यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday 31 December 2010

मणिपुर की दर्द भरी कहानी

मुझे याद है अगस्त, 2010 में प्रगति मैदान (दिल्ली) में लगा 15वां पुस्तक मेला. मेले का विषय था-पूर्वोत्तर भारत का साहित्य, लेकिन वहां के बारे में कोई भी खास किताब देखने को नहीं मिली. मणिपुर की तो कोई किताब ही नहीं आई. कोई लेखक उधर के मामलों पर अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद नहीं करना चाहता. ऐसे में डॉ. वर्मा ने जो काम किया है, वह सराहनीय है. उन्होंने अपने मणिपुर प्रवास की यादों को संजोकर उन्हें उपन्यास की शक्ल दे दी और नाम दिया-उत्तर पूर्व.

अगर आप पूर्वोत्तर भारत को क़रीब से जानना-समझना चाहते हैं तो डॉ. लाल बहादुर वर्मा द्वारा लिखित उपन्यास उत्तर पूर्व आपके लिए एक बेहतर मददगार साबित हो सकता है. यह डॉ. वर्मा की वह जीवंत कृति है, जिसमें मणिपुर का इतिहास, संस्कृति, समाज एवं राजनीति सब कुछ है. उत्तर पूर्व का मुख्य आधार ही मणिपुर है. मणिपुर यूनिवर्सिटी के इर्द-गिर्द बुने इस उपन्यास की शुरुआत में थांगजम मनोरमा को समर्पित एक कविता भी है. जुलाई, 2004 में बलात्कार के बाद मनोरमा की हत्या कर दी गई थी और इसका आरोप भारतीय सेना के जवानों पर लगा था. इस घटना के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने असम रायफल्स के मुख्य फाटक पर निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था. उपन्यास के पहले पन्ने पर प्रकाशित कविता उन प्रदर्शनकारी महिलाओं का उत्साह बढ़ाती है. मणिपुर धनुर्धर अर्जुन की ससुराल है. यही नहीं, यहीं पर मोइरांग नामक वह स्थान भी है, जहां आज़ाद हिंद फौज की भारत विजय योजना साकार हुई थी.

यह उपन्यास केंद्र की उपेक्षा का दंश झेल रहे पूर्वोत्तर भारत की चिंता पर रोशनी डालता है. मणिपुर में सेना का राज है. वहां आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट लागू है. इस एक्ट की आड़ लेकर किसी को पकड़ना, गोली मार देना और महिलाओं के साथ दुष्कर्म सेना के लिए आम बात है. उपन्यास के कुछ पात्र इस एक्ट के शिकार होते हैं. कई परिवारों को इस एक्ट का शिकार होना पड़ता है. उपन्यास बताता है कि शांतिपूर्ण ज़िंदगी जी रहे इराबो को इस एक्ट ने किस तरह प्रभावित किया. बाहर के लोगों, खासकर हिंदीभाषियों को मणिपुर में उपेक्षा की नज़र से देखा और मयांग कहकर संबोधित किया जाता है. बर्मा (उपन्यास का एक पात्र) वहां की संस्कृति में कैसे शामिल होकर धीरे-धीरे घुल-मिल जाता है, यह उपन्यास का अहम हिस्सा है. पूर्वोत्तर के बारे में देश के बाक़ी हिस्से के लोग ज़्यादा नहीं जानते और न ही जानने में दिलचस्पी रखते हैं. चाहे मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल हो या फिर मिजोरम. उत्तर भारतीय तो वहां के लोगों को चाइनीज या नेपाली समझ बैठते हैं.

पूर्वोत्तर की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक पृष्ठभूमि और इतिहास के बारे में भी आम लोगों को बहुत ही कम जानकारी है. यह क्षेत्र राजनीतिक तौर पर भी उतना मज़बूत नहीं है. इन सारी परिस्थितियों को डॉ. वर्मा ने अपने उपन्यास में विभिन्न पात्रों के माध्यम से बहुत सहज ढंग से पेश किया है. इबोहल, बर्मा, इराबो, तनु, आरके, जुही एवं राधा इस उपन्यास के ऐसे पात्र हैं, जिन्होंने वहां की ज़िंदगी को गहराई से जिया और भोगा है. इन पात्रों का चिंतन-मनन उपन्यास के हर पन्ने पर मिलता है. डॉ. वर्मा ने वहां के जीवन, समस्याओं और परंपराओं को बहुत गहराई तक महसूस किया और फिर उसे उपन्यास की शक्ल में सबके सामने पेश किया है. यह हाशिए पर धकेले जा रहे एक राज्य के बारे में सटीक चिंतन है. यही नहीं, लेखक ने इस उपन्यास में पूर्वोत्तर के इतिहास से जुड़ी कई अहम जानकारियां पेश की हैं.

उपन्यास उत्तर पूर्व को पढ़ना केवल उत्तर पूर्व को जानना नहीं है, बल्कि वहां से जुड़ी हर चीज को जानना-समझना भी है. लेखक ने भूमिका में लिखा है, मैंने बहुत से अच्छे-बुरे काम किए हैं पैंसठ वर्षों के दौरान, पर मैं किसी में इतना उजागर नहीं हुआ, किसी ने मुझे इतना नहीं रचा और सजाया-संवारा, जितना उत्तर पूर्व ने. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मणिपुर को लैंड ऑफ ज्वैल कहा था. इस बात को लेखक ने बहुत गहराई से समझा और इसका विश्लेषण भी किया. उपन्यास का प्रत्येक परिच्छेद सुंदर काव्य पंक्तियों से शुरू होता है. मैतै, मणिपुरी और भारतीय होने की त्रिविधा से जूझ रहे मणिपुरियों की मानसिक लड़ाई को लेखक ने जाना. थोपी गई भारतीयता को वहां के लोग कैसे नकारते हैं और झेलते हैं, यह लेखक ने काफी सूझबूझ से बताया है. 336 पृष्ठों के इस उपन्यास में लेखक की सोच और विचारधारा साफ-साफ झलकती है. मैं मूल रूप से पूर्वोत्तर का हूं. उपन्यास पढ़ने के बाद सोचता हूं कि मैंने इसे पहले क्यों नहीं पढ़ा. वहां का नागरिक होने के बावजूद वहां की चीजों के बारे में मुझे इतनी अच्छी समझ नहीं है. उत्तर पूर्व पढ़ने के बाद लगा कि खोजने-समझने के लिए अभी बहुत कुछ बाक़ी है. दरअसल, पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम किताबें देखने-पढ़ने को मिलती हैं. खासकर हिंदी में तो और भी कम. मुझे याद है अगस्त, 2010 में प्रगति मैदान (दिल्ली) में लगा 15वां पुस्तक मेला. मेले का विषय था-पूर्वोत्तर भारत का साहित्य, लेकिन वहां के बारे में कोई भी खास किताब देखने को नहीं मिली. मणिपुर की तो कोई किताब ही नहीं आई. कोई लेखक उधर के मामलों पर अपना क़ीमती व़क्त बर्बाद नहीं करना चाहता. ऐसे में डॉ. वर्मा ने जो काम किया है, वह सराहनीय है. उन्होंने अपने मणिपुर प्रवास की यादों को संजोकर उन्हें उपन्यास की शक्ल दे दी और नाम दिया-उत्तर पूर्व.

Saturday 4 December 2010

मांस के झंडे















देखो हमें
हम मांस के थरथराते झंडे हैं
देखो बीच चौराहे बरहना हैं हमारी वही छातियां
जिनके बीच
तिरंगा गाड़ देना चाहते थे तुम
देखो सरेराह उधड़ी हुई
ये वही जांघें हैं
जिन पर संगीनों से
अपनी मर्दानगी का राष्ट्रगीत
लिखते आये हो तुम
हम निकल आए हैं
यूं ही सड़क पर
जैसे बूटों से कुचली हुई
मणिपुर की क्षुब्ध तलझती धरती

अपने राष्ट्र से कहो घूरे हमें
अपनी राजनीति से कहो हमारा बलात्कार करे
अपनी सभ्यता से कहो
हमारा सिर कुचल कर जंगल में फेंक दे हमें
अपनी फौज से कहो
हमारी छोटी उंगलियां काट कर
स्टार की जगह टांक ले वर्दी पर
हम नंगे निकल आए हैं सड़क पर
अपने सवालों की तरह नंगे
हम नंगे निकल आए हैं सड़क पर
जैसे कड़कती हे बिजली आसमान में
बिल्कुल नंगी...
हम मांस के थरथराते झंडे हैं

-अंशु मालवीय

(मणिपुर में जुलाई, 2004 सेना ने मनोरमा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी. मनोरमा के लिए न्यासय की मांग करते महिलाओं ने निर्वस्त्र हो प्रदर्शन किया. उस प्रदर्शन की हिस्सेदारी के लिए ये कबिता...) साभार: उत्‍तर पूर्व

Thursday 16 September 2010

जनता के खिलाफ सैन्य शक्ति के इस्तेमाल से समस्याएं पैदा होना लाजिमी है : मालेम निंगथौजा

मालेम निंगथैजा : कैंपेन फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी, मणिपुर के अध्यक्ष. उन्होंने 9 जून 2010 को एर्नाकुलम की एक सभा में इरोम शर्मिला का जिक्र करते हुए मणिपुर के ताजा हालात पर रोशनी डाली. प्रस्तुत है उनके भाषण का एक अंश :

...शर्मिला और उनके आंदोलन पर काफी बातें कही गई हैं. आप तो जानते ही हैं कि आत्महत्या के प्रयास के आरोप में शर्मिला को आईपीसी की धारा 309 के तहत रखा गया है. मणिपुर में अतीत में उख्रूल जिले की एक खूबसूरत नगा युवती चानू रोज का भारतीय सुरक्षाकर्मियों ने 4 मार्च 1974 को बलात्कार किया. इस अपमान को वह बर्दाश्त नहीं कर सकी और सैनिकों की इस बर्बरता के खिलाफ उसने 6 मार्च 1974 को आत्महत्या कर ली. 4 अक्टूबर 2003 को मणिपुर के जिरी की एक 15 वर्षीया युवती संजीता का भारतीय अर्द्धसैनिक बल के लोगोंे ने बलात्कार किया और उस युवती ने उसी दिन आत्महत्या कर ली. 15 अगस्त 2004 को एक मानव अधिकार कार्यकर्ता श्री पेबम चिंतरंजन ने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (एफसपा) के विरोध में आत्मदाह किया. हमने यह भी देखा है कि मणिपुर फॉरवर्ड यूथ फ्रंट के पांच कार्यकर्ताओं ने अफसपा के विरोध में आत्मदाह का प्रयास किया. मैं इन सारी घटनाओं का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कि शर्मिला के 10 वर्षों की अथक भूख हड़ताल के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए हम उन्हें भी याद कर लें जिन्होंने अफसपा का विरोध करते हुए अपनी जान की बाजी लगा दी

शर्मिला की 10 वर्ष की भूख हड़ताल ने हमारे सामने बिल्कुल साफ कर दिया है कि मणिपुर में आज किस तरह का जनतंत्र काम कर रहा है. अब मैं संक्षेप में आपको यह बताना चाहूंगा कि खासतौर से एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ कि अफसपा 1958 को कैसे हमारे यहां लागू किया गया. इसके साथ ही मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इसके लागू किए जाने के कौन से निहितार्थ मणिपुर के लिए हैं.

मैं समझता हूं कि आप में से कइयों ने रामायण जरूर पढ़ा होगा. अगर आप इसे ध्यान से पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि उत्तर भारत के लोग दक्षिण भारत के लोगों को किस दृष्टि से देखते थे. दक्षिण के लोगों को जानवरों की तरह व्यवहार किया जाता था बहादुर हनुमान या वानर समुदाय, भालू और तरह तरह के पात्र जो जानवर के रूप में पेश किए जाते हैं. लंका के लोगों को राक्षस के रूप में चित्रित किया गया है. इससे साहित्य में आर्यों के आक्रमण को अभिव्यक्ति दी गई है. इसी प्रकार अंग्रेजों ने ठगी के खिलाफ सामूहिक दंडात्मक कानूनों को लागू किया मसलन इंडियन क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट. इसी तर्ज पर अफसपा ने उत्तरपूर्व की समूची आबादी को एक ही डंडे से हांक दिया और उन्हें विद्रोही बता दिया. 1950 के दशक में पटेल और नेहरू के बीच पत्रों का जो आदान प्रदान हुआ है उसमें साफ तौर पर इस क्षेत्र के लोगों को मंगोल पूर्वाग्रह वाले विद्रोही लोगों के रूप में संबोधित किया गया है. हम लोगों के लिए इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जाता था. हमें एक ऐसी इकाई के रूप में चित्रित किया जाता रहा है जिसे वे भारतीयों से थोड़ा अलग मानते हैं. इसलिए जहां हमें बर्बर और एक अजीबोगरीब भारतीय समूह के रूप में पेश किया जाता था वहीं हमारा बराबर दमन किया जाता रहा है और समूचे व्यवहार में एक ऐसा परायापन दिखाया जाता है जो मनुष्य होने की मूल भावना को ही खो दे. हम लोगों को बराबर इस तरह पेश किया गया कि हम अनुशासनहीन हों, मंगोलपूर्व की जातियों के पूर्वाग्रह से ग्रस्त हों और हमें केवल सैनिक ताकत के बल पर ही नियंत्रित रखा जा सकता है. भारत के शासकों ने इसी मानसिकता के साथ हमें देखा.

अगस्त 2004 में जब संसद में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट पर बहस चल रही थी उस समय तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने टिप्पणी की कि भारतीय सैनिक अपने घरों से 2000 किमी की दूरी पर रह रहे हैं. उन्होंने कैसे मणिपुर और भारतीय सैनिकों के घरों की दूरी नाप ली? 2000 किमी? इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने भारत का अर्थ दिल्ली से लगाया. इसका अर्थ यह भी हुआ कि उन्होंने हमेशा मणिपुर को अपनी मानसिक अनुभूति से 2000 किमी दूर रखा. मणिपुर के बारे में भारतीय शासक वर्ग की यही मानसिकता है. इसीलिए आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट मणिपुर में कारगर हो सका. अभी 7 जून को मुझे एक रिपोर्ट दिखाई दी जिसमें बताया गया था कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में थल सेना और वायु सेना को तैनात करने पर विचार किया जा रहा है. समस्या से निपटने के लिए एक समीक्षा समिति का गठन किया गया है. इस मुद्दे पर सेना और वायु सेना के प्रधानों की राय मांगी गई थी. यह भी खबर थी कि थल सेना ओर वायु सेना दोनों को इस मामले में चिहकिचाहट हो रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे वे लोग भी मारे जाएंगे जिन्हें मारने का इरादा नहीं है. यह भी दलील दी गई कि आबादी वाले इलाकोंे में सेना की तैनाती से एक मनोवैज्ञानिक तनाव पैदा होगा और जनता के साथ एक अलगाव भी पैदा होगा. लेकिन जब उत्तर पूर्वी राज्यों का सवाल आता है तब यह बातें नहीं सोची जातीं. 1950 के दशक में नगा विद्रोहियों का दमन करने के लिए सेना भेजते समय निर्दोष लोगों के मारे जाने की बात दिमाग में नहीं आई. उन्होंने कभी नहीं सोचा कि इससे जनता के साथ अलगाव पैदा हो जाएगा. भारतीय सत्ताधारीवर्ग की यही मानसिकता बहुत बड़ी बाधा पैदा कर रही है.

