यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday 26 September 2009

हम तो हैं परदेस में

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चांद



जिन आँखों में काजल बनकर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक, कतरा होगा चांद



रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चांद



चांद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद

-राही मासूम रज़ा

Friday 11 September 2009

नगा शांति वार्ता अब केंद्र से सीधे होगी


पिछले 10 सालों से केंद्र सरकार और शीर्ष नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के बीच चली आ रही युद्ध विराम की वार्ता अब सीधे तौर पर होगी. वार्ता के प्रतिनिधि के रूप में पूर्व भारतीय गृह सचिव के पद्मनाभैया का 1999 के 28 जुलाई को चयन किया गया था. उनका कार्यकाल समाप्त करने का केंद्र सरकार ने फैसला कर लिया है. भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में पद्मनाभैया पिछले 10 साल से कई भागों में वार्ता करते आ रहे थे. अब सीधी बातचीत करने के लिए गृह मंत्रालय के सीनियर ऑफिसिएल ने घोषित किया गया. युद्ध विराम के समझौते 1997 के अगस्त से शुरू हुआ था. इस वार्ता के सबसे पहला मध्यस्थ मिजोरम के पूर्व राज्यपाल स्वाराज कौशल था. उन्होंने 1999 के जुलाई तक यह कार्य किया था.
नगा बागी काफी दिनों से वृहद नगालैंड नगालिम के तहत नगा बहुल इलाकों को एक प्रशासन तंत्र में शामिल करने की मांग पिछले कई सालों से करते रहे हैं. यानी उन्हें नगालिम में नगालैंड के अलावा मणिपुर के चार जिले, असम के दो पहाड़ी जिले और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के दो जिले भी चाहिए. यूपीए सरकार ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत इन राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने का वादा किया है. असम के मुख्यमंत्री ने तो सीधे तौर पर कहा कि इस तरह की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, जबकि मुख्य विपक्षी दल असम गण परिषद ने कांग्रेस पर यूपीए सरकार को बचाने के लिए असम का ही सौदा करने का आरोप लगाया है. असम, अरुणाचल और मणिपुर की सरकारें और वहां की प्रदेश कांग्रेस समिति इसका विरोध करती रही है. नगालैंड में सोलह नगा जनजातियां हैं और प्रत्येक की अपनी-अपनी बोली और भिन्न पहचान है. प्रत्येक नगा जनजाति का भिन्न नाम है और अपनी पहचान के प्रति सजग है.
पिछले कुछ महीनों में मणिपुर के उख्रुल जिले के सिरुई और नगालैंड के फुटचेरो में एनएससीएन (आईएम) और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़प को लेकर होम मिनिस्टर पी चिदंबरम ने कहा कि भविष्य में अगर वार्ता करनी है तो भारतीय संविधान के दायरे में होनी चाहिए. उन्हें पहले हिंसा का रास्ता छोड़ना होगा. इसलिए दोनों पक्षों को युद्धविराम निभाना ही होगा. एनएससीएन (आईएम) के नेता इसाक मुइवा का वक्तव्य 19 मार्च 09 को नगालैंड के प्रमुख अख़बारों में छपा था कि चिदंबरम नगाओं और इस वार्ता के बारे में कुछ भी जान पा रहे हैं. इसलिए केंद्र सरकार उनकी गलती को सुधारना चाहिए. मुइवा ने कहा कि केंद्र का यह रुख़ अगर बरकरार रहा तो इस वार्ता में कई संकटें आएंगी.



