यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Wednesday 19 May 2010

मुइवा, मणिपुर और केंद्र की दोहरी नीति


पिछले दस वर्षों से शीर्ष नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएनआईएम) और केंद्र सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला आ रहा है. बीते अप्रैल में हुई नई दौर की वार्ता से लोगों को लगा कि इस बार दोनों पक्ष एक-दूसरे को बेहतर तरीक़े से समझ पा रहे हैं. नए वार्ताकार आर एस पांडे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाक़ात करने के बाद मुइवा से मिले थे. पांडे नगालैंड कैडर से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए आईएएस अधिकारी हैं. उनसे पहले के पद्मनाभन ने मुइवा एवं इसाक स्वू के साथ कई दौर की बातचीत करके नींव तैयार की थी और अब समझौता होने के आसार दिखने लगे थे. मगर, केंद्र सरकार के कुछ ़फैसलों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. केंद्र ने अचानक अपना रुख़ बदलते हुए सीधे जवाब दे दिया कि पड़ोसी राज्यों की सहमति के बिना इस वार्ता का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल सकता. सरकार का यह बयान इस समस्या की सच्चाइयों से मुंह मोड़ना है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नगा बागी वृहद नगालिम में पड़ोसी राज्यों के कुछ नगा बहुल इलाक़ों को भी शामिल करने की मांग करते रहे हैं. जब यह पहले से ही स्पष्ट है तो इस मौक़े पर केंद्र का यह बयान अपने बढ़े पैरों को पीछे खींचने जैसा है.

पिछले कई वर्षों से नगा बागी वृहद नगालैंड (नगालिम) के तहत नगा बहुल इलाक़ोंे को एक पृथक प्रशासनिक तंत्र में शामिल करने की मांग करते रहे हैं. उनका कहना है कि नगालिम में नगालैंड के अलावा मणिपुर के चार ज़िले, असम के दो पहाड़ी ज़िले और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के दो ज़िले भी शामिल किए जाएं. केंद्र के इस बयान से वार्ता असफल हुई तो एनएससीएन (आईएम) के मुखिया मुइवा ने अपना पैंतरा बदला. उन्होंने 3 से 10 मई तक मणिपुर में अपने जन्मस्थान उख्रूल के सोमदाल आने का ़फैसला किया. नगा शांति वार्ता पिछले दस वर्षों से चल रही है, लेकिन इस बीच मुइवा कभी मणिपुर नहीं आए. अब उनके इस ़फैसले ने राज्य की जनता को दो हिस्सों में बांट दिया है. स्थानीय लोगों का एक हिस्सा मुइवा को आने देने के पक्ष में है, तो राज्य की जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा ऐसा नहीं होने देना चाहता. उसे डर है कि मुइवा अपने मणिपुर दौरे के दौरान लोगों को लामबंद करने की कोशिश करेंगे, जिससे राज्य का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है. बिफरी हुई जनता चौक-चौराहों और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन पर उतर आई.



राज्य सरकार भी इस ख़तरे से वाक़ि़फ थी और यही वजह है कि राज्य कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर यह ़फैसला ले लिया कि मुइवा को किसी भी क़ीमत पर मणिपुर में प्रवेश की इजाज़त नहीं दी जाएगी. मणिपुर और नगालैंड की सीमा माओ गेट पर धारा 144 के तहत कर्फ्यू लगा दिया गया. मणिपुर का द्वार कहे जाने वाले माओ गेट पर कमांडो पुलिस और सुरक्षाबलों को मुइवा को आने से रोकने के लिए तैनात कर दिया गया. दूसरी ओर, मुइवा के मणिपुर आगमन का समर्थन करने वाले हज़ारों लोगों की भीड़ पांच मई को कर्फ्यू का उल्लंघन करती हुई माओ गेट पर एकत्र हो गई. मुइवा के स्वागत के लिए आए लोगों की पुलिस के साथ झड़प हुई. उन्हें रोकने के लिए सुरक्षाबलों को हवाई फायरिंग और टियर गैस का इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक घायल हो गए. घटना में मारे गए लोगों के परिजनों ने शव ले जाने से मना कर दिया है. पुलिस कार्रवाई के बाद मार्केट सेंटर के रूप में प्रचलित माउ बाज़ार में सन्नाटा पसरा है. बड़ी दुकानें, होटल और रोजमर्रा की ज़रूरतों वाली दुकानें बंद हैं. नेशनल हाइवे नंबर 39, जो मणिपुर को देश के बाक़ी हिस्सों से जोड़ता है, पूरी तरह बंद पड़ा है. इस वजह से लोग गुवाहाटी से इंफाल नहीं पहुंच पा रहे हैं. राज्य के बाहर रहने वाले हज़ारों छात्र अपने घर नहीं जा पा रहे हैं. माउ गेट पर मणिपुर आने वाली तेल और खाने-पीने के सामान से लदी गाड़ियां रुकी हुई हैं. राज्य में महंगाई आसमान छू रही है और जनता रोजमर्रा की ज़रूरतों की पूर्ति से भी महरूम है. मणिपुर की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए पीएमओ ने आदेश दिया कि जब तक यहां का माहौल शांत नहीं हो जाता, मुइवा की मणिपुर यात्रा स्थगित रहे. नगालैंड के मुख्यमंत्री नैफ्यू रिउ ने भी माहौल शांत होने तक यात्रा स्थगित रखने की अपील की. इस मामले में मणिपुर सरकार और जनता एक साथ है. लेकिन, केंद्र के टालमटोल वाले रवैये ने एक बार फिर इस आग में घी डाल दिया.


