समेत इसके तार कई देशों तक फैले हुए हैं. तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद असमिया समाज पर इसका व्‍यापक प्रभाव है और अप्रत्‍यक्ष रूप से यह राज्‍य की राजनीति को भी प्रभावित करता रहा है. यही वजह है कि नब्‍बे के दशक से जारी सैन्‍य अभियान के बावजूद उल्‍फा की सक्रियता में कोई कमी नहीं आई है. कई बार विभाजन के बावजूद कमजोर होने के बदले इस संगठन ने खुद को ताकतवर ही बनाया है्. इसलिए उल्‍फा के साथ शांति वार्ता का आरंभ पूर्वोत्‍तर में उग्रवाद को नियंत्रित करने की दिशा में एक बडी घटना है. नगा बागियों के बाद उल्‍फा सबसे ताकतवर संगठन है. यदि उल्‍फा के साथ जारी वार्ता किसी नतीजे तक पहुंचती है तो अन्‍य छोटे-बडे उग्रवादी संगठनों पर भी वार्ता के लिए दबाव बढेगा. उन संगठनों के अंदर से भी वार्ता के लिए दबाव बढ सकता है और तब जाहिर है कि बाहरी समाज भी अपना दबाव बढा देगा, क्‍योंकि पूर्वोत्‍तर के लोग अब अपने क्षेत्र में अमन-चैन चाहते हैं.

उल्‍फा के साथ जारी वार्ता की सफलता के लिए यह पहली शर्त है कि बातचीत करने वाले दोनों पक्ष अब तक की बातचीत से संतुष्‍ट हों. उल्‍फा पिछले इकतीस वर्षों से असम को एक संप्रभु राष्‍ट्र बनाने के लिए सशस्‍त्र संघर्ष करता रहा है. भूमिगत संगठन के नेताओं और नौकरशाही के कामकाज की शैली में बुनियादी फर्क होता है. नौकरशाह कानून के दायरे और सरकारी औपचारिकताओं में बंधे होते हैं, जबकि भूमिगत संगठन के नेताओं के लिए संविधान की कोई सीमा नहीं होती है. उनकी मांगों के पीछे व्‍यावहारिकता कम और भावनात्‍मक आवेग ज्‍यादा होता है. इसलिए उन दोनों के बीच वार्ता की सफलता के लिए एक दूसरे की बात पर विश्‍वास करना बेहद जरूरी होता है, क्‍योंकि वार्ता के दौरान हर बात लिखित नहीं होती. कई बातों को लिखा भी नहीं जा सकता है लेकिन उन पर चर्चा की जा सकती है. इस नजरिए से देखा जाए तो पहले दौर की बातचीत पर संतोष जताया जा सकता है. कुछ देर के लिए वार्ता में शामिल होकर गृह मंत्री पी चिदंबरम ने उल्‍फा नेताओं के प्रति जो सम्‍मन दिखाया उससे उल्‍फा का वार्ता में विश्‍वास बढा होगा. यह अलग बात है कि संप्रभुता की शर्त पर वार्ता की जिद पर अडे उल्‍फा सेनाध्‍यक्ष परेशा बरुआ और उनके कुछ साथी अब भी वार्ता से अलग हैं और असम के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग परेश बरुआ के समर्थन में अभियान चला रहा है. बहरहाल, सुकून की बात यह है कि परेशा बरुआ और जीवन मोरान को छोडकर सभी उल्‍फा नेता और सैन्‍य बटालियनों के कमांडर खुल कर राजखोवा के साथ हैं. इस वजह से वार्ता के लिए आगे बढे राजखोवा के मन में एक संशय जरूर है. इसलिए वार्ता के आरंभिक चरण में चिदंबरम की भागीदारी एक दूरगामी कदम था. उल्‍फा नेताओं को इस बात का अहसास जरूर हो गया होगा कि केंद्र सरकार भी उनके द्वारा उठाए गए मुद़दों को भारतीय संविधान के दायरे में एक व्‍यावहारिक समाधान चाहती है. चिदंबरम के बयान से इस विश्‍वास को बल मिलता है जो आगे चल कर शांति वार्ता में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