जहां तक आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट के प्रावधानों का सवाल है, मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों ने उसे ठीक से पढ़ा है. इसके अनुच्छेद 4 में सेना के किसी भी अधिकारी को यह अधिकार दिया गया है कि महज संदेह के आधार पर वह किसी को भी गोली मार सकता है. अब संदेह तो ऐसी चीज है जो आपके दिमाग में पलती है. इसे ठोस रूप से बाहर लाकर किसी को दिखाया नहीं जा सकता. अगर आप मुझ पर संदेह करते हैं या आप संदेह करना चाहते हैं तो आप मुझे मार सकते हैं. इसी प्रकार आप पर संदेह कर मैं आपको मार कसता हूं. इसका अर्थ यह हुआ कि संदेह करने वाले को हत्या करने का लाइसेंस मिल गया है. इसमें साफ तौर पर एक समुदाय विशेष के लोगों को संदेहास्पद लोगों की श्रेणी में डाल दिया है. हमारे लिए संदिग्ध जैसा एक अपमानजनक शब्द तय कर दिया गया है. यह वैसे ही है जिस प्रकार अमेरिका ने बहुत साफ तौर पर मुसलमानों को अर्द्धशैतानी प्रवृत्ति वाले आतंकवादी गुट में रख दिया है. इसका उल्लेख एडवर्ड सईद ने अपनी पुस्तक कवरिंग इस्लाम में बहुत स्पष्ट रूप से किया है. मीडिया ने हमारी क्या छवि बनाई और मीडिया ने किस तरह मुसलमानों को परिभाषित किया. यह बिल्कुल वैसा ही है. इस कानून ने सेना के अधिकारी को इस बात का हक दे दिया है कि वह बिना रोकटोक किसी के घर की तलाशी ले ले, बिना वारंट किसी को गिरफतार कर ले और संदेह के आधार पर किसी की भी हत्या कर दे. हम ऐसे हालात में जिंदगी गुजार रहे हैं जहां सेना के पास सारे अधिकार हैं और वह बिना किसी भय के हमारे हत्या करने के लाइसेंस का इस्तेमाल कर सकती है. बिना भय के मैं इसलिए कह रहा हूं कि सिविल कोर्ट को इस बात का अधिकार ही नहीं है कि वह सेना के खिलाफ किसी मुकदमे को स्वीकार करे. अनुच्छेद छह के अनुसार अगर सेना के किसी अफसर के खिलाफ हम कानूनी कार्रवाई करना चाहें तो हमें केंद्रीय गृहमंत्री से विशेष इजाजत लेनी पड़ेगी. और आप तो जानते ही हैं कि सेना के खिलाफ किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई के लिए गृहमंत्री शायद ही इजाजत दें. इसलिए हम ऐसे हालात में जीने को मजबूर हैं जहां पूरी तरह सेना का शासन है जहां कमांडो लोग आतंक के एजेंट बन बैठे हैं और जहां जनता के अधिकार का पूरी तरह दमन किया जा रहा है.

इन बातों से मुझे महसूस होता है कि भारतीय राज्य के निर्माण की प्रक्रिया में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट एक उपकरण है. जैसा कि मैं ने पहले से कहा भारत एक विविध राष्ट्रीयताओं वाला देश है. भारतीय राज्य की संस्थाओं ने जिस भारतीय राष्ट्रवाद का तानाबाना बुना था जिसका आविष्कार किया था अथवा जिसे मूर्त रूप दिया था उसके साथ कुछ भाषाई राष्ट्रीय समूह स्वेच्छा से जुड़ गए और कुछ ने मनोवैज्ञानिक दूरी बनाए रखी. इसलिए 1947 में आजादी की बेला में और 1950 में जब भारत का संविधान विधिवत पारित किया जा रहा था. आप देखेंगे कि उत्तर पूर्व के अनेक विद्रोही गुटों ने भारत राष्ट्र की अवधारणा से खुद को अलग रखा. भारत सरकार ने इसे कानून व्यवस्था की समस्या माना. राजनीति और अर्थव्यवस्था की समस्या को कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में चित्रित किया गया और कानून के पैमाने से इससे निबटा गया. हमने देखा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद के नारे के पीछे भारतीय सत्ताधारी तर्क का पूंजीवादी हित है जो समूचे संसाधन और आबादी को अपने नियंत्रण में करना चाहता है और अपने सैनिक ठिकानों के साथ उत्तर पूर्वी क्षेत्र को एक ऐसे बफर जोने के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है जहां से वह दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में बड़े पैमाने पर पूंजीवादी अभियान चला सके.

किसी राष्ट्र या राज्य के निर्माण से हमारा कोई विरोध नहीं है बशर्ते वह विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया से होकर गुजरा हो. लेकिन अगर ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि आपको सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करना पड़े और जनता के खिलाफ लड़ाई छेड़नी पड़े तो इससे समस्या का पैदा होना लाजिमी है. जो भी समस्या हो उसका राजनीतिक समाधान ढूंढा जाना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति निष्ठावान होने में उत्तर पूर्वी राज्यों के लोगों और कश्मीरी जनता को अभी समय लगेगा. इसके लिए उन प्रावधानों का होना जरूरी है जिसमें जनता अपनी आकांक्षा को स्वतंत्र और जनतांत्रिक तरीके से व्यक्त कर सके और निर्भय होकर ऐसे कार्यक्रम ला सके जो उसके भौतिक आदान प्रदान और परस्पर अंतःक्रिया की ऐतिहासिक प्रक्रिया को पूरी होने में मदद पहुंचाए. भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण में कोई समस्या नहीं हो सकती. हम किसी राष्ट्र के निर्माण का विरोध नहीं कर रहे हैं. लेकिन जिस तरीके से राष्ट्र शब्द का इस्तेमाल एक सरकारी टेक की तरह इसलिए किया जा रहा है ताकि कुछ चुने हुए भारतीय सत्ताधारी वर्ग के पूंजीवादी हिंतों के माफिक हो और अगर वे जनतांत्रिक सक्रिय लोगों की बड़े पैमाने पर धरपकड़ कर रहे हों और साथ ही मानव अधिकारों का घोर उल्लंघन कर रहे हों तो ऐसी हालत में हम कभी भी इस तरह की नीति को स्वीकार नहीं कर सकते. इससे समस्या पैदा होती है. यह राष्ट्र के निर्माण का एजेंडा पूरा करने की बजाय अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ी समस्याएं पैदा कर रहा है. राजनीतिक और आर्थिक किस्म के जो मुद्दे हैं उन्हें कानूनी मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

1958 में जब संसद में बहस हुई थी तो उस समय ही इस कानून को वैधानिक नहीं बल्कि राजनीतिक के बतौर देखा गया था. फिर 1997 में सुप्रिम कोर्ट ने जो फैसला दिया उसमें भी राजनीतिक और प्रशासनिक अनिवार्यताओं के आधार पर ही इस कानून को न्यायोचित ठहराया गया था. वैधानिक नजरिये से देखने वाले कट्‌टरपंथी और अंधराष्ट्रवादी तत्व यह समझ ही नहीं सके.. वे राजनीतिक अंतःकरण और मनोवैज्ञानिक एकता पर आधारित स्वैच्छिक एकीकरण के किसी रूप को देख भी नहीं सके. इसका अभाव आज भी दिखाई देता है. इसलिए मौजूदा वक्त में मार्शल लॉ के अधीन हमेंं जनतांत्रिक अधिकार की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं की हत्या और उन पर निगरानी के मामले देखने को मिलते हैं और बलात्कार, दुराचार जबरन विस्थापन तथा मानव अधिकारों का हर तरह का उल्लंघन दिखाई देता है जो भारत की एकता को बचाए रखने के लिए विद्रोह को कुचलने के नाम पर किया जाता है. मैं समझ नहीं पाता हूं कि अगर सारे लोग मार दिए जाएंगे तो किसके राष्ट्र ओर किसके लिए राष्ट्र की बात ये लोग कर रहे हैं. क्या कोई राष्ट्र बिना जनता के महज एक जमीन का टुकड़ा बन कर रह सकता है? मैं समझ नहीं पाता हूं कि भारतीय राज्य किसी तरह का राष्ट्र तैयार करने की कोशिश में लगा है.

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप जनतांत्रिक संघर्ष को आतंकवाद के समकक्ष रख देंगे तो नागरिक संगठनों के नाम करने का जो जनतांत्रिक दायरा है उसका पूरी तरह लोप हो जाएगा. हम ऐसी स्थिति में रह रहे हैं जहां मणिपुर की आर्थिक स्थिति अल्प विकास के दौर से गुजर रही है. हम पूरी तरह बाहर से किए जाने वाले आयात पर निर्भर हैं. हमारे पास आय के अत्यंत सीमित साधन हैं. गरीब लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. 2001 के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि 25 लोख की आबादी में से सात लाख से अधिक लोग ऐसे है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजार रहे हैं. अर्थव्यवस्था की इस हालत को देख कर हमारी जनता अपने अस्तित्व को लेकर काफी चिंतित है. हम एक भीषण अवस्था से गुजर रहे हैं. दूसरी तरफ हमारा बाजार पूरी तरह बाहरी लोगों द्वारा नियंत्रित है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां और भारतीय पूंजीपति हमारे संसाधनों, जन संसाधनों को अपने नियंत्रण में रखने के प्रयास में लगे हैं और मणिपुर में विस्थापन की हर तरह की नीतियां लागू की जा रही हैं. ऐसी स्थिति में नागरिक समाजों और संगठनों ने जनता की आवाज उठानी शुरू कर दी है.

आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट एक राजनीतिक कानून है. यह भारत के सत्ताधारी वर्ग के हितों की पूर्ति करता है. यह भारत में बसी आम जनता के हितों की पूर्ति नहीं करता. हमें जनतांत्रिक अधिकारों के उल्लंघन के हर तरह के स्वरूप का मिलजुल कर विरोध करना होगा. हमें मिलजुल कर अपनी साझा समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक संघर्ष करना होगा और फिर से एक जनतांत्रिक वातावरण तैयार करना होगा. अभी जो भारतीय जनतंत्र है वह एक मजाक है.

साभार : समकालीन तीसरी दुनिया


शर्मिला की कविता

कांटों की चूड़ियों जैसी बेड़ियों से
मेरे पैरों को आजाद करो
एक संकरे कमरे में कैद
मेरा कुसूर है
परिंदे के रूप में अवतार लेना

कैदखाने की अंधियारी कोठरी में
कई आवाजें आसपास गूंजती हैं
परिंदों की आवाजों से अलग
खुशी की हंसी नहीं
लोरी की नहीं

मां के सीने से छीन लिया गया बच्चा
मां का विलाप
पति से अलग की गई औरत
विधवा की दर्द-भरी चीख
सिपाही के हाथ से लपकता हुआ चीत्कार

आग का एक गोला दीखता है
कयामत का दिन उसके पीछे आता है
विज्ञान की पैदावर से
सुलगाया गया था आग का गोला
जुबानी तजुर्बे की वजह से

ऐंद्रिकता के दास
हर व्यक्ति समाधि में है
मदहोशी-विचार की दुश्मन
चिंतन का विवेक नष्ट हो चुका है
सोच की कोई प्रयोगशीलता नहीं

चेहरे पर मुस्कान और हंसी लिए हुए
पहाड़ियों के सिलसिले के उस पार से आता हुआ यात्री
मेरे विलापों के सिवा कुछ नहीं रहता
देखती हुई आंखें कुछ बचाकर नहीं रखतीं
ताकत खुद को दिखा नहीं सकती

इंसानी जिंदगी बेशकीमती है
इसके पहले कि मेरा जीवन खत्म हो
होने दो मुझे अंधियारे का उजाला
अमृत बोया जाएगा
अमरत्व का वृक्ष रोपा जाएगा

कृत्रिम पंख लगाकर
धरती के सारे कोने मापे जाएंगे
जीवन और मृत्यु को जोड़ने वाली रेखा के पास
सुबह के गीत गाए जाएंगे
दुनिया के घरेलू काम-काज निपटाए जाएंगे

कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो
मैं और किसी राह पर नहीं जाऊंगी
मेहरबानी से कांटों की बेड़ियां खोल दो
मुझ पर इल्जाम मत लगाओ
कि मैंने परिंदे के जीवन का अवतार लिया था.


वाइड एंगिल सोशल डेवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन द्वारा मूल मणिपुरी से अंग्रेजी अनुवाद
विष्‍णु खरे द्वारा हिंदी में अनूदित
साभार : समकालीन तीसरी दुनिया

Monday 19 July 2010

क्या विपक्ष मणिपुर की मुश्किलें समझेगा?


लगातार दो महीनों तक चली आर्थिक नाकेबंदी खत्म हो जाने के बावजूद मणिपुर की जनता महंगाई का दंश झेलने के लिए विवश है. मालूम हो कि नगा संगठनों ने राज्य के दोनों राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम करके जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया था, लेकिन फिर भी केंद्र एवं राज्य सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी. आर्थिक नाकेबंदी खत्म होने के बाद भी जनता की दिक्कतें कम नहीं हो सकी हैं. अब देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने कहा है कि वह मणिपुरी जनता की आवाज संसद में उठाएगी.

बीती 8 जुलाई को लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज दो दिवसीय दौरे पर मणिपुर आईं. उनके साथ एस एस अहलुवालिया, चंदन मित्रा, नेशनल सेक्रेटरी टापी गो एवं नॉर्थ ईस्ट स्टेट के जोनल ऑर्गनाइजेशन सेक्रेटरी चंद्रशेखर राव भी थे. सुषमा की इस यात्रा से मणिपुर की जनता को काफी उम्मीदें हैं. लोगों को लगता है कि केंद्र और राज्य सरकार ने तो जनता के लिए कुछ नहीं किया, लेकिन विपक्ष उसके दर्द को जरूर समझेगा. भाजपा ने कई वादे किए और लोगों ने भी उससे कई सवाल किए. दरअसल मणिपुर में देश के कई बड़े नेता अक्सर आते-जाते रहते हैं, वादे करते हैं, लेकिन वापस जाकर भूल जाते हैं. पर सुषमा स्वराज ने जोर देकर कहा कि वह जो वादा कर रही हैं, उसे पूरा होते मणिपुरी जनता टेलीविजन पर जरूर देखेगी.

सुषमा स्वराज ने कहा कि संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है और वह उसमें मणिपुर की आवाज को उठाएंगी. केंद्र सरकार से जनता के दु:ख-दर्द का हिसाब-किताब मांगा जाएगा. राजधानी इंफाल के जीएम हॉल में आयोजित पार्टी के एक कार्यक्रम में सुषमा स्वराज ने कहा कि आर्थिक नाकेबंदी से त्रस्त मणिपुर पर केंद्र सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. सारे लोग चुप रहे. उस वक्त गृहमंत्री अगर पाकिस्तान जा सकते थे तो मणिपुर क्यों नहीं आ सकते थे. नगालैंड और मणिपुर सीमा को लेकर अभी भी उलझन है. द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से इस समस्या का हल निकल सकता है. राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता एस एस अहलुवालिया ने कहा कि राज्य के लोग आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में जिस बढ़ोत्तरी का सामना कर रहे हैं, उसके लिए केंद्र और राज्य सरकार जिम्मेदार हैं.