ऐसे में इस वार्ता को लेकर मणिपुर और नगालैंड की जनता और हर संगठन तरह-तरह की मांग कर रहे. नगालैंड के कुकी आदिवासियों ने चेतावनी दी कि जिस क्षेत्र पर उनका समुदाय निवास करता है, उस ज़मीन पर एनएससीएन (आईएम) के नेताओं के साथ सहमति बनती है, तो वे खूनी संघर्ष पर उतर आएंगे. शीर्ष कुकी नेता सतकोखारी चोनगोलीई ने कहा कि हम अपनी इंच भर ज़मीन भी किसी को नहीं देंगे. कुकी आदिवासी समुदाय नगालैंड, असम, त्रिपुरा, मणिपुर और मिजोरम राज्यों में निवास करता है. इनका कहना है कि एनएससीएन (आईएम) ने कुकी समुदाय के हजारों लोगों को गुरिल्ला लड़ाई में मौत के घाट उतार दिया है. वे नहीं चाहते कि उनके समुदाय के दुश्मनों को उनकी जमीन पर अधिकार मिले.
एनएससीएन (आईएम) नेता वी एस अतम ने कहा कि नगा लोगों को विद्रोहियों के रूप में दिखाया गया है. जबकि वे अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए सरकार से संघर्ष कर रहे हैं. इस अलगाव की मुख्य वजह, इस क्षेत्र का सामाजिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग रह जाना है. अतम के मुताबिक़ सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और जातीय रूप से हम भारतीयों से भिन्न हैं. यदि शांति वार्ता असफल होती है तो एनएससीएन (आईएम) के जवान भारतीय सेना से लोहा लेने के लिए तैयार हैं.
13 जनवरी 2001 को केंद्र सरकार और एनएससीएन के बीच हुए सीज़ फायर ग्राउंड रूल समझौते को 6 मार्च 09 को लागू किया गया. जिसके तहत,
-यह ग्राउंड रूल केवल नगालैंड राज्य में ही चालू होगा.
-यह रूल चलाने का दायित्व केंद्र सरकार का होगा.
-एक दूसरे के ख़िला़फ कार्रवाई बंद करना और अन्य आतंकवादी गुटों को सहायता न देना.
-एनएससीएन (आईएम) के कार्यकर्ता सीएफसीवी में बताए बिना अपने कैंप से बाहर नहीं जाएंगे, न ही जबरन चंदा लेंगे और न ही नए कार्यकर्ताओं की भर्ती करेंगे.
-आर्मी, पैरा-मिलिट्री फोर्स और पुलिस रक्षा दल या पेट्रोलिंग के लिए अवरूद्ध पैदा नहीं करना.
लेकिन इसके साथ ही यह सवाल अभी बरक़रार है कि क्या इस समझौते से लंबे समय से चली आ रही नगा समस्या का शांतिपूर्ण समाधान हो पाएगा? क्या दूसरे नगा संगठन एनएससीएन-(के) इस समझौते को स्वीकार करेंगे. जो एनएससीएन-आईएम गुट के साथ लगातार खूनी संघर्ष में शामिल रहा है. इससे यह सा़फ है कि यदि केंद्र सरकार और एनएससीएन के बीच भले ही यह समझौता हो जाए, लेकिन जबतक खपलांग गुट इस पर सहमत नहीं होता, यह प्रयास सफल होगा, कहना मुश्किल है. अब देखना यह है कि केंद्र की एनएससीएन (आईएम) से सीधी वार्ता कहां तक सफल होती है.

Monday 7 September 2009

शर्मिला पर लिखी किताब का लोकार्पण


पिछले 05 सितंबर 2009 को आर्म्‍ड फोर्सेस स्‍पेशल पावर एक्‍ट -1958 (अफसपा) के विरोध में आमरण अनशन पर बैठ रही मणिपुर की बाला इरोम शर्मिला चनु पर लिखी किताब बर्निंग ब्राइट : इरोम शर्मिला एंड द स्‍ट्रग्‍गल फॉर पीच इन मणिपुर का लोकार्पण केंद्र ग्रामीण विकास मंत्री अगाथा संगमा ने इंडिया हेबिटेट सेंटर के गुलमोहर हॉल में किया गया. पेंग्विन बुक्‍स द्वारा प्रकाशित इस किताब की लेखिका दीप्ति प्रिया महरोत्रा है. अंग्रेजी की यह किताब शर्मिला के साथ-साथ मणिपुर के सांस्‍कृति और वहां के प्रतिरोधी को भी टटोलती है.
इस कार्यक्रम में अगाथा संगमा के अलावा बाब्‍लू लोयतोंगबम, डायरेक्‍टर ह्यूमन रायट्स एलर्ट, बिनालक्ष्‍मी नेप्रम, सेक्रेटरी जेनरल कंट्रोल ऑफ आर्म्‍ड फाउंडेशन ऑफ इंडिया और जीवन रेड्डी कमेटी के सदस्‍य संजय हजारिका आदि उपस्थित थे. इस कार्यक्रम की मुख्‍य अतिथि अगाथा संगमा ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि यह मेरे लिए बहुत ही महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम है. शर्मिला पर लिखी यह किताब पूरे मणिपुर का चेहरा है, जो वहां की जिंदगी को दर्शाता है. उन्‍होंने कहा कि मैं इस मुद्दे पर हर संभव प्रयास कर रही हूं और करती ररूंगी. उल्‍लेखनी है अगाथा पिछले 3 महीने पहले इंफाल में एनसीपी के स्‍थापना दिवस पर गई हुई थी. उस दरमियान वह शर्मिला से मिली और वहां की जनता से वादा किया कि इस काला एक्‍ट को हटाने में हर संभव प्रयास करूंगी. वहां से लौटकर इस मुद्दे पर उन्‍होंने प्रधानमंत्री से भी बात की. इससे वहां के लोगों में आशा का संचार हुआ. लगा कि यह एक्‍ट अब हट जायेगा. कई सालों से इस मामले को लेकर पूछने वाला कोई नेता हो या शासक वर्ग नहीं था.
कार्यक्रम में इस किताब की लेखिका दीप्ति ने शर्मिला के बारे में बताया. जब शर्मिला 2007 में दिल्‍ली आई हुई थी, तब राममनोहर लोहिया अस्‍पताल में वह उनसे जाकर मिली थी. उनका हाल देख कर वह इतना विचलित हुई कि वे साख्‍ता गुस्‍से में उनके मुंह से निकला कि मैं आप पर किताब लिखूंगी. उससे पहले उन्‍होंने अपने इस निर्णय के बारे में पता नहीं था. लेखिका ने मणिपुर की इमाओं (मशाल लेकर प्रदर्शन करती मणिपुर की महिलाएं) की संघर्षपूर्ण कहानी और शर्मिला की तस्‍वीर, उसकी परिवार की तस्‍वीर भी इस कार्यक्रम में एक पावर प्रेजेंटेशन के द्वारा दिखाया.
बाब्‍लू लोयतोंगबम, डायरेक्‍टर ह्यूमन राइट्स एलर्ट ने शर्मिला की संघर्षपूर्ण कहानी भी श्रोताओं के सामने रखी. शर्मिला 2000 के 2 नवंबर से भूख हडताल पर बैठी है. शुरूआती दौर में उनको आत्‍महत्‍या के आरोप में पकडा गया और जेल में धारा 309 लगा कर डाल दिया गया था. उस घटना के चश्‍मदीद बाब्‍लू ने जब इस घटना के बारे में लोगों को बताया, तो पूरे हॉल में सन्‍नाटा छा गया. सभी लोग इस बर्बरपूर्ण कार्रवाई के बारे में सुन कर सकते के हालत में आ गए. बिनालक्ष्‍मी नेप्रम, सेक्रेटरी जेनरल कंट्रोल ऑफ आर्म्‍ड फाउंडेशन ऑफ इंडिया एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ एक मणिपुरी बाला है, जो शर्मिला के बहुत करीब रही है और मणिपुरियों के लिए संघर्ष करती शर्मिला की त्रासदी को शिद्दत से महसूस किया है. शर्मिला और मणिपुरी किन-किन यातनाओं से गुजरे और गुजर रहे हैं, इससे उन्‍होंने दर्दपूर्ण रूप से सभा को रू-ब-रू करवाए. उन्‍होंने कहा कि यह एक्‍ट (अफसपा) मानवता के विरोधी है, जो अमन पसंद लोगों की शांति को भंग करता है.
जीवन रेड्डी कमेटी के सदस्‍य संजय हजारिका ने कहा कि यह एक्‍ट हटना ही चाहिए, क्‍योंकि वहां के हर आदमी, हर संगठन इस एक्‍ट को रीपिल करने की राय देते रहे हैं. यह आवाम की आवाज है. आगे कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी अपनी भागीदारी निभाई.


