यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Sunday 27 April 2008

बहन की शादी

मैं और बहन हम दो ही हैं हमारे परिवार में, मां बाप को छोरकर। छोटा परिवार हैं हमारा। तीन साल से घर का समाचार नहीं मिला था। एक दिन अचानक पता चला की ८ may को बहन की शादी हैं। मुझे जानकर बहुत खुशी हुयी। एक भाई अपनी एकलौती बहन की शादी में जो खुशी महसूस होती हैं वह खुशी मुझे महसूस हो रही थी. खुशीमें आंशु भी शामिल था। मेरी खुशी कि कोई ठिकाना नहीं था.

मेरी पढ़ई - लिखाई को लेकर कितना सतर्क रहती थी मेरी बहन। एक घटना मुझे आज भी याद हैं कि जब मैं मेट्रिक परीक्षा के लिए खूब पड़ता था। साडी रात बहन जागती थी। भोर में उठकर खाना टियर करती थी। मेरे लिए छोच कर अपनी पढ़ई तक छोर दी। कहती थी कि में तो लड़की हूँ ज्यादा क्या पड़ना हैं। तुम तो परिवार की आशा के दीप हैं। दीदी की आशा आज भी मैंने संजो कर रखा हैं। मेरे लिए तो माँ की जगह दीदी ने ली, क्योंकि एक मां अपने बच्चे को परवरिश करने में जो जिम्मेदारी उठाती हैं वह जिम्मेदारी उनहोने मेरे लिए उठाई। मेरे ऊपर परिवार की आशा टिकी हुयी थी। जीवन परिवर्तनशील हैं। आज वे जा रही हैं ससुराल।

लोग बहन कि शादी में ताओ दिखाते हे। मगर मैं तो १० दिन कि छुट्टी में जा रहा हूँ शादी में शामिल होने मेहमान की तरह... मुझे इस बात की दुःख हूँ कि उनके लिए समय निकाल नहीं पाया। लम्बे समय से सुख दुःख के हिस्सा एक दुसरे को नहीं बांटे। बस! क्या करूँ कि नौकरी करनी हैं तो आज्ञा पालन करना पड़ेगा। संपादक के शब्द हैं कि अख़बार कि नौकरी में १० दिन बहुत हैं।

लेकिन इस बात की खुशी हैं कि बहन की शादी में समय पर शरीक हो पाया। वरना बहन की कर्ज मेरे ऊपर जिंदगी भर रहते, जो ताउम्र नौकरी करने में भी नहीं चुकता। अंत में उनको धन्यबाद मन से देता हूँ जो बहन की शादी में समय पर शामिल करवाया।