नित्याइपात चुथेक स्थित भाजपा के प्रदेश कार्यालय में सुषमा स्वराज ने विभिन्न राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों के साथ मणिपुर की वर्तमान स्थिति पर विचार-विमर्श किया. सुषमा ने कहा कि मणिपुर से पार्टी का कोई सांसद नहीं है, फिर भी उन्होंने प्रतिनिधि सांसद रखकर पूर्वोत्तर के बारे में सरकार और लोगों का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की है. भाजपा की तरफ से लोकसभा में विजया चक्रवर्ती और राज्यसभा में एस एस अहलुवालिया पूर्वोत्तर के प्रतिनिधि के तौर पर मणिपुर की आवाज उठाएंगे. गौरतलब है कि आर्थिक नाकेबंदी खत्म होने के बाद भी पेट्रोल, डीजल, गैस एवं खाने-पीने की वस्तुओं के दाम अभी भी आसमान छू रहे हैं. सरकार चाहे तो सेना और हवाई जहाज के जरिए बाहर से सामान मंगवा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. निजी ट्रकों का राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन अभी भी बंद है, क्योंकि रास्ते में नगा संगठनों द्वारा जानलेवा हमले की आशंका व्यक्त की जा रही है. जाहिर है, निजी ट्रक न चलने की स्थिति में खाने-पीने की वस्तुओं, पेट्रोल एवं गैस आदि की उपलब्धता कैसे संभव है? सुषमा स्वराज ने भरोसा दिलाया कि वह दिल्ली जाकर केंद्र से हाइवे प्रोटेक्शन फोर्स रखने की मांग जरूर करेंगी. साथ ही हाइवे पर अवैध वसूली के बारे में मीडिया को बताएंगी.
इस दौरान सुषमा स्वराज नगा संगठनों से भी मिलीं. नगा संगठनों ने उन्हें अपनी शिकायतों से अवगत कराया. उन्होंने कहा कि एडीसी एक्ट में सुधार हो, पहाड़ों पर विकास कार्य शुरू किए जाएं और घाटी की अपेक्षा पहाड़ी इलाके की आबादी ज्यादा है, लेकिन तुलनात्मक रूप से विधानसभा में प्रतिनिधित्व कम है, इसलिए सीटें बढ़ाने पर भी विचार किया जाए. मालूम हो कि पहाड़ में 20 और घाटी में 40 सीटें हैं.

अब देखना यह है कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा मणिपुरी जनता की मुश्किलों को कितना समझ सकी है और वह इन मुश्किलों को कहां तक दूर कर पाती है? या फिर उसका वादा भी दूसरे नेताओं की तरह हवा-हवाई साबित होगा. सरकार तो जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी, ऐसे में विपक्षी पार्टी द्वारा मणिपुर आकर लोगों की व्यथा सुनना एक महत्वपूर्ण बात है. लोगों को उम्मीद है कि भाजपा मणिपुर के लिए कुछ करेगी, लेकिन वह क्या कर पाती है और कब तक? यही देखने वाली बात होगी.

सुषमा का वादा

मानसून सत्र के दौरान संसद में मणिपुर की आवाज उठाई जाएगी, जिसके तहत हाइवे प्रोटेक्शन फोर्स रखने, जरूरी वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने, मणिपुर-नगालैंड सीमा समस्या सुलझाने और अफसपा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) कानून में सुधार की मांग की जाएगी.

Wednesday 14 July 2010

धूमिल की रचना

धूमिल की अंतिम कविता जिसे बिना नाम दिये ही वे संसार छोड़ कर चल बसे।

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोडे से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।

Wednesday 23 June 2010

मणिपुर : वे 65 दिन, जिन्होंने जिंदगी को नरक बना दिया

आखिर नगा संगठनों ने बिना शर्त नाकेबंदी खत्म करने की घोषणा क्यों की? वजह साफ है कि नगालैंड होकर गुवाहाटी से आए मणिपुर के लाखों वाहनों से बीच रास्ते में एनएससीएन टैक्स वसूलता है. सामान लदे प्रत्येक ट्रक से एक हजार से लेकर पंद्रह सौ तक की रकम जबरन वसूली जाती है. पिछले लगभग ढाई माह से नाकेबंदी के चलते एनएससीएन इस अवैध वसूली से वंचित था.



कभी राज्य सरकार की अनावश्यक जिद तो कभी केंद्र सरकार का विरोधाभासी रवैया, कभी नगा संगठनों की हिंसक धमकियां तो कभी इशाक मुइवा का राजनीतिक खेल, मणिपुर आखिर कब तक इन दोराहों के बीच झूलता रहेगा. नगा संगठनों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर करीब ढाई महीने से चल रही नाकेबंदी को बंद करने की घोषणा भले कर दी हो, लेकिन मणिपुर में हालात सामान्य होने में अभी भी काफी वक्त लगेगा. पहला तो नाकेबंदी खत्म होने को लेकर ही कई विरोधाभासी बयान आ रहे हैं, ऊपर से इसके चलते स्थानीय लोगों की रोजाना की जिंदगी नारकीय होकर रह गई है. खाने-पीने की चीजें हों या जीवन की अन्य आधारभूत जरूरतें, माओ गेट होकर सामानों की आपूर्ति ठप्प होने से लोगों का जीना मुहाल हो चुका है. राज्य के अंदरूनी इलाकों में लोग दवाओं के अभाव में मर रहे हैं तो पेट्रोल-डीजल की कीमत भी आसमान छूने लगी है.



15 जून को मणिपुर के मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 39 (इंफाल-दिमापुर) और 53 (इंफाल-सिल्चर) की 65 दिनों से चली आ रही नाकेबंदी को खत्म करने की घोषणा आखिरकार ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर (एनएसएएम) ने कर दी. हालांकि यह फैसला अस्थायी है. नाकेबंदी का कारण था, ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (एडीसी) का चुनाव. पांच पहाड़ी जिलों में इस चुनाव को लेकर नगाओं को आपत्ति थी. वे एडीसी के कामकाज से खुश नहीं थे. नए नियमों के तहत एडीसी के वित्तीय अधिकारों में कटौती की जा रही है. इसलिए चुनाव का विरोध करते हुए इकोनॉमिक ब्लॉकेड का फैसला लिया गया था. मामला तब और गरमा गया, जब नगा नेता इशाक मुइवा ने मणिपुर के उख्रूल जिले के अपने पैतृक गांव सोमदाल में प्रवेश की अनुमति देने की मांग की. ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर का समर्थन करते हुए नगा स्टूडेंट फेडरेशन ने भी नगालैंड से मणिपुर आने वाली गाड़ियां रोक दीं. साथ में राष्ट्रीय राजमार्ग 39 की भी नाकेबंदी कर दी. इतना ही नहीं, राजमार्ग 59 को भी इन संगठनों ने जाम कर दिया. बीते 14 जून को नगा संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर अस्थायी तौर पर नाकेबंदी खत्म करने का फैसला लिया. वहीं दूसरी तरफ ऑल नगा स्टूडेंट एसोसिएशन ऑफ मणिपुर और ऑल स्टूडेंट्‌स एसोसिएशन ऑफ मणिपुर ने एक बयान में कहा है कि आर्थिक नाकेबंदी तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक सरकार पुलिस कमांडो और अर्द्धसैनिक बलों को राज्य के नगा आबादी वाले इलाकों से नहीं हटाती है. साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि मणिपुर सरकार इन संगठनों के प्रमुख डेविड कोरो और सैमसन रेमई के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट को भी वापस ले. सरकार ने पिछले हफ्ते इन दोनों नेताओं को अति वांछित घोषित करते हुए इन पर एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया था.



केंद्र सरकार ने लगातार बिगड़ती स्थिति से निपटने के लिए अर्द्धसैनिक बल के 2000 से ज्यादा जवान भेजने का निर्णय लिया था. 65 दिनों की नाकेबंदी ने मणिपुर की हालत नरक से भी बदतर बना दी. चारों तरफ मायूसी और उदासी छाई हुई है. इन 65 दिनों के दौरान मणिपुर में महंगाई इतनी बढ़ गई कि आम लोगों का जीना मुहाल हो गया. पेट्रोल का दाम 300 रुपये लीटर तक पहुंच गया और रसोई गैस का दाम 1500 रुपये प्रति सिलेंडर. राजधानी इंफाल के मुख्य अस्पताल और नर्सिंग होम बंद पड़े रहे. ऑक्सीजन और दवा की कमी से मरीजों का इलाज नहीं हो पाया. शिशु आहार, रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले सामानों का घोर संकट हो गया. दाम तो बढ़े ही, सामान मिलना भी मुश्किल हो गया. बीते 65 दिनों के दौरान मणिपुर के लोगों ने एक ऐसी नारकीय जिंदगी जी, जिसे बयां करना खासा मुश्किल है. स्थानीय नागरिक जय सिंह के अनुसार,एक तो रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के दाम लगातार आसमान छू रहे थे, ऊपर से वे सहज मुहैया भी नहीं थीं. महिलाओं को घर का चूल्हा जलाने के लिए लाख जतन करने पड़ते थे.

केरोसिन पहले 40 रुपये लीटर था, मगर नाकेबंदी के दौरान वह 100 रुपये प्रति लीटर हो गया. नाकेबंदी के चलते खाने-पीने का सामान, पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस एवं दवाइयां आदि पर्याप्त मात्रा में न पहुंच पाने की वजह से जिंदगी मानों थम सी गई थी. मणिपुर की सड़कों पर वाहनों की कतार खड़ी थी, क्योंकि उनमें पेट्रोल नहीं था. कुछ सार्वजनिक वाहन अगर चल भी रहे थे तो किराया तीन गुना वसूला जा रहा था. विनय सिंह ने बताया कि उन्हें अपने वाहन में पेट्रोल भराने के लिए तीन किमी लंबी लाइन लगानी पड़ी.

डीजल की कमी ने किसानों को खेतीबारी से दूर कर दिया. मणिपुर ड्राइवर वेलफेयर एसोसिएशन ने कहा कि अगर नाकेबंदी खुल भी गई तो भी वे अपनी गाड़ियां नहीं चलाएंगे, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि रास्ते में क्या होगा. उन लोगों ने कहा कि सुरक्षा का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, तब तक उनका चलना संभव नहीं है. वजह, नाकेबंदी के दौरान कई ट्रकों को राजमार्ग पर जला दिया गया, खाई में धकेल दिया गया और ड्राइवरों पर भी हमला किया गया. हालांकि राज्य सरकार ने इस मामले में हरसंभव कोशिश की. राज्य सरकार के मंत्री रंजीत सिंह के नेतृत्व में नेशनल हाइवे 53 पर रुके 377 ट्रकों को सुरक्षाबलों के साथ इंफाल तक लाया गया. इस काफिले में पेट्रोल-डीजल से भरे 25 टैंकर, रसोई गैस से लदे तीन और रोजमर्रा के सामानों से लदे 334 ट्रक और 15 यात्री बसें शामिल थीं. कार्गो हेलीकॉप्टर से भी तेल भरे ट्रक लाए गए. बावजूद इसके आम लोगों की जरूरतें पूरी नहीं की जा सकीं.

गौरतलब है कि यह नाकेबंदी ज्यादा उग्र इसलिए भी हो गई, क्योंकि नगा नेता मुइवा को मणिपुर जाने से रोक दिया गया. राज्य सरकार ने उन्हें मणिपुर आने से सख्त मना कर दिया. सरकार का कहना था कि पिछले 40 सालों के दौरान मुइवा अपने पैतृक गांव नहीं आए तो अब क्यों जाना चाहते हैं और वह भी नगा वार्ता विफल होने के बाद. शायद राज्य सरकार को लगा कि नगा संगठनों को एकजुट करने की साजिश की जा सकती है और इससे भविष्य में हिंसा का दौर फिर से शुरू होने की आशंका हो सकती है. मुइवा की मणिपुर यात्रा का कार्यक्रम राजनीति से प्रेरित था. अगर वह केवल अपने पैतृक गांव जा रहे होते तो सरकार मान भी लेती, मगर उन्होंने नगा बहुल इलाकों में जाकर बैठकों को संबोधित करने की योजना बनाई थी. इसी वजह से यह मामला उलझता चला गया. 2005 में भी एनएसएएम के इकोनॉमिक ब्लॉकेड का समर्थन करते हुए एनएसएफ ने नगालैंड के हिस्सों में मणिपुर जाने वाले वाहनों को रोककर मणिपुरी लोगों को संकट में डाल दिया था. अत्याधुनिक हथियारों से लैस उक्त संगठनों के लोग माउ से दिमापुर के बीच हमेशा यात्रियों को तंग करते हैं. लूटपाट, गाड़ी जलाना एवं लोगों को सताना आदि घटनाएं आएदिन होती रहती हैं. इन्हीं कारणों से मणिपुर में 14 जनवरी का दिन हर साल ड्राइवर डे के रूप में मनाया जाता है, इन नगा संगठनों के जुल्मों के विरोध में.

मुइवा मणिपुर में जन्मे हैं, मगर वह नगालैंड में रहकर नगा बहुल इलाकों को एक साथ मिलाकर वृहद नगालैंड (नगालिम) बनाने की मांग करते रहे हैं. प्रस्तावित नगालिम में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर की जमीनें भी शामिल हैं. मणिपुर के लोग असम, बांग्लादेश और मंडेला आदि अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, मगर उन्हें इकट्ठा करके एक अलग राज्य बनाने की मांग किसी भी लिहाज से जायज नहीं है. इसमें मुख्य बात यह है कि नगाओं के लिए पृथक राज्य की मांग कर रहे मुइवा इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि राज्य की हर नगा जाति उनकी इस मांग की समर्थक है. मुइवा अपनी प्रतिष्ठा को नजरअंदाज करते हुए नगालैंड में रह कर मणिपुर पर कब्जा जमाना चाहते हैं. वह अगर अपने गुणों और कौशल का सही इस्तेमाल करते तो हर जाति-समुदाय के लोग उन्हें सम्मान देते. एनएससीएन (आईएम) भी मणिपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग 39 पर निर्भर रहता है. गौरतलब यह है कि नगा संगठन एनएससीएन के लोग नगालैंड होकर गुवाहाटी से आने वाले मणिपुर के लाखों वाहनों से बीच रास्ते में अवैध वसूली करते हैं. इससे उन्हें करोड़ों रुपये की आमदनी होती है. सामान लदे प्रत्येक ट्रक से एक हजार से लेकर पंद्रह सौ रुपये तक वसूले जाते हैं. अगर कोई ट्रक बिना पैसा दिए चला जाए तो उसके मालिक से दोगुनी रकम वसूली जाती है. पिछले लगभग ढाई माह से नाकेबंदी के चलते एनएससीएन इस अवैध वसूली से वंचित था.

23 लाख की आबादी वाले राज्य मणिपुर में नगा ईसाई धर्मावलंबी हैं, जबकि मणिपुरी (मैतै) वैष्णव संप्रदाय में हिंदू लोग हैं. मैतै घाटी में और नगा पहाड़ियों में रहते हैं. मैतै लोग चावल की खेती करते हैं. नगालैंड में नगा जनजाति बहुमत में है, वहीं मणिपुर में नगा अल्पसंख्यक हैं. नगा नेताओं का कहना है कि नगाओं की स्वतंत्रता और उनके हकों को मणिपुरियों ने दबा रखा है. मगर सवाल यह है कि कौन से मणिपुरियों ने नगाओं को दबा कर रखा है? उच्च शिक्षा पाने में कौन बाधा उत्पन्न कर रहा है? नौकरी में भी नगाओं को आरक्षण की सुविधा है. आखिर यहां कौन उनका हक मार रहा है? विकास कार्यों में भी सबकी समान हिस्सेदारी रही है.
उधर केंद्र सरकार भी मणिपुर संकट के प्रति संवेदनशील नहीं दिख रही है. लोग सवाल करने लगे हैं कि कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार जितनी संवेदनशील है, उतनी मणिपुर को लेकर क्यों नहीं? मणिपुर भी भारत का एक अहम हिस्सा है. जानकारों का मानना है कि अगर केंद्र सरकार मणिपुर के मौजूदा संकट पर शीघ्र ध्यान नहीं देती है तो एक बड़ा जनांदोलन खड़ा होने में देर नहीं लगेगी. जाहिर है, यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा.

