यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday 21 June 2008

कारवाँ गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,
वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़ेखड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पातपात झर गये कि शाख़शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये,
और हम झुकेझुके,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कलीकली कि घुट गयी गलीगली,
और हम लुटेलुटे,
वक्त से पिटेपिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखरबिखर,
और हम डरेडरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरनचरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयननयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तारतार हुई चूनरी,
और हम अजानसे,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
- गोपालदास नीरज

Wednesday 4 June 2008

गुरुजी की चिट्ठियां

शंकर मोहन झा इन दिनों हिंदी विद्यापीठ देवघर के प्राचार्य हैं। उन्होंने मुझे ईमानदारी से हिंदी सिखाई थी। उनसे हिंदी सिखने की प्रेरणा मिली थी। जब मैं पंजाब में था, तब उन्होंने मुझे चिट्ठियां भेजी थीं। उसका एक हिस्सा आप लोगों के सामने प्रस्तुत करता हूं।
पहला दिनांक 2-11-2007

परम प्रिय बिजेन,
तुम्हारी 6.10 की चिट्ठी 11.10.07 को मिल गई. तुम्हारी चिट्ठी पाकर बड़ी प्रसन्नता होती है. तुने एक फोन भी नहीं किया है। बूथ से तो फोन करो। मैडम मुंबई से आ गई है। लाला (मेरा बड़ा पुत्र) गंगोत्री से पैदल जल लेकर आ रहा है। परसों चला है। पता नहीं, लुधियाना होकर रास्ता है या कहीं और से।अमरजीत एवं रोजी के साथ 12.11 की रात मुंबई जाना है। 17.11
को भाषण प्रतियोगिता है। 19.11 को वापसी है। बनारस होते हुए।
गिरिजेश कहां पर है। यहां का समाचार ठीक है। विद्यापीठ की
खेल-कूद प्रतियोगिता संपन्न हो गई है। समापन-समारोह होना
बाकी है। तुमने दूसरा पत्र फिर लिखा ही नहीं। प्रति सप्ताह
एक पोस्टकार्ड डालने का नियम बना लो। यहां केवल कुमार
राहुल रह गए हैं। निशिरंजन ठाकुर भी यहां से चले गए। जाने के
पूर्व मुझसे मिले भी नहीं। पता नहीं, कैसी परिस्थितियां थी।
पत्र हमेशा दो।
तुम्हारी याद में

शंकर मोहन झा


दूसरा दिनांक 23.11.07


प्रिय बिजेन,

6।10।07 के बाद का एक पत्र भी नहीं मिला है। शुभाशीर्वाद।
कल मुंबई से बनारस होते हुए वापस आया। अमरजीत वहां भाषण
प्रतियोगिता में प्रथम एवं नियांग द्वितीय होकर लौटे। बनारस
में दो दिन रहे। गंगा-स्नान किया। गंगा की भव्य आरती देखी।
ज्ञानेंद्रपति जी वहीं रहते हैं। कभी देवघर लौटो तो बनारस में
भी आते या जाते एक शाम अवश्य बिताओ। कल पटना में रहूंगा। मजकूर को मालूम है। गिरिजेश का
एसएमएस आया था। पत्र देगा लिखा है। कल मैं संपर्क करने
की कोशिश करता हूं। वहां तो ठंड खूब पड़ रही है। यहां तो ठंड
शुरू ही हुई है। तुम्हारा शुरू का एक ही पत्र मिला है। पत्र
हमेशा दो। पत्र न भी मिले तब भी दो।
तुम्हारा

शंकर मोहन झा

तीसरा हिंदी विद्यापीठ दिनांक 8।12। 07

प्रिय बिजेन,

शुभाशीर्वाद। तुम्हारा 11 नवंबर का पत्र चार दिन पूर्व मिला।
पत्र वहां से बड़ी देर में आ रहा है। तुमने बूथ से भी कभी फोन
नहीं किया? अमरजित प्रथम रोजी द्वितीय। मुंबई में बिटिया है।
वहां की यात्रा ठीक ठाक रही।वहां से लौट कर 15 दिन पूर्व एक
पत्र दिया है। वह शायद अब तक मिल गया हो। मैडम वहां से
लौट आई हैं। मेरा बड़ा पुत्र गंगोत्री से पैदल जल लेकर बाबा
भोलेनाथ को अर्पित करने चला है। अभी अयोध्या तक पहुंचा है।
एक माह तक में यहां आ जाने की संभावना है। लालम लोग 12
की सुबह खूब जल्दी बड़े दिन की छुट्टी में निकलेंगे। द्वारी जी
दिल्ली-चंडीगढ़ में ईलाज में थे। देवघर आए कल। परसों शायद
महाविद्यालय आएं। खूब आगे बढ़ो। वहां से अंबाला कितनी दूर
है? कटरा-वैष्णो देवी की दूरी?
तुम्हारा

