यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday 19 August 2011

मणिपुर जातीय तनाव की चपेट में

देश के सुदूर उत्तर-पूर्व राज्यों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. राज्य सरकार ही नहीं, केंद्र सरकार भी इस बारे में गंभीर नहीं है. कम से कम पिछले एक सप्ताह से मणिपुर को जो़डने वाली लाइफ लाइन यानी एनएच 53 और 39 की आर्थिक नाकेबंदी से तो ऐसा ही लग रहा है. मामला सदर हिल्स डिस्ट्रिक बनाने की मांग का है. आम आदमी परेशान है, लेकिन राज्य सरकार इस सब से मानो बे़खबर है. आ़खिर, मणिपुर इस जातीय तनाव से कब मुक्त होगा?
सदर हिल्स डिस्ट्रिक की मांग धीरे-धीरे तूल पकड़ रही है. लोग सड़क पर उतर रहे हैं. महिलाएं और बच्चे भी इसमें शामिल हो रहे हैं. शांति व्यवस्था प्रभावित हो रही है. कई गाड़ियां जलाई गईं, एनएच 53 के बीचोंबीच खुदाई कर रखी है. पेसेंजर बस सेनापति ज़िले में फंसी रही. सामान लाने वाली गाड़ियां सिक्युरिटी द्वारा कोहिमा से उख्रूल ज़िले के जेसामी होते हुए इंफाल लाई जा रही हैं. पुलिस लाचार है. इस इकोनॉमी ब्लॉकेड से आम जीवन प्रभावित हो रहा है. रोज़मर्रा के जीवन में उपयोग होने वाले सामान की कमी से वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं. किसान सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं.
मणिपुर में छोटी-छोटी जातियों के बीच सांप्रदायिक तनाव हमेशा होता रहा है. इस बार फिर सदर हिल्स डिस्ट्रिक डिमांड कमेटी ने सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट बनाने की मांग की है और जिसे लेकर प्रदेश में का़फी तनाव है. 31 जुलाई की रात से मणिपुर के दोनों राष्ट्रीय राज्यमार्ग (एनएच 53 और 39) नाकेबंदी शुरू हो गई थी. इस दौरान एक छात्र समेत पांच लोगोंे की मौत हो गई. 10 सरकारी ऑफिस भी जलाए गए, जिनमें सपरमैना स्थित डीआई ऑफिस के गोडाउन, ट्राइवल डेवलपमेंट ऑफिस और साइकुल स्थित एसडीओ ऑफिस आदि शामिल हैं. एनएच 53 में स्कोर्ट के लिए गई एक गाड़ी खाई में गिर गई और छह एमआर (मणिपुर रायफल्स) के जवान घायल हो गए. खाने-पीने का सामान ढोकर आ रही 150 गाड़ियां एनएच 53 में फंसी हुई हैं.
मणिपुर विधानसभा चुनाव अगले साल ़फरवरी में होने हैं. ऐसे में जातियों के बीच तनाव या झगड़े का मक़सद राजनीतिक दलों का ध्यान आकृष्ट करने का भी होता है. सेनापति ज़िले को दो टुकड़ों में तोड़ कर सदर हिल्स ज़िला बनाने की यह मांग का़फी समय से की जा रही है. सदर हिल्स डिस्ट्रिक डिमांड कमेटी कुकियों की है. सदर हिल्स एरिया में नगा जाति अधिक संख्या में है. जब 1992 में नगा और कुकी जातियों के बीच लड़ाई हुई थी, तब से दोनों जातियों के बीच हमेशा तनाव बना हुआ था. भले ही दोनों जातियों के बीच बाहरी दिखावा हो, मगर उन दोनों का पॉलिटिकल एजेंडा अलग-अलग है. घाटी स्थित बड़ी आबादी वाली मीतै जाति भी दोनों जातियों के बीच की लड़ाई में कुछ नहीं बोल रही है. मीतै ने सदर हिल्स डिस्ट्रिक बनाने की मांग पर अभी तक कोई राय ज़ाहिर नहीं की है. मगर सेनापति ज़िले में बसी नगा जाति का दावा है कि यह ज़िला केवल उन लोगों का है. इसलिए यह ज़िला उनकी मर्ज़ी के बिना नहीं बन सकता. सदर हिल्स डिस्ट्रिक बनाने में सबसे ज़्यादा आपत्ति नगा जाति को है. अगर नगा जाति का विरोध नहीं होता तो सदर हिल्स डिस्ट्रिक बहुत पहले बन गया होता. कुकी जाति की उप जातियां- आइमोल, अनाल, चोथे, चीरू, गांटे, मार, कोइरेंग, कोम, लमकां, लूसाइ, मोयोन, मोनशांग, पाइटे, थादौ, वाइफै, पुरुम, जौ आदि शुरुआत से ही मणिपुर में रह रही थीं. मणिपुर के राजा नरसिंह के समय से ये कुकी उप जातियां पहाड़ों पर बसने लगी थीं. उन लोगों की मदद से राजा नरसिंह की सैन्य ताक़त में और भी ब़ढोतरी हुई थी. ऐसा माना जाता है कि कुकी जातियां म्यांमार के चितांगों पहाड़ों से आई हैं. वह मणिपुर के राजा से दोस्ती कर मोयरांग नामक जगह पर बस गई थीं. माउ सब डिविजन से कुछ जगह, तमेंगलोंग से कुछ गांव, सेंट्रल इंफाल ज़िले से कुछ इलाक़े निकाल कर सदर हिल्स बनाया था. सदर हिल्स में दो तिहाई तो नगा जाति बसी हुई है. इसलिए कुकी होमलैंड बनाने की बात को लेकर नगा जाति परेशान रहती है. इस तरह नगाओं के मालिकाना होने के बाद भी सदर हिल्स डिस्ट्रिक बनाने की कुकियों की यह मांग एंटी नगा पॉलिसी मानी जा रही है.       
आ़िखर इस तरह के जातीय तनाव पर सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए, अन्यथा धीरे-धीरे यह जातीय तनाव पूरे प्रदेश में भी फैल सकता है. सदर हिल्स डिस्ट्रिक डिमांड कमेटी को नगा संगठनों से बातचीत करनी चाहिए, ताकि हल का रास्ता निकल आए.

 नगाओं की अनुमति के बिना सरकार ़फैसला नहीं कर सकती - एस.डी.एस.ए.

सदर हिल्स को पूर्ण ज़िला बनाने को लेकर हो रही मांग पर सेनापति डिस्ट्रिक स्टूडेंट एसोसिएशन ने कहा कि राज्य सरकार नगाओं की अनुमति के बिना निर्णय लेगी तो उसके बाद जो भी घटना घटेगी, उसकी ज़िम्मेदारी मणिपुर सरकार की होगी. सदर हिल्स डिस्ट्रिक डिमांड कमेटी 31 जुलाई से एनएच 39 और 53 की आर्थिक नाकेबंदी कर आम जनता को ज़्यादा परेशान कर रही है. मेडिकल एंबुलेंस पर पथराव करना, श्राद्ध कर्म पर जाने वाली गाड़ी रोकना और स्कूली बच्चों की गाड़ी रोकना, परीक्षा के लिए जा रहे छात्रों को रोकना, ये सब ग़लत है. एसडीएसए ने कहा कि मानवीय मुद्दों पर छूट देनी चाहिए. नगाओं के हक़ को नकारते हुए अगर ज़िला बनाया तो जातियों के बीच का़फी तनाव पैदा होगा, इसलिए सरकार सही निर्णय ले.