यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Wednesday 26 August 2009

आदिवासी औरतों की दुनिया का सच

दिवासी महिलाएं भले ही तन की काली हों, पर दिल की बहुत भोली होती हैं. झरने-सी उन्‍मुक्‍त निश्‍छल फेनिल हंसी और पुटुस के फूलों-सा उनके नैसर्गिक स्‍वभाव का क्‍या कहना. वे जंगलों को प्रेम करती हैं. उसके नाते-रिश्‍ते की परिधि में गाय, बकरी, सुअर भी आते हैं. उनकी दुनिया सारे जहां तक व सिर पर पहाड-सा दुख, हृदय में पहाड-सा धीरज संजोये रहती हैं.

अन्‍य समाजों की तरह आदिवासी समाज भी महिलाओं और पुरुषों की सहभागिता से बना है, लेकिन इसमें जो एक सबसे बडी बात है, वह है आदिवासी समाज की संरचना में महिलाओं का पुरुषों से चौगुना योगदान.औरतें, आदिवासी समाज की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ होती हैं. उन्‍हें खेत खलिहान, जंगल पहाड में ही नहीं, हाट-बाजारों में भी मेहनत-मजदूरी करते हुए देखा जा सकता है. अनाज के एक-एक दाने उनके पसीने से पुष्‍ट होते हैं. उनके घर की बाहरी-भीतरी चिकनी दीवारों और उस पर अंकित अनेक चित्रों से उनके मेहनत, रुचि और कल्‍पनाशीता का अंदाजा लगाया जा सकता है. वह अक्‍सर चुप रह कर सब कुछ सहती हैं. रोज मीलों पैदल चल कर पानी भी लाती हैं और नशे में धुत लडखडाते मर्दों को कंधों का सहारा भी देती हैं. भूख-प्‍यास, थकान से पस्‍त औरत मर्दों के रोज लात-घूसे भी सहती हैं और देर रात गए देह पर पाश्विक तांडव भी.सब कुछ सुनती, मन ही मन गुनती और भीतर ही भीतर लकडी सी घुनती निरंतर ये महिलाएं भला क्‍या जाने कि उनकी आंखों की पहुंच तक ही सीमित नहीं है उनकी दुनिया. वे नहीं जानती कि इतनी महत्‍वपूर्ण भूमिकाओं और त्‍याग बलिदानों के बावजूद उन्‍हें उनके समाज ने उचित मान सम्‍मान और कहीं कोई जगह क्‍यों नहीं दिया क्‍यों संपूर्ण चल अचल संपत्ति पर अपना अधिकार जमा छल-प्रपंच और परंपरा के नाम पर मकडी के जाले-सा उलझा कर रख दिया. शरी के विभिन्‍न अंगों पर असंख्‍य गोदने की तरह विडंबनाएं हैं, उनके जीवन में. कई बंदिशें और वर्जनाएं भी हैं, उनके लिए. जैसे वह हल नहीं छू सकती, चाहे लाख खेती का काम बिगड जाए. अगर भूल से भी मजदूरी में हल छू लिया तो प्रलय मच जायेगा. माझीथान में बैठे देवता का सिंहासन डोल उठेगा और फिर सजोनी किस्‍कू की तरह हल में बैल बना कर जोतने जैसी अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने से वे नहीं चूकेंगे. हल की तरह तीर-धनुष छूना भी उनके लिए अपराध है. इसके लिए भी कुछ ऐसी ही निर्धारित शर्त है. जीवन में सिर्फ एक बार शादी के समय लग्‍न मंडप में उन्‍हें तीर-धनुश छूने का मौका मिलता है. उसके बाद फिर कभी नहीं. इतिहास साक्षी है संताल विद्रोह के समय आदिवासी औरतों ने फूलों-झरनों के रूप में जम कर अंग्रे सिपाहियों का मुकाबला किया था और दर्जनों को मौत के घाट उतार दिया था. क्‍या वह काम उसने आंचा मार कर किया था. वे छप्‍पर-छावनी नहीं कर सकती. चाहे घर चू रहा हो या छप्‍पर टूट कर गिर गया हो. इस अपराध के लिए भी वैसी ही सजा है. नाक-कान काट कर घर से धकिया कर निकाल फेंकेगा दकियानूसी समाज. महिलाओं को जाहेर वृक्ष पर चढना या उसकी डालियां तोडना भी महिलाओं के लिए वर्जित है. संतालों की मान्‍यता है कि जाहेर वृक्ष पर बोंगा निवास करते हैं. महिलाओं के उस पर चढने से वह अलविदा हो जाता है. बोंगा नाराज हो जाते हैं और वर्षा को रोक देते हैं, जिससे अकाल पड जाती है.


