यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Tuesday, September 16, 2014

पूर्वोत्तर की गांधी

इरोम शर्मिला 

मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफ्सपा)  हटाने की मांग को लेकर पिछले 14 वर्षों से भूख हड़ताल कर रहीं इरोम शर्मिला को मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश के बाद रिहा तो किया गया, लेकिन दूसरे ही दिन आत्महत्या की कोशिश के आरोप में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया. अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि शर्मिला के ऊपर आत्महत्या का कोई मामला नहीं बनता. बावजूद इसके राज्य सरकार ने शर्मिला पर वही आरोप दोबारा लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. यह राज्य सरकार की कौन-सी रणनीति है, यह कह पाना मुश्किल है. लेकिन, पिछले 14 वर्षों से, चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, किसी ने शर्मिला से बातचीत करने का कोई प्रयास नहीं किया. राज्य सरकार की ज़्यादती का आलम यह कि दोबारा गिरफ्तार किए जाते वक्त पुलिस उन्हें इस तरह खींच-घसीट कर ले गई, जैसे वह किसी शातिर और दसियों मुकदमों में वांछित अपराधी को ले जा रही हो. गिरफ्तारी के दौरान शर्मिला को काफी चोटें आईं. सवाल यह उठता है कि सरकार को ऐसी कार्रवाई की आख़िर क्या ज़रूरत पड़ी? शर्मिला की शारीरिक एवं मानसिक हालत का अंदाजा किए बगैर उनके साथ इस तरह का बर्ताव आख़िर क्या बताता है? राज्य के गृह मंत्री गाइखांगम के अनुसार, मेडिकल टीम ने कहा कि शर्मिला की तबीयत लगातार खराब होती जा रही है, चार-पांच दिनों के अंदर उनकी हालत और भी ज़्यादा खराब होने की आशंका है, इसलिए उन्हें सुरक्षित जगह पर रखना ज़रूरी हो गया है. यह जान-बूझकर की गई कार्रवाई नहीं है, बल्कि उन्हें मजबूरन उठाना पड़ा.

कब से शुरू हुआ था अनशन

2 नवंबर, 2000 को असम राइफल्स के जवानों ने इंफाल से सात किमी दूर मालोम बस स्टैंड पर 10 बेकसूर लोगों को गोलियों से भून डाला. घटना की दिल दहला देने वाली तस्वीरें अगले दिन स्थानीय अख़बारों में छपीं. मरने वालों में 62 वर्षीया महिला लिसेंगबम इबेतोमी और 18 वर्षीय सिनाम चंद्रमणि भी शामिल थे. चंद्रमणि 1988 में राष्ट्रपति से वीरता पुरस्कार पा चुका था. इस घटना से विचलित होकर 28 वर्षीया शर्मिला ने 4 नवंबर को सत्याग्रह शुरू कर दिया.


कौन है शर्मिला 

इरोम चनु शर्मिला का जन्म 14 मार्च, 1972 को इंफाल के कोंगपाल में हुआ था. वह सामाजिक कार्यकर्ता एवं कवयित्री हैं. इंफाल के पशु चिकित्सालय में काम करने वाले एक अनपढ़ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सबसे छोटी बेटी शर्मिला हमेशा से अकेले रहना पसंद करती थीं. कक्षा में वह सबसे पीछे बैठती और अच्छी श्रोता थीं. घर में आठ बड़े भाई-बहन और थे. जब शर्मिला का जन्म हुआ, तो उनकी 44 वर्षीया मां इरोम सखी का दूध सूख चुका था. जब शाम होती और गांव अंधेरे में डूबने लगता, तो शर्मिला रोना शुरू कर देती थीं. उनके सामने से हटने के लिए मां को निकट स्थित किराने की दुकान पर जाना पड़ता था, ताकि भाई सिंहजीत अपनी छोटी बहन को गोद में उठाकर पड़ोस की किसी महिला के पास दूध पिलाने ले जा सके. शर्मिला के भाई सिंहजीत का मानना है कि शायद इस तरह वह उन सब माताओं के दूध का कर्ज चुका रही हैं. शर्मिला की इच्छाशक्ति हमेशा से असाधारण रही है. शायद इसीलिए वह सबसे अलग भी हैं. वह इंफाल के एक दैनिक हुयेल लानपाऊ में अपना नियमित कॉलम भी लिखती थीं. शर्मिला बचपन में मुर्गियां पालती और उनके अंडे बेचकर उनका पैसा वह नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय को दान कर देती थीं. इरोम स़िर्फ 12वीं कक्षा तक पढ़ी हैं. इसके बाद उन्होंने नेत्रहीन बच्चों के लिए सोशल वर्क किया. शर्मिला को ब्रिटिश मूल के देसमोंड कोटिंहो से प्यार है, जिससे वह शादी करना चाहती हैं.

