यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Thursday 19 December 2013

मणिपुर : फर्जी मुठभेड़ पर नकेल कसती सरकार

सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की, जनता की हिफाजत करने में पूरी तरह से नाकाम रही है. आए दिन भ्रष्टाचार और घोटालों से सरकार की किरकिरी होती रहती है. लगता ही नहीं कि भारत में कोई सरकार काम कर रही है, क्योंकि जनता के अधिकारों और उसके हितों का पूरा ख्याल सुप्रीम कोर्ट को या नेशनल ह्यूमन राट्स कमीशन को रखना पड़ रहा है. जनता को भी इस बात का भान हो चुका है कि सरकार उसके लिए कुछ नहीं कर सकती, इसीलिए वह न्याय की आस कोर्ट और कमीशन से लगाने लगी है. समझ में नहीं आता कि इतने बड़े अमले और लाव-लश्कर के साथ सरकार आखिर क्या कर रही है. जब हर काम कोर्ट और कमीशन के दखल के बाद ही होगा, तो इस अकर्मण्य और अपाहिज सरकार का  भला क्या काम?


'मारने के अलावा कोई चारा नहीं' जैसे विवादास्पद बयान देने वाला मणिपुर के मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी को अब नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन से करारा जवाब मिला है. इसलिए उन्होंने फर्जी मुठभेड़ मामले में फंसे राज्य के 15 पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से हटाया. इनमें से 9 पुलिसकर्मी एक बड़ी मुठभेड़ संजीत और रवीना कांड में शामिल हैं. यह कांड इसलिए लोगों के जेहन में है कि तहलका ने 12 तस्वीरें छाप कर राज्य के पुलिसकर्मियों की पोलपट्टी खोल दी थी. उन तस्वीरों में साफ-साफ दिखाया गया था कि फर्जी मुठभेड़ हुई है. वे इंफाल (वेस्ट) में तैनात कमांडो हैं.

बहरहाल, नेशनल ह्यूमन राट्स कमीशन की एक टीम 23 अक्टूबर 2013 को इंफाल गई थी. 13 वर्षों से भूख हड़ताल कर रही इरोम शर्मिला से मिली. साथ में राज्य में हो रहे फर्जी मुठभेड़ मामले की तहकीकात भी की थी. वहां से लौटने के बाद कमीशन ने 19 नवंबर को अपना फैसला सुनाया. कमीशन का प्रतिनिधि सत्यवर्ता पाल ने कहा कि 2005-2010 के दौरान होने वाले 44 फर्जी मुठभेड़ के मामलों को कमीशन ने उठाया है. अधिकतर मामले में राज्य सरकार और उसकी मशीनरी ही दोषी पाई गई है. सेल्फ डिफेंस के नाम पर राज्य में तैनात पुलिस कर्मी द्वारा अधिकतर मुठभेड़ को अंजाम दिया गया है. पाल ने कहा कि राज्य सरकार दोषियों को सजा दिलाने में बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है. यह अधिकारियों के बीच सहयोग की कमी दिखाती है. कमीशन ने कहा कि अधिकतर बड़ी फर्जी मुठभेड़ राज्य की पुलिस ने ही की है. सरकारी मशीनरी द्वारा उनको बचाया जा रहा है. कमीशन ने राज्य सरकार को फटकार लगाई कि मामले की सही सुनवाई होनी चाहिए. दोषियों को निष्पक्ष रूप से सजा दिलाना होगा. राज्य सरकार को 6 दिसंबर तक अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी. इसके बाद तत्काल प्रभाव से राज्य में तैनात 15 पुलिसकर्मियों, जो फर्जी मुठभेड़ मामले में लिप्त हों, को हटाया गया. अभी और भी आरोप में फंसे पुलिसकर्मियों को हटाना बाकी है. इसमें राज्य के पूर्व डीजीपी एमके दास का बड़ा योगदान रहा. हाल ही में एमके दास रिटायर्ड हुए. उन्होंने केवल दो महीने ही कार्यभार संभाला था. इतने कम समय में उन्होंने राज्य में काफी अच्छा काम किया. आम जनता और पुलिस के बीच के खराब संबंध को सुधारा. नई-नई नीतियां और काम शुरू किए. अब नए डीजीपी आसिफ अहमद आए हैं. उन्होंने भी कहा कि एमके दास के कार्यों को आगे बढ़ाएंगे.

सबसे बड़ी चिंताजनक बात यह है कि 15 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के छह मुठभेड़ों के मामले में एक फैसला सुनाया. सारी मुठभेड़ फर्जी थीं. दो संस्थाओं एक्सट्रा जूडिशिएल एक्जीक्यूशन विक्टीम फेमिलीज एसोसिएशन (एएवीएफएएम) और ह्यूमन राइट्स एलर्ट ने एक पीटिशन सितंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट को दी थी. इस पीटिशन में लिखा था कि 1979 से 2012 तक मणिपुर में मुठभेड़ की 1528 घटनाएं हुई थीं, जिन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुईं. उन संस्थाओं की मांग है कि इन मुठभेड़ों की जांच-पड़ताल सुप्रीम कोर्ट करे. पीटिशन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन लोगों का एक कमीशन बनाया था, जिसके चेयरमैन हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े. इस कमेटी में पूर्व चीफ इलेक्शन कमिश्नर जी एम लिंगदोह और कर्नाटक के पूर्व डीजीपी अजय कुमार सिन्हा भी शामिल हैं. कमीशन ने पहले छह केस की जांच शुरू की थी. इंफाल क्लासिक होटल में 3 से 7 मार्च तक कमीशन की बैठक हुई थी. इसके बाद दिल्ली में 13 से 21 मार्च तक बैठक कर कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट को 12 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट दी थी. इससे और बड़ी बात क्या हो सकती है?
सबसे आश्चर्य की बात यह है कि अपने ही बनाए कानून के ऊपर अपनी ही बनाई हुई कमेटी बैठाई. कमेटी ने सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी कि यह कानून गलत है. वाकई वहां के लोगों से ज्यादती हो रही है. मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है. एक नहीं कई कमेटियां बैठाई गईं. जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी, जस्टिस वर्मा कमेटी, संतोष हेगड़े कमेटी आदि. बावजूद इसके आज तक सरकार चुप्पी साधे हुए है.


दूसरी तरफ, ह्यूमन राइट्स कमीशन ने मणिपुर में लागू आर्म्‍ड फोर्सेस स्प़ेशल पावर एक्ट को हटवाने को लेकर 13 साल से भूख हड़ताल कर रही इरोम शर्मिला के हालचाल की भी जानकारी ली. नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन का यह कदम काफी सराहनीय है. सबसे हैरानी की बात तो यह है कि 13 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी शर्मिला से राज्य के मुख्यमंत्री या उनकी कोई टीम आज तक मिलने नहीं आई. वे अब तक न्याय की उम्मीद लेकर बैठी हैं. इससे ज्यादा अहिंसात्मक तरीके से और कैसे विरोध हो सकता है. पूरी दुनिया की सबसे लंबी हड़ताल बन चुकी है. अहिंसात्मक आंदोलन के लिए मशहूर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जन्म भूमि भारत में इस तरह के अहिंसात्मक आंदोलन को नकारा जाना एक बड़ी
विडंबना है.

कहां गए राष्ट्रवाद के नारे लगाने वाले लोग, कहां हैं मुख्यधारा से जोडऩेवाले नेता. एक तरफ सरकार पूर्वोत्तर को मुख्यधारा में जोडऩे की बड़ी-बड़ी योजनाएं बैठ कर बनाती है, दूसरी तरफ देश को बांटने वाले ऐसे काले कानून लागू करवाती है. किस हक से हम कहें कि पूर्वोत्तर महान देश भारत का अभिन्न अंग है. दूसरी बात कि जम्मू कश्मीर में भी यह काला कानून लागू है. मगर जम्मू कश्मीर में अलग मुद्दा है. वहां की जनता भारत से अलग होना चाहती है. उन लोगों को जोडऩे की कोशिश करना मुश्किल है. मगर मणिपुर में ऐसी स्थिति नहीं है कि वहां के लोगों को जबरन जोड़ कर रखा है. वहां के लोग बार-बार कई मौके पर अपने आपको भारतीय होने का साबित करते हैं. हर क्षेत्र में खुद को साबित करते हैं कि हिंदुस्तानी हूं. उदाहरण के तौर पर मैरी कॉम, डिंकू, सुशीला, सनामचा, कुंजरानी आदि हैं. उन लोगों ने अंतरराष्ट्रीय खेल के मैदान में देश का नाम रोशन किया. ऐसी स्थिति में यह कानून लगाने का औचित्य क्या है?  

Tuesday 17 December 2013

मिजोरम चुनाव : कांग्रेस की बची लाज


राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना कर चुकी कांग्रेस मिजोरम में जम कर वापसी की है. 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए हो रही मतगणना के नतीजों में कांग्रेस ने 33 सीटों पर विजय दर्ज कर दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया. वहीं तीनों पार्टियों का गठबंधन मिजोरम डेमोक्रेटिक एलाइन्स (एमडीए) केवल पांच सीट हासिल कर पाई और एमडीए के सहयोगी पार्टी मिजोरम पीपुल्सम कान्फारेंस को एक सीट मिली. दूसरी ओर चार राज्यों में भले ही कांग्रेस का पत्ता साफ करने वाली भाजपा मिजोरम में एक भी खाता नहीं खोल पाई है. राज्य में बीजेपी ने 17 सीटों से चुनाव लड़ा, मगर सभी सीटों से हाथ धोना पड़ा.

25 नवंबर को मिज़ोरम में चुनाव हुए थे. 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए कुल 142 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमाई, जिनमें छह महिला उम्मीदवार शामिल थीं. एक कांग्रेस से,  एक एमडीए से, 3 भाजपा से और एक निर्दलीय हैं. मिजोरम भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से 9,806 अधिक है. राज्य में कुल मतदाता 6,90,860 है. विधानसभा की एक ख़ास बात यह है कि यहां की 40 विधानसभा सीटों में 39 आदिवासी-जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित हैं, महज एक सीट सामान्य वर्ग के लिए है. चार बार से राज्य के मुख्यमंत्री रहे ललथनहवला ने सेरछिप और हरंगतुर्जो दोनों सीटों पर जीत हासिल की है. सेरछिप में वे 734 मतों के अंतर से विजय हुए हैं और अपने एमएनएफ प्रतिद्वंदि ललरामजुआवा को हराया. हरंगतुर्जो में मुख्यमंत्री ने मिजोरम पीपुल्स  कांफ्रेंस के ललथनसंगा को 1638 मतों के अंतर से हराया है. सरकार के कुल ग्याररह मंत्रियों में से आठ ने विजय दर्ज की है. इस बार असम सहित पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में मोदी या भाजपा की लहर न चल सकी है. इसका जीता जागता उदाहरण मिजोरम में कांग्रसे की जीत है. साल 2008 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने 32 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी.