किसी व्‍यक्ति का बाल काटना भी संताल महिलाओं के लिए वर्जित है. आज संताली समाज में प्रमुख और संपूर्ण चल-अचल संपत्ति का हकदार केवल पुरुष हैं. आदिवासी औरतों का अपने पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं बनता. जब-तक उसकी शादी नहीं होती उनके नाम से जमीन का एक टुकडा अलग रखा जाता है, जिसकी उपज से उसका भरण-पोषण और शादी की जाती है. शादी के बाद वह जमीन उसके भाइयों में बंट जाती है और अगर उसका कोई नहीं रहा तो उनके सबसे करीबी संगोष्ठियों में. अगर उसका पिता किसी को गोद लेकर धर जंवाई बसा लेता है तो ऐसी हालत में उसकी संपत्ति का हकदार उसका पति होता है. किसी कारणवश अगर लडकी को कुंवारी छोड कर उसका पिता मर जाता है तो ऐसे में पिता की संपत्ति पर उसका कोई हक नहीं होता, बल्कि उसके पिता के भाइयों में बंट जाता है. अगर कहीं वह बीच में विधवा हो गई, तो बस पूछिये मत. जमीन जायदाद हडपने की नीयत से उसके गोतिया भाई एक-एक षडयंत्र के तहत तुरंत उस पर डायन का आरोप लगा देंगे. जमीन सहित समस्‍त प्राकृतिक साधनों पर सामूहिक स्‍वामित्‍व की बात झूठी है. पहले कभी रहा होगा, लेकिन अब यह बीते जमाने की बात हो गई. जब खतियान बना, सरकार को मालगुजारी दी जाने लगी तो खतियान में पुरुशों का नाम चढा. कुंवारी लडकियों के साथ भी अजीब विडंबना है, कभी हाट बाजार मेला घूमने गई तो वहां भी जिसको जो पसंद आया भगा कर ले गया और साल छह महीना पास रख कर मन हुआ तो शादी की, नहीं तो छोड दिया. भले ही लडकी उसे पसंद करे न करे. ऐसे मामले में भी समाज का रवैया औरतों के पक्ष में सकारात्‍मक नहीं होता. पहले समुदाय में थोडी बहुत नैतिकता और मानवीय भावना बची हुई थी. इस वजह में संयुक्‍त परिवार था लोगों में सामुदायिक और सामूहिकता थी. घर गांव की चाटुकारिता ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया. परिणामत: आज संताली समाज की औरतें न घर की है, न घाट की. इस तरह संताली औरतों के लिए कहीं कोई व्‍यावहारिक व्‍यवस्‍था नहीं है, आदिवासी प्रथागत नियम कानून में. अंग्रेजी गैंजर की रिपोर्ट ने भी संताली प्रथागत कानून को वै़द्य ठहराया और आदिवासी औरतों को जमीन पर अधिकार वे वंचित कर दिया. आज आजादी के इतने सालों पर भी जबकि भारतीय संविधान में कितने संशोधन हुए, संताली प्रथागत कानून में अबतक कोई संशाधन नहीं हुआ. 1956 में जब हिंदू औरतों को पारिवारिक संपत्ति में हिस्‍सा देने के लिए हिंदू उत्‍तराधिकारी अधिनियम बना तो उसी समय आदिवासी औरतों को उस विरादरी से अलग छोड दिया गया, प्रथागत कानून के जयंती शिकंजे में घुट-घुट कर जीने और तिल-तिल कर मरने के लिए. आज जबकि अपने चारों ओर बदलती कमियों को देख कर ये अपने अभिशप्‍त जीवन के खिलाफ जोर-शोर से आवाज उठारही है. छोटी-छोटी जमातों से जुडकर पढना लिखना और मुंह खोलना सीख रही है. अपने हक और अधिकारों के लिए मिल बैठ कर बतियाने लगी है, प्रथागत कानूनों-सी लौह-किवाडों को धकियाने लगी है.