Wednesday 19 May 2010

मुइवा, मणिपुर और केंद्र की दोहरी नीति


पिछले दस वर्षों से शीर्ष नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएनआईएम) और केंद्र सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला आ रहा है. बीते अप्रैल में हुई नई दौर की वार्ता से लोगों को लगा कि इस बार दोनों पक्ष एक-दूसरे को बेहतर तरीक़े से समझ पा रहे हैं. नए वार्ताकार आर एस पांडे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाक़ात करने के बाद मुइवा से मिले थे. पांडे नगालैंड कैडर से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए आईएएस अधिकारी हैं. उनसे पहले के पद्मनाभन ने मुइवा एवं इसाक स्वू के साथ कई दौर की बातचीत करके नींव तैयार की थी और अब समझौता होने के आसार दिखने लगे थे. मगर, केंद्र सरकार के कुछ ़फैसलों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. केंद्र ने अचानक अपना रुख़ बदलते हुए सीधे जवाब दे दिया कि पड़ोसी राज्यों की सहमति के बिना इस वार्ता का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल सकता. सरकार का यह बयान इस समस्या की सच्चाइयों से मुंह मोड़ना है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नगा बागी वृहद नगालिम में पड़ोसी राज्यों के कुछ नगा बहुल इलाक़ों को भी शामिल करने की मांग करते रहे हैं. जब यह पहले से ही स्पष्ट है तो इस मौक़े पर केंद्र का यह बयान अपने बढ़े पैरों को पीछे खींचने जैसा है.

पिछले कई वर्षों से नगा बागी वृहद नगालैंड (नगालिम) के तहत नगा बहुल इलाक़ोंे को एक पृथक प्रशासनिक तंत्र में शामिल करने की मांग करते रहे हैं. उनका कहना है कि नगालिम में नगालैंड के अलावा मणिपुर के चार ज़िले, असम के दो पहाड़ी ज़िले और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के दो ज़िले भी शामिल किए जाएं. केंद्र के इस बयान से वार्ता असफल हुई तो एनएससीएन (आईएम) के मुखिया मुइवा ने अपना पैंतरा बदला. उन्होंने 3 से 10 मई तक मणिपुर में अपने जन्मस्थान उख्रूल के सोमदाल आने का ़फैसला किया. नगा शांति वार्ता पिछले दस वर्षों से चल रही है, लेकिन इस बीच मुइवा कभी मणिपुर नहीं आए. अब उनके इस ़फैसले ने राज्य की जनता को दो हिस्सों में बांट दिया है. स्थानीय लोगों का एक हिस्सा मुइवा को आने देने के पक्ष में है, तो राज्य की जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा ऐसा नहीं होने देना चाहता. उसे डर है कि मुइवा अपने मणिपुर दौरे के दौरान लोगों को लामबंद करने की कोशिश करेंगे, जिससे राज्य का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है. बिफरी हुई जनता चौक-चौराहों और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन पर उतर आई.



राज्य सरकार भी इस ख़तरे से वाक़ि़फ थी और यही वजह है कि राज्य कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर यह ़फैसला ले लिया कि मुइवा को किसी भी क़ीमत पर मणिपुर में प्रवेश की इजाज़त नहीं दी जाएगी. मणिपुर और नगालैंड की सीमा माओ गेट पर धारा 144 के तहत कर्फ्यू लगा दिया गया. मणिपुर का द्वार कहे जाने वाले माओ गेट पर कमांडो पुलिस और सुरक्षाबलों को मुइवा को आने से रोकने के लिए तैनात कर दिया गया. दूसरी ओर, मुइवा के मणिपुर आगमन का समर्थन करने वाले हज़ारों लोगों की भीड़ पांच मई को कर्फ्यू का उल्लंघन करती हुई माओ गेट पर एकत्र हो गई. मुइवा के स्वागत के लिए आए लोगों की पुलिस के साथ झड़प हुई. उन्हें रोकने के लिए सुरक्षाबलों को हवाई फायरिंग और टियर गैस का इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक घायल हो गए. घटना में मारे गए लोगों के परिजनों ने शव ले जाने से मना कर दिया है. पुलिस कार्रवाई के बाद मार्केट सेंटर के रूप में प्रचलित माउ बाज़ार में सन्नाटा पसरा है. बड़ी दुकानें, होटल और रोजमर्रा की ज़रूरतों वाली दुकानें बंद हैं. नेशनल हाइवे नंबर 39, जो मणिपुर को देश के बाक़ी हिस्सों से जोड़ता है, पूरी तरह बंद पड़ा है. इस वजह से लोग गुवाहाटी से इंफाल नहीं पहुंच पा रहे हैं. राज्य के बाहर रहने वाले हज़ारों छात्र अपने घर नहीं जा पा रहे हैं. माउ गेट पर मणिपुर आने वाली तेल और खाने-पीने के सामान से लदी गाड़ियां रुकी हुई हैं. राज्य में महंगाई आसमान छू रही है और जनता रोजमर्रा की ज़रूरतों की पूर्ति से भी महरूम है. मणिपुर की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए पीएमओ ने आदेश दिया कि जब तक यहां का माहौल शांत नहीं हो जाता, मुइवा की मणिपुर यात्रा स्थगित रहे. नगालैंड के मुख्यमंत्री नैफ्यू रिउ ने भी माहौल शांत होने तक यात्रा स्थगित रखने की अपील की. इस मामले में मणिपुर सरकार और जनता एक साथ है. लेकिन, केंद्र के टालमटोल वाले रवैये ने एक बार फिर इस आग में घी डाल दिया.


दिल्ली से बुलावा आने पर मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इबोबी सिंह 7 मई को दिल्ली पहुंचे. इस मसले को लेकर गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य वरिष्ठ नेताओं से उनकी बातचीत हुई. केंद्र ने मुख्यमंत्री से कहा कि वह मुइवा के मणिपुर आने की व्यवस्था करें. केंद्र सरकार का तर्क है कि एनएससीएन (आईएम) प्रतिबंधित संगठन नहीं है और इसलिए मुइवा को मणिपुर में आने से रोकना उचित नहीं है. उसने राज्य सरकार को मुइवा के लिए ज़रूरी सुरक्षा इंतज़ाम करने की सलाह दी, लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसा करने से इंकार कर दिया. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मुइवा को रोकने का ़फैसला उनका व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य कैबिनेट का है, जो इस आधार पर लिया गया है कि 40 वर्ष बाद मुइवा का अपने जन्मस्थल लौटना एनएससीएन (आईएम) के पक्ष में नया माहौल बनाने में मददगार साबित हो सकता है. राज्य सरकार इसलिए भी डरी हुई है, क्योंकि मुइवा उख्रूल के अलावा मणिपुर के कई अन्य ज़िलों जैसे सेनापति, तमेंगलोग और अन्य नगा बहुल इलाक़ों में जाने की योजना बना रहे थे. सरकार का मानना है कि अपनी बैठकों और भाषणों के ज़रिए मुइवा हज़ारों वर्षों से एक साथ रह रहे नगा और मणिपुरी लोगों के बीच अलगाव की कोशिश करेंगे. केंद्र सरकार के इन विरोधाभासी ़फैसलों को देखकर आम जनता को लगने लगा है कि केंद्र मुइवा के इस दौरे का राजनीतिक इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसमें मुइवा को हथियार बनाया जा रहा है. हालांकि, राज्य सरकार मुइवा को रोकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन फिर भी अगर मुइवा आ जाते हैं, तो इसके हर परिणाम के लिए केंद्र सरकार ही ज़िम्मेदार होगी. केंद्र के इस रवैये ने स्थानीय लोगों के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है. उन्हें लग रहा है कि मुइवा के मणिपुर आने का यह मुद्दा कहीं 2001 के उस कांड की पुनरावृत्ति न कर दे, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गई थी. लोग सहमे हुए हैं. 18 जून, 2001 को हुई घटना के लिए भी लोग मुइवा को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि मुइवा अगर ग्रेटर नगालैंड के सपने न देख रहे होतेे, तोे 18 जून की घटना नहीं घटती और शांति वार्ता भी तेज़ी से आगे बढ़ती.

केंद्र सरकार केवल अपना राजनीतिक लाभ देखते हुए मुइवा को मणिपुर आने देने के लिए दबाव डाल रही है, मगर वह इस बात को भूल रही है कि वहां की जनता भी भारत का हिस्सा है, उसकी भावनाओं से खेलकर केंद्र दरअसल उसके मन में अपने ही ख़िला़फ कांटे बो रहा है. इससे देश की एकता और अखंडता को ख़तरा हो सकता है. केंद्र सरकार ने अगर दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखा होता, तो वह यह निर्णय न लेती. शांति वार्ता को लेकर आम जनता का ख़ून बहा था, वह शायद केंद्र को याद नहीं है. स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि अब यदि मणिपुर सरकार मुइवा को आने की इजाज़त दे भी देती है, तो हालात इससे भी ज़्यादा बदतर हो सकते हैं. अब भी समय है कि केंद्र सरकार राजनीतिक बयानबाज़ी और निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए ज़मीनी हक़ीक़त को समझे. साथ ही उसे यह भी समझना होगा कि यह मामला जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए ज़रूरी है कि वह ज़बरदस्ती की अड़ंगेबाज़ी से बाज आए और राज्य की बहुसंख्यक जनता की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों को स्पष्ट करे.


मणिपुर ज़रूर जाऊंगा : मुइवा



नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने भारत सरकार से शिलांग समझौता टूटने के बाद 30 अप्रैल, 1988 को नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड का गठन किया था. बाद में एनएससीएन दो गुटों में बंट गया. पहला गुट एनएससीएन (आईएम) यानी आइजाक चीसी स्वू और थुइङालेंग मुइबा और दूसरा एनएससीएन (के) यानी खपलांग के रूप में जाना जाने लगा. एनएससीएन (आईएम) का एक ही मक़सद है, माओत्से-तुंग की क्रांतिकारी विचारधारा पर आधारित ग्रेटर नगालिम का गठन. इस संगठन के घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि नया नगालैंड केवल ईसाइयों के लिए हो. भारतीय संविधान के मौजूदा दायरे में ऐसा संभव नहीं है और एनएससीएन (आईएम) इसके ख़िला़फ सशस्त्र आंदोलन चलाने का पक्षधर है. हालांकि, केंद्र के साथ पहली बार 1997 में हुए युद्ध विराम समझौते के बाद से हिंसा का दौर थमा हुआ है, लेकिन मौजूदा विवाद से सांप्रदायिक भावनाएं एक बार फिर भड़क जाने का ख़तरा भी पैदा हो गया है. दूसरी ओर, संगठन के जनरल सेके्रटरी थुइङालेंग मुइवा भी राज्य सरकार को चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. उनका कहना है कि मैं मणिपुर ज़रूर जाऊंगा और अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों से मिलूंगा. कोई भी ताक़त मुझे नहीं रोक सकती. मैं मणिपुरियों से कुछ नहीं लूंगा. किसी भी तरह के आपत्तिजनक काम नहीं करूंगा. मैं स़िर्फ नगाओं के हक़ की ही मांग करूंगा. मणिपुरियों ने मेरी यात्रा में बाधा डाली, इससे मैं बहुत आहत हूं. यह यात्रा शांति के लिए है, किसी को परेशान करने के लिए नहीं.