आखिर क्या कारण है जो कांग्रेस की मिजोरम में जीत हुई है. एक बार नहीं यह पांचवीं बार राज्यमें कांग्रेस की जीत है. राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन बना कर कांग्रेस के खिलाफ लडऩे के बावजूद कांग्रेस ने जीत हासिल की. इस जीत के पीछे राष्ट्रीय मुद्दे हावी नहीं रहे, बल्कि वहां के स्थानीय मुद्दों ने ही कांग्रेस को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. विपक्षी पार्टियां दूर-दूर तक कांग्रेस का मुकाबला नहीं कर सकीं. मिजोरम के एक स्वतंत्र पत्रकार ने बताया कि न्यू लैंड यूटिलाइजेशन पॉलिसी के तहत कांग्रेस उन किसानों को एग्रीकल्चर भूमि देती है, जो परंपरागत झूम कल्टीवेशन में सक्रिय हैं. इसके तहत किसानों को मुफ्त में धान और सब्जियों के बीज भी दिए जाते हैं. कांग्रेस के इस कदम ने किसानों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी प्रभावित किया है. मिजोरम में कांग्रेस की जीत में इस पॉलिसी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है. देश जहां भ्रष्टाचार से जूझ रहा है. तमाम राज्यों में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा रहा, वहीं मिजोरम में यह मुद्दा नहीं बना है. मिजोरम को भ्रष्टाचार मुक्त तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन यहां भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने नहीं आए. संभवत: इस कारण से लोगों ने कांग्रेस पर विश्वास किया और अपने वोट देकर जीत दिलाई. महंगाई, राजनैतिक मुद्दे, माइग्रेशन इश्यू जैसे मुद्दे भी मिजोरम में अप्रभावी रहे, जिसके कारण कांग्रेस को जीत मिली.

मिजोरम में विपक्षी दलों के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था. इस कारण से कांग्रेस की जीत हुई और विपक्षी दलों को करारी शिकस्त मिली. विपक्ष ने पीने के पानी, बिजली और सडक़ जैसी मुख्य समस्याओं को आधार बनाकर चुनाव लड़ा था, लेकिन लोगों ने नकार दिया और कांग्रेस पर भरोसा जताया. मिजोरम में चाहे नेशनल हाईवे हो या फिर स्टेट हाईवे, सभी के हालत बेहद जर्जर हैं. राजधानी आइजॉल तक पहुंचने वाली सडक़ भी टूटी-फूटी है. ऐसे में विपक्षी दलों ने इसे भुनाने की कोशिश की, लेकिन मतदाताओं ने विपक्षी पार्टियों पर विश्वास नहीं किया.  ऐसे में ये कहा जा सकता है कि मिजोरम के स्थानीय लोगों ने बुनियादी सुविधाओं के आधार पर वोट नहीं दिया.


ललथनहवला : मिजोरम में कांग्रेस का चेहरा

मिजोरम में कांग्रेस का चेहरा और चार बार के मुख्यमंत्री ललथनहवला राज्य की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. पिछले तीन दशक में सत्ता के गलियारों में आते-जाते रहे हैं. 70 वर्षीय ललथनहवला राज्य़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के विजय रथ पर सवार होकर पांचवीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ रहे हैं. 1984 में पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने ललथनहवला ने सेरछिप और हरंगतुर्जो से चुनाव लड़ा था. चुनाव नतीजे में उन्हें दोनों ही स्थानों से विजय हासिल की. एक औसत सरकारी अधिकारी से प्रदेश कांग्रेस में शीर्ष स्तर तक पहुंचने की उनकी कहानी किसी परीकथा से कम नहीं है. कांग्रेस के पोस्टर ब्वॉय के तौर पर उन्होंने हर चुनाव में पार्टी की जीत की कथा लिखी है. 1987 में इस पर्वतीय क्षेत्र को राज्य का दर्जा दिए जाने के बाद से यहां कांग्रेस की हर जीत में अहम भूमिका निभाई. वह मिजोरम पत्रकार संघ के संस्थापक अध्यक्ष हैं. उन्होंने मिजो जिला परिषद में इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के कार्यालय में रिकॉर्डर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की और 1963-64 में सहायक के तौर पर असम को-ऑपरेटिव अपेक्स बैंक से जुड़ गए. इस दौरान उन्होंने एजल कॉलेज से स्नातक की अपनी पढ़ाई पूरी की. उस समय मिजोरम असम के तहत एक जिला परिषद हुआ करती थी और यहां अस्थिरता का माहौल था.

 लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) पृथक राज्य के लिए संघर्ष कर रहा था. एमएनएफ को शिक्षित युवकों की तलाश थी. मोर्चा लगातार इस कोशिश में रहा कि ललथनहवला को मोर्चे में शामिल किया जाए. हालांकि पृथकतावादी आंदोलन में शामिल होने को लेकर शंका के बावजूद वह एमएनएफ के सदस्य  बने और जल्द ही इसके विदेश सचिव बना दिए गए. 1967 में सरकार ने उन्हें राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और वह असम की नगांव जेल भेज दिए गए, जहां 1969 तक उन्हें रखा गया. 19 मई 1942 को एजल में जन्मे ललथनहवला 1973 में मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने और पिछले 40 साल से उन्हें इस पद से कोई हटा नहीं पाया है. वह 1978 में पहली बार मिजोरम म्यांमार सीमा पर स्थित चंफई विधानसभा क्षेत्र से जीत कर विधानसभा पहुंचे और 1979 में भी इसी सीट से दोबारा जीते. कांग्रेस पार्टी ने 1984 में सत्तारूढ़ पीपुल्स कांफ्रेंस को हराया और ललथनहवला मिजोरम के तीसरे मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में ललथनहवला ने सेरछिप सीट से चुनाव लड़ा था. पीपुल्स कांफ्रेंस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ब्रिगेडियर थेनफुंगा सेलो के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था.

30 जून 1986 को ऐतिहासिक मिजो शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ललथनहवला ने मिजो नेशनल फ्रंट के नेता रहे लालडेंगा के समर्थन में अपनी कुर्सी छोड़ दी और राज्य में अंतरिम एमएनफ कांग्रेस गठबंधन सरकार में उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया गया. ललथनहवला एक बार फिर 1987 में सेरछिप सीट से विधानसभा का चुनाव जीते, लेकिन उन्हें  विपक्ष में बैठना पड़ा क्योंकि एमएनएफ ने चुनाव जीता और लालडेंगा मिजोरम के पहले मुख्य़मंत्री बने. मिजोरम को 20 फरवरी 1987 को राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ. सितंबर 1988 में लालडेंगा की एमएनएफ सरकार गिरा दी गई और 1988 में राज्यर में राष्ट्रपति शासन लगा कर नए चुनाव कराने का आदेश दिया गया. 1989 में ललथनहवला फिर सत्ता  में लौटे, जब एमएनएफ और कांग्रेस के बीच गठबंधन के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. 1993 में कांग्रेस और ब्रिगेडियर थेनफूंगा सेलो के नेतृत्व वाले मिजोरम जनता दल (अब मिजो पीपुल्स कांफ्रेंस) में गठबंधन से सरकर बनी और ललथनहवला मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहे. 1998 में उन्हें अपनी परंपरागत सेरछिप सीट से हार का मुंह देखना पड़ा और एमएनएफ ने जोरामथांगा के नेतृत्व में सत्ता संभाली. अगले पांच वर्ष ललथनहवला बागियों की तमाम गतिविधियों के बीच प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बने रहे. इस दौरान उन पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. 2003 में वह एक बार फिर सेरछिप से जीत कर एमएनएफ के दूसरे कार्यकाल में विपक्ष केऌ नेता बने. 

Friday 15 November 2013

क्षेत्रीय राजनीति का नया प्रयोग

नॉर्थ ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट 

पूर्वोत्तर की लगभग सभी प्रादेशिक पार्टियों ने मिलकर नॉर्थ ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट का गठन किया है. 20 अक्टूबर को इस फ्रंट के गठन के बाद फ्रंट की ओर से कहा गया कि इसका मक़सद पूर्वोत्तर से जु़डे विभिन्न मसलों पर एकजुट होकर आवाज़ उठाना है. फ्रंट जल, जंगल, जमीन के मुद्दों को उठाने के साथ उन मसलों को भी उठाएगा, जो भाजपा और कांग्रेस की चिंताओं में शामिल नहीं हैं. पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकारें रही हैं, लेकिन पार्टी पूर्वोत्तर के वास्तविक मुद्दों को सुलझाने में असफल रही है. अब देखना यह है कि यह फ्रंट कितना सफल हो पाता है.

पूर्वोत्तर के कई अहम मसलों पर एक साथ सामना करने और पूर्वोत्तर की सारी प्रादेशिक पार्टियों को मज़बूत करने के उद्देश्य से नॉर्थ ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट का गठन 20 अक्टूबर को किया गया है. इस फ्रंट का संयोजक नागा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) नागालैंड के नेता और वर्तमान मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो को बनाया गया है. मुख्य सलाहकार असम के पूर्व मुख्यमंत्री और असम गण परिषद (एजीपी) के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत, सलाहकार सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग, मिजोरम के पूर्व मुख्यमंत्री जोराम थांगा और मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री दोंकूपर राय को बनाया गया. गुवाहाटी स्थित ब्रह्मपुत्र होटल में आयोजित पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय पार्टियों की इस बैठक में क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं ने हिस्सा लिया था. बैठक में साथ देने अकाली दल के सुरजीत सिंह बरनाला, तेलुगूदेशम पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू भी शामिल थे. हाल ही में प्रफुल्ल कुमार महंत ने दिल्ली में चंद्र बाबू नायडू से मुलाकात की थी. साथ में मणिपुर पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष एन सोभाकिरण, उपाध्यक्ष एच. मनिसना और प्रवक्ता हैक्रुजम नवश्याम, मणिपुर स्टेट कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष वाई मणि और मणिपुर पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष जी. तोनसना शर्मा आदि ने हिस्सा लिया था. इस फ्रंट का हेडक्वार्टर गुवाहाटी में बनाया जाएगा. पूर्वोत्तर की सभी रीजनल पार्टियों से तीन-तीन प्रतिनिधियों को समन्वयक के तौर चुना गया है. मिजो नेशनल फ्रंट अपने राज्य में चुनाव के चलते बैठक में शामिल नहीं हो पाया. मगर उसने यह आश्‍वासन ज़रूर दिया कि इस फ्रंट में वो भी हिस्सा लेगा. 