- निर्मला पुतुल

Sunday 23 August 2009

असम से उठते कुछ जरूरी सवाल

लचित बोरदोलाई के पास सरकार के लिए एक चेतावनी है- अगर सरकार ने उल्‍फा से सीधी वार्ता नहीं शुरू की और सेना अपने मनमाने तरीकों से काम करती रही, तो असम में भी मणिपुर जैसे हालात हो जाएंगे.किसी ने सुना लचित को? वे पीपुल्‍स कंसल्टिव ग्रुप के सदस्‍य हैं, जो पीपुल्‍स कमेटी फॉर पीस इनीशिएटिव्‍स इन असम का मुख्‍य शक्ति स्रोत है. कमेटी में 20 से अधिक संगठन हैं, जो शांति प्रक्रिया शुरू करने और सैन्‍य अभियान रोके जाने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि असम की जनता एक बडे आंदोलन के बारे में सोच रही है. हम शांति के लिए लड रहे हैं. हम सेना के मनमानेपन के मौन गवाह नहीं बने रह सकते. यदि यह जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं, असम में भी मणिपुर की तरह सेना विरोधी प्रदर्शन होने लगेंगे. मगर शायद लचित की आवाज सुननेवाले कोई नहीं है. उन बीस से अधिक संगठनों की भी जो शांति के लिए एक मंच पर आए हैं. लचित जब यह बोल रहे थे, 22 फरवरी 2007 को, उससे ठीक एक दिन पहले ही सेना ने अनेक गांवों पर भारी बमबारी की थी. उनमें आदमी ही रहते थे. वे भारतीय सीमा के इस ओर, असम में थे.लगता है कि हम अंधों-बहरों के ही देश में रहते हैं. लगता है कि हम सिर्फ धमाके ही सुन सकते हैं. कुछ समय पहले, जब 79 बिहारियों की असम में हत्‍या कर दी गई, तो सारे देश का ध्‍यान असम पर गया. इन हत्‍याओं को कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता, मगर यह जानना किसी ने जरूरी नहीं समझा कि इनके लिए जितनी दोषी उल्‍फा है, उससे कम दोषी सरकार नहीं है.माना जाता है कि पीपुल्‍स कंसल्‍टेटिव ग्रुप उल्‍फा के निकट है. ऐसे में शांति प्रक्रिया के लिए उसकी इस तरह की कोशिशें उन लोगों के लिए आश्‍चर्य का विषय हो सकती हैं, जो सरकारी प्रचारतंत्र पर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं. असम में जारी युद्ध विराम और शांति प्रक्रिया के टूटने के लिए उल्‍फा से अधिक भारत सरकार जिम्‍मेदार है. शांति प्रक्रिया से जुडे अनेक जानकारों ने यह बार-बार कहा है कि शांति प्रक्रिया के दौरान सरकार ने अडियल रवैया अपनाया. इसके उलट उल्‍फा ने काफी लचीला रुख दिखाया, मगर उसे सरकार से सहयोग नहीं मिला. शांति प्रक्रिया के विफल रहने से असम की व्‍यापक जनता में निराशा और एक हद तक गुस्‍सा भी फैल गया.
दरअसल, हम राष्‍ट्रीय एकता, अखंडता, आजादी और लोकतंत्र आदि सुनहरे शब्‍दों और नारों पर इतने मुग्‍ध रहते हैं कि हम कभी इनसे उपर उठ कर कुछ खरे-खरे सवाल कर ही नहीं पाते. इसका फल यह होता है कि हमारे आसपास क्‍या घट रहा है, इससे हम लगभग अनभिज्ञ रहते हैं और जब कुछ अनहोनी घटती है, तो कुछ सरल और प्राय: भ्रमित किस्‍म की सूचनाओं पर निर्भर और उनसे नियंत्रित होते हैं तथा जल्‍दी ही एक आसान सा निष्‍कर्ष भी निकाल लेते हैं.क्‍या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आखिर असम में उल्‍फा या एनडीएफबी जैसे संगठन क्‍यों इतने मजबूत हैं और क्‍यों कुछ भी कर पाने में सफल रहते हैं. असम वस्‍तुत: एक पिछडा प्रदेश है, जहां की दो करोड से अधिक की आबादी में से 15 लाख से अधिक बेरोजगार हैं और उनमें 3.1 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है, इसके उलट प्‍लेसमेंट 20.7 प्रतिशत की दर से घट रहा है. 2002 में वहां कुल शिक्षित बेरोजगारों की संख्‍या 10,45,940 थी, जिनमें से उस साल केवल 70 को रोजगार मिल पाया. असम में प्रति व्‍यक्ति औसत आय राष्‍ट्रीय औसत का 61 प्रतिशत है और बांग्‍लादेश का एक व्‍यक्ति असम के एक व्‍यक्ति से औसतन अधिक कमाता है. असम में साक्षरता की दर भी राष्‍ट्रीय औसत से कम है. वहां सिर्फ 45 प्रतिशत लोगों तक साफ पानी पहुंचता है. असम के सकल घरेलू उत्‍पाद में कृषि का योगदान 31 प्रतिशत है मगर हाल के वर्षों में पैदावार घटी है. असम का किसान 50 रुपए रोज से भी कमाता है. असम की लगभग 72 प्रतिशत विवाहित महिलाओं में खून की भयंकर कमी है, जो कि भारत में सबसे बदतर आंकडा है. वहां मलेरिया भी इसका एक कारण है.ये सिर्फ आंकडे नहीं है, ये इस बात के भी संकेतक है कि हमें असम की कितनी परवाह है. ऐसे में जबकि सरकार विफल होती दिखती है, वहां की जनता अपनी अधिकार मांगने के लिए उठ खडी. होती है मगर जब ऐसा होता है तो सरकार उनसे निपटने के लिए सेना का प्रयोग करती है.असम में 1985 से अफसपा, आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर एक्‍ट लागू है, जो वहां तैनात सेना को असीमित शक्ति दे देता है. इसका परिणाम यह हुआ कि सेना आम जनता का उत्‍पीडन करने लगी. सेना की कोई जवाबदेही नहीं है और इस एक्‍ट के कारण वहां की चुनी हुई सरकारें कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती. क्‍या हमें पता है कि पूरा राज्‍य लगभग आधी सदी से आपातकाल में जी रहा है? वहां के नागरिकों के मौलिक अधिकार रद्द कर दिए गए हैं, जो बिना औपचारिक रूप से आपातकाल घोषित किए रद्द नहीं किए जा सकते. असम को नजदीक से देखनेवाले यह बताते हैं कि किस तरह वहां इस कानून ने सैन्‍य के जरिए नागरिक प्रशासन को शक्तिहीन किया है. सेना द्वारा जनता का यह उत्‍पीडन हालिया शांति प्रक्रिया के दौरान भी जारी रहा, जबकि उल्‍फा की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई.
मगर बिहारियों की हत्‍या के मामले का एक और आयाम भी है. बिहारियों पर हमले अन्‍य राज्‍यों में भी होते रहे हैं. इसके आर्थिक कारण हैं. चाहे पंजाब हो या महाराष्‍ट्र या आंध्र हर जगह वैश्‍वीकरण की नीतियों के कारण आर्थिक संकट बढ रहा है. गरीबों और वंचितों के लिए अवसर और विकल्‍प लगातार कमते जा रहे हैं. क्‍या हम इस जगह पर प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद की जर्मनी के आर्थिक संकट और हिटलर के उदय को याद करने की इजाजत मांग सकते हैं?
असम में कई छोटे-छोटे विद्रोह होते रहे हैं. हिंसा भी होती रही है, मगर सेना की तरफ से होने वाली हिंसा ही बहस का मूल मुद्दा होना चाहिए. सरकार शांति प्रक्रिया के लिए कितनी गैर संजीदा है, इसका पता इससे भी लगता है कि राष्‍ट्रीय खेलों के बाद समय से अ‍बतक उग्रवादी संगठनों की तरफ से एक भी गोली नहीं चलाई गई है, जब कि सरकार ने अपनी तरफ से कार्रवाई जारी रखी है, शांति प्रक्रिया की तमाम मांगों के बावजूद. उल्‍फा जैसे संगठनों की कार्यशैली से ही स्‍पष्‍ट है कि वे बिना जनता के समर्थन के न तो टिक सकते हैं, न सफल हो सकते हैं. उन्‍हें सेना के बल पर मिटाना मुश्किल हैं. इसका समाधान है, असम की व्‍यापक जनता के लिए असम का विकास. क्‍या सरकार तैयार हैं?