शंकर मोहन झा

चौथा दिनांक 12।12।07 देवघर


परमप्रिय बिजेन,

शुभाशीष। तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा हमेशा रहती है। 24-25
नंबर को पटना में था। राजेंद्रनगर एवं अशोक सिनेमा तक भी
गया था। राजकमल प्रकाशन में महुआ मांजी का उपन्यास 'मैं
बोरिशाइल्ला' लिया। इस पुस्तक को अभी ताराबाबू पढ़ रहे हैं।
नचिकेता जी से तुम्हारे विषय में बात भी हुई। लड़के लोग बड़े
दिन की छुट्टी में कल रात तक चले गए। मैडम मुंबई से कब
की लौटीं। अमरजित एवं रोजी को मुंबई में पहला एवं दूसरा
स्थान मिला। गत वर्ष मिहिजात एवं प्रधान को भी पहला एवं
दूसरा स्थान मिला था। यहां का समाचार ठीक हैं। ठंडा तो शुरू
ही हुआ है। तुम्हारे यहां तो भीषण ठंड पड़ती है। अभी
ज्ञानेंद्रपति जी को भी पत्र लिखेंगे। विशेष कुशल। कृपा बनी
रहेगी। पत्र हमेशा देना।
तुम्हारा

शंकर मोहन झा


पांचवां दिनांक 15.12.07


प्रिय बिजेन,

कुशल हूं। कल कुमार राहुल जी से फोन पर बात हुई। तारा बाबू
के यहां मुंगेर के कवि श्री राजेश जी के साथ बैठा था। एक
सप्ताह पूर्व वयोवृद्ध कवि श्री त्रिलोचन जी का देहावसान हो
गया। त्रिलोचन जी बडे व्यावहारिक, सरल एवं जीवट के व्यक्ति
थे। 'वागर्थ' पत्रिका में प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने 2006 में दो
अंकों के संपादकीय में इनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर
विचार किया था। अंग्रेजी सोनेट को हिंदी में सफलतापूर्वक लाने
वाले वे अकेले व्यक्ति थे। तुम्हारा हाल-चाल जानने की चिंता
रहती हे। आज शाम को पटना जा रहा हूं। वहां पुस्तक मेला लगा
है। 18.12 तक मेला है। वहां अन्य साहित्यकारों, साथियों से
मुलाकात हो। यहां तो खास ठंड नहीं है। पटना में शायद थोड़ी
हो। तुम्हारे प्रदेश में तो ठंड ढंग से आ ही गई होगी। यहां के
सभी समाचार ठीक। विद्यार्थीलोग 11.12 को ही छात्रावास खाली
कर गए।

शंकर मोहन झा

देवघर

छठा दिनांक 29.12.07

प्यारे बिजेन,

शुभाशीर्वाद। पत्र की संख्या बढ़ाओ जल्दी-जल्दी पत्र मिलेगा।
30.11 की चिट्ठी को यहां आने में एक महीना क्यों लगा, पता
नहीं। खैर, चिट्ठी आ गई। हरेंद्र जी को भी तुम्हारी चिट्ठी मिल
गई। कभी-कभी लेटर बॉक्स बदल कर पत्र भेजो। शायद पत्र
आ जाए। मुंबई से वापसी के बाद मैंने दो या तीन पत्र तुम्हें
भेजा है। कुमार राहुल से कभी-कभार भेंट कर लेता हू। तुम्हारा
देवघर आना कब तक हो सकेगा? काम मन लगा कर करना।
तुम्हें बहुत आगे बढ़ना। मुझे तुमसे बहुत आशा है। बनारस में
ज्ञानेंद्रपति से भेंट हुई थी। थोड़ी मार्केटिंग हुई। अमरजित के
साथ नौका-विहार भी हुआ। गंगा की महा आरती भी देखी।
गंगा-स्नान तो किया ही। यह सब बातें तुम्हें श्यामो ÷ मेरा
भतीजा' ही बताएगा। बच्चों को खूब पढ़ने के लिए बोलना, जब
यहां आओ बहुत प्यार के साथ।

तुम्हारा
शंकर मोहन झा देवघर

सातवां दिनांक 31.1.08

प्रिय बिजेन,
पिन कोड तो लिखो। पत्र जल्दी पहुंचता है, इससे। बहुत-बहुत
शुभाशीर्वाद। तुम्हारा पत्र 15.1 एवं 16.1 का मिला। अमरजित
वगैरह आ गए। 11 फरवरी को वाणी की देवी सरस्वती की पूजा
है। तुम्हारे जाने के बाद से विसर्जन के समय कोई ढोलक नहीं
बजाता है। यहां वारिश होकर। एक सप्ताह से जबर्दस्त ठंड है।
तुम्हारे यहां जैसी तो बिल्कुल नहीं। मणिपुर की तुलना में
लुधिया की ठंड का हाल लिखो। बंबई से ठाकुर से संपक्र हो तो
मेरी याद दिलाना। अमृता प्रीतम एक विशिष्ट रचनाकार थीं।
मौज-मस्ती एवं पंजाब के लोकगीत आज भी देश के लोग पसंद
करते हैं। पंजाब के लोग मिहनती बहुत होते हैं। यहां का समाचार
ठीक है। दिव्यांशु एक सप्ताह के लिए देवघर आए थे। फोन एक
बार करना। महीने में एक बार तो फोन करो। दिव्यांशु को भी
फोन करना। तुम्हें बहुत प्यार। ठीक से रहना। पत्र हमेशा देना।
शंकर मोहन झा