Saturday 8 May 2010

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

-पाश

Saturday 13 March 2010

नगा समस्‍या हल की ओर



ऐसा प्रतीत होता है कि एनएससीएन (आईएम)के जरिए नगाओं के साथ हो रही सरकार की बातचीत अंतिम चरण में है. अब दोनों पक्ष एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं. प्रधानमंत्री व गृहमंत्री से मुलाकात करने के बाद श्री मुइवा अब नए वार्ताकार आरएस पांडे से बातचीत कर रहे हैं. श्री पांडे नगालैंड कैडर के हाल ही में सेवानिवृत्‍त हुए आईएएस अधिकारी हैं. उनसे पहले के पद्मनाभन ने मुइवा एवं इसाक स्‍वू के साथ कई दौरों की बातचीत करके धैर्यपूर्वक एक अधिकार तैयार किया था जिसके आधार पर अब समझौता होने के कगार पर है.
सरकार ने नगाओं के अनूठे इतिहास को स्‍वीकार तभी जाकर विश्‍वास की बुनियाद पडी और आगे बातचीत में प्रगति हो सकी. एनएससीएन (आईएम) की दो प्राथमिक मांगें थीं संप्रभुता और नगालिम यानी भारत के सभी नगा क्षेत्रों का एकीकरण (और म्‍यांमार में पूर्वी नगालैंड). समय के साथ सरकार एनएससीएन आईएम को थोडा बहुत यह समझाने में कामयाब रही है कि भारत में राज्‍यों का जो ढांचा है वह सरकारी संघवाद का ढांचा है जिसमें एक गणतंत्र के अंतर्गत सभी राज्‍यों की सहयोगी संप्रभुता बरकरार है. फिर भी इससे आगे जाकर सरकार ने यह स्‍वीकार किया है कि संविधान के मौजूदा ढांचे में अतिरिक्‍त व्‍यवस्‍था करके नगाओं की अनूठी पहचान को एक अलग मान्‍यता दी जाएगी.
एनएससीएन आईएम से यह पूछा गया है कि भारतीय संविधान का कौन सा हिस्‍सा वे अपनी इच्‍छा से अपनाने को तैयार हैं तथा कौन से अतिरिक्‍त अध्‍याय वे विशेष नगा संविधान के तहत लिखना चाहते हैं जिन्‍हें भारतीय संविधान में एक अलग अध्‍याय के तौर पर जोडा जा सके. संभव है कि आलोचक इस मुद्दे पर चीख पुकार मचाने लगे लेकिन अगर वे गौर से देखें तो पाएंगे कि भारतीय संविधान में कई छोटे छोटे संविधान या विशेष व्‍यवस्‍थाएं की गई हैं. इनका ब्‍यौरा अनुच्‍छेद 370, 371 और 371 ए (नगालैंड के संदर्भ में) से लेकर 371 आई तथा पांचवीं व छठी अनुसूची में दिया गया है. यह ब्‍यौरा अनुसूचित जाति व जनजाति अन्‍य पिछडा वर्ग, धार्मिक व भाषाई अल्‍पसंख्‍यकों हेतु विशेष सकारात्‍मक कार्रवाई तक फैला हुआ है. ये सभी सूक्ष्‍म बदलाव हमारे संवैधानिक व सामाजिक परिद्श्‍य का हस्‍सा हैं. ये सभी इस तरह हमारे संविधान में भलीभांति समा गए हैं कि हम अकसर इनके अस्तित्‍व को पहचान भी नहीं पाते.
इनमें से कुछ को राज्‍यसूची में स्‍थानांतरित करके किया गया है जो कि संविधान संशोधन के द्वारा अब सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में शामिल है. यह कोई समस्‍या मूलक बात नहीं है क्‍योंकि इनमें से कुछ को मौजूदा अनुच्‍छेद 371 ए में सीमित हद तक शामिल कर लिया गया है. अब भी अनुच्‍छेद 258 के जरिए हस्‍तांतरण परिवर्तन संभव है जिसके तहत केंद्र को ऐसा मसला सौंपने का अधिकार है जिसके माध्‍यम से संघ की कार्यपालिका की शक्ति का विस्‍तार होता हो. भारतीय संविधान की उदार समायोजन क्षमता के चलते इनमें से कोई भी राष्‍ट्र की एकता व अखंडता को प्रभावित नहीं करेगा. चाहे जो भी दावा किया जाए पर नगा मामला सबसे अनूठा है.
इसके अलावा नगालिम का मुद्दा भी कोई दुसाध्‍य नहीं है. जैसा कि कभी कभी नगालिम की कल्पित सीमाएं खींची जाती हैं उनका बहुत थोडा ही ऐतिहासिक आधार है क्‍योंकि पूर्वोत्‍तर के अपने बाकी बंधुओं की ही तरह नगा भी प्रवासी रहे हैं और संभवत: अब भी हैं. उदाहरण के लिए दीमापुर इस इलाके का सबसे बेशकीमती क्षेत्र है जो पहले दिमसा साम्राज्‍य की राधानी हुआ करता था. अब यह एक प्रमुख नगा शहर और यह ऐसा ही रहेगा चाहे दिमसा कुछ भी दावा करें क्‍योंकि इतिहास बदला नहीं जा सकता. इसी प्रकार भारत की सबसे पुरानी रियासतों में से एक मणिपुर को बांटा नहीं जा सकता. असम से कछार को तथा अरुणाचल प्रदेश से तिरिप व चांगलांग को काट कर अलग नहीं किया जा सकता.
इस समस्‍या का हल क्षेत्रीय पुनर्गठन से नहीं हो पाएगा तथा इसका पुरजोर विरोध होगा; बल्कि इन बाकी नगा बहुल क्षेत्रों को एक गैर प्रादेशिक इकाई में एक साथ आने से ही हल होगा. इस तरह सारे नगा लोग आर्थिक सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक विकास के लिए, मौजूदा प्रशासनिक न्‍यायालय की अवमानना किए वगैर एकत्रित हो पांगे. इसका उदाहरण हितेश्‍वर साइकिया द्वारा बनाई गई मौजूदा शीर्ष परिषदों में देखा जा सकता है जिनमें असम के विस्‍तृत क्षेत्र में दूर दूर बसी छोटी छोटी जनजातियों जैसे तिवास, रभास और मिशिंग को शामिल करके उनके हितों का ख्‍याल रखा जा रहा है. शीर्ष परिषदों द्वारा एक कार्यकारी निकाय चुना जाता है. यह निकाय न्‍यासगत बजट के प्रशासक के तौर पर काम करता है तथा स्‍थानांतरित विषयों पर अपने खास लोगों के माध्‍यम से योजना बनाता है.
एक गैर प्रादेशिक नगा पीपुलहुड अस, अरुणाचल, मणिपुर के नगा इलाकोंे में आर्थिक व सामाजिक विकास हेतु साझे कार्यक्रम चला कर नगा लोगों को सशक्‍त कर सकता है. ऐसा करने के लिए विभिन्‍न प्रशासनिक तरीके मौजूद हैं. मूल राज्‍य अपने प्रदेश की सीमाओं के भीतर ऐसी इकाइयों को सशक्‍त कर सकता है. राजनीतिक स्‍तर पर सर्वर नगा हो हो राज्‍य ने सीमाओं के बाहर ही नहीं बल्कि अंतरराष्‍ट्रीय सीमाओं के रूप में भी कार्य किया है.
कल्‍पनाशक्ति व रचनात्‍मकता से समाधान निकाले जा सकते हैं. कुछ ऐसे समाधान पहले ही उपलब्‍ध हैं बाकी संविधान में संशोधन करके हासिल किए जा सकते हैं. के ग्रुप ने संप्रभुता का मुद्दा त्‍याग देने के लिए आईएम ग्रुप की निंदा की है. ये सौदेबाजी के तरीके हैं. हां यह बहुत जरूरी है कि सभी किस्‍म के नगा विचारधाराओं के लोगों को एक मंच पर लाया जाए यानी आईएम, के तथा फिजो द्वारा स्‍थापित नगा राष्‍ट्रीय परिषद के दोनों धडों को भी. समग्र समाधान हेतु यह आवश्‍यक है. श्री मुइवा मणिपुर के एक तांगखुल नगा हैं और श्री खापलांग बर्मा के एक हेमि नगा हैं, इन बातों से कोई फर्क नहीं पडता.
मंजिल तक पहुंचने के लिए यह जरूरी है कि सफर तय किया जाय. नगर व भारतीय शीर्ष नेतृत्‍व को चाहिए कि वह अपने पूर्वाग्रह त्‍यागे और नए अवसरों को गले लगाए. नगा संघष्‍र्ज्ञ का अंत एक मलहम का काम करेगा और इससे यह संदेश जाएगा कि वैरभाव व कटुता से शांति और प्रगति कहीं भी, कभी भी हासिल नहीं की जा सकती.

वी जी वर्गीज
लेखक द इंडियन एक्‍सप्रेस के पूर्व संपादक हैं
साभार : नई दुनिया (13 मार्च 2010)

Wednesday 3 March 2010

संस्‍कार की थैली

मेरी मां ने दी मुझे संस्‍कार की एक थैली
जिसे मेरी नानी ने दी थी मेरी मां को
उसमें बहुत सारी थीं रूढियां-परंपराएं
जिसके तहत चलने को कहा मुझे
मैं संस्‍कारी, मां की अनुयायी
निभाती रही ये परंपराएं
मानती रही ये रूढियां
कई लोग रोके गए मेरे चौखट से
कई लोगों ने कोसा, अनुताप किया
एक दिन मैं बहुत क्रोधित हुई
वो रूढियां-परंपराएं फिर से डालीं
मैंने उस संस्‍कार की थैली में
और जाके फेंक दी नाले में

इंतजार
(मणिपुर मांओं के लिए)

वहां पर रोज कई बेटों का जन्‍म होता है
दूध पिलाती है मां
इंतजार करती है बडा होने का
बेटा बडा होता है, पहली बार घर से
निकलता है
तो वापस नहीं आता
इंतजार करती रहती है मां
हाथ में मशाल, आंखों में आस लिए
आता नहीं कोई वापस
वापस आता है तो
शव.... कई वर्षों के इंतजार के बाद


प्रियोबती निंगथौजा

प्रियोबती निंगथौजा महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी भाषा एवं साहित्‍य में अध्‍ययनरत छात्रा है.

लेखिका का पता है: महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा महाराष्‍ट्र 442001

साभार : परिकथा

Thursday 11 February 2010

मां

मक्सिम गोर्की की मां के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं होगी. पालभेन की मां खाली पालभेन की ही नहीं होती, पालभेन जैसे हजारों बेटों पर अपनी ममता न्योछावर करती है। इन दिनों मां के करीब हूं. मां का पहला अंक आप लोगों को शेयर करता हूं. शायद आप लोग भी मेरी तरह मां की याद करे.



मजदूरों की बस्ती की धुआंरी और गंदी हवा में हर रोज फैक्टरी के भोंपू का कांपता हुआ कर्कश स्वर गूंज उठता और उसके आवाहन पर छोटे-छोटे मटीले घरों से उदास लोग सहमे हुए तिलचट्‌टों की तरह भाग पड़ते. नींद पूरी करके अपने थहे हुए अंगों को आराम भी नहीं दे पाते थे. ठिठुरते झुटपुटे में वे कच्ची सड़क पर फैक्टरी की ऊंची-सी पत्थर की इमारत की तरफ चल पड़ते, जो बड़े निर्मम तथा निश्चिंत भाव से उनकी प्रतीक्षा करती रहती थी और जिसकी तेज से चिकनी दर्जनों चौकोर आंखें सड़क पर प्रकाश करती थीं. उनके पेरों के नीचे कीचड़ की छप-छप होती थी. वे अलसाई हुई आवाज में चिल्लाते और हवा में उनकी गंदी गालियां गूंज उठतीं और दूसरी आवाजें- मशीनों की गड़गड़ाहट और भाप की फक-फक हवा में तैरती हुई आकर इन आवाजों में मिल जातीं. ऊंची-ऊंची काली चिमनियां, जो बहुत कठोर और निराशापूर्ण मालूम होती थीं बस्ती के ऊपर मोटे-मोटे मुगदरों की तरह अपना मस्तक ऊंचा किये खड़ी रहती थीं.
शाम को जब डूबते हुए सूरज का थका-थका प्रतिबिंब घरों की खिड़कियों में दिखाई देता तो फैक्टरी इन लोगों को अपने पाषाण उदर से उगल देती, मानो वे साफ की गई धातु का बचा हुआ कचरा हों और वे फिर सड़क पर चल पड़तेः गंदे, चेहरों पर कालिख, भूखे, दांत चमकते हुए और शरीर से मशीन के तेल की दुर्गंध आती हुई. इस समय उनके स्वर में उत्साह होता था, उल्लास होता था क्योंकि काम का एक दिन और खत्म हो चुका था और घर पर रात का खाना और विश्राम उनकी बाट जोह रहा था.
दिन को तो फैक्टरी निगल गई थी, उसकी मशीनों ने जी भरकर मजदूरों की शक्ति को चूस लिया था. दिन का अंत हो गया था, उसका एक चिन्ह भी बाकी नहीं रहा था और मनुष्य अपनी कब्र के एक कदम और निकट पहुंच गया था. परंतु इस समय विश्राम की, और धुएं से घुटे हुए शराबखाने की सुखद कल्पना कर रहा था और उसे संतोष था.
इतवार को छुट्‌टी के दिन लोग दस बजे तक सोते थे और फिर शरीफ विवाहित लोग अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर गिरजाघर जाते थे और नौजवानों को धर्म के प्रति उनकी उदासीनता के लिए डांटते-फटकारते थे. गिरजे लौट कर वे घर आते, कीमे के समोसे खाते और फिर शाम तक सोते.
बरसों की संचित थकान के कारण उनकी भूख मर जाती थी इसलिए शराब पीकर वे अपनी भूख चमकाते, तेज वोदका के घूंटों से अपने पेट की आग को भड़काते.
शाम को वे सड़कों पर घूमते फिरते. जिनके पास रबड़ के जूते होते, वे जमीन सूखी होने पर भी उन्हें पहनते और निके पास छतरियां होतीं, वे आसमान साफ होने पर भी उन्हें लेकर चलते.
दोस्तों से मिलते तो फैक्टरी की, मशीनों की और अपने फोरमैन की बात करते, वे ऐसी चीज के बारे में न तो कभी सोचते थे और न बात ही करतेजिसका उनके काम से संबंध न हो. उनके जीवन के नीरस ढर्रे में कभी कभी इक्का-दुक्का भटकते हुए विचारों की मद्धिम चिंगारियां चमक उठतीं. जब लोग घर वापस लौटते तो अपनी घरवालियों से झगड़ते और बहुधा उन्हें पीटते. नौजवान लोग शराबखानों में या अपने दोस्तों के घर जाते, जहां वे अकार्डियन बजाते, गंदे गीत गाते, नाचते, गालियां बकते और शराब पीकर मदहोश हो जाते कठोर परिश्रम से चूर होने के कारण नशा भी उनको जल्दी चढ़ता और एक अज्ञात झुंझलाहट उनके सीनों में मचलती और बाहर निकलने के लिए बेचैन रहती. इसी लिए मौका पाते ही वे दरिंदों की तरह एक दूसरे पर टूट पड़ते और अपने दिल की भड़ास निकालते. नतीजा यह होता कि खूब मारपीट और खून-खराबा होता कभी-कभी किसी को बहुत सख्त चोट लग जाती और कभी तो इन लड़ाइयों में किसी की जान भी चली जाती.
उनके आपस के संबंधों में शत्रुता की एक छिपी हुई भावना छायी रहती. यह भावना उतनी ही पुरानी थी जितनी कि उनके अंग-अंग की बेहद थकान. आत्मा की ऐसी बीमारी वे अपने बाप-दादा से उत्तराधिकार में लेकर पैदा होते थे और यह परछाई की तरह कब्र तक उनके साथ लगी रहती थी. इसके कारण वे ऐसी बेतुकी क्रूर हरकतें करते थे कि घृणा होती थी.
छुट्‌टी के दिन नौजवान लोग बहुत रात गए घर लौटते, उनके कपड़े फटे होते, मिट्‌टी और कीचड़ में सने हुए, आंखें चोट से सूीे हुई और नाक से खून बहता हुआ. कभी वे बड़ी कुत्सा के साथ इस बात की डींग मारते कि उन्होंने अपने किसी दोस्त को कितनी बुरी तरह पीटा था और कभी उनका मुंह लटका होता और वे अपने अपमान पर गुस्सा होते या आंसू बहाते. ऊे शराब के नशे में चूर होते, उनकी दशा दयनीय, दुखद और घृणास्पद होती. बहुधा माता-पिता अपने बेटों को किसी बाड़ के पास या शराबखाने में नशे में चूर पड़े पाते. बड़े-बूढ़े उन्हें बुरी तरह कोसते, उनके नरम वोदका के कारण शिथिल हुए शरीरों पर घूंसे लगाते, फिर उन्हें घर लाकर किंचित स्नेह के साथ बिस्तर पर सुला देते ताकि जब मुंह अंधेरे ही काली नदी की तरह भोंपू का कर्कश स्वर हवा में फिर गूंजे तो वे उन्हें काम पर जाने के लिए जगा दें.
वे अपने बच्चों को कोसते और बड़ी निर्ममता से पीटते थे, पर नौजवानों की मारपीट और उनकी दारू पीने की लत को स्वाभाविक माना जाता था. इन लोगों के पिता जब खुद जवान थे तब वे भी इसी तरह लड़ते झगड़ते और शराब पीते थे और उनके माता पिता भी इसी तरह उनकी पिटाई करते थे. जीवन हमेशा से इसी तरह चलता आया था. जीवन का प्रवाह गंदे पानी की धारा के समान बरसों से इसी मंद गति के साथ नियमित रूप से जारी था, दैनिक जीवन पुरानी आदतों, पुराने संस्कारों, पुराने विचारों के सूत्र में बंधा हुआ था. और इस पुराने ढर्रे को कोई बदलना भी तो नहीं चाहता था.
कभी-कभी फैक्टरी की बस्ती में कुछ नए लोग भी आकर बस जाते थे. शुरू-शुरू में तो उनकी ओर ध्यान जाता, क्योंकि वे नए होते, फिर धीरे-धीरे केवल इस कारण उनमें हल्की और ऊपरी सी दिलचस्पी बनी रहती कि वे उन जगहों के बारे में बताते जहां पहले काम कर चुके थे. परंतु शीघ्र ही उनका नयापन खत्म हो जाता, लोग उनके आदी हो जाते और उनकी ओर विशेष ध्यान देना छोड़ देते. ये नए आए हुए लोग जो कुछ बताते उससे इतना स्पष्ट हो जाता कि मेहनतकशों का जीवन हर जगह एक जैसा ही है और यदि यह सच है तो फिर बात ही क्या की जाए?
पर कुछ नए आने वाले ऐसी बातें बताते जो बस्तीवालों के लिए अनोखी होतीं. उनसे बहस तो कोई न करता, पर वे उनकी अजीब-अजीब बातें शंका के साथ सुनते. ऊे जो कुछ कहते, उससे कुछ लोगों को झुंझलाहट होती, कुछ को एक अस्पष्ट सा भय अनुभव होता और कुछ से हृदय में आशा की एक हल्की सी किरण जगमगा उठती और इसी कारण वे और ज्यादा शराब पीने लगते ताकि जीवन की गुत्थी को और उलझा देने वाली आशंकाओं को दूर भगा सकें.
किसी नवागंतुक में कोई असाधारण बात नजर आने पर बस्ती वाले इसी कारण उससे असंतुष्ट रहने लगते और जो कोई भी उनके जैसा न होता उससे वे सतर्क रहते. उन्हें तो मानो यह डर लगता कि वह उनके जीवन की नीरस नियमितता को भंग कर देगा जो कठिनाइयों के बावजूद कम से कम निर्विघ्न तो था. लोग इस बात के आदी हो गए थे कि जीवन को बोझ उन पर हमेशा एक जैसा रहे और चूंकि उन्हें छुटकारा पाने की कोई आशा नहीं थी, इसलिए वे यह मानते थे कि उनके जीवन में जो भी परिवर्तन आएगा वह उनकी मुसीबतों को और बढ़ा देगा.
नए विचार व्यक्त करने वालों से मजदूर चुपचाप कन्नी काटते रहते. इसलिए ये नवागंतुक वहां से कहीं और चले जाते. अगर कुछ यहीं रह जाते तो वे या तो धीरे धीरे अपने साथियों जैसे ही हो जाते, या फिर कटे-कटे रहते...
कोई पचास वर्ष तक इसी प्रकार की जीवन बिताने के बाद आदमी मर जाता.

Tuesday 2 February 2010

मणिपुर : दिन-प्रतिदिन बिगडते सुर

एक तरफ पूरा देश में महंगाई की मार से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ गणतांत्रिक खुशियों की खुमारी भी है. इस समय किसका ध्‍यान हाशिया की खबरों पर जाता है. पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में सबसे संवेदनशील प्रदेश मणिपुर की स्थिति दिन ब दिन बदत्‍तर होती जा रही है. हाल ही में स्‍कूली छात्रों ने स्‍कूल जाना शुरू किया है. पिछले पांच महीनों से सरकारी और गैरसरकारी स्‍कूलें बंद पडे थे. प्रदेश में आतंकवादी समस्‍या तो स्‍थाई समस्‍या है ही. हत्‍या और बलात्‍कार की घटनाएं भी पूरे प्रदेश की सजावट है. ऐसे मौके में पूरे पूर्वोत्‍तर राज्‍यों खास कर मणिपुर की बिगडी स्थिति के बारे में अश्विनी कुमार के गंभीर चिंतन. यह शानदार आलेख, पंजाब केसरी से साभार.



जब भी हम दिल्‍ली से मुंबई, हैदराबाद जाने के लिए उडान भरते हैं तो हमें लगता है कि भारत कितना बढिया देश है, जब हम चमचमाती सडकों और फ्लाइओवरों पर तेज रफ्तार की गाडियों में बैठे बहुमंजिली इमारतों को निहारते हैं तो हमें सब कुछ तिलिस्‍मी लगता है, सोचते हैं - देखते ही देखते कितना कुछ बदल गया. उडान भरते भारत को देखने का अर्थ यह नहीं कि विकास की लहर हर कोने में पहुंच गई है. जितना देश महानगरों में खूबसूरत लगता है भीतर से उतना ही खोखला और भयावह है. मैं बात कर रहा हूं देश के पूर्वोत्‍तर राज्‍यों की. ब्रिटेन की दासता से मुक्‍त होने के बाद से ही असम, मणिपुर और नगालैंड आतंकवाद से ग्रस्‍त हैं. सैकडों युवक जो अच्‍छे शिक्षक, नियोजक, इंजीनियर, डाक्‍टर और नेता बन सकते थे, अपनी जान गंवा बैठे. फिर भी नियति से छुटकारा नहीं मिला. असम में जो कुछ हुआ या हो रहा है वह सबके सामने है लेकिन मणिपुर और नगालैंड के बारे में उत्‍तर भारतीयों को कुछ अधिक जानकारी नहीं. मणिपुर की स्थिति इतनी भयानक हो चुकी है लगता है कि भारत एक और राज्‍य खो रहा है. मणिपुर में जीवन के अधिकार को शिक्षा के आधार से बडा बताते हुए तीन महीने से अधिक स्‍कूल कॉलेज बंद रहे. किसी ने इस ओर ध्‍यान नहीं दिया क्‍योंकि उत्‍तर भारतीय प्रिंट मीडिया भी एक कॉलम की छोटी सी खबर देकर इतिश्री कर लेता है. इलैक्‍ट्रोनिक मीडिया को रिएल्‍टी शोज से फुर्सत नहीं. ऐसे में देश की वास्‍तविक स्थिति से लोग अनभिज्ञ हैं. पिछले कई वर्षों से राज्‍य के किसी शिक्षा संस्‍थान में न तो राष्‍ट्रगान ही गाया गया न ही वंदेमातरम. हिंदी बोलने पर अघोषित प्रतिबंध है. फिर भी मणिपुर कश्‍मीर की तरह भारत का अभिन्‍न अंग है. राज्‍य के शिक्षण संस्‍थान तो अब खुल चुके हैं, लेकिन इनके ठप रहने का करण यह था कि आल मणिपुर स्‍टूडैंट्स यूनियन, मणिपुरी स्‍टूडैंट्स फैडरेशन और कांगलेइपाक स्‍टूडैंट्स एसोसिएशन का आराप था कि एक प्रतिबंधित पूर्व संगठन पीपुल्‍स लिबरेशन आर्मी के एक सदस्‍य और महिला की दिनदहाडे फर्जी मुठभेड में हत्‍या कर दी गई थी, लेकिन मुख्‍यमंत्री इबोबी सिंह की सरकार ने दोषियों को दंडित करने के लिए कुछ नहीं किया. कई सामाजिक संगठनों ने इस फर्जी मुठभेड के खिलाफ जन आंदोलन चलाया. छात्रों ने कक्षाओं के बहिष्‍कार का आह्वान किया था. अंतत: सरकार ने मजबूर होकर एक सेवानिवृत्‍त जज की अध्‍यक्षता में एक आयोग का गठन किया, तब जाकर शिक्षण संस्‍थान खुले. इंफाल की प्रेस यह आवाज उठाती रही कि सत्‍ता में कौन है और कानून किसके हाथ में है ? उसने हालात के लिए सरकार को जिम्‍मेदार ठहराया. राज्‍य में कानून-व्‍यवस्‍था लगभग समाप्‍त हो चुकी हे क्‍योंकि राज्‍य में सरकार का नहीं अलगाववादी संगठनों का शासन स्‍थापित है. हथियारों की खुलेआम बिक्री होती है. राज्‍य के सीमांत बाजारों में बंदूक दस हजार में आसानी से मिल जाती है. सीमापार से हथियार और नशीले पदार्थों की तस्‍करी की जाती है. मणिपुर की स्‍वायत्‍तता के लिए 25 से अधिक संगठन सक्रिय हैं जिनके कैडर के पास हथियार आसानी से पहुंच जाते हैं. उत्‍तर-पूर्व के कई आतंकवादी संगठनों के भारत-म्‍यांमार लंबी सीमा के उस पार नगालैंड-मणिपुर के उत्‍तर में और दक्षिण मिजोरम में प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं. हत्‍याएं और बलात्‍कार की घटनाओं के बाद राज्‍य अशांत हो जाता है. राज्‍य में हिंदी भाषियों की हत्‍याएं की गईं तब कोई हंगामा खडा नहीं हुआ. जब भी कोई आतंकवादी सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारा जाता है तो कोहराम मच जाता है. कई बार महिलाओं के संगठन विरोध करने सडकों पर उतर आते हैं. यह भी सच है कि राज्‍य में मानवाधिकारों का उल्‍लंघन सरकारी एजेंसियों का खुला खेल भी बन गया है. निर्दोष युवा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर उन पर गंभीर आरोपों वाली धाराएं लगाई जाती हैं. कुछ युवकों पर तो सरकार के खिलाफ युद्ध छेडने का प्रयास, सरकार के खिलाफ साजिश रचने, गैर कानूनी गतिविधियों में मदद करने तक के आरोप लगाए गए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्‍य में आतंकवाद पर काबू पाने में सुरक्षा बलों को सफलता हाथ लगी.


फर्जी मुठभेड का परिणाम सामने नहीं आने पर छात्र संगठनों ने स्‍कूल बंद रखा था. उस दरमियान
अनजान लोगों के स्‍कूल जलाए जाने पर विरोध प्रदर्शन करते स्‍कूली बच्‍चे.

आतंकवादी शिविर नष्‍ट किए गए हैं, कुछ आतंकवादियों ने आत्‍मसमर्पण भी किया है, लेकिन राज्‍य की स्थिति विस्‍फोटक ही है. पिछले सात वर्षों से राज्‍य में कांग्रेस की सरकार है लेकिन वह भी स्थिति सामान्‍य बनाने की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ सकी. कांग्रेस और कुछ अन्‍य राजनीतिक दलों के अलगाववादी संगठनों से सांठगांठ के प्रमाण भी मिल चुके हैं. कई आतंकवादी राजनीतिज्ञों के आवास से गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं. सत्‍ता में बने रहने के लिए राजनीतिज्ञों ने तुम भी लूटो और हम भी लूटें का फार्मूला अपनाया हुआ है. राज्‍य के मुख्‍यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह पर दो आतंकी संगठनों को डेढ करोड का फंड देने के सबूत खुफिया विभाग के पास हैं और सेना प्रमुख ने यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय को भी दे दी थी. इसके बावजूद उनका मुख्‍यमंत्री पद पर बने रहने का अर्थ क्‍या है ? विकास कार्यों के ठेके भी अलगाववादी संगठनों को दिए जाते हैं यानीे इसका स्‍पष्‍ट अर्थ यही है कि केंद्र का फंड अलगाववादी संगठनों में बांटा जा रहा है. भ्रष्‍ट प्रपंचों भरी व्‍यवस्‍था, तेग तमंचों भरी व्‍यवस्‍था,
खुले घूमते हैं व्‍यभिचारी, शह देते हैं सत्‍ताधारी।
मणिपुर की अशांति का एकमात्र समाधान है कि ईमानदार लोगों को सत्‍ता में लाया जाए और अलगाववादी संगठनों से बातचीत की जाए. वार्ता की एकमात्र शर्त मानवीयता ही होनी चाहिए. अलगाववादी संगठन हिंसा रोकें और राज्‍य सरकार गैर जरूरी बल प्रयोग कर मानवाधिकारों का उल्‍लंघन न करे. मणिपुर की जनजातियों से वार्ता कर हिंसक टकराव को रोका जा सकता है. लोकतंत्र में हिंसा का खात्‍मा हिंसा से नहीं किया जा सकता. जन आकांक्षाओं को पूरा करना भी जरूरी है, अलगाववादी संगठनों के सुर बिगड रहे हैं. केंद्र सरकार वार्ता की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए लेकिन क्‍या ऐसा होगा?

-अश्विनी कुमार
ashwinikumar001@gmail.com

Friday 15 January 2010

...तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे

देश अपने गणतंत्र के 60 वें वर्ष में अपने ही नागरिकों के खिलाफ छेड़े गए दर्जन भर से अधिक युद्धों, लगभग एक अघोषित आपातकाल, लाखों किसानी आत्महत्याओं और एक अदद इरोम शर्मीला के साथ दाखिल हो रहा ही. इरोम ने अपने अनशन के दस वर्षों में इस लोकतंत्र का रेशा-रेशा उजागर किया है, किसी अर्थशास्त्री, नेता, आन्दोलन, समाज विज्ञानी, ने नहीं किया है. इस शानदार प्रतिरोध पर शोमा चौधरी का यह शानदार आलेख, तहलका से साभार.



कभी-कभी हमें अपने जिद्दी और अड़ियल वर्तमान को ठीक से जानने के लिए अतीत में लौटना पड़ता है. इसलिए पहले एक फ्लैशबैक.
यह 2006 है. नवंबर में दिल्ली की एक आम-सी शाम. तभी एक रुक-रुककर आती धीमी आवाज आपकी चेतना को चीरती हुई चली जाती है. 'मैं कैसे समझाऊं? यह सजा नहीं, मेरा कर्तव्य है.. अपने दर्द के कारण धीमी मगर फिर भी अपनी नैतिकता में डूबी हुई ऐसी जादुई आवाज और ऐसे शब्द, जिन्हें आप कभी नहीं भूल सकते. 'मेरा कर्तव्य.' आर्थिक प्रगति के उत्साह में गले तक डूबे भारत में 'कर्तव्य' का भला क्या मतलब होगा?

आप कहीं दूर चले जाना चाहते हैं. आप व्यस्त हैं और उस आवाज में हिंसा का कोई संकेत भी नहीं है. लेकिन तभी एक चित्र बनने लगता है. अस्पताल के एक बिस्तर पर गोरे रंग की एक कमजोर औरत, बिखरे हुए काले बालोंवाला सिर, नाक में प्लास्टिक की एक ट्यूब, दुबले और साफ हाथ, दृढ़ और बादामी आंखें और रुक-रुक कर आती, कांपती आवाज, जो कर्तव्य की बात करती है.

उसी क्षण इरोम शर्मिला की पूरी कहानी हमारे भीतर पैठना शुरू करती है. आप किसी ऐतिहासिक इनसान के आस-पास हैं. ऐसा कोई, जिसका राजनीतिक विरोधों के इतिहास में पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है. फिर भी आप उसे भूल गए हैं. आपके पास सैकड़ों टीवी चैनल और मीडिया का अपूर्व गौरवशाली दौर है, मगर फिर भी आप उसे भूल गए हैं.

2006 में इरोम शर्मिला ने पिछले छह साल से न ही कुछ खाया था और न ही पानी की एक बूंद तक पी थी. भारत सरकार उसकी नाक में एक ड्रिप लगाकर उसे जबर्दस्ती जीवित रख रही थी. छह साल से कोई ठोस पदार्थ उसके शरीर में नहीं गया था और पानी की एक भी बूंद ने उसके होठों को नहीं छुआ था. उसने बालों में कंघी करना तक बन्द कर रखा था. वह अपने दांतों को रुई से और होंठों को सूखी स्पिरिट से साफ करती थी, जिससे उसका उपवास न टूटे. उसका शरीर अंदर से खत्म होता जा रहा था. उसके मासिक चक्र बंद हो गए थे, परंतु उसका संकल्प नहीं टूटा था. जब भी उसका बस चलता था, वह नाक से ट्यूब निकाल फेंकती थी. वह कहती थी कि अपनी आवाज को 'उचित और शांत ढंग' से सुनाने के लिए यही उसका नैतिक कर्तव्य है.

फिर भी भारत सरकार और भारत के लोग उसके प्रति बेपरवाह थे.