-रेयाज-उल-हक

Saturday 22 August 2009

रेयाज भैया

रेयाज भैया को मैं काफी दिनों से जानता हूं. उनके साथ प्रभात खबर, पटना संस्‍करण में काम किया. वे एक सक्रिय और निष्‍पक्ष पत्रकार हैं. उनकी कविताओं में भारत की युवा पीढी का सबसे सार्थक प्रतिनिधित्‍व झलकता है. उनके बारे में ज्‍यादा बताना उचित नहीं लगता. उनकी कविता और लेख पढकर आप खुद निर्णय ले सकता है. पेश करता हूं उनकी कविताएं और आलेख.


क्रान्ति के लिए जली मशाल
क्रान्ति के लिए उठे क़दम !

भूख के विरुद्ध भात के लिए
रात के विरुद्ध प्रात के लिए
मेहनती ग़रीब जाति के लिए
हम लड़ेंगे, हमने ली कसम !

छिन रही हैं आदमी की रोटियाँ
बिक रही हैं आदमी की बोटियाँ

साक्षी

कुछ शब्‍द
उनके लिए
जो नंदीग्राम में मार दिए गए
कि मैं गवाह हूं उनकी मौत का

कि मैं गवाह हूं कि नई दिल्‍ली, वाशिंगटन
और जकार्ता की बदबू से भरे गुंडों ने
चलायीं गोलियां, निहत्‍थी भीड पर
अगली कतारों में खडी औरतों पर.

मैं गवाह हूं उस खून का
जो अपनी फसल
और पुरखों की हड्डी मिली अपनी जमीन
बचाने के लिए बहा.

मैं गवाह हूं उन चीखों का
जो निकलीं गोलियों के शोर
और राइटर्स बिल्डिंग के ठहाकों को
ध्‍वस्‍त करतीं.

मैं गवाह हूं
उस गुस्‍से का
जो दिखा
स्‍टालिनग्राद से भागे
और पश्चिम बंगाल में पनाह लिए
हिटलर के खिलाफ.

मैं गवाह हूं
अपने देश की भूख का
पहाड की चढाई पर खडे
दोपहर के गीतों में फूटते
गडेरियों के दर्द का
अपनी धरती के जख्‍मों का
और युद्ध की तैयारियों का.

पाकड पर आते हैं नए पत्‍ते
सुलंगियों की तरह
और होठों पर जमी बर्फ साफ होती है.

यह मार्च
जो बीत गया
आखिरी वसंत नहीं था
मैं गवाह हूं.


शामिल
(सु के लिए,जिसके लिए यह कविता लिखी गई और जिसने इसे संभव बनाया)


तुम कहोगी
कि मैं तो कभी आया नहीं तुम्‍हारे गांव
सलीके से लीपे तुम्‍हारे आंगन में बैठ
कंकडों मिला तुम्‍हारा भात खाने
लाल चींटियों की चटनी के साथ
तो भला कैसेट जानता हूं मैं तुम्‍हारा दर्द
जो मैं दूर बैठा लिख रहा हूं यह सब?

