यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Thursday 7 July 2011

हिंदी हमारी राष्‍ट्रभाषा नहीं है

हिंदी, हिंद और हम, एक हिंदुस्तानी की पहचान इससे ज़्यादा और क्या हो सकती है, लेकिन जिस पहचान को दुनिया मानती है, जानती है, उसे हमारी अपनी सरकार मानने को तैयार नहीं है. शायद तभी केंद्र सरकार ने खुलकर और आधिकारिक तौर पर कह दिया है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं है. 
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है. हिंदी जन-जन की भाषा है. आजादी की लड़ाई में हिंदी ने लोगों को जोड़ने का काम किया, लेकिन यह बात हमारी सरकार और संसद नकारती रही है. पिछले साल गुजरात हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि भारत की अपनी कोई राष्ट्रभाषा है ही नहीं. अदालत ने कहा कि भारत में अधिकांश लोगों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया है. बहुत से लोग हिंदी बोलते हैं और इसे देवनागरी लिपि में लिखते भी हैं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा नहीं है. मुख्य न्यायाधीश एस जे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने यह बात उस समय कही, जब उसे डिब्बा बंद सामानों पर हिंदी में विवरण लिखे जाने से संबंधित एक मामले में फैसला सुनाना था. सुरेश कचाड़िया ने गुजरात हाईकोर्ट में पीआईएल दायर करके मांग की थी कि डिब्बा बंद सामानों पर हिंदी में उत्पाद संबंधी विवरण लिखा होना चाहिए और यह नियम केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लागू कराया जाना चाहिए. पीआईएल में कहा गया था कि डिब्बा बंद सामानों पर कीमत आदि जैसी जरूरी जानकारियां हिंदी में भी लिखी होनी चाहिए. तर्क यह था कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है और देश के अधिकांश लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है, इसलिए यह जानकारी हिंदी में छपी होनी चाहिए. इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का कहना था कि क्या इस तरह का कोई नोटिफिकेशन है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है, क्योंकि हिंदी तो अब तक राजभाषा यानी आधिकारिक भर है. सरकार द्वारा ऐसा कोई नोटिफिकेशन अब तक अदालत में पेश नहीं किया गया है. हिंदी देश के राज-काज की भाषा है, न कि राष्ट्रभाषा.
दूसरी तरफ अभी हाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से एक खबर आई कि संविधान में राष्ट्रभाषा का प्रावधान नहीं है. यह जानकारी विभाग ने सामाजिक कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय को दी है. रॉय ने बीते 6 जून को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत गृह मंत्रालय से राष्ट्रभाषा के संबंध में जानकारी मांगी थी. मंत्रालय के जवाब के मुताबिक, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिंदी केंद्र की राजभाषा जरूर है, परंतु संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई प्रावधान नहीं है.                                                                                
सामाजिक कार्यकर्ता रॉय ने कहा कि देश को हिंदी में भारत, अंग्रेजी में इंडिया और उर्दू में हिंदुस्तान के नाम से पुकारा जाता है. इसलिए उन्होंने अपनी आरटीआई की अर्जी में पूछा था कि इस देश का आधिकारिक नाम क्या है? बहरहाल, इन दोनों उदाहरणों को देखते हुए इस देश में हिंदी की दशा और दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है. वर्ष 1965 में संसद द्वारा हिंदी राजभाषा अधिनियम पारित किया गया था. तभी से हिंदी को सिर्फ राजभाषा का दर्जा हासिल है, लेकिन राष्ट्रभाषा का नहीं? क्यों? जब स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त यह कहा जाता रहा कि हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा हो सकती है, तब आजादी के बाद संविधान में सिर्फ राजभाषा का ही उल्लेख क्यों किया गया? 
राष्ट्रभाषा कहने के दो तात्पर्य निकलते हैं. एक है राष्ट्र की एकमात्र भाषा. किसी भी बहुभाषिक देश में अन्य सारी भाषाओं की अस्मिता को ठुकराते हुए उनके स्थान पर सिर्फ एक भाषा को ही स्वीकार करने वाली बात किसी भी जनतांत्रिक देश में सही नहीं मानी जा सकती. इस कारण कुछ विद्वान राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर विचार करते हुए इस शब्द के अर्थ को विस्तार देकर कहते हैं कि हिंदी, तमिल, तेलुगु और बांग्ला आदि सभी हमारी राष्ट्रभाषाएं हैं. फिर इस अर्थ में राष्ट्रभाषा का कोई निश्चित अर्थ नहीं रह जाता. 
राष्ट्रभाषा का दूसरा अर्थ यह है कि उससे सांकेतिक सम्मान प्रकट होता है, जैसे राष्ट्रगान से. हिंदी भाषा का प्रश्न सम्मान से अधिक उसके प्रयोजनों का है, उसकी भूमिकाओं का है. राजभाषा के तौर पर हिंदी की अहम भूमिका है. इसकी अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाएं भी हैं. यह देश की भाषाओं के बीच एक सेतु है, एक संपर्क भाषा है. यह दस से अधिक देशों में बोली जाती है और लगभग 150 विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है. भारतेंदु बाबू की एक पंक्ति आज भी जेहन में ताजा है-निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के आपा मिटे हिय को सूल.  
आजादी के 64 सालों बाद भी आज हिंदी उपेक्षा की शिकार है. हिंदी अपने ही घर में सौतेला व्यवहार झेल रही है. पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा हिंदी ही हो सकती है. हिंदी राजभाषा, संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के तौर पर इस विविधता से भरे देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम कर सकती है. केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करे, उसका विकास करे, जिससे वह संपूर्ण भारतवर्ष की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके.