यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Sunday 4 January 2009

विद्यापीठ न होता तो क्या होता...

हिंदी विद्यापीठ और देवघर ये दो शब्द मेरी जेहन में इस कदर रच-बस गए हैं कि इन दोनों में से कोई सा शब्द सुनते ही ऐसा लगने लगता है कि वह मेरा कोई अपना हो। मैं इन दोनों से इस तरह परिचित हूं जैसे कोई अपने पड़ोसी को जानता हो। षायद इसलिए कि यहीं से मेरी अनगढ़ जिंदगी को एक आकार मिला। मणिपुर के बाद मैंने अपनी पढ़ाई-लिखाई हिंदी विद्यापीठ से की, तो प्रोफेषनल जिंदगी की शुरुआत भी देवघर से ही की। इसलिए भी हिंदी विद्यापीठ और देवघर मेरे जीवन में बहुत....बहुत खास है। मेरी जिंदगी का छोटा मगर बहुत अहम हिस्सा देवघर में बीता। हिंदी विद्यापीठ में तो और भी कम। लेकिन आज मैं जहां भी हूं, उसमें हिंदी विद्यापीठ का अहम योगदान है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। यहां मैं हिंदी सीखने के लिए मणिपुर से जब मार्च, 2003 में चला था, तो उस वक्त की स्थिति याद कर मुझे हंसी आती है। हिंदी का एक भी वाक्य पूरा नहीं बोल पाता था। जब मैं गुवाहाटी से जसीडीह आ रहा था, तो किसी तरह टूटी-फूटी हिंदी बोल कर और इशारों से समझा कर रोटी-सब्जी खरीदता था।पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंदी की क्या दशा है, इस बारे में तो मुझे नहीं लगता कि किसी को बताने की जरूरत है। सौतेली मां की संतान की तरह है। मणिपुर बोर्ड के सिलेबस में पहले की ही तरह आज भी आठवीं कक्षा तक हिंदी की एक ही किताब चलती है, जबकि इस बात को सब लोग जानते हैं कि भारत में हिंदी के बगैर काम नहीं चल सकता। लेकिन उसके बाद भी यहां चाहे जिसकी सरकार रही हो, उसने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। एक तो यहां हिंदी की हालत पहले से ही खराब थी, उस पर से कोढ़ में खाज यह कि 1999 में अलगाववादियों ने हिंदी के खिलाफ फतवा जारी कर हिंदी गाना, हिंदी फिल्म, हिंदी बोलना, हिंदी के प्रचार-प्रसार आदि हिंदी से जुड़ी हर चीज पर ठीक वैसे ही रोक लगा दी, जैसा अब महाराष्द्र में राज ठाकरे कर रहे हैं। साथ ही राज ठाकरे की तरह ही हिंदी बोलनेवाले लोगों को भी टार्गेटेड कर रखा है, चाहे वह मणिपुरी ही क्यों न हो! जिस क्षेत्र में हिंदी के साथ इस तरह का व्यवहार होता हो, उस क्षेत्र के आदमी के लिए हिंदी सीखना और हिंदी से जुड़ कर प्रोफेशन बनाना या हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगने की इच्छा रखना भी बहुत मुश्किल काम है। इन सारे तथ्यों को जानने-समझने के बाद भी इस चुनौती को स्वीकार कर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ मैं घर से निकल पड़ा। मुझे आज भी याद है कि 2004 में 'आजकल' पत्रिका के किसी अंक में मैंने पढ़ा था कि जापान के रहनेवाला एक आदमी साइजी मकीनो के बारे में। इतने लगन और मेहनत से उन्होंने हिंदी पढ़ी कि हिंदी भाषा को उन पर नाज हो आया। हिंदी की सेवा करने और गैर हिंदी देशों में उसे फैलाने के लिए उन्हें हिंदी रत्न अवार्ड से नवाजा गया। हिंदी सीखने में उन्हें कितनी मेहनत करनी पड़ी साथ ही कितनी कुरबानियां देनी पड़ीं इस बारे में उस पत्रिका में विस्तार से चर्चा थी। उसे पढ़ कर मेरा आत्मबल और मजबूत हुआ। सोचा एक गैर हिंदी देश का आदमी जब हिंदी की बुलंदी पर पहुंच सकता है, तो मैं तो हिंदी की मिट्टी में ही पला-बढ़ा हूं, तो भला मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता। हां, तो मैं हिंदी विद्यापीठ, देवघर पहुंचा 2003 के मार्च में। तेज धूप और गर्मी से परेशान, पसीने से लथपथ। इससे पहले हिंदी प्रदेशों की गर्मी से मैं वाकिफ नहीं था। इतनी गर्मी तो पूर्वोत्तर के किसी राज्य में कभी पड़ती ही नहीं। मेरे साथ तीन लड़के और थे। हम सब ऑटो से होस्टल आए। हमलोग को होस्टल लेकर आए, मणिपुर से हमें लाने वाले सर विनय। इशारे से कॉलेज को दिखाते हुए बताया कि यही तुम्हारा कॉलेज है। उस भव्य बिल्डिंग को देख कर मैं दंग रह गया। गांव से आया था। इससे पहले इंफाल छोड़ कर किसी और शहर में नहीं गया था। इसलिए इस तरह की भव्य बिल्डिंग सिर्फ मेरी कल्पनाओं में हुआ करते थे। भीतर कहीं जोरदार सिहरन और गुदगुदी हुई, ये सोचकर कि अब मैं इसी बिल्डिंग में रोज बैठा करूंगा। हॉस्टल के सारे विद्यार्थी हिंदी में बातें कर रहे थे। मुझे बहुत अच्छा लगा, लेकिन डर ज्यादा। अच्छा इसलिए कि मुझे अच्छा माहौल मिला है, जहां मैं बेखौफ होकर हिंदी सीख सकूंगा। और डर इसलिए कि मैं तो हिंदी जानता ही नहीं और यहां सबकुछ हिंदीमय है। मैं कैसे लोगों से बात करूंगा, अपनी बात उन्हें समझा पाउंगा। क्योंकि मणिपुर के स्कूल में तो हमें हिंदी भी मणिपुरी में बोलकर सिखाई गई थी। खैर, यह बात मैंने किसी पर जाहिर नहीं होने दी और उस डर को चुनौती की तरह लिया, घर से आए तीन दोस्तों के साथ। हम चारों का कॉलेज जाना शुरू हुआ। हम लोगों ने भी तय किया कि आपस में हिंदी में ही बातें करेंगे। शुरू-शुरू में बहुत संकोच होता था। हम चारों के बीच सबसे ज्यादा प्रयास रोमेश करता था और बोलता भी वही था। गलत बोल रहा है कि सही वह इस बात का जरा भी परवाह नहीं करता था। हम चारों में जबर्दस्त कंपीटिशन था। जल्दी ही, देर रात तक पढ़ना और सुबह जल्दी उठना और भाषण की तैयारी करना दिनचर्या का हिस्सा बन गया। धीरे-धीरे शिक्षकों से प्रगाढ़ता भी बढ़ी। उन दिनों पंडित नरसिंह जी प्राचार्य हुआ करते थे। हॉस्टेल के सारे विद्यार्थी उनसे बहुत डरते थे। लेकिन हमारा दुर्भाग्य रहा कि उनसे बहुत ज्यादा कुछ सीखने को नहीं मिल पाया। हमारे वहां पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही उनका देहांत हो गया। वे बहुत अनुशासन प्रिय थे। काफी बुजुर्ग होने और बीमार रहने के बावजूद वे समय के बहुत पाबंद थे। हालांकि उसी दरमियान मैंने उन्हें समर्पित करते हुए एक कविता जरूर लिखी थी ÷गुरु तर्पण', लेकिन उस अनुशासन का महत्व मुझे आज ज्यादा समझ में आता है। उसके बाद सर शंकर मोहन झा से भी सीखने को बहुत कुछ मिला। खास कर सही लिखना व सही उच्चारण करना। वे शब्दों का अर्थ बहुत विस्तार और उदाहरण के साथ बताते थे। इसलिए उनसे सीखा सबक हमें लंबे समय तक याद रहता था। उनसे साहित्य की भी जबर्दस्त प्रेरणा मिली। उन्होंने ही मेरे अंदर आगे बढ़ने की ललक और जिजीविषा पैदा की और इसके लिए मार्गदर्शन भी किया। आप सोच सकते हैं कि एक अहिंदी भाषी क्षेत्र का लड़का, जिसे ठीक-ठीक शब्द ज्ञान तो दूर, सही-सही उच्चारण करने में भी परेशानी होती हो, उसका हिंदी साहित्य से कितना नाता हो सकता है। लेकिन वे बिना निराश हुए लगे