तुम हंसोगी
मैं यह भी जानता हूं

तुम जानो कि मैं कोई जादूगर नहीं
न तारों की भाषा पढनेवाला कोई ज्‍योतिषी
और रमल-इंद्रजाल का माहिर
और न ही पेशा है मेरा कविता लिखना
कि तुम्‍हारे बारे में ही लिख डाला, मन हुआ तो

मैं तुम्‍हें जानता हूं
बेहद नजदीक से
जैसे तुम्‍हारी कलाई में बंधा कपडा
पहचानता है तुम्‍हारी नब्‍ज की गति
और सामने का पेड
चीह्न लेता है तुम्‍हारी आंखों के आंसू

मैं वह हूं
जो चीह्नता है तुम्‍हारा दर्द
और पहचानता है तुम्‍हारी लडाई को
सही कहूं
तो शामिल है उन सबमें
जो तुम्‍हारे आंसुओं और तुम्‍हारे खून से बने हैं

दूर देश में बैठा मैं
एक शहर में
बिजली-बत्तियों की रोशनी में
पढा मैंने तुम्‍हारे बारे में
और उस गांव के बारे में
जिसमें तुम हो
और उस धरती के बारे में
जिसके नीचे तुम्‍हारे लिए
बोयी जा चुकी है बारूद और मौत

सुनाओ कि तुम्‍हारा गांव
अब बाघों के लिए चुन लिया गया है
तुमने सुना-देश को तुम्‍हारी नहीं
बाघ की जरूरत है
बाघ हैं बडे काम के जीव
वे रहेंगे
तो आएंगे दूर देश के सैलानी
डॉलर और पाउंड लाएंगे
देश का खजाना भरोगा इससे

सैलानी आएंगे
तो ठहरेंगे यहां
और बनेंगे इसके लिए सुंदर कमरे
रहेंगे उनमें सभ्‍य नौकर
सुसज्जित वर्दी में
आरामदेह कमरों के बीच
जहां न मच्‍छर, न सांप, न बिच्‍छू
बिजली की रोशनी जलेगी
और हवा रहेगी मिजाज के माफिक

...वे बाघ देखने आएंगे
और खुद बाघ बनना चाहेंगे
तुम्‍हारे गांव में कितनी लडकियां हैं सुगना
दस, बीस, पचास
शायद नाकाफी हैं उनके लिए
उनका मन इतने से नहीं भर सकेगा

जो बाघ देखने आते हैं
उनके पास बडा पैसा होता है
वे खरीद सकते हैं कुछ भी
जैसे खरीद ली है उन्‍होंने
तुम्‍हारी लडकियां
तुम्‍हारा लोहा
तुम्‍हारी जमीनें
तुम्‍हारा गांव
सरकार
...वह जमादार
जो आकर चौथी बार धमका गया तुम्‍हें
वह इसी बिकी हुई सरकार का
बिका हुआ नौकर है
घिनौना गाखरू
गंदा जानवर
ठीक किया जो उसकी पीठ पर
थूक दिया तुमने

आएंगे बाघ देखने गाडियों से
चौडी सडकों पर
और सडकें तुम्‍हारे बाप-दादों की
जमीन तुमसे छीन कर बनाएगी
और तुम्‍हारी पीठ पर
लात मार कर
खदेड देगी सरकार तुम्‍हें
यह
तुम भी जानती हो

पर तुम नहीं जानतीं
दूसरी तरु है बैलाडिला
सबसे सुंदर लोहा
जिसे लाद कर
ले जाती है लोहे की ट्रेन
जापानी मालिकों के लिए
अपना लोहा
अपने लोहे की ट्रेन
अपनी मेहनत
और उस पर मालिकाना जापान का

लेकिन तुम यह जानती हो
कि लोहा लेकर गई ट्रेन
जब लौटती है
तो लाती है बंदूकें
और लोहे के बूट पहने सिपाही
ताकि वे खामोश रहें
जिनकी जगह
बाघ की जरूरत है सरकार को

सुगना, तुमने सचमुच हिसाब
नहीं पढा
मगर फिर भी तुम्‍हें इसके लिए
हिसाब जानने की जरूरत नहीं पडी कि
सारा लोहा तो ले जाते हैं जापान के मालिक
फिर लोहे की बंदूक अपनी सरकार के पास कैसे
लोहे की ट्रेन अपनी सरकार के पास कैसे
लोके बूट अपनी सरकार के पास कैसे

जो नहीं हुअ अब तक
जो न देखा-न सुनाओ कभी
ऐसा हो रहा है
और तुम अचक्‍की हो
कि लडकियां सचमुच गायब हो रही हैं
कि लडके दुबलाते जा रहे हैं
कि भैंसों को जाने कौन-सा रोग लग गया है
कि पानी अब नदी में आता ही नहीं
कि शंखिनी ओर ढाकिनी का पानी
हो गया है भूरा
और बसाता है, जैसे लोहा
और लोग पीते हैं
तो मर जाते हैं

तुम्‍हारी नदी
तुम्‍हारी धरती
तुम्‍हारा जंगल
और राज करेंगे
बाघ को देखने-दिखानेवाले
दिल्‍ली–लंदन में बैठे लोग

ये बाघ वाकई बडे काम के जीव हैं
कि उनका नाम दर्ज है संविधान तक में
ओर तुम्‍हारा कहीं नहीं
उस फेहरिस्‍त में भी नहीं
जो उजडनेवाले इस गांव के बाशिंदों की है.