दिल्ली से बुलावा आने पर मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इबोबी सिंह 7 मई को दिल्ली पहुंचे. इस मसले को लेकर गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य वरिष्ठ नेताओं से उनकी बातचीत हुई. केंद्र ने मुख्यमंत्री से कहा कि वह मुइवा के मणिपुर आने की व्यवस्था करें. केंद्र सरकार का तर्क है कि एनएससीएन (आईएम) प्रतिबंधित संगठन नहीं है और इसलिए मुइवा को मणिपुर में आने से रोकना उचित नहीं है. उसने राज्य सरकार को मुइवा के लिए ज़रूरी सुरक्षा इंतज़ाम करने की सलाह दी, लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मुइवा को रोकने का ़फैसला उनका व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य कैबिनेट का है, जो इस आधार पर लिया गया है कि 40 वर्ष बाद मुइवा का अपने जन्मस्थल लौटना एनएससीएन (आईएम) के पक्ष में नया माहौल बनाने में मददगार साबित हो सकता है. राज्य सरकार इसलिए भी डरी हुई है, क्योंकि मुइवा उख्रूल के अलावा मणिपुर के कई अन्य ज़िलों जैसे सेनापति, तमेंगलोग और अन्य नगा बहुल इलाक़ों में जाने की योजना बना रहे थे. सरकार का मानना है कि अपनी बैठकों और भाषणों के ज़रिए मुइवा हज़ारों वर्षों से एक साथ रह रहे नगा और मणिपुरी लोगों के बीच अलगाव की कोशिश करेंगे. केंद्र सरकार के इन विरोधाभासी ़फैसलों को देखकर आम जनता को लगने लगा है कि केंद्र मुइवा के इस दौरे का राजनीतिक इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसमें मुइवा को हथियार बनाया जा रहा है. हालांकि, राज्य सरकार मुइवा को रोकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन फिर भी अगर मुइवा आ जाते हैं, तो इसके हर परिणाम के लिए केंद्र सरकार ही ज़िम्मेदार होगी. केंद्र के इस रवैये ने स्थानीय लोगों के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है. उन्हें लग रहा है कि मुइवा के मणिपुर आने का यह मुद्दा कहीं 2001 के उस कांड की पुनरावृत्ति न कर दे, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गई थी. लोग सहमे हुए हैं. 18 जून, 2001 को हुई घटना के लिए भी लोग मुइवा को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि मुइवा अगर ग्रेटर नगालैंड के सपने न देख रहे होतेे, तोे 18 जून की घटना नहीं घटती और शांति वार्ता भी तेज़ी से आगे बढ़ती.

केंद्र सरकार केवल अपना राजनीतिक लाभ देखते हुए मुइवा को मणिपुर आने देने के लिए दबाव डाल रही है, मगर वह इस बात को भूल रही है कि वहां की जनता भी भारत का हिस्सा है, उसकी भावनाओं से खेलकर केंद्र दरअसल उसके मन में अपने ही ख़िला़फ कांटे बो रहा है. इससे देश की एकता और अखंडता को ख़तरा हो सकता है. केंद्र सरकार ने अगर दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखा होता, तो वह यह निर्णय न लेती. शांति वार्ता को लेकर आम जनता का ख़ून बहा था, वह शायद केंद्र को याद नहीं है. स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि अब यदि मणिपुर सरकार मुइवा को आने की इजाज़त दे भी देती है, तो हालात इससे भी ज़्यादा बदतर हो सकते हैं. अब भी समय है कि केंद्र सरकार राजनीतिक बयानबाज़ी और निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए ज़मीनी हक़ीक़त को समझे. साथ ही उसे यह भी समझना होगा कि यह मामला जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए ज़रूरी है कि वह ज़बरदस्ती की अड़ंगेबाज़ी से बाज आए और राज्य की बहुसंख्यक जनता की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों को स्पष्ट करे.


मणिपुर ज़रूर जाऊंगा : मुइवा



नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने भारत सरकार से शिलांग समझौता टूटने के बाद 30 अप्रैल, 1988 को नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड का गठन किया था. बाद में एनएससीएन दो गुटों में बंट गया. पहला गुट एनएससीएन (आईएम) यानी आइजाक चीसी स्वू और थुइङालेंग मुइबा और दूसरा एनएससीएन (के) यानी खपलांग के रूप में जाना जाने लगा. एनएससीएन (आईएम) का एक ही मक़सद है, माओत्से-तुंग की क्रांतिकारी विचारधारा पर आधारित ग्रेटर नगालिम का गठन. इस संगठन के घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि नया नगालैंड केवल ईसाइयों के लिए हो. भारतीय संविधान के मौजूदा दायरे में ऐसा संभव नहीं है और एनएससीएन (आईएम) इसके ख़िला़फ सशस्त्र आंदोलन चलाने का पक्षधर है. हालांकि, केंद्र के साथ पहली बार 1997 में हुए युद्ध विराम समझौते के बाद से हिंसा का दौर थमा हुआ है, लेकिन मौजूदा विवाद से सांप्रदायिक भावनाएं एक बार फिर भड़क जाने का ख़तरा भी पैदा हो गया है. दूसरी ओर, संगठन के जनरल सेके्रटरी थुइङालेंग मुइवा भी राज्य सरकार को चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. उनका कहना है कि मैं मणिपुर ज़रूर जाऊंगा और अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों से मिलूंगा. कोई भी ताक़त मुझे नहीं रोक सकती. मैं मणिपुरियों से कुछ नहीं लूंगा. किसी भी तरह के आपत्तिजनक काम नहीं करूंगा. मैं स़िर्फ नगाओं के हक़ की ही मांग करूंगा. मणिपुरियों ने मेरी यात्रा में बाधा डाली, इससे मैं बहुत आहत हूं. यह यात्रा शांति के लिए है, किसी को परेशान करने के लिए नहीं.

Saturday 8 May 2010

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

-पाश