बहरहाल, फ्रंट का गठन होने के बाद संयोजक नेफ्यू रियो ने कहा कि नॉर्थ ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट एक पॉलिटिकल पार्टी होगी. यह प्रादेशिक राजनीतिक दलों की सामूहिक ताक़त होगी. लोकसभा चुनावों में भी मिल-जुल कर आपस में सहमति से अपना प्रतिनिधि घोषित करेंगे. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पूर्वोत्तर को एक ही नज़र से देखती है. उनके लिए पूर्वोत्तर के मायने असम, इसलिए बाक़ी राज्यों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है. इससे बचने के लिए सभी प्रांतीय राजनीतिक पार्टियों का समूह यह फ्रंट बना रहा है. राज्यों के सार्वजनिक मुद्दों को मिल कर सामना करेंगे. आने वाले लोकसभा चुनाव में भी फ्रंट के घटक दल एक साथ सामना करेंगे. उन्होंने साफ किया कि हम कांग्रेस और बीजेपी का साथ कभी नहीं देंगे. 

इस फ्रंट का मक़सद पूर्वोत्तर के राज्यों में व्याप्त कई महत्वपूर्ण समस्याओं का मिलकर सामना करना है. कल्चर, सीमा, सोशल पॉलिटिकल और इकॉनोमिक्स फ्रंट की रक्षा करना और संविधान के अनुसार सिक्स शिड्यूल के तहत राज्यों को जो लाभ मिलना चाहिए, वह अब तक नहीं मिला. फ्रंट का मकसद उसके लिए आवाज़ उठाना है. चीन का अरुणाचल प्रदेश पर सीमा बढ़ाने और अवैध कब्ज़ा करने के विरोध में केंद्र को तत्काल सूचित करेंगे, ताकि अवैध कब्ज़ा रोका जा सके. केंद्र सरकार को चीन पर तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करनी चाहिए. ऊपरी ब्रह्मपुत्र पर डैम बनाकर नदी को मोड़ने की चीन की प्रक्रिया को रोकना होगा. ब्रह्मपुत्र पूर्वोत्तर की जान है, ऐसे में केंद्र सरकार की असंवदेन-शीलता पर फ्रंट द्वारा असंतुष्टि व्यक्त की गई. पूर्वोत्तर को लेकर केंद्र सरकार चीन पर स़ख्त क़दम उठाने होंगे. वैसे कांग्रेस सरकार कई वर्षों से पूर्वोत्तर के कई राज्यों में राज कर रही है. मगर जनता के दुख-दर्द समझने में सक्षम नहीं है. मणिपुर, असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मेघालय में कांग्रेस की सरकार है. वहां के आदिवासियों की मूलभूत समस्याएं आज भी वैसी की वैसी बनी हुई हैं. कहने को तो आज़ादी के 65 वर्ष हो गए, मगर भ्रष्टाचार का स्तर इतना बढ़ गया है कि आम जनता गरीबी का जीवन जीने के लिए विवश है. छोटे-मोटे सरकारी काम के लिए भी घूस देनी पड़ती है. फ्रंट मणिपुर के मुद्दों पर भी आवाज़ उठाएगा. हाल में इंडो म्यांमार बॉर्डर फेंसिंग का मुद्दा गरम रहा. बर्मा द्वारा बॉर्डर फेंसिंग में अवैध कब्ज़ा किया गया है. इस कब्जे को तत्काल रोकना होगा, क्योंकि बांग्लादेश 15 किलोमीटर मणिपुर की तरफ़ बढ़ा कर फेंसिंग कर रहा है. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) के बारे में भी फ्रंट आवाज़ उठाएगा. पूर्वोत्तर में वर्षों से लागू अफस्पा वहां की जनता से जीने का अधिकार छीन रहा है. यह कितना भयानक क़ानून है, इसका उदाहरण इरोम शर्मिला प्रकरण को देखकर समझा जा सकता है. शर्मिला इस क़ानून को हटवाने के लिए पिछले 13 सालों से आमरण अनशन कर रही हैं. मगर सरकार कभी तैयार नहीं हुई.   

दूसरी बात कि नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो अपने राज्य में एक महत्वपूर्ण नेता के तौर पर जाने जाते हैं. फ्रंट बनाने के बाद लग रहा है कि वे अपने राज्य में ही न सिमट कर पूरे पूर्वोत्तर में अपनी ख्याति पाना चाहते हैं. वे पूर्वोत्तर के नेता बन कर राष्ट्रीय राजनीति के फलक में उभरना चाहते हैं. त्रिपुरा और नागालैंड में कांग्रेस की सरकार नहीं है. नागालैंड में क्षेत्रीय पार्टी नागा पीपुल्स फ्रंट और त्रिपुरा में सीपीआई (एम) की सरकार है. त्रिपुरा में सीपीआई (एम) की छवि एक ईमानदार सरकार की है. वहां के आदिवासियों के लिए कोई ठोस क़दम अब तक नहीं उठाया गया. इसी वजह से वहां के आदिवासी अपने ही क्षेत्र में बेगाने हो गए. वहां के आदिवासी जो असली त्रिपुरावासी हैं, बाहरी बांग्लादेशी लोगों के अवैध कब्ज़े से जंगल में जीवन यापन करने को मजबूर हो रहे हैं. नागालैंड एकमात्र राज्य है, जो अपनी मर्जी का करता है, क्योंकि वहां की सरकार क्षेत्रीय पार्टी से बनी है. बीजेपी तो पूर्वोत्तर में आज तक कोई ख़ास जगह बना नहीं पाई है.    

वैसे घोटालों और महंगाई से त्रस्त पूर्वोत्तर के लोग इस बार के लोकसभा चुनाव में अपने मतदान के दम पर अपने प्रतिनिधि चुनेंगे. विकास के नाम पर कांग्रेस सरकारें जनता की ज़मीन हड़प रही हैं. कम दामों में कभी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने के नाम पर तो कभी नेशनल हाइवे के नाम पर ग़रीब जनता से ज़मीन हड़प रही हैं. ये सरकारें विदेशी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने की इजाज़त खुल कर दे रही हैं. वे विरोध करने वालों पर गोली चलवाती हैं. ऐसे में जनता अगर कांग्रेस से परेशान है तो वह लोगों की बात सुनने वाले और समझने वाले जनप्रतिनिधि चुनेंगे. अगर नहीं तो स्थिति जस की तस बनी रहेगी. जब तक वोट में अपने अधिकार का सही इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब तक कोसते रहेंगे.  

मजे की बात यह है कि पीए संगमा के नेतृत्व वाली पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को नहीं बुलाया है. 2009 में भी एनसीपी लीडर पूर्व लोकसभा स्पीकर पीए संगमा ने पूरी कोशिश कर क्षेत्रीय पार्टियों का गठन किया था- नार्थ ईस्ट पीपुल्स फ्रंट. संगमा को पता था कि लोसकभा में पूर्वोत्तर के 25 एमपी हैं. इसके द्वारा संसद में एक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. मगर यह प्रयोग सफल नहीं हुआ. एक आश्‍चर्यजनक सवाल यह भी है कि सबसे ज्यादा अलगाव की भावना पूर्वोत्तर में है. इन राज्यों के लोग केंद्र सरकार पर यक़ीन नहीं करते, मगर चुनाव में वोट कांग्रेस को ही दिया जाता है. जल, जंगल, ज़मीन की बात करने वाली स्थानीय पार्टियों का तो एक भी प्रतिनिधि सफल नहीं हो पाता है. उदाहरण के तौर पर पिछली बार मणिपुर की क्षेत्रीय  पार्टी मणिपुर पीपुल्स फ्रंट द्वारा एक भी प्रतिनिधि नहीं ला पाने की वजह से चुनाव आयोग ने इसकी मान्यता बर्ख़ास्त कर दी थी. 

इन हालातों में कमज़ोर पड़ीं क्षेत्रीय पार्टियां कैसे अपनी ताक़त जुटा पाएंगी और वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस सरकार का सामना कर पाएंगी? अब देखना यह है कि कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ यह फ्रंट आने वाले चुनाव में क्या चमत्कार दिखाएगा और कितने उम्मीदवार संसद में भेज पाएगा, इसकी पहली झलक मिजोरम विधानसभा चुनाव के दौरान देखने को मिलेगी.

फ्रंट में शामिल दस पार्टियां
नगा पीपुल्स फ्रंट, नगालैंड
असोम गण परिषद, असम
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी, मेघालय
मणिपुर पीपुल्स पार्टी, मणिपुर
मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी
डेमोक्रेटिक पीपुल्स फ्रंट
इंडिजीनस पीपुल्स फ्रंट, त्रिपुरा
पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल
मिजो नेशनल फ्रंट, मिजोरम
हिल्स स्टेट्स डेमोक्रेटिक पार्टी, मेघालय

Friday 8 November 2013

इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के 13 साल, सत्‍ता तंत्र खामोश

यह 2 नवंबर 2013 को इरोम चनु शर्मिला के आमरण अनशन को 13 साल हो चुका है. शर्मिला ने वर्ष 2000 में इसी दिन अपना आमरण अनशन शुरू किया था. उन्होंने यह क़दम मणिपुर में 1958 से चले आ रहे आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट के खिलाफ उठाया था. तात्कालिक कारण बना था, इसी दिन इंफाल से 10 किमी दूर मालोम गांव में असम रायफल्स के जवानों द्वारा बस के इंतजार में बैठे 10 आम लोगों को गोलियों से भून डालना. पुलिस के इस कृत्य को सही साबित करने के लिए मणिपुर में लागू क़ानून आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) था ही. तमाम मानवाधिकार संगठन इस पुलिसिया जुल्म के खिलाफ चिल्लाते रहे, आहत शर्मिला अनशन पर जा बैठीं, लेकिन अफसपा के रहते इन पुलिस वालों का कुछ नहीं बिगड़ना था, सो वास्तव में कुछ नहीं हुआ. यहीं से अत्याचार के खिलाफ शुरू हुई मणिपुर के एक दैनिक अ़खबार हुयेल लानपाऊ की स्तंभकार शर्मिला की गांधीवादी यात्रा. 

बात यहीं पर खत्म नहीं होती, पुलिस और सरकार अड़ी है कि वह अफसपा को खत्म नहीं करेगी और दूसरी ओर शर्मिला की जिद है कि जब तक सरकार इस काले क़ानून को खत्म नहीं करती, तब तक वह अनशन नहीं तोड़ेंगी. सत्तामद में चूर हुक्मरानों को जब लगा कि शर्मिला की वजह से उनकी बहुत किरकिरी हो रही है, तो उन्होंने शर्मिला का मनोबल तोड़ने के लिए उन पर आईपीसी की धारा 309 लगाकर आत्महत्या की कोशिश के आरोप में 21 नवंबर 2000 को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. और, इस तरह एक बार फिर यह साबित कर दिया गया कि सत्ता का चरित्र ही शोषक का होता है. 