बाघ भरते हैं खजाना देश का
तुम क्‍या भरती हो देश के खजाने में सुगना
उल्‍टे जन्‍म देती हो ऐसे बच्‍चे
जो साहबों के सपने में
खौफ की तरह आते हैं- बाघ बन कर

सांझ ढल रही है तुम्‍हारी टाटी में
और मैं जानता हूं
कि मैं तुम्‍हारे पास आ रहा हूं
केवल आज भर के लिए नहीं
हमेशा के लिए
तुम्‍हारे आंसुओं और खून से बने
दूसरे सभी लोगों की तरह
उनमें से एक

हम जानते हैं
कि हम खुशी हैं
और मुस्‍कुराहट हैं
और सबेरा हैं
हम दीवार के उस पार का वह विस्‍तार हैं
जो इस सांझ के बाद उगेगा

हम लडेंगे
हम इसलिए लडेंगे कि
तुम्‍हारे लिए
एक नया संविधान बन सकें
जिसमें बाघों का नहीं
तुम्‍हारा नाम होगा, तुम्‍हारा अपना नाम
और हर उस आदमी का नाम
जो तुम्‍हारे आंसुओं
और तुम्‍हारे खून में से था

जिसने तुम्‍हें बनाया
और जिसे तुमने बनाया
सारी दुनिया के आंसुओं और खून से बने
वे सारे लोग होंगे
अपने-अपने नामों के साथ
तुम्‍हारे संविधान में

जो जिये और फफूंद लगी रोटी की तरह
फेंक दिये गये, वे भी
और जिन्‍होंने आरे की तरह
काट डाला रात का अंधेरा
और निकाल लाये सूरज

जो लडे और मारे गये
जो जगे रहे और जिन्‍होंने सपने देखे
उस सबके नाम के साथ
तुम्‍हारे गांव का नाम
और तुम्‍हारा आंगन
तुम्‍हारी भैंस
और तुम्‍हारे खेत, जंगल
पंगडंडी,
नदी की ओट का वह पत्‍थर
जो तुम्‍हारे नहाने की जगह था
और तेंदू के पेड की वह जड
जिस पर बैठ कर तुम गुनगुनाती थीं कभी
वे सब उस किताब में होंगे एक दिन
तुम्‍हारे हाथों में

तुम्‍हारे आंसू
तुम्‍हाना खून
तुम्‍हारा लोहा
और तुम्‍हारा प्‍यार

... हम यह सब करेंगे
वादा रहा.

(शंखिनी और ढाकिनी : छत्‍तीसगढ की दो नदियां
बैलाडिला : छत्‍तीसगढ की एक जगह, जहां लोहे की खाने हैं और जहां से निकला लोहा उच्‍च गुणवत्‍ता का माना जाता है. दो दशक से भी अधिक समय से यह लोहा बहुत कम कीमत पर जापानी खरीद ले जा रहे हैं.)


जारी...

Wednesday 5 August 2009

23 जुलाई : मणिपुर के एक और खूनी दिन

उस मासूम बच्चे को क्या पता था कि वह दिन (22 जुलाई 09) उसका अंतिम दिन और वह अपनी मां से हमेशा-हमेशा के लिए बिछड जाएगा. इस काले दिन ने उस मासूम को अनाथ बना दिया, जिसकी कमी उसे जिंदगी भर खलती रहेगी.

घटना स्‍थल से रवीना को उठाती हुई पुलिस
22 जुलाई की सुबह 10.30 बजे इंफाल शहर के बीटी रोड में कमांडो द्वारा फ्रिस्किंग किया जा रहा था. जाहिर है कि इंफाल राजधानी है तो सेक्युीरिटी भी जबरदस्तव होंगी. हाल ही में एसेम्बेली की बैठक में मणिपुर के सीएम ओक्रम इबोबी ने आदेश पारित करने के अनुसार इंफाल शहर में बडी संख्याि में सेक्युइरिटी तैनात की जाए. इसलिए राहगीरों से छानबीन की जा रही थी. उरिपोक की तरफ से एक संदिग्‍ध आदमी उसी तरफ आ रहा था, जिस तरफ कमांडो द्वारा चेकिंग की जा रही थी. उसे रोकने पर बंदूक निकाल कर उसने गोली चलाई और गोली चलाते हुए भागने लगा. जवाबी कार्रवाई में मणिपुर कमांडो ने भी गोली चलानी शुरू कर दी. और उसे मार गिराया. इस गोली बारी में पांच और लोग घायल हो गए. दो को गंभीर चोटें आईं. उसी वक्त अपने तीन साल के बेटे के साथ बाजार में खरीदारी करने आई एक औरत अपने बेटे के सामने जान गंवा बैठी. वह गर्भवती थी. उसका नाम थोकचोम रबीना था, उम्र 23 सा‍ल. उस मासूम जान को क्यां पता होगा कि उसका वह दिन अपनी मां के साथ अंतिम दिन है.