उल्‍फा के साथ वार्ता इसलिए आरंभ हो पाई है वह बिना शर्त वार्ता को तैयार हो गया. बातचीत के दौरान वह कोई मुद्दा उठा सकता है. केंद्र सरकार भले ही उसके लिए तैयार नहीं हो लेकिन उल्‍फा को मुद्दे उठाने से रोका नहीं जा सकता है. पले भी केंद्र सरकार ने स्‍पष्‍ट किया था कि भारत सरकार संविधान की सीमा के तहत बिना शर्त वाता्र को तैयार है, भले वार्ता के दौरान उल्‍फा नेतृत्‍व अपने मन की बात कर सकता है. संकेत साफ था कि आपसी बातचीत के दौरान उल्‍फा नेतृत्‍व असम की संप्रभुता पर भी चर्चा कर सकता है. ठीक है कि केंद्र संप्रभुता दिए जाने की बात नहीं मानेगा लेकिन अपनी बात रख कर उल्‍फा नेतृत्‍व अपने समर्थकों को यह जवाब जरूर दे सकता है कि जिस मूल मुद्दे के लिए उसने इतने दिनों तक संघर्ष किया उसे केंद्र सरकार के समक्ष उठाया. इसमें कुछ भी असंवैधारिक नहीं है क्‍योंकि केंद्र ने संप्रभुता के मुद्दे पर बातचीत करने से इनकार कर दिया है और बातचीत बिन किसी पूर्व शर्त के हो रही है. आखिर उल्‍फा को भी तो संघर्ष से इतर राह दिखाई देने लगी है. अगर परेश बरुआ संप्रभुता की शर्त पर वार्ता की जिद पर अडे रहेंगे तो जाहिर है कि वार्ता का प्रयास कुछ दूर जाकर ठहर जाएगा जैसा कि विगत में होता रहा है.

जब उल्‍फा नेतृत्‍व बिना शर्त वार्ता को तैयार हो गया तो वार्ता आरंभ हो गई. वार्ता को सफल बनाने में असम सरकार की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका है. राज्‍य सरकार चाहे तो कई तरह से उल्‍फा के कैडरों को उकसाने का कार्य कर सकती है. इसलिए वार्ता लायक माहौल बनाए रखना राज्‍य सरकार की जिम्‍मेदारी है. इस नाते दिल्‍ली जाने के पहले अरविंद राजखोवा का अपने साथियों के साथ जाकर मिलना एक अच्‍छा संकेत था. मुख्‍यमंत्री तरुण गोगोई भी इस वार्ता को सफल बनाने के लिए उत्सुक लग रहे हैं. इस आधार पर अब तक घटनाक्रमों को सुखद कहा जा सकता है. उम्‍मीद की किरण तो नजर आने लगी है. देखते हैं उजाला कब तक फैलता है.

लेकिन वार्ता की सफलता के लिए समाज का हर वर्ग का सहयोग जरूरी है. इसमें दो राय नहीं है कि उल्‍फा और केंद्र सरकार को वार्ता के लिए मजबूर करने के वास्‍ते बुद्धिजीवी डॉ हीरेन गोहाई की अगुवाई में गठित सम्मिलित जातीय अभिवर्तन की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है. उसे आमलोगों का समर्थन मिला. बडी मुश्किल से उल्‍फा और केंद्र के बीच वार्ता आरंभ हो पाई है. शांति के लिए सभी को अपने स्‍तर से इस आरंभ को सार्थक मुकाम तक पहुंचाने के लिए पहल करनी चाहिए. इसमें केंद्र सरकार, खास कर असम में स्‍थायी शांति के इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए. यह केंद्र सरकार राज्‍य सरकार और उल्‍फा के लिए एक मौका है और उन्‍हें किसी भी हालत में यह मौका नहीं गंवाना चाहिए.

रविशंकर रवि

Friday, December 31, 2010

मणिपुर की दर्द भरी कहानी

मुझे याद है अगस्त, 2010 में प्रगति मैदान (दिल्ली) में लगा 15वां पुस्तक मेला. मेले का विषय था-पूर्वोत्तर भारत का साहित्य, लेकिन वहां के बारे में कोई भी खास किताब देखने को नहीं मिली. मणिपुर की तो कोई किताब ही नहीं आई. कोई लेखक उधर के मामलों पर अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद नहीं करना चाहता. ऐसे में डॉ. वर्मा ने जो काम किया है, वह सराहनीय है. उन्होंने अपने मणिपुर प्रवास की यादों को संजोकर उन्हें उपन्यास की शक्ल दे दी और नाम दिया-उत्तर पूर्व.