देवघर

आठवां दिनांक 15.2.08

प्रिय बिजेन,

शुभाशीर्वाद। तुम्हारा 7.1 का पत्र आराम से चल कर अभी
तुरंत यहां पहुंचा। पत्र जरा इीक पत्र-मंजूषा में डालो ताकि
जल्दी गंतव्य तक पहुंचे। हरेंद्र जी ने भी तुम्हारा पत्र पढ़ा।
अपने पते का पिनको ठीक से लिख कर भेजो। मैंने अनुमान से
तुम्हारा पिन कोड डाला है। ठंड कम हो रही हे। लड़के आ गए हैं।
11.2 को बसंत पंचमी थी। 13.2 को मूर्ति विसर्जन संपन्न हो
गया। निदा फाजली के शेर की सादगी देखो। सादी चीजों का
सौंदर्य बड़ा प्रखर होता है। मनुष्य के जीवन का दर्शन भी
ऐसा ही होना चाहिए। पिछला पत्र मिला या नहीं? देवघर में
तुम्हारी प्रतीक्षा है। 28.2 को दिव्यांशु दिल्ली लौटेंगे। परसों
13.2 को आए हैं। परसों अमरजीत के साथ हरेंद्र जी के घर गए
थे। कभी-कभी फोन करो। अपना कंटैक्ट नंबर कब दोगे?
शंकर मोहन झा

देवघर

नौवां दिनांक 18.2.08

प्रिय बिजेन,

तुम्हारा 8.2 का पत्र 10 दि में अभी मुझे एवं हरेंद्र जी को
मिला। अमरजित ने भी तुम्हारा पत्र पढ़ा। दो दिनों से ठंड
बिल्कुल कम है। कोई गरम कपड़ा अभी दोपहर में नहीं डाला है।
यहां का समाचार ठीक है। मिहनत करो। मिहनत ही आगे बढ़ने
की कुंजी भी है और पूंजी भी। कुमार राहुल ठीक-ठाक हैं।
ज्ञानेंद्रपति जी ने ठीक ही कहा कि जीभ पर और जी मे बसने
की बात है। गीत समान्य जन के लिए होता है। मंच का गीत
भी जन साधारण के लिए होता है। कविता विशिष्ट पाठक व
श्रोता के लिए है। वैसे अच्छा गीत एवं अच्छी कविता तो सबके
लिए है। यहां अभी शादी-ब्याह, उपनयन का मौसम है। तुम्हारे
लुधियाना से अंबाला कितनी दूर है। किसी एक पत्र में पूछ था।
अच्छा होने में और लोकप्रिय होने में फर्क है। विरले को ही
प्रतिष्ठा, लोकप्रियता साथ-साथ मिलती है। तुम्हारे पुराने
प्राचार्य स्व. नरसिंह पंडित जी महान भी थे, लोकप्रिय भी।
कभी कुबेर नाथराय की किताब 'मणि पुतुल के नाम पत्र' मिले
तो पढ़ो।
शंकर मोहन झा

देवघर

दसवां दिनांक 20.2.08

परमप्रिय बिजेन,

शुभाशीर्वाद। यहां का समाचार ठीक है। आज ठीक से धूप ही
नहीं निकली है। बड़ा घना कुहरा है। तुम ठीक ठिकाने से रहना।
पढ़ाई-लिखाई जारी रखना। सीखने की कोशिश करते-करते ही
आदमी कुछ बनता है। बिना त्याग के जीवन के किसी क्षेत्र में
कुछ भी हासिल नहीं होता। इतनी बड़ी दुनिया में आदमी अपने
काम से ही यश प्राप्त करता है। काम से ही पहचान बनती है।
अपना समाचार देते राहे। पिछला पत्र तुम्हारा 8-10 दिन में ही
मिल गया था। उसका उत्तर तो 4-5 दिन पूर्व ही भेजा है।
इसके पहले ही मिलेगा। फोन कभी बूथ से करो। अभी तक
तुम्हारा कोई संपर्क नंबर नहीं है क्या? विशेष कुशल। पत्र
डालते रहना।

तुम्हारा

शंकर मोहन झा
देवघर