घायलों को अस्‍पताल में ले जाते हुए परिजन

बिलखते परिजन

अपनी मां की तस्‍वीर पर फुल अर्पित करता बच्‍चा

मृतक रवीना

असंतोष जनता किसको जिम्‍मेदारी ठहरायेगी. मुख्‍यमंत्री की इफीजि जला कर प्रदर्शन करती हुई


निर्दोष लोगों को मारने में खाली यही होता है जो प्रदर्शन सडक जाम और इफीजि जलाना उसका नतीजा कुछ नहीं होता

इस घटना के कुछ दिन बाद तहलका में इस घटना को लेकर तेरेसा रहमान की स्‍टोरी आई 12 फोटो के साथ. उस स्‍टोरी और फोटो के छपने के बाद पूरे प्रदेश की जनता जल उठी. प्रदेश सरकार के बयान झुठे निकले. सरकार की नींद उड गई. मामला शांत करने को तैयार हो गए थे मगर घटना की पोल खोलने के बाद जनता शांत नहीं हो सकी. तहलका में छपी स्‍टोरी और तस्‍वीर हैं- तहलका के वेब पेज हैं- http://www.tehelka.com/story_main42.asp?filename=Ne080809murder_in.asp








तलका में ये स्‍टोरी आने से पहले लोग शांत था और समझता था कि वाकई में एनकाउंटर हुआ था. मगर तहलका ने जब घटना की पोल खोली तब प्रदेश की जनता हत्‍यारों को सजा दिलवाने के लिए सडक पर उतरी. फोटो से साफ साफ दिखाया गया कि एनकाउंटर नहीं हुआ जानबुझ कर गोली चलाई थी.




उस घटना को एक कार्टूनिस्‍ट ने इस तरह पेश किए


इस तरह की घटना मणिपुर में आम है. हर दिन कहीं न कहीं घटती रहती है. कई मासूम और निर्दोष जानें बिना वजह की चली जाती हैं. संदिग्धक एक आदमी को मारने के लिए कई निर्दोष लोगों की जान गंवानी पडी हैं. यह सही नहीं है कि एक के लिए भीड में अंधाधुंद गोली चलाना और उसका नतीजा निर्दोष जानों को भुगतना. किसको शिकायत करोगे. जिससे शिकायत करनी थी वो तो गूंगा और बहरा की तरह आंखों में पट्टी बांध कर बैठे हैं. किसी की शिकायत सुनते नहीं है. दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही मणिपुर की हालत पर काबू पाने के लिए शासक वर्ग न कोई समझने की कोशिश करते और नही पहल. पिछले 20 सालों से मणिपुर में अशांति फैली हुई है. आतंकवादियों को कुचलने के नाम पर कई निर्दोषों की जानें चली गईं. किसी के मां, बेटे, पिता, भाई-बहन आदि मारे गए. इतनी बेरहम झेलने के बाद भी आज तक किसी भी संस्थाु या कोई भी आदमी आगे नहीं आए. चुपचाप अत्याजचार झेलता रहा. जो आवाज उठाना शुरू हुई, वह भी आत्मआहत्या के आरोप में जेल में समय काट रही है. आखिर किसकी जिम्मेदारी है.
उस घटना को लेकर मुख्यहमंत्री ओ इबोबी कहते हैं कि मारने के सिवाय कोई चारा नहीं है. यह एक अभिभावक और नेतृत्वह की राय नहीं है. शायद उनको पता नहीं है कि मारने से आतंकवादी जड से मिटा नहीं पाएंगे. उसके लिए पहल करना होगा. आतंकवादी का जड को समझना होगा और उसको दूर करने की योजना बनानी होगी. जब तक कारण को नहीं समझेंगे और निदान नहीं करेंगे तब तक आतंकवाद मिटाना मुश्किल है. उनको आठ-दस सालों से माहौल देखते आ रहे हैं. वे मुख्यामंत्री हैं. इसपर सरकार क्यां करना चाहिए, उनको समझना चाहिए. मासुमों की चीख कब तक सुनते रहेंगे. यह जनता को उपेक्षा का एक नमुना है. शोकाकुल परिवार को तो सांत्वचना देंगे और मरहम लगाएंगे. इससे घाव भरेगा. लेकिन कब तक सांत्वलना देते रहेंगे. एक दिन तो पूरे प्रदेश से एक ही आवाज निकलेगी – हमें आजादी चाहिए.