क्या है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (1958)

आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट संसद में 11 सितंबर, 1958 को पारित किया गया था. यह क़ानून पूर्वोत्तर के सात अशांत (डिस्टर्ब) राज्यों (असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम एवं नगालैंड) में लागू है. यह क़ानून अशांत क्षेत्रों में सेना को विशेष अधिकार देने के लिए पारित किया गया था. जम्मू- कश्मीर में भी यह क़ानून 1990 से लागू है. अफ्सपा की आड़ लेकर सेना एवं सुरक्षाबलों द्वारा किसी को भी घर में घुसकर ढूंढना, किसी को भी शक के आधार पर पकड़ना और महिलाओं के साथ दुर्व्यहार करना आम बात हो गई है. यह क़ानून पहले असम और मणिपुर में लागू किया गया था, बाद में संशोधन करके 1972 में इसे पूरे पूर्वोत्तर (असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम एवं नगालैंड) में लागू कर दिया गया. अफ्सपा लागू होने के बाद पूरे पूर्वोत्तर में फर्जी मुठभेड़, बलात्कार, लूट और हत्या जैसी घटनाओं की बाढ़ आ गई. जब 1958 में अफ्सपा क़ानून बना, तो यह केवल राज्य सरकार के अधीन था, लेकिन 1972 में हुए संशोधन के बाद इसे केंद्र सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. संशोधन के मुताबिक, किसी भी क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित कर वहां अफ्सपा लागू किया जा सकता है. इस क़ानून के सेक्शन 4-ए के अनुसार, सेना किसी पर भी गोली चला सकती है और अपने बचाव के लिए शक को आधार बना सकती है. सेक्शन 4-बी के अनुसार, सेना किसी भी संपत्ति को नष्ट कर सकती है. सेक्शन 4-सी के अनुसार, सेना किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है और वह भी बिना वारंट के. सेक्शन 4-डी के अनुसार, सेना द्वारा किसी भी घर में घुसकर बिना वारंट के तलाशी ली जा सकती है. सेक्शन 6 के अनुसार, केंद्र सरकार की अनुमति के बिना सेना के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. मणिपुर में राज्य सरकार द्वारा अगस्त 2004 में कुछ इलाकों से यह क़ानून हटा दिया गया था, लेकिन केंद्र सरकार इसके पक्ष में नहीं थी. जीवन रेड्डी कमेटी ने भी सरकार को संकेत कर दिया था कि यह क़ानून दोषपूर्ण है और इसमें संशोधन की ज़रूरत है. इस क़ानून के चलते पिछले दो दशकों से प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा बढ़ गई है. इस विवादास्पद क़ानून के विरोध में 10 सितंबर, 2010 को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत कई लोग प्रदर्शन भी कर चुके हैं.

जीवन रेड्डी कमेटी
वर्ष 2004 में असम राइफल्स के जवानों ने थांगजम मनोरमा नामक महिला को हिरासत में लेकर पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसे मौत के घाट उतार दिया. इस घटना के बाद एक पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया, जिसके प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी थे. रेड्डी कमेटी ने 6 जून, 2005 को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में यह क़ानून हटाने की सिफारिश की, लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने रेड्डी कमेटी की सिफारिश नामंजूर कर दी. उन्होंने कहा कि अफ्सपा को डिस्टर्ब एरिया से हटाना कतई संभव नहीं है. 