शर्मिला की रिहाई के लिए राज्य भर में हुए तमाम विरोध और मानवाधिकार संगठनों द्वारा किए गए प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने उन्हें नहीं छोड़ा. इस क़ानून के तहत अधिकतम एक साल तक किसी को जेल में रखा जा सकता है और शर्मिला को भी सजा के अधिकतम समय तक जेल में रखा गया. लेकिन, जब सरकार ने देखा कि शर्मिला की लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है और जनमत इस काले क़ानून के विरोध में बनता जा रहा है, तो उन्हें एक बार फिर क़ैद कर लिया गया. इसके बाद से शर्मिला सजिवा जेल द्वारा संचालित जवाहरलाल नेहरु अस्पताल, इंफाल में क़ैद हैं, जहां लाख कोशिशों के बावजूद शर्मिला के अनशन न तोड़ने पर जबरदस्ती नाक में नली लगाकर खाना खिलाया जा रहा है. 

शर्मिला के लगातार 13 साल से चले आ रहे इस आमरण अनशन ने इतिहास तो रच दिया, लेकिन इसकी जितनी धमक होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई. सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?  इसके जवाब में फ्रीडम एट मिडनाइट के लेखक कॉलिंस और लॉपियर के शब्दों को दोहरा देना ही ज़्यादा उचित प्रतीत होता है, ‘‘अहिंसात्मक आंदोलन का असर अच्छे आदमियों पर होता है.’’
शायद यही वजह है कि पिछले 13 वर्षों से शर्मिला के आमरण अनशन पर बैठे रहने के बाद भी उनकी आवाज अनसुनी है, लेकिन इसके बाद भी वह टूटी नहीं हैं. वह आज भी इस काले क़ानून को हटाने की मांग पर कायम हैं और सरकार से अपने लिए रहम की भीख नहीं चाहतीं. वह न तो जमानत चाहती हैं और न ही अनशन तोड़ने को राजी हैं. वह कहती हैं कि सरकार पहले बगैर किसी शर्त के इस काले कानून को हटाए.

उल्लेखनीय है कि पूर्वोत्तर राज्यों में पिछले कई सालों से आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट की आड़ में निर्दोषों की हत्याएं होती आ रही हैं. आतंकवाद पर अंकुश लगाने के नाम पर पुलिस निर्दोषों के साथ फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उन्हें मार देती है और आतंकियों को मार गिराने का ऐलान कर अपना कॉलर भी टाइट कर लेती है. 2 जुलाई 2009 को फर्जी मुठभे़ड में मारी गई रवीना और 2004 में असम रायफल्स के जवानों द्वारा हवालात में सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी की बलात्कार के बाद हत्या तो मात्र नमूना भर है. आपको याद होगा कि मनोरमा हत्याकांड को लेकर पेबम चितरंजन ने अपने शरीर पर तेल छिड़क कर इसी साल आत्महत्या कर ली थी. लेकिन इसके बाद भी पुलिस वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. उक्त सारी घटनाएं यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि अफसपा की आड़ में मणिपुर में किस तरह पुलिसिया जुल्म और आतंक के साये में लोग जी रहे हैं. 

हालांकि ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि शर्मिला के इस अहिंसक आंदोलन का कोई असर नहीं है. आम जनमानस तो पूरी तरह से शर्मिला को देवी मान बैठा है. दबाव में ही सही, इस बार का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अगाथा संगमा मणिपुर जाकर शर्मिला इरोम से मिलीं और उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि वह जोर-शोर से संसद में इस मुद्दे को उठाएंगी. मालूम हो कि इस क़ानून को हटाने की मांग जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी की थी. 

दूसरी तरफ शर्मिला के इस संघर्ष में कई और जांबाज साथियों भी 10 दिसंबर 2008 से जुड़ गई हैं. मणिपुर के कई महिला संगठन पिछले साल से ही रिले भूख हड़ताल पर प्रतिदिन बैठ रहे हैं. यानी समूह बनाकर प्रतिदिन भूख हड़ताल. इनमें चनुरा मरूप, मणिपुर स्टेट कमीशन फॉर वूमेन, आशा परिवार, नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इंफॉरमेशन, नेशनल कैंपेन फॉर दलित ह्यूमेन राइट्‌स, एकता पीपुल्स यूनियन ऑफ ह्यूमेन राइट्‌स, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमेन एसोसिएशन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्‌स एसोसिएशन, फोरम फॉर डेमोक्रेटिक इनिसिएटिव्स और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी आदि शामिल हैं. 

इतना ही नहीं, विदेशों में भी शर्मिला के बचाव के लिए कई संस्थाएं सतत प्रयास कर रही हैं. इनमें पूरी दुनिया के मानवाधिकार संगठनों और एनआरआई, फ्रेंड्‌स ऑफ साउथ एशिया, एनआरआई फॉर ए सेक्युलर एंड हारमोनिएस इंडिया, पाकिस्तान ऑर्गेनाइजेशंस, पीपुल्स डेवलपमेंट फाउंडेशन, इंडस वैली थिएटर ग्रुप और इंस्टीट्यूट फॉर पीस एंड सेक्युलर स्टडीज आदि शामिल हैं.

शर्मिला अपने आंदोलन को लेकर कहती हैं कि हम लोगों ने क्या और कितना किया, इसको प्रतिशत में नहीं बताया जा सकता, मगर मुझे लगता है कि हम मंज़िल के क़रीब हैं. शर्मिला आगे कहती हैं कि वह उम्मीद करती रहीं कि देश के शासक वर्ग इस जंगल शासन से मुक्ति दिलाएगा. एक ऐसा शासन, जिसमें आम जनता बिना डर-भय के जी सके. लेकिन शासकों ने जब ऐसा कुछ नहीं किया तो मुझे सैकड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाने के लिए खुद को समर्पित कर देना पड़ा. जब तक मणिपुरियों को इस काले कानून से मुक्ति नहीं मिल जाती, मेरा संघर्ष जारी रहेगा. शर्मिला की मां कहती हैं कि 13 साल हो गए, उसे घर से गए हुए. वह मुझसे मिलना चाहती थी. उसने मिलने के लिए चिट्ठी भेजी थी, मगर मैंने मना कर दिया. कहा कि जब तक तुम सफल नहीं हो जाती, मुझसे नहीं मिलोगी. तुम जब कामयाब होकर घर लौट आओगी, तब तुम्हारे हाथ का बना खाना खाऊंगी.

वसुधैव कुटुंबकम का नारा देने वाले इस देश ने गांधी, बुद्ध और महावीर जैसे अनेक अहिंसावादियों को जन्म दिया है, जिन्होंने न स़िर्फ भारत को, बल्कि पूरी दुनिया को राह दिखाई. अब जबकि शर्मिला भी इसी सत्याग्रही रास्ते के 13 साल हो रहा हैं और इस अवसर पर मानवाधिकार समर्थक संस्थाएं एवं लोग उम्मीद, न्याय व शांति के उत्सव के रूप में मना रहे हैं. सेव शर्मिला सोलिडरिटी कैंपेन द्वारा पूरे देश में शर्मिला के समर्थन में कैंडल मार्च, एक दिन का उपवार का आयोजन किया जा रहा है. दिल्‍ली में भी राजघाट और दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के आर्ट फेकल्‍टी में एक दिन का उपवास रख कर लोगों ने शर्मिला को समर्थन दिया. वार्धा में भी महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में भी वहां के विद्यार्थियों ने नाटक का मंचन और कैंडल मार्च किया गया. देश के विभिन्‍न भागों से एक स्‍वर में शर्मिला के समर्थन की आवाज उठाई गई.
इससे क्या उम्मीद की जाए कि मणिपुर से अफसपा की कालिमा खत्म होगी. एक नयी सुबह आएगी या यह एक ऐसी काली रात है, जिसकी कोई सुबह नहीं.

अफसपा की आ़ड में पुलिसिया कारनामे

1. 1980 में उइनाम में इंडियन आर्मी ने चार लोगों को गोली चलाकर मारा.
2. 1984 में हैरांगोई थोंग के बोलीबॉल ग्राउंड में सीआरपीएफ की गोली से 13 लोग मारे गए.
3. 1985 में रिम्स गेट से गोली चलाने में नौ लोग मारे गए.
4. 2000 में तोंसेम लमखाई में इलेक्शन ड्‌यूटी के लिए जा रही बस में दस आदमी को गोली मारी. 
5. 2000 के दो नवंबर को मालोम में असम रायफल्स द्वारा की गई गोलीबारी से वेटिंग शेड में गाड़ी का इंतजार कर रहे कुल 10 लोग मारे गए, जिसमें 10 साल की एक बच्ची भी शामिल थी. 

Wednesday 23 October 2013

राजनीतिक पार्टियों का कांग्रेस पर हमला

मिजोरम चुनाव 

मिजोरम विधानसभा चुनाव 4 दिसंबर को हो रहा है. चुनाव की तारीख घोषित होते ही राज्य में चुनावी हलचल मचने लगी है. सभी पार्टियां अपनी अपनी तैयारी में लग गई हैं. राज्य के 6,86,305  मतदाता विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.  मिजोरम में वर्तमान में कांग्रेस की सरकार है.

बहरहाल, 40 विधानसभा सीट वाला राज्य मिजोरम मुख्य विपक्षीय दल मिजो नेशनल फ्रंट, मिजोरम पीपल्स कान्फरेन्स (एमपीसी), जेएनपी और अन्य पार्टियों ने कांग्रेस पर हमला करने के लिए कमर कसना शुरू किया है. उन पार्टियों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी पायलट परियोजना, नई भूमि उपयोग नीति ललथनहावला नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को वापस आने में कारगर साबित नहीं होगी. मिजोरम पीपल्स कान्फरेन्स के कार्यकारी महासचिव डॉ. केनेथ च्यांगलियाना ने कहा कि आनेवाले विधानसभा चुनाव में पायलट परियोजना, नई भूमि उपयोग नीति एक खास मकसद से सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी द्वारा राज्य में लागू की गई है. यह चुनावी फायदे के लिए ही राज्य में लाई है. कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों की बौछार विरोधी पार्टियों द्वारा की जा रही है.

राज्य में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और मिजोरम पीपल्स कान्फरेन्स (एमपीसी) चुनावी एजेंडा भ्रष्टाचार मुक्त सरकार बनाना है. एमएनएफ-एमपीसी ने लोगों से आह्वान किया कि एक साफ छवि की सरकार देने के लिए वे प्रतिबद्ध हैं. मिजो नेशनल फ्रंट, मिजो राष्ट्रवाद को ज्यादा तवज्जो देता है. एमएनएफ ग्रेटर मिजोरम के गठन की मांग को चुनावी मुद्दा बना कर लोगों से अपील की है कि राज्य के भीतर सभी मिजो एकजुट होकर रह सकें. एक शासन तंत्र के तहत सभी मिजो को एकजुट होने की अपील एमएनएफ ने की. केंद्र सरकार और लालदेंगा के बीच 30 जून 1986 को हुए समझौते के अनुसार मिजो लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. दूसरी ओर मिजोरम पीपल्स कनेक्शन ने चुनावी दस बिंदु बनाए है, जो राज्य के विकास पर केंद्रित हैं. 

भारतीय जनता पार्टी राज्य में कमजोर स्थिति में है. पिछले चुनावों में भाजपा अपना एक भी उम्मीदवार जिता नहीं पाई. 1998 के चुनाव में तो 12 उम्मीदवारों में कोई जीत नहीं पाया था. राज्य में भाजपा का नामोनिशान मिट सा गया था. अब मोदी के हाथों में चुनावी कमान आने के बाद हो सकता है राज्य में इस बार चुनाव में कुछ खास चमत्कार हो. एमएनएफ-एमपीसी के गठबंधन में राज्य में 1998 के चुनाव में ऐतिहासिक जीत हुई थी. लोगों को पूर्वोत्तर के चुनावी इतिहास में एक अनहोनी घटना लगी थी. मगर कांग्रेस ने अपनी पकड़ मजबूत करने में देर नहीं की. पिछले 10 सालों से कांग्रेस की स्थिति राज्य में मजबूत है. मगर इस बार कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा. विरोधी पार्टियां एक जुट हो कर कांग्रेस पर हमला बोलेंगी. दूसरी सबसे बड़ी चुनौती मोदी हैं. मोदी का नाम आजकल सबकी जुबान पर है. पूर्वोत्तर के राज्यों में गांव-देहात तक मोदी का नाम चल रहा है. सोशल साइट्स पर वहां के लोग लिख रहे हैं कि हम बदलाव चाहते हैं, उसके लिए भगवान ने मोदी को भेजा है. मोदी कौन हैं, कैसे हैं, इससे उनको कोई मतलब नहीं है. बस बदलाव चाहिए. इसलिए मोदी का नाम लिया जा रहा है. वर्षों से कांग्रेस का शासन राज्य में है. उसकी स्वार्थी राजनीति से लोग आहत हुए हंै. वैसे राज्य में समता पार्टी की स्थिति भी वैसी ही है, जैसी भाजपा की.

वैसे राज्य में सक्रिय मार और रियांग उग्रवादी संगठनों के बीच शांतिपूर्ण चुनाव हो पाना अपने आप में एक बड़ा सवाल है. ये संगठन राज्य के पश्चिम और उत्तर पूर्व हिस्से में अधिक सक्रिय हैं. हर बार आशंकाओं के बीच चुनाव होता है. इसलिए भी राज्य में पुलिस बल   जरूरी है. चुनाव अभियान के खर्च पर चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद उम्मीदवारों के दरवाजे पर संगीत कार्यक्रम पूर्वोत्तर पहाड़ी राज्यों की विशिष्ट पहचान है. मिजो धर्मसभा के प्रेस्बिटेरियन चर्च ने आनेवाले मिजोरम विधानसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के दौरान विद्रोही और सशस्त्र समूहों का उपयोग नहीं करने के लिए राजनीतिक दलों से आग्रह किया है. मिजोरम पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) को मिजोरम की सबसे बड़ी धर्मसभा द्वारा एक चुनावी वाच डॉग के रूप में जारी किया गया है.
मालूम हो कि पिछले विधानसभा चुनावों में अधिकांश भारतीय राज्यों के चुनावी एजेंडे में भले ही पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता

नहीं मिलती है, लेकिन मिजोरम विधानसभा चुनाव के दौरान ये मुद्दे प्रमुख बन कर उभरे थे. बांस में आए फूल राज्य की सबसे बड़ी आर्थिक और पर्यावरणीय समस्या बने हुए थे, जिनसे निपटने के लिए वहां की सरकार ने कई कार्यक्रमों की घोषणा की है. चूहा मारने वालों को इनाम भी दिए जा रहे थे. हरियाली से ढके मिजोरम के लोग पर्यावरणीय संतुलन को लेकर संजीदा रहे हैं, इसलिए राजनीतिक पार्टियां ने भी इसे प्रमुख मुद्दा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. राज्य के 80 फीसदी हिस्सों में जंगल है. अधिकांश दलों ने इसे अपने एजेंडे में प्रमुखता से शामिल किया था. मगर इस बार भ्रष्टाचार और मिजो राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया है.

राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अश्विनी कुमार ने 1,126 मतदान केंद्रों में से 94 को संवेदनशील घोषित किया है. राज्य में आचार संहिता लागू हो गई है. राज्य की शांति रक्षा के मद्देनजर सेंट्रल पेरामिलिट्री फोर्स, 31 कंपनियां साथ में राज्य की आर्म्‍ड पुलिस बटालियन आठ भी तैनात की गई है. जिला चुनाव अधिकारी का काम करना शुरू हो चुका है. उन्होंने कहा कि जब तक 4 दिसंबर को चुनाव नहीं होते तब तक के लिए म्यांमार के  अंतराष्ट्रीय सीमा और बांग्लादेश सीमा को बंद कर दिया जाएगा. कुमार ने कहा कि कई मौजूदा कार्यों के चलते रहने की इजाजत दी जाएगी, नए कार्यक्रमों के एलान एवं कार्यान्वयन पर रोक लग जाएगी. उन्होंने कहा कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर वीएस संपथ मिजोरम में अक्टूबर महीने में दौरा करेंगे. एसेंबली पोल की सूचना 8 नवंबर को दी जाएगी. 4 तारीख को वोटिंग होगी और 8 दिसंबर को मतगणना होगी.



Monday 21 October 2013

हग्रामा ने छोड़ी पृथक बोडोलैंड की आस

सब वोट बैंक की राजनीति

बोडोलैंड की मांग को लेकर हुएदर्दनाक नरसंहार को ज्यादा दिन नहीं हुए हैं. उस अप्रिय घटना में लाखों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थीं. असम के लोगों ने अपनों को कटते और जलते हुए देखा था. उस भयावह और खतरनाक दिन को लोग अब भी याद कर कांफ जाते हैं. मगर आश्चर्य की बात है कि डिवाइड असम 50-50 के नारे से पृथक बोडोलैंड राज्य गठन किए जाने की मांग को बुलंद करने वाले बीटीएडी (बोडोलैंड टेरिटोरिएल एरिया डिस्ट्रीक्स) सुप्रीमो और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीटीएफ) के अध्यक्ष हग्रामा महिलारी ने सात सितंबर को एक सभा में स्पष्ट कहा कि पृथक बोडोलैंड संभव नहीं है. अब पृथक बोडोलैंड राज्य का गठन नहीं होगा और यह बात सौ प्रतिशत सच है. बोडोलैंड का गठन कब होगा, यह कोई नहीं जानता. इसलिए आंदोलन करके कोई फायदा नहीं है. बोडोलैंड की मांग पर जो आंदोलन चल रहा है, उस के पीछे राजनीतिक कारण हैं. आगामी लोकसभा चुनाव के कारण ही विभिन्न पक्षों की ओर से वोट बैंक के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है. बीपीएफ भी पृथक बोडोलैंड की मांग पर आंदोलन कर रही है. महिलारी ने आगे कहा कि मेरी बात से लोग बुरा मानेंगे, मगर मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि पृथक बोडोंलैंड का गठन नहीं होगा.

हालांकि राजनीतिक हलकों में हग्रामा के इस बयान को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. वैसे 5 सितंबर को बोडो नेशनल कान्फरेंस (बीएनसी) व बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) के साथ दिल्ली में हुए त्रिपक्षीय वार्ता में यह साफ हो गया था कि बोडोलैंड का गठन अभी संभव नहीं है. क्योंकि सरकार के पास नया राज्य गठन करने की कोई योजना नहीं है. केंद्र ने साफ कर दिया था कि कभी निकट भविष्य में नए राज्यों का गठन होगा तो बोडोलैंड पर भी विचार किया जाएगा. सभी लोगों को पता है कि नए राज्यों का गठन अभी नहीं हो सकता है. बोडोलैंड टेरिटोरिएल काउंसिल (बीटीसी) के विकास के लिए सभी समझौते को लागू करने व सुविधा मुहैया कराने पर बल दिया गया है. सरकार ने बीटीसी को और अधिक शक्तिशाली बनाने का आश्वासन दिया है.

हग्राम की टिप्पणी से बोडो भूमि पर भूचाल

पृथक बोडोलैंड की मांग को लेकर बीटीएडी सुप्रीमो हग्रामा महिलारी की ओर से की गई टिप्पणी को लेकर बोडो भूमि पर भूचाल-सा आ गया है. ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन (अब्सू) समेत कई बोडो संगठनों ने हग्रामा की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है. कई जगह हग्रामा के पुतले फूंके गए हैं. अब्सू की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में संगठन के अध्यक्ष प्रमोद बोडो व महासचिव रोमियो पी. नर्जारी ने इस तरह की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी से बाज आने को महिलारी से आग्रह किया. दूसरी ओर पृथक बोडोलैंड की मांग को लेकर केंद्र व राज्य सरकार के साथ दूसरे दौर की त्रिपक्षीय बैठक तक अब्सू ने अपने पूर्व घोषित राष्ट्रीय राजमार्ग व रेल मार्ग अवरोध कार्यक्रम को फिलहाल स्थगित रखा है. अब्सू नेताओं ने विज्ञप्ति में बताया कि त्रिपक्षीय बैठक की प्रगति को ध्यान में रखते हुए संगठन ने अक्तूबर में होने वाली दूसरे दौर की बैठक तक अपना आंदोलन स्थगित रखने का फैसला किया है. वहीं बीटीएडी में अपहरण, धन-उगाही व गैर-कानूनी तरीके से कर वसूली आदि जैसी घटनाओं के सिलसिले में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को संगठन की ओर से एक ज्ञापन भी सौंपा गया है. ज्ञापन में बीटीएडी में इन अनैतिक कार्यों को तत्काल बंद करने की केंद्रीय गृहमंत्री से मांग की गई है. इस बीच बोडो नेशनल कौंसिल बीएनसी, बीपीपीएफ समेत कई संगठनों ने जगह-जगह हग्रामा की इस टिप्पणी का कड़ा विरोध किया हे. उदालगुड़ी समेत बीटीएडी के विभिन्न भागों में इसके विरोध में हग्रामा के पुतले फूंके गए. बीपीएफ के उदालगुड़ी कार्यालय में शरारती तत्वों ने आग लगा दी. अब्सू, बीएनसी या बीपीपीएफ ही नहीं, बल्कि महिलारी के खिलाफ उनकी ही पार्टी बीपीएफ के कुछ शीर्ष नेता भी नाराज हैं. बीटीसी के उप मुख्य कार्यवाही सदस्य खम्फा बरगयारी ने हग्रामा की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बीएनसी का मूल लक्ष्य ही पृथक बोडोलैंड का गठन है. अगर कोई बोडोलैंड नहीं चाहता तो उसे बीएनसी से बाहर हो जाना चाहिए.
आखिर एक पृथक राज्य की मांग करनेवाला एक नेता का इस तरह का गैरजिम्मेदाराना बयान देना कहां तक उचित है. इस मांग पर इतना बड़ा दंगा हुआ था, लाखों की जानें जा चुकी थीं, क्या वह सिर्फ वोट बैंक के लिए हुआ था. वैसे हग्रामा ने वोट वैंक की स्वार्थिक राजनीति में लोगों की बात करना छोडक़र अपने मन की बात की है. इस बात से साफ है कि उनकी मंशा स्पष्ट नहीं है. पूर्वोत्तर में और भी कई स्वायत्त दल प्रथक राज्यों की मांग कर रहे हैं. ऐसे में हग्रामा की टिप्पणी सुन कर लोगों को और सरकार को इस तरह की मांगों पर यकीन नहीं करेंगे. इसलिए बोडोलैंड की मांग पर जुड़े नेताओं को सार्वजनिक बयान सोच समझ कर देना होगा, वर्ना कहीं बोडोलैंड की मांग मजाक न बन जाए.