वह तीन साल पहले था. बीते साल 5 नवंबर को इरोम शर्मिला ने अपने इस अभूतपूर्व उपवास के दसवें साल में प्रवेश किया, जो मणिपुर और अधिकांश पूर्वोत्तर पर 1980 से थोपे गए अफ्स्पा (सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम) के विरोध में था. सिर्फ इस संदेह के आधार पर कि कोई व्यक्ति अपराध करने वाला है या कर चुका है, यह एक्ट सेना को बलप्रयोग, गिरफ्तारी और गोली मारने तक की छूट देता है. यह एक्ट सेना के किसी भी व्यक्ति के विरु द्ध केंद्र सरकार की अनुमति के बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति भी नहीं देता.

शब्दों में क्रूर दिखनेवाला यह कानून इरादों में और भी क्रूर है. आधिकारिक तौर पर इसके लागू किए जाने के बाद से सुरक्षा बलों ने मणिपुर में हजारों लोग मारे हैं. (2009 में ही सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 265 है, जो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक 300 से ऊपर है, जिसका अर्थ है- प्रतिदिन एक या दो ग़ैर कानूनी हत्याएं) विद्रोही संगठनों पर लगाम कसने के बजाय इस एक्ट ने आम आदमी में उबलता हुआ आक्रोश ही पैदा किया है और उससे नए उग्रवादी पनपे हैं. 1980 में जब यह कानून लागू हुआ, मणिपुर में केवल 4 विद्रोही संगठन थे. आज उनकी संख्या 40 है और मणिपुर मौत की घाटी जैसा बन गया है, जहां बेतहाशा भ्रष्टाचार है और उसके दस्ताने के अंदर पुलिस, उग्रवादियों और राजनीतिज्ञों के हाथ एक साथ हैं और निर्दोष नागरिक उस दस्ताने की गिरफ्त में हैं.

कुछ साल पहले एक सीडी सभ्य समाज के गलियारों तक पहुंची. इसमें सेना की अपमानजनक क्रूरता और जनता के रोष की फुटेज थीं. छोटे बच्चों, छात्रों, कामकाजी वर्ग की औरतों की तसवीरें थीं, जो सड़कों पर आ गए थे और आंसू गैस या गोलियों का निशाना बन रहे थे. ऐसी तसवीरें थीं, जिनमें आदमियों को नीचे जमीन पर लिटा दिया गया था और फौज उनके सिरों से बस कुछ इंच ऊपर गोलियां दाग रही थी. हर गुजरते दिन के साथ आते किस्से ग़ुस्सा बढ़ाते जा रहे थे. लड़के गायब हो रहे थे, औरतों के साथ बलात्कार किए जा रहे थे. मनुष्य की सबसे जरूरी चीज, उसके आत्मसम्मान को छील-छील कर उतारा जा रहा था.

युवा इरोम शर्मिला के लिए ये सब चीजें 2 नवंबर, 2000 को स्पष्ट हुईं. एक दिन पहले एक विद्रोही संगठन ने असम राइफल्स के एक दस्ते पर बम फेंका था, क्रोधित बटालियन ने मालोम बस स्टैंड पर दस बेकसूर लोगों को मार डाला. उन शवों की दिल दहला देनेवाली तसवीरें अगले दिन के स्थानीय अखबारों में छपीं, जिनमें एक 62 साल की औरत लिसेंगबम इबेतोमी और 18 साल की सिनम चंद्रमणि भी थी, जो 1988 में राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार ले चुकी थी. असामान्य रूप से बेचैन 28 साल की शर्मिला ने 4 नवंबर को अपना सत्याग्रह शुरू किया.

तीन साल पहले की नवंबर की उस सर्द शाम में हॉस्पिटल के एक बर्फ से सफेद गलियारे में पसर कर बैठे हुए शर्मिला के 48 वर्षीय भाई सिंहजीत ने कुछ हंस कर कहा था, 'हम यहां कैसे पहुंचे?' उस उदास प्रश्न की अनुगूंज में ही शर्मिला और उनके अद्भुत सफर की कहानी छिपी थी. उस कहानी के बड़े हिस्से को अपने अंदर झांक कर जानने की जरूरत है. ऐसा तनाव, तीव्रता और लगभग असंभव कल्पना का काम इतनी आसानी से नहीं दिखता. यह इंफाल की एक सुदूर झोंपड़ी में शुरू हुआ. राजधानी और राज्य की सारी शक्तियां उनके विरुद्ध लामबंद हो गईं. अस्पताल के उसके छोटे-से कमरे में उसके साथ बंद नर्स थी और बाहर भाई था, जिसके पास कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था और जो न हिंदी बोल पाता था, न अंग्रेजी. दरवाजे पर तैनात पुलिसवाले भी थे.

'मेंघाओबी' अर्थात गोरी लड़की, जिस नाम से मणिपुर के लोग उसे पुकारते हैं, इंफाल के पशु चिकित्सालय में काम करनेवाले एक अनपढ़ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सबसे छोटी बेटी थी. वह हमेशा से अकेले रहना पसंद करती थी, क्लास में सबसे पीछे बैठती थी और अच्छी श्रोता थी. उससे बड़े आठ भाई-बहन और थे. जब उसका जन्म हुआ, उसकी 44 वर्षीया मां इरोम सखी का दूध सूख चुका था. जब शाम ढलती थी और मणिपुर अंधेरे में डूबने लगता था, शर्मिला रोना शुरू कर देती थी. उसके सामने से हटने के लिए मां को पास की किराने की दुकान पर जाना पड़ता था, ताकि सिंहजीत अपनी छोटी बहन को गोद में लेकर पड़ोस की किसी मां के पास दूध पिलाने ले जा सके.

'इसकी इच्छाशक्ति हमेशा से असाधारण रही है. शायद इसीलिए वह सबसे अलग भी है,' सिंहजीत कहते हैं, 'शायद इस तरह यह उन सब मांओं के दूध का कर्ज चुका रही है.'

बगल में बैठे इस समझदार गंवई व्यक्ति की कहानी में एक तीखा-सा दर्द था- इस जंग को अपनी अदृश्य सांसें देता हुआ वफादार योद्धा, एक अधेड़ भाई, जिसने बाहर दरवाजे पर रह कर बहन की देखभाल करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, वह आदमी जो बुनाई से प्रतिदिन 120 रू कमानेवाली अपनी पत्नी पर निर्भर है, ताकि वह दृढ़ता से अपनी बहन के साथ खड़ा रह सके.

डेढ़ महीने पहले वह अपने दो साथियों बबलू लोइतेंगबम और कांग्लेपाल की मदद से शर्मिला को किसी तरह मणिपुर से बाहर निकाल लाने में सफल हो गया था. पिछले छह साल से वह पुलिस की निगरानी में इंफाल के जेएन हास्पिटल के एक छोटे-से कमरे में बंद थी. जब भी उसे रिहा किया जाता, वह अपनी नाक से ट्यूब निकाल फेंकती और अपना अनशन जारी रखती. तीन दिन बाद मरणासन्न हालत में उसे 'आत्महत्या के प्रयास के आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया जाता और यह सिलसिला बार- बार दोहराया जाता. मगर मणिपुर में अनशन, गिरफ्तारी और उस ट्यूब के छह साल थोड़ा काम ही कर पाए थे. लड़ाई को दिल्ली में लाना ही था.

3 अक्तूबर, 2006 को दिल्ली पहुंच कर दोनों भाई-बहनों ने भारतीय लोकतंत्र की आशाओं से भरी वेदी जंतर-मंतर पर डेरा डाला. मीडिया को उनमें कोई रुचि नहीं थी. फिर एक रात पुलिस ने आकर उसे आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और उसे एम्स में फेंक दिया गया. उसने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और गृहमंत्री को तीन भावुक चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. यदि उसने यह करने के बजाय किसी विमान का अपहरण कर लिया होता तो शायद उसकी बात कुछ जल्दी सुनी जाती.

सिंहजीत ने उस हास्पिटल के गलियारे में कहा था, 'हम अपनी लड़ाई के बीच में हैं. परेशानियां तो आएंगी ही मगर फिर भी हम आखिर तक लड़ेंगे, चाहे इसमें मेरी बहन की जान ही क्यों न चली जाये. लेकिन अगर उसने यह अनशन शुरू करने से पहले मुझे बता दिया होता तो मैं उसे खुद के साथ यह कभी न करने देता. पहले हमें बहुत सारी चीजें सीखनी चाहिए थीं. बात कैसे करनी है, समझौता कैसे करना है, पर हमें कुछ भी नहीं पता था. हम गरीब थे और कुछ भी नहीं जानते थे.'

लेकिन एक तरह से देखा जाए तो शर्मिला की कहानी की विनम्र कर देनेवाली शक्ति का मूल उसकी उसी बिना मार्गदर्शनवाली शुरुआत में है. वह कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन नहीं चला रही और अगर आप करिश्माई भाषणों और जोशीले नायकत्व की उम्मीद कर रहे हैं तो लेटी हुई यह शांत महिला आपको निराश ही करेगी. उस 34 वर्षीया स्त्री का सत्याग्रह कोई वैचारिक उपज नहीं था. अपने आस-पास मृत्यु और हिंसा के चक्र की प्रतिक्रिया में यह उसका नितांत मानवीय उत्तर था, अंदर से एक आध्यात्मिक संदेश जैसा.

शर्मिला ने अपनी कांपती लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा था, 'पहले पन्ने पर मालोम के शव को देख कर मैं स्तब्ध थी. मैं एक शांति रैली में हिस्सा लेने जानेवाली थी, मगर मुझे लगा कि इस तरह सेना की हिंसा नहीं रोकी जा सकती. इसलिए मैंने अनशन पर बैठने का निश्चय किया.'

4 नवंबर, 2000 को शर्मिला की मां सखी ने उसे आशीर्वाद दिया था, 'तुम अपनी मंजिल पाओगी' और फिर वे तटस्थ भाव से पलट कर चली गई थीं.

उसके बाद चाहे शर्मिला इंफाल में अपनी मां से पैदल पहुंचने की दूरी पर ही कैद थी, वे कभी नहीं मिलीं.

दिल्ली की एक फिल्म-निर्मात्री कविता जोशी द्वारा बनाई गई एक फिल्म में सखी रोते हुए कहती हैं, 'क्या फायदा है? मेरा दिल बहुत कमजोर है. मैं उसे देखते ही रो पड़ूंगी. इसीलिए मैंने तय किया है कि जब तक उसकी बातें नहीं मानी जातीं, मैं उससे नहीं मिलूंगी, क्योंकि इससे उसका संकल्प कमजोर पड़ जाएगा. हमें खाना नहीं मिलता तो हम किस तरह बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं और सो भी नहीं पाते. वे जो थोड़ा-सा द्रव उसके शरीर में डालते हैं, वह उसके सहारे किस तरह अपने दिन और रातें बिताती होगी. अगर पांच दिन के लिए भी यह कानून हटा लिया जाए तो मैं अपने हाथों से उसे एक-एक चम्मच करके चावल खिलाऊंगी. उसके बाद वह मर भी जाती है, तो भी हमें संतुष्टि रहेगी कि मेरी शर्मिला की इच्छा पूरी हुई.'

शर्मिला के लिए यह साहसी, निरक्षर औरत ही भगवान है. यही वह मंदिर है, जिससे शर्मिला को शक्ति मिलती है. यह पूछने पर कि मां से न मिल पाना उसके लिए कितना कष्टकारक है, वह उत्तर देती है, 'ज्यादा नहीं', और थोड़ा रुकती है, 'क्योंकि... मुझे नहीं पता कि मैं यह कैसे समझाऊं. पर हम सब यहां एक खास काम करने आए हैं और उसके लिए हम अकेले ही यहां आए हैं.'

अपने शरीर और दिमाग में संतुलन बनाए रखने के लिए वह दिन में चार-पांच घंटे योग करती है, जो उसने खुद से ही सीखा है. डाक्टर आपको बताएंगे कि शर्मिला का उपवास एक चमत्कार है. उसकी स्थिति का अनुमान लगाना ही आपको डरा देता है. लेकिन शर्मिला कभी किसी शारीरिक कष्ट की बात स्वीकार नहीं करती. वह मुस्कुरा कर कहती है, 'मैं ठीक हूं, मैं ठीक हूं. मैं अपने ऊपर कोई अत्याचार नहीं कर रही. यह सजा नहीं है, यह तो मेरा फर्ज है. मुझे नहीं पता कि भविष्य में मेरे साथ क्या होनेवाला है. वह तो ईश्वर की मर्जी है. मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि नियमितता, अनुशासन और बहुत सारे उत्साह के साथ आप कुछ भी पा सकते हैं.' आप इन बातों को सुनी-सुनाई नीरस बातें कहकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन जब वह बोल रही होती है तो यही बातें नायकत्व का चोला पहन लेती हैं.

उसके बाद तीन साल से कुछ नहीं बदला है. दिल्ली आने का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अपने उपवास के दसवें साल में भी वह इंफाल हास्पिटल के एक गंदे से कमरे में किसी अदने अपराधी की तरह बंद है. यद्यपि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है, फिर भी कभी-कभी अपने भाई के अलावा उसे किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं है. यहां तक कि कुछ महीने पहले महाश्वेता देवी को भी उससे मिलने नहीं दिया गया. वह किसी के साथ और गांधी और मंडेला की जीवनियों लिए तरसती रहती है. उसका भाईचारे का भ्रम तथा महान और लगभग अमानवीय आशा का खजाना कभी उसका साथ नहीं छोड़ता.

लेकिन भाई की हताशा उतनी ही प्रबल है. शर्मिला के इस ऐतिहासिक सत्याग्रह की कद्र करने में देश की असफलता उस बेकद्री की एक झलक दिखाती है, जिसके चलते पूरा उत्तर-पूर्व नष्ट हो रहा है. जब 32 साल की मनोरमा देवी को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध रखने के आरोप में असम राइफल्स ने गिरफ्तार किया, तब अफ्स्पा के विरुद्ध शर्मिला के अनशन को चार साल हो चुके थे. एक दिन बाद इंफाल में मनोरमा का शव मिला था, जिस पर यातना और बलात्कार के भयानक निशान थे. मणिपुर उबल पड़ा था. पांच दिन बाद, 15 जुलाई, 2004 को मानवीय अभिव्यक्ति की सब सीमाएं लांघते हुए 30 आम महिलाओं ने असम राइफल्स के मुख्यालय कांग्ला फोर्ट पर नग्न होकर प्रदर्शन किया था. जो बुरा होना बचा था, उसे पूरा करती आम मांएं और दादियां चिल्ला रही थीं, 'भारतीय सेना, हमारा बलात्कार करो.' उन सबको तीन महीने के लिए जेल के अंदर डाल दिया गया.

उसके बाद सरकार द्वारा गठित किए गए हर आयोग ने घावों को बढ़ाने का काम ही किया है. मनोरमा हत्याकांड के बाद गठित किए गए जस्टिस उपेंद्र आयोग की रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई. नवंबर, 2004 में प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह ने अफ्स्पा की समीक्षा के लिए जस्टिस जीवन रेड्डी समिति गठित की. उस समिति ने अफ्स्पा को खत्म करने की सिफारिश की और साथ ही उसकी सबसे क्रूर शक्तियों को ग़ैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) एक्ट में स्थानांतरित करने की सलाह दी. इस निष्कर्ष पर हर आधिकारिक प्रतिक्रिया इसे ग़लत ही ठहराती है. तब के रक्षा मंत्नी प्रणब मुखर्जी ने अफ्स्पा को वापस लेने या उसकी शक्तियों को कम करने की बात इस आधार पर खरिज कर दी थी कि 'अशांत इलाकों' में ऐसी शक्तियों के बिना सेना ठीक से काम नहीं कर सकती.