पूर्वोत्तर की महिलाएं

पुरुषों से दो क़दम आगे 

भारत नारी को शक्ति का प्रतीक मानता है, लेकिन महिलाओं के साथ आएदिन होने वाले भेदभाव ने इस प्रतीक को शक्तिहीन बना दिया है. वातानुकूलित कमरों में बैठ कर तमाम किस्म के विमर्श होते हैं कि कैसे महिलाओं को सशक्त बनाया जाए. लेकिन, भारत में एक ऐसी जगह भी है, जहां की महिलाएं इस पूरी कहानी की अलग और सुंदर तस्वीर पेश करती हैं. आइए, जानते हैं, पूर्वोत्तर की महिलाओं की वे कहानियां, जो बताती हैं कि असल में महिला सशक्तिकरण के मायने क्या हैं....

देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं को सम्मान दिलाने की जद्दोजहद जारी है, वहीं दूसरी तरफ़ पूर्वोत्तर की महिलाएं शिक्षा, खेल एवं समाजसेवा आदि हर क्षेत्र में अपने-अपने राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए देश का नाम रोशन कर रही हैं. घरेलू महिलाएं भी घर के कामकाज के अलावा कुछ ऐसे कार्यों से जुड़ी हुई हैं, जो इन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद करते हैं. इससे न केवल इनकी अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है, बल्कि इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है.


मणिपुर स्थित ईमा कैथेल केवल महिलाओं का बाज़ार है. यह बाज़ार महिला सशक्तिकरण का एक प्रतीक है. ईमा कैथेल राजधानी इंफाल के बीचोबीच स्थित है. राज्य की महिलाओं को कार्यस्थल, घर एवं समुदाय की ओर से कई तरह की सहूलियतें हासिल हैं, जो देश के बाकी हिस्सों में बहुत कम मिलती हैं. इस बाज़ार की दुकानदार महिलाओं की अपनी एक अलग जीवनशैली है. यहां हरी सब्जियां, खाद्य पदार्थ, लोहे के औजार, मछलियां, कपड़े, बांस निर्मित वस्तुएं एवं मिट्टी के बर्तन आदि का व्यवसाय होता है. ईमा कैथेल के माध्यम से मणिपुर की महिलाओं ने व्यापार-वाणिज्य के क्षेत्र में अपने क़दम आगे बढ़ाए हैं. इन दुकानदार महिलाओं को समय-समय पर राजनीतिक और सैन्य हलचलों का भी सामना करना पड़ता है. जीवन को स्वदेशी बनाए रखने में इन महिलाओं की बड़ी भूमिका है. अपने परिवार एवं समुदाय के लिए ये आर्थिक स्तंभ की तरह हैं. ये 4,000 शक्तिशाली महिलाएं अपने बेहतर भविष्य के लिए हमेशा एकजुट रहती हैं.

पूर्वोत्तर मूल रूप से महिला प्रधान समाज है. यहां महिलाओं की स्थिति बहुत मजबूत है. पुरुषों की अपेक्षा परिवार की ज़्यादातर ज़िम्मेदारियां महिलाएं संभालती हैं. ये घर से बाहर निकल कर मज़दूरी करती हैं, अपनी खेती-बाड़ी का काम संभालती हैं, पुरुषों से कई गुना ज़्यादा काम करके अपना परिवार चलाती हैं. यहां की महिलाएं कोई भी निर्णय अपने स्तर पर लेने में सक्षम एवं स्वतंत्र हैं. नगालैंड की महिलाएं दुर्गम पहाड़ों पर खेती का काम करती हैं. इन मेहनतकश महिलाओं पर घर-समाज की ओर से किसी तरह की पाबंदी नहीं होती. ये महिलाएं उतने ही बिंदास अंदाज में रहती हैं, जितने पुरुष. मिजोरम, जो अधिकतर पहाड़ पर बसा हुआ है, की महिलाएं अपने बच्चे को पीठ पर बैठाकर लकड़ी काटने जाती हैं, कटी हुई लकड़ी सिर पर लाद कर देर शाम अपने घर लौटती हैं, लेकिन परिवार में किसी को उनसे शिकायत नहीं रहती. त्रिपुरा में महिलाएं खेती-बाड़ी का ज़िम्मा खुद संभालती हैं, दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ कर झरने से पानी लाती हैं. यह स़िर्फ एक दिन की बात नहीं है, बल्कि यह जीवन का हिस्सा है. मणिपुर में महिलाएं झील से मछली पकड़ने के काम में घर के पुरुषों की मदद करती हैं. साक्षरता के मामले में भी पूर्वोत्तर की महिलाएं किसी से कम नहीं हैं. अगर पुरुषों का प्रतिशत 80 है, तो महिलाएं भी 70 फ़ीसद दर के साथ उनके क़दम से क़दम मिला रही हैं.