बोडोलैंड की मांग क्या है

बोडोलैंड राज्य का प्रस्ताव ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर स्थित जिलों का है. यह एक स्वायत्त प्रशासनिक इकाई है, जिसका गठन छठी अनुसूचित के तहत किया गया था. बोडोलैंड राज्य के नक्शे में चार जिला कोकड़ाझाड़, बस्का, उदलगुड़ी और चिरांग शामिल है. वर्तमान में कोकड़ाझाड़ पृथक बोडोलैंड की राजधानी है. बोडोलैंड का क्षेत्रफल 8795 किमी में फैला है. पृथक बोडोलैंड आर्थिक, शिक्षा, जमीन का अधिकार, भाषा का अधिकार, सामाजिक-सांस्कृतिक और बोडोओं की जातीय पहचान को विकसित करने के मकसद से बना था. परिषद का वास्तविक कामकाज 7 दिसंबर 2003 को अस्थाई 12 सदस्यों के साथ शुरू किया गया था. बोडो समुदाय के दो चरमपंथी गुट, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) और वार्तापंथी पृथक बोडोलैंड राज्य की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ बीटीसी इलाके में गैर बोडो समुदायों की नाराजगी का एक प्रमुख कारण शायद यह भी है कि वहां स्वायत्त शासन लागू होने के बाद से कानून-व्यवस्था की स्थिति पहले से बदतर हो गई है. गैर बोडो समुदाय अक्सर अपने साथ भेदभाव होने और शिकायत करने पर पुलिस द्वारा उचित कार्रवाई न किए जाने का आरोप लगाते रहे हैं.

कौन है हग्रामा मोहिलारी


हग्रामा मोहिलारी उर्फ हग्रामा बासुमटारी बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के  मुख्य कार्यकारी सदस्य हैं. वह बोडो लिबरेशन टाइगर्स फोर्स (बीएलटीएफ) के पूर्व मुखिया थे. उन्होंने 2641 कैडरों के साथ 6 दिसंबर 2003 को समर्पण किया था. बीएलटीएफ ऐसा एक सशस्त्र समूह है, जो बोडो बहुल क्षेत्रों पर सक्रिय है. उनका संघर्ष है असम राज्य से अलग होकर बोडोओं का अलग राज्य बनाना, जिसका नाम बोडोलैंड है. यह संस्था 18 जून 1996 को प्रेम सिंह ब्रह्मा के नेतृत्व में बनाई गई थी. बोडोलैंड काउंसिल का गठन भारत सरकार, असम सरकार और बोडो लिबरेशन टाइगर के बीच 10 फरवरी 2003 को हस्ताक्षरित समझौते (मेमोरेंडम ऑफ सेटलमेंट) में वर्णित प्रावधानों के आधार पर किया गया था. हग्रामा को बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के मुखिया के तौर पर चुना गया था साथ में 12 कार्यकारी सदस्य भी शामिल किए गए थे. वह बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के भी सभापति हैं. 

Friday 20 September 2013

भगवान भरोसे नेशनल हाइवे

मणिपुर में नेशनल हाइवे की स्थिति पिछले छह महीनों से बदतर स्थिति में पहुंच चुकी है, जिसके कारण स्थानीय लोगों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है. राज्य में रोजमर्रा की चीजें आसमान छूने लगी हैं और सरकार है कि वादों का सिर्फ ढोल पीटने में ही लगी है. मणिपुर के निवासियों को वहां की सडक़ों के दिन फिरने का इंतजार है, देखना यह होगा कि लोकसभा के इस चुनावी समर में भी उनकी कोई सुनता है या नहीं या इस बार भी नेतागण सिर्फ वादों से ही काम चला लेते हैं.  

Photo : e-pao.net

मणिपुर को भारत में शामिल किए लगभग 64 वर्ष हो चुके हैं. बावजूद इसके, आज तक यहां मुख्यधारा से जोडऩे वाला कोई भी रास्ता सही तरीके से नहीं बनाया गया. मणिपुर के साथ बाहर के राज्यों से संपर्क का सिर्फ एक ही रास्ता है. नेशनल हाइवे 39 (इंफाल-डिमापुर). एक समय इस हाइवे पर 65 दिनों की आर्थिक नाकेबंदी हुई थी. उस समय आम जनता के बीच त्राहिमाम मच गया था. जिंदगी नरक बन गई थी. रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करनेवाली चीजों की कीमत आसमान छूने लगी थी. एलपीजी गैस सिलेंडर का दाम 2500 और पेट्रोल प्रति लीटर 250 रुपए बिकने लगा था. आज फिर यह हाइवे चर्चा में है, क्योंकि पिछले दिनों लैंडस्लाइडिंग की वजह से 300 मीटर लंबा रोड पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है. 12 जुलाई के बाद से ही कोहिमा के फेसिमा में यातायात पूरी तरह से ठप है. हाइवे को बंद कर दिया गया है. लोगों को सडक़ निर्माण का इंतजार है. स्थानीय लोगों का मानना है कि सडक़ बनने में 5 से 6 महीने लगेंगे.

इस सडक़ के विकल्प के तौर पर नेशनल हाइवे 37 (इंफाल-जिरि) का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन उसकी भी स्थिति बदतर है और आने-जाने लायक नहीं है. सडक़ पर यातायात व्यवस्था बहाल करने के लिए डिफेंस मिनिस्टर ऑफ स्टेट जीतेंद्र सिंह भी वहां पहुंचे थे. हाइवे की खराब स्थिति का अंदाजा इस बात से लागाया जा सकता है कि जिस गाड़ी में मंत्री महोदय जा रहे थे, वह गाड़ी भी रास्ता खराब होने के कारण बीच में ही फंस गर्ई. इसके बाद मंत्री जी को दूसरी गाड़ी में जाना पड़ा. हाइवे 37 इंफाल-जिरि के बीच में बराक और मक्रू पुल है, इस पर निर्मित हैंगिंग क्लाम टूटा हुआ है, जिसे तार से बांधा हुआ है. इसे भी मंत्री जी से दिखाया गया. मंत्री ने आश्वासन दिया है कि 15 दिनों के अंदर वे इंजीनियरों की टीम भेजेंगे, ताकि इसे जल्द से जल्द ठीक किया जा सके. 20 दिसंबर को उन्होंने खुद इस हाइवे को देखने आने को भी कहा था. वहां ड्यूटी पर तैनात सीआरपीएफ जवानों से मंत्री के पूछने पर पता चला कि इस कमजोर पुल से कम से कम 800 गाडिय़ां रोज पार करती हैं. इस दौरे में मिनिस्ट्री ऑफ ट्रांस्पोर्ट एंड हाइवे के चीफ इंजीनियर एस वर्मा, बीआरओ ऑफिसियल, चीफ मिनिस्टर और डिप्टी चीफ मिनिस्टर भी शामिल थे.

नेशनल हाइवे-37 (इंफाल-जिरि) 1980 में बना है. इस हाइवे को बनाने का काम बीआरटीएफ (बॉर्डर रोड टास्क फोर्स) द्वारा किया जा रहा है. गौरतलब है कि 15वीं बीआरटीएफ कर्नल तेजपाल ने अगस्त महीने तक काम पूरा होने की संभावना जताई थी, ताकि हैवी व्हीकल के जाने-आने में दिक्कत न हो. 16 जुलाई से काम शुरू हो चुका था. बारिश अधिक होने की वजह से रास्ता बनाने में कठिनाई हो रही है. बारिश में रास्ता बनाने वाली मशीनें भी काम नहीं कर पा रही हैं. बारिश होने की वजह से पूरे दिन में 3-4 घंटे से ज्यादा काम नहीं हो पा रहा है, इसलिए काम में देरी होने की संभावना बढ़ गई है. ये आश्वासन मंत्री महोदय ने दिए थे, लेकिन अगस्त महीने तक काम पूरा होने का जो वादा उन्होंने किया था, वो अब तक पूरा नहीं हो पाया है. गाडिय़ां अभी भी नहीं जा पा रही हैं. यात्रियों को क्षतिग्रस्त रास्तों से सफर तय करना पड़ रहा है, जो कभी भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है. वैसे बीआरटीएफ अलग-अलग राज्यों में और म्यांमार में रोड बनाने का काम कर चुका है, लेकिन इंफाल-जिरि रोड की मरम्मत कब होगी, यह अभी तय नहीं है. 225 किमी लंबा इंफाल-जिरि रोड के बीच नोने से अवांगखुन तक 40 किमी और खोंगसांग से बराक तक 30 किमी का कुल 70 किमी कीचड़ से भरा हुआ कच्चा रास्ता है, जिसके कारण यात्रियों को बहुत सारी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं. बारिश का पानी तो इस सडक़ पर आने-जाने लायक ही नहीं छोड़ता और फंसी हुई गाडिय़ों की लंबी कतार लग जाती है. सडक़ की खस्ताहाल स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहां इंफाल से जिरि तक जाने में मात्र 5 से 6 घंटा लगते थे, वहीं अब दो से तीन दिन लगते हैं. 