मणिपुर एसेम्बतली की बैठक में मुख्यनमंत्री ने आतंकवादी को लेकर इस तरह भाषण पेश किया-
इस राज्य‍ में असंख्यक आतंकवादियों ने पैसे के लिए किए जा रहे हत्या और हमले से आम जनता बर्दाश्तस नहीं कर पा रही है. आज इंफाल शहर में जो घटना घटी है वह एक दुखद है. इस राज्यद में जो भी आतंकवादी गुट हैं सभी मणिपुरी हैं. सरकार उनको मारना नहीं चाहती है. मगर अब जो भी घटना घट रही है वह सब बर्दाश्तै के बाहर है. उन्हों ने आगे कहा कि इस राज्यद के सात विधानसभा क्षेत्र (एसेम्बाली सेग्मेंैट 7) से अफसपा हटाना केंद्र की पसंद के विपरीत था. अफसपा हटाने के बाद इंफाल शहर में हो रही इस तरह की घटना को देख कर केंद्र सरकार का मानना है कि राज्यट सरकार आतंकवादियों को प्रोत्सा हन दे रही है. केंद्र सरकार नाराज जताती है कि राज्या सरकार आतंकवादियों को बचा रही है. इसके साथ इस राज्य. के आतंकवादियों द्वारा पैसे की मांग करना, धमकी देना और लूटपाट की घटनाओं से केंद्र सरकार भी इस मसले में गंभीर नहीं है. आतंकवादी समस्याट को खात्म् के लिए बातचीत करने को कहने पर मजाकीय लहजे में कहा कि कौन सा आतंकवादी गुट से बातचीत करनी है. केंद्र सरकार ने कहा कि राज्यन सरकार इस विषय में बहुत ढीला-ढाला डील कर रही है. कोई भी आतंकवादी गुट जब तक पैसा कमाते रहेंगे तब तक बातचीत करने को तैयार नहीं होंगे. केंद्र सरकार का विश्वा स है कि तब उन लोगों को बातचीत करने को तैयार होंगे जब यातना देंगे. अब तो देखना यह है कि आतंकवादी शासन करेंगे या सरकार.

Monday 3 August 2009

मीर, मैं तुम्‍हारे सिरहाने बोल रहा हूं



उन तमाम बच्चों के लिए, जो अमरीकी आर्थिक प्रतिबंध के कारण मारे गए)

तुम्हारे दु:खों को मैं जानता हूं
तुम्हारे आंसू मेरे चेहरे को भींगो रहे हैं
मैं जानता हूं
तुम अभी-अभी रोते-रोते सोये हो
फिर भी
मैं तुम्हारे सिरहाने बैठ कर बोल रहा हूं, मीर!
बहुत उदास है रात,पसरा है मातमी सन्नाटा
कहीं से कोई आवाज नहीं,कोई पुकार भी नहीं
मैं बताना चाहता हूं
कल तक जहां घास के मैदान थे
अब वहां कब्रें हैं, (जहां सोये हैं बच्चे
जो कभी नहीं जागेंगे
वे इराकी हैं,फिलिस्ती नी हैं, सर्बियाई हैं, अफगानी हैं
मीर उन बच्चोंम की कब्रें उदास सी निर्जन पडी हैं
उन पर घास उग आए हैं
उन पर किसी ने फूलों के गुच्छे नहीं रखे
कहीं कोई मोमबत्ती नहीं जल रही
प्रार्थना का कोई स्विर नहीं सुनाई पड रहा है
कहीं उनके लिए एक मिनट का मौन नहीं रखा गया
उनके लिए मर्सिया नहीं पढा गया
उन्होंथने जो जीवन खोया
उसकी कोई पहचान बाकी नहीं है.
मीर! वे मरे नहीं, मारे गए.
उन्हेंथ उनकी मां की गोद से दूर कर दिया गया
उनकी धरती से दूर कर दिया
उनकी हवा से दूर कर दिया गया
उनकी रोटियां छीन ली गईं
दवाइयां छीन ली गईं
उनके खिलौने,उनकी धरती, उनकी हवा पर
प्रतिबंध लगाए गए.
मीर,आज जो लाखों बच्चे कब्रों में सोये पडे हैं
कल तक, उनका अपना आकाश था, अपने गीत थे,
अपना शहर था
घास के मैदान थे, घाटियां थीं, उनके घर थे, चूल्हें थे
उनकी नींद थी और उनके सपने थे
इस उदास रात में जागो, मीर!
देखो बच्चोंा की कब्रें हैं, जो दिख रही हैं
नहीं दिख रहे हैं तो वे जो इनके हत्याहरे हैं
जो प्रतिबंध लगाते हैं और मौत देते हैं.
मीर कितनी रातें कितने गम कितनी बातें बीत गईं
उनके दर्द की दास्तां कहते-कहते, बादल भी रो गए
भले ही उनकी मौत का जिक्र
शहंशाहों की गलियों में न हो
लेकिन अपने आंसुओं से तर, चेहरे के साथ जागो, मीर!
और एक दीप उन बच्चोंट की कब्रों पर जला दो
जो अभी-अभी रोते-रोते सो गए हैं.

-सत्येंद्र कुमार
सौजन्य - जन-ज्वार