रोचक बात यह है कि शर्मिला के मुद्दे को रोशनी में आने के लिए शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेता, ईरान की शिरीन एबादी की 2006 की भारत यात्ना का इंतजार करना पड़ा. पत्रकारों के बीच वे उबलते हुए बोली थीं, 'यदि शर्मिला मरती है तो संसद इसकी सीधे तौर पर जिम्मेदार है. वह मरती है तो कार्यपालिका, प्रधानमंत्नी और राष्ट्रपति भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं किया...अगर वह मरती है तो आप सब पत्रकार भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि आपने अपना फर्ज नहीं निभाया...'

फिर भी पिछले तीन साल में कुछ नहीं बदला है. 'मनोरमा मदर्स' के असीमित आक्रोश के बाद इंफाल के कुछ जिलों से अफ्स्पा हटाया गया, लेकिन वायरस ने अपनी जगह बदल ली. जहां आर्मी ने छोड़ा, वहां मणिपुर पुलिस के कमांडो आ गए. अफ्स्पा के अत्याचार शासन की संस्कृति में ही घुल गए हैं. इसे आप 'दंडविहीन संस्कृति' भी कह सकते हैं, जहां मानवाधिकारों के हनन पर कोई सजा नहीं है. इस साल 23 जुलाई को एक पूर्व विद्रोही नवयुवक संजीत को पुलिस ने इंफाल के व्यस्ततम बाजार में भीड़ के सामने दिन-दहाड़े गोली मार दी. पास खड़ी एक निर्दोष महिला राबिना देवी, जिसे पांच महीने का गर्भ था, के सिर में भी एक गोली लगी और वह भी वहीं मारी गई. उसके साथ उसका दो साल का बेटा रसेल भी था. कई लोग घायल हुए.

इस पूरे हत्याकांड की तसवीरें लेनेवाले अज्ञात फोटोग्राफर के लिए ये महज संख्याएं बनकर रह जातीं: पिछले साल हुई 265 हत्याओं में से सिर्फ दो, मगर इस बार तहलका में छपी ये तसवीरें सबूत थीं. मणिपुर फिर से उबल पड़ा.

चार महीने बाद भी लोगों का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. लोगों की भावनाओं से बेपरवाह मुख्यमंत्नी इबोबी सिंह ने पहले तो बेशर्मी से बच निकलने की कोशिश की. संजित की हत्या के दिन उन्होंने विधानसभा में दावा किया कि उनकी पुलिस ने मुठभेड़ में एक उग्रवादी मारा है. बाद में तहलका के आलेख के सामने आने पर वे बोले कि उन्हें उनके अधिकारियों ने गुमराह किया है और अब वे न्यायिक जांच करवाने के लिए मजबूर थे. हालांकि मुख्यमंत्री और मणिपुर के डीजीपी जॉय कुमार, दोनों तहलका पर घटना को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाते हैं.

अब भी थोड़ी-सी उम्मीद बाकी है. पिछले कुछ महीनों में राज्य में विरोध बढ़ा है और दर्जनों सामाजिक अधिकार कार्यकर्ताओं को निरंकुश राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत बहुत ओछे ढंग से गिरफ्तार किया गया है. इनमें एक प्रतिष्ठित पर्यावरण कार्यकर्ता जितेन युमनाम भी थे. 23 नवंबर को एक स्वतंत्न 'सिटिजंस फैक्ट फाइंडिंग टीम' ने 'लोकतंत्र से मुठभेड़: मणिपुर में अधिकारों का हनन' नाम की रिपोर्ट जारी की और गृह मंत्रालय को एक प्रेजेंटेशन दी. एक दिन बाद गृह सचिव गोपाल पिल्लै ने भूतपूर्व आइपीएस अधिकारी और फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य के.एस. सुब्रह्मण्यम को बताया कि मंत्रालय ने जितेन और दस अन्य लोगों का रासुका के तहत कारावास रद्द कर दिया है. एक और छोटी-सी आशा का संकेत यह है कि तहलका से एक साक्षात्कार में गृहमंत्नी पी चिदंबरम ने अफ्स्पा को अधिक मानवीय और जवाबदेह बनाने के लिए कुछ सुधारों की सिफारिश किए जाने के बारे में कहा है. इन सुधारों को अभी कैबिनेट का मंजूरी का इंतजार है.

उलझी हुई इस दुनिया में अक्सर किसी समस्या का समाधान एक अटल और प्रेरणादायक नेतृत्व में मिलता है. ऐसा नेतृत्व, जो अपने सामने आते प्रश्नों की नैतिकता को जगा सके और बिना किसी शर्त के उसे सही दिशा में सोचने को प्रेरित कर सके. शर्मिला का महान सत्याग्रह भी ऐसा ही एक नेतृत्व है. यह एक सच्चे और सभ्य समाज के विचार को फिर से आधार देता है. यह मृत्युपरक और संवेदनहीन क्रूरता के चेहरे पर क्रूरता का तमाचा मारने से इनकार कर देता है. उसकी याचना सीधी-सी है-सशस्त्न बल विशेष अधिकार अधिनियम को वापस लिया जाए. यह भारतीय गणराज्य के उस विचार में तो कहीं नहीं था, जिसे इसके संस्थापकों ने हमें वसीयत में दिया है. यह अमानवीय है.

यह सच है कि आज मणिपुर टूटा हुआ और हिंसक समाज है. मगर उसका हल दृढ़ और प्रेरक नेतृत्व में ही खोजा जा सकता है, जिसे निभाने की जिम्मेदारी अब सरकार की है. बाकी दर्शन छोड़कर नैतिकता का कानून लागू कीजिए. बाकी सब अपने आप सुलझ जाएगा.

लेकिन दुर्भाग्यवश, जब हम हिंसा की भयानक तारीख 26/11 की बरसी मनाना याद रखते हैं, हम उस औरत को भूल जाते हैं, जिसने असीम हिंसा का उत्तर असीम शांति से दिया.

यह हमारे समय का एक दृष्टांत है. यदि इरोम शर्मिला की कहानी हमें रुक कर कुछ सोचने पर मजबूर नहीं करती तो कोई भी चीज ऐसा नहीं कर सकेगी. यह असाधारण होने की कहानी है. असाधारण इच्छाशक्ति, असाधारण सादगी और असाधारण उम्मीदों की. सूचनाओं से भरे हुए इस व्यस्त समय में अपनी बात किसी को सुनवाना असंभव ही है, मगर यदि इरोम शर्मिला की कहानी सुन कर हम नहीं ठिठकते तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे.'

Thursday 14 January 2010

अब खिलाड़ी नहीं रहेंगे भिखाड़ी



भारत में खिलाड़ियों की उपेक्षा कोई नई बात नहीं है. जो खिलाड़ी अपने खेल जीवन में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं और देश को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाते हैं, एक व़क्त ऐसा आता है जब वे खिलाड़ी गुमनामी के अंधेरे में जीने को मजबूर हो जाते हैं. खेलों से संन्यास लेने के बाद रोज़गार के अभाव में इन्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं. लेकिन भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर ने खिलाड़ियों की इसी समस्या को दूर करने की शुरुआत की है. इसे खिलाड़ियों की हालत सुधारने की दिशा में एक अहम क़दम माना जा रहा है. मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इबोबी सिंह ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़िताब जीतने वाले 109 खिलाड़ियों को नौकरी देने का ़फैसला किया है. अपने इसी ़फैसले के तहत गत 30 दिसंबर को नेशनल स्पोर्ट्‌स एकेडमी स्कूल का उद्‌घाटन करने के दौरान मुख्यमंत्री ने खिलाड़ियों को नियुक्ति पत्र सौंपा. इन खिलाड़ियों को शिक्षा, गृह और युवा एवं खेल मामले के विभागों में नौकरी दी गई. इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि मणिपुर ने स्पोर्ट्‌स और कल्चर को हमेशा से तरजीह दी है और यह बाक़ी राज्यों के लिए यह एक मिसाल है. नौकरी पाने वाले खिलाड़ियों में अधिकतर महिला खिलाड़ी हैं. गौरतलब है कि राज्य के हर विभाग में नौकरी का पांच ़फीसदी कोटा खिलाड़ियों के लिए आरक्षित
रहता है.
यह ध्यान देने वाली बात है कि कोई खिलाड़ी पूरी ज़िंदगी भर नहीं खेलता है. उनकी खेल आयु बहुत ही छोटी होती है. ऐेसे में उन्हें हमेशा भविष्य की असुरक्षा का एहसास होता रहता है. सरकार न तो उनकी और न ही उनके परिवार की कोई खोज ख़बर लेती है. ऐसे में भारत की सेवन सिस्टर राज्यों में एक मणिपुर से दूसरे राज्यों को सीख लेने की ज़रूरत है, जिसने अपने खिलाड़ियों को राज्य सरकार में नौकरी देकर देश का सम्मान बढ़ाने वालोंें की कद्र की है. ऐसे फैसलों से ही लोग खेल को अपना करियर बनाने को प्रेरित होंगे और बे़िफक्र होकर अपनी खेल प्रतिभा को निखार सकेंगे.

Saturday 2 January 2010

मणिपुरः विवाद के केंद्र में तिपाईमुख बांध



मणिपुर में छह हज़ार करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित तिपाईमुख पनबिजली परियोजना के निर्माण का पड़ोसी देश बांग्लादेश विरोध करता रहा है. मणिपुर के ग़ैर सरकारी संगठन भी इसके ख़िला़फ आंदोलन चलाते रहे हैं. विरोध और आलोचना को नज़रअंदाज़ करते हुए हाल ही में इस परियोजना की आधारशिला रखी गई. इससे सा़फ संकेत मिलता है कि केंद्र सरकार इस परियोजना को समय पर पूरा करना चाहती है, लेकिन केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश के बयान से ऐसा लगता है कि परियोजना को अंजाम तक पहुंचने में अधिक व़क्त लग सकता है. जलवायु परिवर्तन पर आयोजित एक कार्यशाला को नई दिल्ली में संबोधित करते हुए रमेश ने कहा कि तिपाईमुख एक मुद्दा नहीं, बल्कि एक अनूठी परियोजना है, जिसका शिलान्यास देश के तीन प्रधानमंत्री कर चुके हैं. शायद यह बांध अधर में लटक सकता है. उन्होंने बांध क्षेत्र की जैव विविधता को स्वीकार करते हुए कहा कि वह चार बार बांध क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं और उन्हें लगता है कि बांध का निर्माण अधर में लटक सकता है. जब उनसे पूछा गया कि उनका मंत्रालय पर्यावरण के दृष्टिकोण से बांध बनाने के लिए हरी झंडी दिखा चुका है, ऐसी स्थिति में बांध का निर्माण कैसे रुक सकता है? इस पर उन्होंने कहा कि उनके मंत्रालय की अनुमति मिलने का अर्थ किसी परियोजना का क्रियान्वयन नहीं होता. उन्होंने कहा कि पर्यावरण की दृष्टि से दी जाने वाली अनुमति की प्रचलित प्रणाली से वह ख़ुश नहीं हैं और इसे अधिक कारगर बनाने की आवश्यकता है. रमेश ने कहा कि जब उन्होंने तिपाईमुख बांध के विरोध में बांग्लादेश के रुख़ के बारे में पढ़ा, तब उन्होंने फौरन अपने मंत्रालय के अधिकारियों से इस मामले पर विचार करने के लिए कहा, ताकि यह मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ा मुद्दा न बन जाए. अब उन्हें लगता है कि तिपाईमुख एक राजनीतिक फुटबाल बनकर रह गया है. केंद्रीय मंत्री ने आश्वस्त किया कि उनका मंत्रालय परियोजना के संबंध में बांग्लादेश की चिंता को ध्यान में रखेगा. इस मसले पर बांग्लादेश सरकार के साथ बातचीत भी की जाएगी.

(प्रस्‍तावित बांध निर्माण स्‍थल)
मणिपुर में प्रस्तावित तिपाईमुख बांध के विरोध में बांग्लादेश के कई संगठन अपनी नाराज़गी जता चुके हैं. बांग्लादेश नेशनल पार्टी की नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भी बांध का विरोध कर रही हैं. ग़ैर सरकारी एवं पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने जब तिपाईमुख बांध के ख़िला़फ विरोध प्रदर्शन किया तो ़खालिदा जिया भी उसमें शामिल हुईं. उन्होंने कहा कि बांध के निर्माण से बांग्लादेश को ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा और क्षेत्र का पर्यावरण नष्ट हो जाएगा. इसके बाद बांग्लादेश के अधिकारियों के एक दल ने बांध क्षेत्र का दौरा भी किया. इस बांध का निर्माण बांग्लादेश की सीमा से 200 किलोमीटर दूर बराक नदी पर प्रस्तावित है. बांग्लादेश के पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर मणिपुर में बराक और तुईवाई नदी के संगम स्थल पर 162 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण किया जाएगा तो बराक नदी के प्रवाह का रुख़ बांग्लादेश की ओर हो सकता है. बराक नदी का पानी मेघना नदी तक पहुंचता है और बराक लाखों लोगों को पेयजल उपलब्ध कराती है. पर्यावरणविदों एवं ग़ैर सरकारी संगठनों का तर्क है कि तिपाईमुख पनबिजली परियोजना की वजह से खेती प्रभावित होगी, लोगों को विस्थापन का संकट झेलना पड़ेगा, स्थानीय जलाशय सूख जाएंगे और क्षेत्र की जैव विविधता नष्ट हो जाएगी. दूसरी तऱफ भारत सरकार की तऱफ से तर्क दिया जा रहा है कि पूर्वोत्तर भारत में बिजली की आपूर्ति करने के लिए बांध का निर्माण किया जा रहा है और इससे बांग्लादेश को किसी तरह का नुक़सान नहीं होगा, बल्कि उसे बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलेगी. नेशनल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पॉवर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अभी तक कोई ज्वाइंट वेंचर कंपनी नहीं बनाई गई है, इसलिए तिपाईमुख बांध के निर्माण में समय लग सकता हैै. केंद्र की तऱफ से परियोजना को क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी एनएचपीसी को सौंपी गई है, लेकिन इसका निर्माण संयुक्त उपक्रम के रूप में किया जाएगा, जिसमें एनएचपीसी की भागीदारी 69 ़फीसदी, सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड की भागीदारी 26 ़फीसदी और मणिपुर सरकार की भागीदारी पांच ़फीसदी रहेगी. अब देखना यह है कि बांग्लादेश और मणिपुर में हो रहे विरोध के बीच भारत सरकार किस तरह तिपाईमुख बांध का निर्माण कर पाती है. तिपाईमुख की तरह अरुणाचल प्रदेश में भी लोअर भुवनशिरि पनबिजली परियोजना का काम शुरू हो रहा है, जिसका विरोध असम के ग़ैर सरकारी संगठन कर रहे हैं और बांध बन जाने के बाद असम में तबाही की आशंका प्रकट कर रहे हैं. बड़े बांधों के संबंध में सरकार को एक कारगर नीति बनाने की ज़रूरत है, ताकि विकास का अर्थ विनाश न हो. बिजली की ज़रूरत की पूर्ति करने के लिए किसी भी इलाक़े को तबाह करना औचित्यपूर्ण निर्णय नहीं कहलाएगा.
- दिनकर कुमार