अगर आप पूर्वोत्तर भारत को क़रीब से जानना-समझना चाहते हैं तो डॉ. लाल बहादुर वर्मा द्वारा लिखित उपन्यास उत्तर पूर्व आपके लिए एक बेहतर मददगार साबित हो सकता है. यह डॉ. वर्मा की वह जीवंत कृति है, जिसमें मणिपुर का इतिहास, संस्कृति, समाज एवं राजनीति सब कुछ है. उत्तर पूर्व का मुख्य आधार ही मणिपुर है. मणिपुर यूनिवर्सिटी के इर्द-गिर्द बुने इस उपन्यास की शुरुआत में थांगजम मनोरमा को समर्पित एक कविता भी है. जुलाई, 2004 में बलात्कार के बाद मनोरमा की हत्या कर दी गई थी और इसका आरोप भारतीय सेना के जवानों पर लगा था. इस घटना के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने असम रायफल्स के मुख्य फाटक पर निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था. उपन्यास के पहले पन्ने पर प्रकाशित कविता उन प्रदर्शनकारी महिलाओं का उत्साह बढ़ाती है. मणिपुर धनुर्धर अर्जुन की ससुराल है. यही नहीं, यहीं पर मोइरांग नामक वह स्थान भी है, जहां आज़ाद हिंद फौज की भारत विजय योजना साकार हुई थी.

यह उपन्यास केंद्र की उपेक्षा का दंश झेल रहे पूर्वोत्तर भारत की चिंता पर रोशनी डालता है. मणिपुर में सेना का राज है. वहां आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट लागू है. इस एक्ट की आड़ लेकर किसी को पकड़ना, गोली मार देना और महिलाओं के साथ दुष्कर्म सेना के लिए आम बात है. उपन्यास के कुछ पात्र इस एक्ट के शिकार होते हैं. कई परिवारों को इस एक्ट का शिकार होना पड़ता है. उपन्यास बताता है कि शांतिपूर्ण ज़िंदगी जी रहे इराबो को इस एक्ट ने किस तरह प्रभावित किया. बाहर के लोगों, खासकर हिंदीभाषियों को मणिपुर में उपेक्षा की नज़र से देखा और मयांग कहकर संबोधित किया जाता है. बर्मा (उपन्यास का एक पात्र) वहां की संस्कृति में कैसे शामिल होकर धीरे-धीरे घुल-मिल जाता है, यह उपन्यास का अहम हिस्सा है. पूर्वोत्तर के बारे में देश के बाक़ी हिस्से के लोग ज़्यादा नहीं जानते और न ही जानने में दिलचस्पी रखते हैं. चाहे मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल हो या फिर मिजोरम. उत्तर भारतीय तो वहां के लोगों को चाइनीज या नेपाली समझ बैठते हैं.

पूर्वोत्तर की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक पृष्ठभूमि और इतिहास के बारे में भी आम लोगों को बहुत ही कम जानकारी है. यह क्षेत्र राजनीतिक तौर पर भी उतना मज़बूत नहीं है. इन सारी परिस्थितियों को डॉ. वर्मा ने अपने उपन्यास में विभिन्न पात्रों के माध्यम से बहुत सहज ढंग से पेश किया है. इबोहल, बर्मा, इराबो, तनु, आरके, जुही एवं राधा इस उपन्यास के ऐसे पात्र हैं, जिन्होंने वहां की ज़िंदगी को गहराई से जिया और भोगा है. इन पात्रों का चिंतन-मनन उपन्यास के हर पन्ने पर मिलता है. डॉ. वर्मा ने वहां के जीवन, समस्याओं और परंपराओं को बहुत गहराई तक महसूस किया और फिर उसे उपन्यास की शक्ल में सबके सामने पेश किया है. यह हाशिए पर धकेले जा रहे एक राज्य के बारे में सटीक चिंतन है. यही नहीं, लेखक ने इस उपन्यास में पूर्वोत्तर के इतिहास से जुड़ी कई अहम जानकारियां पेश की हैं.