नेशनल हाइवे 39 (इंफाल-डिमापुर) की अपेक्षा हाईवे 37 (इंफाल-जिरि) में कम धन उगाही, बंद-ब्लॉकेड, हत्या, कई अप्रिय घटनाएं होती हैं. दूसरी तरफ इंफाल-डिमापुर बंद होने के बाद भी जिरि होते हुए सामान लादने वाली गाडिय़ां इंफाल पहुंचती हैं. ऐसे में यह रास्ता अगर बन कर तैयार हो जाता है, तो यह रास्ता मणिपुर का पहला लाइफ लाइन बन सकता है. हाइवे 37 के बने लगभग 40 साल हो गए. रास्ते के बनने के बाद से इसमें जो पुल बीच में पड़ा था, वो अभी भी वैसे के वैसे ही पड़ा हुआ है. इस पुल में कोई बदलाव आज तक नहीं किया गया है और न ही कोई मरम्मत की गई है. इसे केवल पार करने लायक बना दिया गया है और किसी तरह से काम चलाया जा रहा है. फिलहाल तो बरसात का मौसम भी है, इसलिए और भी इस रास्ते की स्थिति खराब हो गई है. वैसे दोनों हाइवे राज्य की लाइफलाइन हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करने वाली हर चीजें इस रास्ते से होकर इंफाल आती हैं. फिर भी दोनों हाइवे की स्थिति बेहद खराब है. दोनों को नेशनल हाइवे तो घोषित कर दिया गया, मगर उनके निर्माण और रख-रखाव की बात किसी ने अब तक नहीं सोची.

हाईवे 39 की स्थिति खराब होने से राज्य में महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आम जनता त्रस्त है. सामानों की कीमतें बढऩे से कमाई कर खानेवाले किसानों की तो और भी हालत खराब है. छोटे-मोटे हर सामान इस रास्ते से होकर आते हैं, लेकिन रास्ता ठप पडऩे से खाने-पीने का सामान, दवाई, पेट्रोलियम पदार्थ आदि नहीं पहुंच पा रहा है. इसलिए राज्य में लोगों का जीना मुहाल हो गया है. पेट्रोल के लिए सुबह से लंबी लाइन लगी होती है. ब्लैक में एक लीटर पेट्रोल 200 से 250 रुपए में खरीदना पड़ रहा है. यह स्थिति तभी उत्पन्न होती है, जब नेशनल हाइवे बंद होता है. समय रहते इस रास्ते को अगर नहीं बनाया गया तो आनेवाले दिनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है.

दूसरी तरफ इस हाइवे पर कई आए दिन घटनाएं भी होती रहती हैं. इस हाइवे पर कई अलगाववादी संगठन अवैध वसूली करते रहते हैं. उनकी मांगें नहीं मानने पर वे यात्रियों को मारने, सामान लूटने और ड्राइवरों को मार डालने जैसी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं. इन घटनाओं के कारण कई बार जनता ने रोड ब्लॉकेड करना और हिंसक प्रदर्शन का सहारा लिया है. आज यहां की जनता के लिए यह प्रदर्शन आम हो गया है. इतना ही नहीं, हाइवे के आसपास बसे लोगों द्वारा किसी मुद्दे को लेकर सरकार से मांग की जाती है और उनकी मांग नहीं पूरा होने की स्थिति में रास्ता बंद कर दिया जाता है. फिलहाल अलग राज्यों की मांग को लेकर फिर से लोगों ने हाइवे ब्लॉकेड करना शुरू कर दिया है. रास्तों को बंद करने से रोकने के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. सिविल ऑर्गनाइजेशनों ने इसे रोकने के लिए हाइवे सिक्योरिटी रखने की मांग भी केंद्र सरकार से की थी, लेकिन सरकार ने आज तक उनकी एक भी नहीं सुनी.


बहरहाल, नेशनल हाइवे का संबंध राज्य से उतना नहीं है, जितना कि केंद्र से. राज्य के लिए तो इसे केवल सही तरीके और समय पर खत्म होने की मॉनिटरिंग करना है. साथ में उसकी रिपोर्ट सेंटर को भेज कर नियत समय पर खत्म करवाने की मांग करना है. जिरिबाम के लोग 20 वर्षों से मांग करते आए हैं कि इस हाइवे को सही तरीके से बनाया जाए, ताकि एक हाइवे पर लोग निर्भर न रहें. सरकार की उदासीनता के विरोध में लोगों ने प्रदर्शन तक किया था और उनका कहना था कि जब तक रास्ता नहीं बनाया जाएगा, तब तक गाड़ी नहीं चलने देंगे. कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन सभी ने सिर्फ आश्वासन दिया, किया कुछ नहीं. सडक़ों के खराब होने पर थोड़ा बहुत ठीक करके उनकी सुध कभी नहीं जाती. सच्चाई यह है कि पूरी सडक़ें आज तक नहीं बनीं, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि निर्धारित समय में काम पूरा किया जाए. ग्रामीणों का कहना है कि इस बार केंद्र सरकार कितना पूर्वोत्तर को याद करता है, इसका उदाहरण केंद्रीय
मंत्री के दौरे से पता चलेगा. पिछले साल भी सितंबर में मणिपुर में आए यूनियन मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर डिफेंस पल्लम राजु ने कहा था कि 2013 
के दिसंबर महीने तक इस हाइवे का काम
पूरा हो जाएगा. केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह ने 2014
 के जून तक हाइवे बनाने का काम पूरा होने का
वायदा किया है. अब देखना यह है कि देर से ही सही
, केंद्रीय मंत्री का वायदा कहां तक पूरा हो
पाता है.  

Thursday 29 August 2013

अफसपा का गलत इस्तेमाल : कमीशन

मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) वर्षों से लागू है, जिसकी आ़ड में सुरक्षा बल फर्जी मुठभे़डों को अंजाम देते रहे हैं. अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कह दिया है कि अफसपा का गलत इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में इस एक्ट का बने रहना कितना उचित है?


भारत सरकार अपनी जनता की हिफाजत करने में पूरी तरह से नाकाम रही है. आए दिन भ्रष्टाचार और घोटालों से सरकार की किरकिरी होती रहती है. लगता ही नहीं कि भारत में कोई सरकार काम कर रही है, क्योंकि जनता के अधिकारों और उसके हितों का पूरा ख्याल सुप्रीम कोर्ट को रखना प़ड रहा है. जनता को भी इस बात का भान हो चुका है कि सरकार उसके लिए कुछ नहीं कर सकती, इसीलिए वह न्याय की आस में कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है. समझ में नहीं आता कि इतने ब़डे अमले और लाव-लश्कर के साथ सरकार कर क्या रही है. जब हर काम कोर्ट के दखल के बाद ही होगा, तो इस अकर्मण्य और अपाहिज सरकार का क्या काम.
कुछ ऐसा ही हाल है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा)-1958 का, जिसकी सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट करने लगी है. गौरतलब है कि 15 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने छह मुठभेड़ों के मामले में एक फैसला सुनाया. सारे मुठभे़ड फर्जी थे. दो संस्थाओं एक्सट्रा जूडिशिएल एक्जीक्यूशन विक्टीम फेमिलीज एसोसिएशन (एएवीएफएएम) और ह्यूमन राइट्स एलर्ट ने एक पीटिशन सितंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट को दिया था. इस पीटिशन में लिखा था कि 1979 से 2012 तक मणिपुर में मुठभेड़ की 1528 घटनाएं हुई थीं, जिन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई. उन संस्थाओं की मांग है कि इन मुठभे़डों की जांच-पड़ताल सुप्रीम कोर्ट करे. पीटिशन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन लोगों का एक कमीशन बनाया था, जिसके चेयरमैन हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े. इस कमेटी में पूर्व चीफ इलेक्शन कमिश्‍नर जी एम लिंगदोह और कर्नाटक के पूर्व डीजीपी अजय कुमार सिन्हा भी शामिल हैं. कमीशन ने पहले छह केस की जांच शुरू की थी. इंफाल क्लासिक होटल में 3 से 7 मार्च तक कमीशन की बैठक हुई थी. इसके बाद दिल्ली में 13 से 21 मार्च तक बैठक कर कमीशन ने सुप्रीम कोर्ट को 12 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट दिया था.

बहरहाल, जिन छह लोगों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है, उन्में हैं-एमडी आजाद खान (4-3-2009), खुमबोंगमयुम ओरसोनजीत सिंह (16-3-2010), नामैराकपम गोविंद मैतै (4-4-2009) और नामैराकपम नोवो मैतै (4-4-2009), इलांगबम किरणजीत सिंह (24-4-2009), चोंगथाम उमाकांता (5-5-2009), अकोयजम प्रियोबर्ता (15-3-2009). इनमें आजाद खान स्कूली बच्चा है. आजाद कोे उसके मां-बाप के सामने उसके घर से घसिट कर ले जाकर गोली मारी गई. बच्चे की लाश के पास से पिस्टल भी मिला. मणिपुर पुलिस कमांडो और असम रायफल्स की तरफ से यह कहा गया कि वह आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त था. उसके पास से हथियार पिस्टल और ग्रेनेड आदि बरामद हुआ है. आपको जानकर ताज्जुब होगी कि जिस दिन इस बच्चे को मारा गया, उस दिन उसके स्कूल रजिस्टर में उसकी उपस्थिति दर्ज दिखाई गई है, जो एक ब़डा सवाल है. हैवानों की हद देखिए कि जब बच्चे का पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आया, तो पता चला कि उसे छह गोलियां मारी गई थीं.

कमीशन की रिपोर्ट के केंद्र में अफसपा ही है. अफसपा को हटाने के लिए जो जीवन रेड्डी कमेटी गठित की गई थी, उस रिपोर्ट को भी कमीशन ने सही ठहराया. अफसपा की आड़ में कई जगहों को अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया, ताकि वहां आर्मी का दखल हो सके. मणिपुर पुलिस कमांडो जनता को धमकी दे रही है. आए दिन हत्याओं की खबरें आती रहती हैं, जिसकी जितनी भर्त्सना की जाए, कम है. एसपी द्वारा कमांडो के कार्यों पर नजर रखी जानी चाहिए. जिला स्तर पर पुलिस कंप्लेंट कमेटी बनाना चाहिए. कमेटी में जन प्रतिनिधि की हिस्सेदारी होनी चाहिए. गैरकानूनी कामोें पर सीआईडी को अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी. लंबे अर्से से रख रहे अफसपा को हटाने की दिशा में काम होना चाहिए. मुठभेड़ में मारे गए लोगों की छानबिन पुलिस द्वारा अच्छी तरह की जानी चाहिए. एनकाउंटर में मारे गए लोगों का पोस्टमॉर्टम होने में काफी देरी हो जाती है, जिससे रिपोर्ट में छे़ड-छा़ड का मौका मिल जाता है और महत्वपूर्ण सुराग गायब हो जाता है, इसलिए वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमॉर्टम होना चाहिए. फोरेंेसिक एनालिसिस होनी चाहिए, ताकि फिंगर प्रिंट का पता चल सके. सबसे अहम बात यह है कि पुलिस कमांडो द्वारा गोलीबारी में जो लोग मारे गए हैं, उसके जवाब में वह यह बयान देते हैं कि उन्होंने अपने डिफेंस में गोली चलाया है, यह उचित नहीं है. सच तो यह है कि अफसपा दूसरे देशों से रक्षा के लिए बनाया गया कानून है.