रहे। भाषण प्रतियोगिताओं में हम लोग भाग लें, इस पर उनका काफी जोर रहता था, जिसके लिए वे हमलोगों को प्रेरित करते रहते थे। हमलोगों का हौसला बढ़ाते थे। और वही हौसला मेरे जिंदगी का मूलमंत्र बन गया। आज मैं जो भी हूं, वह उसी का फल है। जिसकी शुरुआत अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ द्वारा दिल्ली में आयोजित बाबू गंगा शरण सिंह वाकस्पर्धा, 2005 में सफलता से हुई। लेकिन यहां एक बात और मैं कोट करना चाहूंगा- वह जानकर शायद आपको भी आश्चर्य हो कि सर शंकर मोहन झा की पृष्ठभूमि हिंदी की नहीं है। अगर मुझे ठीक से याद है तो वह विज्ञान के छात्र रहे हैं। मेरे यह बात बताने का तात्पर्य यह है साथियो कि सर शंकर मोहन झा हिंदीपट्टी से आते हैं, इसलिए हिंदी का व्यवहारिक ज्ञान उन्हें अपने आसपास के माहौल से ही मिल जाता है। लेकिन आप सब को इसके लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ेगा, तभी आप हिंदी को बेहतर तरीके से आत्मसात कर सकेंगे। इसके लिए आपलोगों के लिए भी जरूरी है कि आप कैसी हिंदी बोलते हैं, इसकी परवाह छोड़कर हिंदीभाषी लोगों के साथ आत्मीय संबंध बनाए और उनसे हिंदी में ही बातचीत करें। सर शंकर मोहन झा का भी इस बात पर ज्यादा जोर था। और सच कहा जाए तो मैंने भी प्रभात खबर, देवघर में काम के दौरान ही व्यवहारिक हिंदी सीखी, जिसमें खाद-पानी का काम किया हिंदी विद्यापीठ, देवघर में सीखी-पढ़ी हिंदी ने।अब एक बात और, जो मेरे हॉस्टल की जिंदगी से जुड़ी है। वह है जिम्मेदारी का एहसास, जिसका एहसास घर में रहते हुए शायद मुझे कभी नहीं हो पाता। घर से दूर आदमी बहुत सी ऐसी कठिनाइयों से पाला पड़ता है, जिसके बारे में घर में रहते हुए कभी सोच भी नहीं सकता। उसमें सर्वोपरि तो यह है कि परिवार के साथ रहने पर आदमी घर की जिम्मेदारियों को नहीं समझता। सारा कुछ मां-बाप के उपर थोप कर आदमी मगन रहता है। मैं भी कुछ उसी तरह का था। लेकिन हॉस्टल में तो आदमी को अपनी जिम्मेदारी खुद लेनी पड़ती है। शुरू-शुरू में मुझे बहुत परेशानी हुई। अपना काम खुद करना पड़ता था। इस संदर्भ में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की कहानी याद आती है, जो बहुत हद तक मुझ पर भी लागू होती है। घर में जिस दिन सब्जी अच्छी नहीं बनती थी, तो उस दिन मैं घर में खाता नहीं था या फिर कम खाता था। मगर हॉस्टल में तो जो भी मिलता था, वह हर हाल में खाना पड़ता था, क्योंकि वहां मां नहीं थी, जो मेरी नाजो-नखरे उठाकर दोबारा खाना बनाती और मैं भूखा भी नहीं रह सकता था, क्योंकि मामला एक दिन का तो था नहीं। और यह सब इसलिए होता था कि परिवार चलाने का भार और दिक्कतों का एहसास मुझे नहीं था। मगर हॉस्टल में मुझे खुद ही कब क्या करना है और घर से आनेवाले कुछ पैसों में कैसे महीने भर का खर्च चलाना है, यह तय करना पड़ता था और उसी हिसाब से अपनी प्राथमिकता तय करते हुए आड़े वक्त के लिए कुछ पैसे बचा कर रखने भी होते थे। मैंने यह जाना हिंदी विद्यापीठ के हॉस्टल में कि कैसे संयम से रहकर अपनी जिंदगी को संवारा जा सकता है। हॉस्टल में स्वतंत्र माहौल मिलता है। और इस स्वतंत्रता का सदुपयोग करने के लिए निर्णय क्षमता की जरूरत पड़ती है, जो स्वयं विकसित करनी पड़ती है। मैंने भी उस संयम की घड़ी में जिंदगी का एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया। वह निर्णय लेने का साहस परिस्थिति और हिंदी की जानकारी बढ़ने के बदौलत ही मुझमें आया था, जो मैंने हिंदी विद्यापीठ से पाया था। घर के लोगों ने आगे की पढ़ाई के लिए पैसे भेजने से मना कर दिया था। पिताजी की तबियत खराब रहने लगी थी। हां, इस निर्णय की वजह से मेरा एक बड़ा नुकसान जरूर हुआ कि हिंदी विद्यापीठ से पढ़ने की इच्छा अधूरी रह गई, जो आज भी बनी हुई है और अगर कभी मौका मिला, तो उसे जरूर पूरा करना चाहूंगा।खैर, 31 मार्च 2005 को इस अधूरी इच्छा के साथ ही अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर देवघर में ही वहां से एक साल पहले शुरू हुए एक अखबार 'प्रभात खबर' में नौकरी ज्वॉइन कर ली। मुझे ठीक से याद है कि जब मैं हॉस्टल छोड़ रहा था, तब मेरे परम आदरणीय प्राध्यापक साहजी ने मुझसे कहा था- 'अभावों में ही आदमी कुछ कर सकता है।' आज जब मैं यह आलेख लिखने बैठा हूं, तो उनकी यह उक्ति सिर्फ इसलिए मेरे जेहन में नहीं उमड़-घुमड़ रही है कि अपनी जिंदगी के सफर में मैंने जाना कि कितनी महत्वपूर्ण शिक्षा दी थी उन्होंने। और हाल ही में मुझे पता चला कि वे नहीं रहे। यह जानने के बाद से ही मैं बहुत अशांत था। हिंदी विद्यापीठ से जुड़ी एक और दुखद घटना, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता, वह है मेरा एक पुराना साथी, जो मेरे साथ रूम पर रह कर पढ़ाई-लिखाई करता था, ज्ञानेश्वर। वह अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ। विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी कर वह घर वापस गया था और वहां एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक की नौकरी कर जीवन-यापन कर रहा था। जहां तक मेरी जानकारी है उसे कोई ऐसी बीमारी भी नहीं थी, जो जानलेवा हो। मौत के समय उसकी उम्र लगभग 25 की रही होगी। दुखद तो यह भी है कि मां-बाप का वह एकलौता सहारा था। उसकी मौत की बात पर यकीन करने में मुझे बहुत समय लगा। लेकिन अब भी वह मेरे आसपास ही रहता है, जैसे पढ़ाई के दिनों में रहा करता था। विद्यापीठ ने पूर्वोत्तर को क्या दिया है- इसका बढ़िया उदाहरण हैं मेरे मित्र। मेरे बहुत सारे मित्र मणिपुर में हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उस लंबी चौड़ी लिस्ट में से कुछ नाम यों हैं- ओबेद, मिहजात, लेईजात, ब्रूसली, रोमेश, निंथेम, कैगुइयांग। संक्षेप में, हम हिंदी विद्यापीठ के व्यवस्थापक के आभारी हैं, जिनके सद्प्रयासों के बदौलत पूर्वोत्तर के अहिंदी भाषी विद्यार्थियों को हिंदी की शिक्षा मिल रही है। इतना ही नहीं यहां मिलने वाला कंप्यूटर और टंकण का प्रशिक्षण हमें तकनीकी दुनिया से भी रू-ब-रू कराता है, जिसका लाभ हमें हर कदम पर मिलता है। विद्यापीठ के सफर में हमें सुख-दुख और जीत-हार सब मिला। लेकिन हर बार सुख-दुख और जीत-हार ने मेरे हिंदी सीखने के हौसले को और मजबूती दी। विद्यापीठ खाली हिंदी नहीं सिखाता, जिंदगी का पाठ भी पढ़ाता हैं। कुल मिला कर हिंदी विद्यापीठ, देवघर मेरे जीवनयात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। अंत में, मैं इतना तो कह ही सकता हूं कि अगर मैं हिंदी विद्यापीठ, देवघर नहीं आया होता, तो शायद आज मैं जहां हूं वहां नहीं, कहीं और होता...।