उपन्यास उत्तर पूर्व को पढ़ना केवल उत्तर पूर्व को जानना नहीं है, बल्कि वहां से जुड़ी हर चीज को जानना-समझना भी है. लेखक ने भूमिका में लिखा है, मैंने बहुत से अच्छे-बुरे काम किए हैं पैंसठ वर्षों के दौरान, पर मैं किसी में इतना उजागर नहीं हुआ, किसी ने मुझे इतना नहीं रचा और सजाया-संवारा, जितना उत्तर पूर्व ने. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मणिपुर को लैंड ऑफ ज्वैल कहा था. इस बात को लेखक ने बहुत गहराई से समझा और इसका विश्लेषण भी किया. उपन्यास का प्रत्येक परिच्छेद सुंदर काव्य पंक्तियों से शुरू होता है. मैतै, मणिपुरी और भारतीय होने की त्रिविधा से जूझ रहे मणिपुरियों की मानसिक लड़ाई को लेखक ने जाना. थोपी गई भारतीयता को वहां के लोग कैसे नकारते हैं और झेलते हैं, यह लेखक ने काफी सूझबूझ से बताया है. 336 पृष्ठों के इस उपन्यास में लेखक की सोच और विचारधारा साफ-साफ झलकती है. मैं मूल रूप से पूर्वोत्तर का हूं. उपन्यास पढ़ने के बाद सोचता हूं कि मैंने इसे पहले क्यों नहीं पढ़ा. वहां का नागरिक होने के बावजूद वहां की चीजों के बारे में मुझे इतनी अच्छी समझ नहीं है. उत्तर पूर्व पढ़ने के बाद लगा कि खोजने-समझने के लिए अभी बहुत कुछ बाक़ी है. दरअसल, पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम किताबें देखने-पढ़ने को मिलती हैं. खासकर हिंदी में तो और भी कम. मुझे याद है अगस्त, 2010 में प्रगति मैदान (दिल्ली) में लगा 15वां पुस्तक मेला. मेले का विषय था-पूर्वोत्तर भारत का साहित्य, लेकिन वहां के बारे में कोई भी खास किताब देखने को नहीं मिली. मणिपुर की तो कोई किताब ही नहीं आई. कोई लेखक उधर के मामलों पर अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद नहीं करना चाहता. ऐसे में डॉ. वर्मा ने जो काम किया है, वह सराहनीय है. उन्होंने अपने मणिपुर प्रवास की यादों को संजोकर उन्हें उपन्यास की शक्ल दे दी और नाम दिया-उत्तर पूर्व.

Saturday, December 4, 2010

मांस के झंडे















देखो हमें
हम मांस के थरथराते झंडे हैं
देखो बीच चौराहे बरहना हैं हमारी वही छातियां
जिनके बीच
तिरंगा गाड़ देना चाहते थे तुम
देखो सरेराह उधड़ी हुई
ये वही जांघें हैं
जिन पर संगीनों से
अपनी मर्दानगी का राष्ट्रगीत
लिखते आये हो तुम
हम निकल आए हैं
यूं ही सड़क पर
जैसे बूटों से कुचली हुई
मणिपुर की क्षुब्ध तलझती धरती

अपने राष्ट्र से कहो घूरे हमें
अपनी राजनीति से कहो हमारा बलात्कार करे
अपनी सभ्यता से कहो
हमारा सिर कुचल कर जंगल में फेंक दे हमें
अपनी फौज से कहो
हमारी छोटी उंगलियां काट कर
स्टार की जगह टांक ले वर्दी पर
हम नंगे निकल आए हैं सड़क पर
अपने सवालों की तरह नंगे
हम नंगे निकल आए हैं सड़क पर
जैसे कड़कती हे बिजली आसमान में
बिल्कुल नंगी...
हम मांस के थरथराते झंडे हैं

-अंशु मालवीय

(मणिपुर में जुलाई, 2004 सेना ने मनोरमा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी. मनोरमा के लिए न्यासय की मांग करते महिलाओं ने निर्वस्त्र हो प्रदर्शन किया. उस प्रदर्शन की हिस्सेदारी के लिए ये कबिता...) साभार: उत्‍तर पूर्व