एनकाउंटर के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद मणिपुर का दूसरा स्थान है. राज्य में कुल 60 असम रायफल्स कंपनी, 37 सीआरपीएफ कंपनी और 12 बीएसएफ कंपनी तैनात है. मणिपुर की जनता खासकर युवा, हिंसा से इस हद तक प्रभावित है कि पटाखे भी आज मौत की सबब बन गए हैं, भले ही वह बम-बारूद या गोलीबारी की आवाज न हो. घर में लोग छुप जाते हैं. हिंसा की वजह से यहां के नौजवान देश के बाकी हिस्सों से या दूसरे राज्यों से किसी भी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा में शामिल भी नहीं हो पाते. गोलीबारी, बम धमाका यहां के लिए आम बात है. बच्चा-बच्चा इससे वाकिफ है. एक समय ऐसा भी था, जब वहां का युवा घर से बाहर नहीं निकलता था. चारों तरफ डर का माहौल होता था. इंडियन आर्मी और मणिपुर पुलिस कमांडों दोनों का डर इन नौजवानों को हमेशा सताता रहता था. मुठभेड़ में न जाने कितनी महिलाओं का सुहाग उज़ड गया, जिनके लिए परिवार का बोझ ढोना बहुत मुश्किल हो जाता है. 2004 में थांगम मनोरमा को इंडियन आर्मी द्वारा घर से पकड़ लिया गया था. इंसानियत उस समय शर्मसार हो गई, जब पहले उसके साथ दुष्कर्म किया गया और बाद में उसको गोली मार दी गई. मनोरमा पर आरोप था कि वह आतंकवादी संगठन की सदस्य है. मनोरमा की घटना के विरोध  में उस समय 10 महिलाओं ने असम रायफल्स के गेट पर नग्न प्रदर्शन किया था. भारत जैसे लोकतंत्र के लिए इससे शर्मनाक घटना भला और क्या हो सकती है. 23 जुलाई, 2009 को रवीना और संजीत को सरेआम सड़क पर मारा गया था. संजीत को पीपल्स लिबरेशन आर्मी का सदस्य बताया गया था. इरोम शर्मिला राज्य से अफसपा हटाने के लिए पिछले 12 सालों से भूख हड़ताल पर है, लेकिन बहरी सरकार के कानों तक अहिंसात्मक आंदोलन की आवाज आज तक नहीं पहुंची.


ह्यूमन राइट्स एलर्ट के एक्जीक्यूटिव डाइरेक्टर बब्लू लोइतोंगबम ने कहा है कि यह रिपोर्ट कमीशन ने 8 अप्रैल, 2013 को सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया था और 15 जुलाई को पीड़ित के पीटिशनर को दिया गया. अगला हियरिंग 17 सितंबर को होगा. वह कहते हैं कि इतने दिनों से अफसपा लागू है, लेकिन स्थिति बद से बदतर हो गई है, ऐसे में अफसपा के लागू होने का मतलब नहीं समझ में आता. बब्लू कहते हैं कि यह रिपोर्ट कम से कम अफसपा को हटाने का एक सुंदर मौका है. इस रिपोर्ट से उम्मीद का दरवाजा खुला है, जिसे बंद नहीं होने देना चाहिए. 

Friday 19 July 2013

सरकारी कर्मचारी करते हैं ड्रग्स का काला कारोबार

भारत-म्यांमार सीमा पर ड्रग्स लेकर जाते लोगों के पकड़े जाने का सिलसिला थम ही नहीं रहा है. ड्रग्स का यह काला और जानलेवा कारोबार धीरे-धीरे अब पूरे पूर्वोत्तर तक पहुंच चुका है. सबसे दु:खद और आश्‍चर्यजनक बात तो यह कि इस कारोबार में सरकारी तंत्र भी लिप्त है और उसके सबूत भी मिल रहे हैं. भारतीय सेना एवं मणिपुर पुलिस के जवान और मंत्रियों-राजनेताओं के बेटे आदि सभी इस कारोबार में बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी कर रहे हैं. जब सेना के लोग इस काले कारोबार में लिप्त पाए जा रहे हैं, तो ऐसे में पूर्वोत्तर में लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट पर भी सवाल खड़े होते हैं. कहीं सेना के लोग इस एक्ट की आड़ में तो यह सब नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह एक्ट उन्हें काफी अधिकार देता है?

बीते 26 मई को थौबाल ज़िले में पुलिस ने दो लोगों को बड़ी मात्रा में ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किया, जिसकी क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 2.50 करोड़ रुपये आंकी गई. ड्रग्स की इस खेप के साथ पकड़े गए वांजिंग निवासी टी बोकुल और थौबाल निवासी एम डी ताजुद्दीन शाह पुलिस अधिकारी हैं. उक्त दोनों पुलिस अधिकारी एक सरकारी जिप्सी पर ड्रग्स की यह खेप लेकर नगालैंड से मणिपुर की तरफ़ आ रहे थे और वह भी बाकायदा यूनिफॉर्म में! जिप्सी में इफिड्रिन बाइउसेट नामक टैबलेट से भरे तीन बॉक्स लदे थे, बाद में टैबलेटों की कुल संख्या 3,19,200 पाई गई. पूछताछ में पता चला कि ड्रग्स की यह खेप सीमावर्ती शहर मोरे (मणिपुर) होते हुए म्यांमार (बर्मा) जानी थी. 

ह इस काले कारोबार से जुड़ी एक छोटी-सी घटना है. इससे बड़ी और हैरान करने वाली घटना तो यह है कि मणिपुर के पलेल नामक जगह से बीते 24 फरवरी को इंफाल में तैनात कर्नल रैंक के डिफेंस पीआरओ अजय चौधरी का 25 करोड़ रुपये के ड्रग्स के साथ पकड़ा जाना. अजय चौधरी के साथ छह अन्य लोग भी थे, जिनमें उसका असिस्टेंट आर के बब्लू, असिस्टेंट मैनेजर इंडिगो- ब्रोजेंद्रो, हाउपू हाउकिप, मिनथं डोंगेल, मिलान हाउकिप एवं साइखोलेन हाउकिप शामिल थे. साइखोलेन हाउकिप वर्तमान कांग्रेसी विधायक टी एन हाउकिप का बेटा है. अजय चौधरी भी ड्रग्स लेकर मोरे जा रहा था. ग़ौरतलब है कि भारत-म्यांमार मार्ग पर केवल 77 दिनों के अंदर 19 ड्रग्स कारोबारी गिरफ्तार किए गए, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं. जानकार बताते हैं कि क़रीब 90 प्रतिशत ड्रग्स म्यांमार से भारत में आता है. म्यांमार से भारत में ड्रग्स लाने के लिए चार रूट इस्तेमाल किए जाते हैं, तामु (म्यांमार)-मोरे-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर, न्यू सोमताल (एक गांव, भारत-म्यांमार सीमा)-सुगनु-चुराचांदपुर-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर, खैमान (म्यांमार)-बेहियांग-चुराचांदपुर-इंफाल-कोहिमा-डिमापुर और सोमराह (म्यांमार)-तुइसांग (उख्रूल ज़िला मणिपुर)-खारासोम-जेसामी-कोहिमा (नगालैंड)-डिमापुर. इन चारों रूटों में सबसे ज़्यादा ड्रग्स मणिपुर-नगालैंड होते हुए भारत लाया जाता है.



स सिलसिले में हाल के दिनों की सबसे बड़ी घटना है, मोरे कमांडो के पूर्व ऑफिसर-इन-चार्ज एवं सब-इंस्पेक्टर आर के बीनोदजीत की गिरफ्तारी, जिसके पास से बरामद ड्रग्स की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 3.64 करोड़ रुपये आंकी गई. बीनोदजीत को बीते 8 मई को गिरफ्तार किया. उसने 11 पुलिसकर्मियों को यह ड्रग्स ट्रांसपोर्ट करने का ऑर्डर दिया था, जो इसे बर्मा की ओर ले जा रहे थे. फिलहाल बीनोदजीत एवं उसके 11 मणिपुर पुलिस कमांडो साथी जेल में हैं. इस ड्रग्स की डिलीवरी मोरे में होनी थी. मोरे मणिपुर-म्यांमार की सीमा पर बसा एक छोटा-सा बाज़ार है और यह भारत का एक व्यापारिक केंद्र भी है. जबसे इंडो-म्यांमार ट्रेड एग्रीमेंट लागू हुआ, तबसे यहां व्यापार के क्षेत्र में काफी तेजी आ गई. रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुएं म्यांमार से भारत लाकर बेची जाती हैं. इसके बाद उन्हें पूर्वोत्तर और अन्य भारतीय बाज़ारों में बेचा जाता है. ऐसे में सवाल यह है कि ऐसी जगह पर तैनात पुलिसकर्मियों का ड्रग्स के साथ पकड़ा जाना आख़िर क्या साबित करता है?

सी तरह बीते 29 मई को नार्कोटिक अफेयर्स बॉर्डर पुलिस (एनएबीपी) ने लंफेल के सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी इरोइसेम्ब गेट से लगभग 50 लाख रुपये क़ीमत की 25 किलो इफिड्रिन टैबलेट्स के साथ तीन लोगों को धर दबोचा. इससे पहले एक जनवरी को 1.5 करोड़ रुपये का ड्रग्स इंफाल एयरपोर्ट से पकड़ा गया था, लेकिन उसे कौन ले जा रहा था, इसका पता ही नहीं चल सका. कई सामाजिक संगठनों ने इस मामले में किसी सरकारी आदमी की संलिप्तता का शक जताया था. ड्रग्स के इस काले कारोबार का पूर्वोत्तर पर विपरीत असर पड़ रहा है. इस मामले में पूरे पूर्वोत्तर में नगालैंड का दिमापुर सबसे आगे है, जबकि दूसरे नंबर पर मणिपुर का चुराचांदपुर ज़िला है. इन दोनों स्थानों पर आप खुलेआम ड्रग्स की खरीद-फरोख्त और उसका सेवन होते देख सकते हैं. यहां एचआईवी पॉजिटिव कई नवयुवक मिलेंगे, जो बहुत खराब हालत में हैं. सुबह से लेकर शाम तक, पूरे दिन टैबलेट्स खाना और सीरिंज के जरिए ड्रग्स लेना उनका एकमात्र काम है. वे जो सीरिंज अपने दोस्तों को लगाते हैं, उसे दोबारा किसी को भी लगा देते हैं, इससे एचआईवी पॉजिटिव होने की आशंका ज़्यादा रहती है. जाहिर है, उत्तर-पूर्व में चल रहे ड्रग्स के इस काले कारोबार को अगर समय रहते नहीं रोका गया, तो यह उग्रवाद से भी ज़्यादा बड़ी समस्या बन जाएगा.