लेखक के साथ शर्मिला इरोम

यह किताब मणिपुरियों की आवाज बन चुकी शर्मिला इरोम की संघर्ष गाथा की जीवंत दस्‍तावेज है. गांधीवादी तरीके से अपने संघर्ष को आगे बढा रही शर्मिला के कुछ दुलर्भ तस्‍वीर भी इस पुस्‍तक में दिए गए है और यह बताया गया है कि कैसे अफसपा मणिपुरियों के लिए एक काला कानून है, जिसे जबरन उनपर थोप दिया गया है और इसे हटाया जाना चाहिए. नहीं तो मणिपुर के इस कानून का आड लेकर सुरक्षा प्रहरियों द्वारा किए जा रहे अत्‍याचार के खिलाफ एक बडा मुहिम खडा हो सकता है. इतना ही नहीं लेखिका का यह भी मानना है कि यदि जल्‍दी ही इस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया, तो मणिपुर अलगाव की राह पर भी जा सकता है. इस काले कानून की आड लेकर अलगाववादी तत्‍व मणिपुर की भोली जनता को भडका कर सरकार के खिलाफ कर सकते हैं, जो संघीय भारत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. लेखिका का यह सार्थक प्रयास है कि पूर्वोत्‍तर की एक साधारण महिला पर उसने प्रेम किया और उसको किताब के रूप में पेश किया.

दीप्ति प्रिया महरोत्रा

दीप्ति प्रिया महरोत्रा दिल्‍ली में अपनी बेटी के साथ रहती है. उन्‍होंने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में राजनीतिक शास्‍त्र पर पीएचडी की. साथ ही उन्होंने इस पर स्वतंत्र अनुसंधान भी की, जिसके लिए भारत फाउंडेशन, मैकआर्थर फाउंडेशन और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद द्वारा फैलोशिप से नवाजा गया.
इसके अलावा नारीवादी विचारों सहित उनकी दिलचस्पी शिक्षा, रंगमंच, जन-आंदोलन में भी काफी है. उन्‍होंने कई सामाजिक संगठनों में कार्य और रिसर्च भी किया. फिलहाल वे दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज में अध्‍यापिका हैं. वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखती रही हैं. उनकी तीन किताबें गुलाब बाई –द क्विन ऑफ नाटंकी थिएटर, होम ट्रूट्स – स्‍टोरिस ऑफ सिंग्‍ल मडर्स एंड वेस्‍टर्न फिलोसफी और इंडियन फेमिनिज्‍म –फ्रोम प्‍लेटोस एकेडमी टू द स्‍ट्रीट्स ऑफ दिल्‍ली पेंग्विन बुक्‍स द्वारा प्रकाशित भी हो चुकी हैं.