इतिहास गवाह है कि पूर्वोत्तर की महिलाओं ने विषम से विषम परिस्थितियों में मोर्चा संभाला है. 1904 और 1939 में हुए संघर्ष नुपी लाल में मणिपुर की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. ब्र्रिटिश सरकार के अन्याय के ख़िलाफ़ महिलाओं ने कपड़ा बुनने में इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के टुकड़े को अपना हथियार बनाया और पुरुषों से एक क़दम आगे बढ़कर मोर्चा संभाल लिया. आज भी हर साल 12 दिसंबर को उन महिलाओं को याद किया जाता है. नगा स्वतंत्रता सेनानी रानी गायदिनलू को भी लोग याद करते हैं. काफी लंबे समय तक वह जेल में रहीं. उन्होंने गांधी जी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर 14 सालों तक आज़ादी की लड़ाई लड़ी.

पूर्वोत्तर की महिलाओं को स्वयं के महिला होने का कोई दु:ख नहीं होता, क्योंकि उन्हें घर और समाज का पर्याप्त संरक्षण हासिल है. माता-पिता बेटी-बेटे के बीच फर्क नहीं करते, कोई पक्षपात नहीं बरतते. जबकि उत्तर भारत में बेटी का जन्म होते ही बहुधा घर में मायूसी छा जाती है. वजह भी है. समाज में दहेज प्रथा आज भी खुशियों को ग्रहण लगा रही है. वहीं पूर्वोत्तर में अलग रिवाज है. वर पक्ष वधु के घर वालों को खुद दहेज देते हैं, जिससे वधु अपने पारंपरिक परिधान खरीदती है. बॉक्सिंग में पांच बार विश्‍व चैंपियन रहीं मैरी कॉम के जीवन पर आधारित एक फिल्म भी आ रही है. मैरी कॉम पूर्वोत्तर की महिलाओं का एक सशक्त रूप है. ग़रीब परिवार में पैदा होने के बावजूद खेल के क्षेत्र में उन्होंने देश का नाम रोशन किया. दो बच्चों की मां बनने के बाद वह विश्‍व चैंपियन बनीं. यह उनके लिए एक चुनौती थी. 

Tuesday, August 26, 2014

पूर्वोत्तर में भी पहुंची मोदी लहर

16वीं लोकसभा चुनाव का परिणाम सामने है. इस चुनाव में भाजपा को अप्रत्याशित परिणाम मिला. पूरे देश में मोदी की लहर का असर हुआ. पूर्वोत्तर में भी. यहां के सबसे ब़डे राज्य असम में पार्टी को काफी हद तक सफलता मिली वहीं पूरे पूर्वोेत्तर में पार्टी ने अपने सहयोगियों के साथ बेहतरीन जीत हासिल की. चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर में कई वायदे किए. अरुणाचल और त्रिपुरा की धरती पर मोदी ने चीन और बांग्लादेश को चुनौती दी. इंफाल में आईटी हब खोलने की बात की. मोदी के इन वायदों का असर पूर्वोत्तर के लोगों पर हुआ.
 
16 मई के नतीजे ने यह स्पष्ट कर दिया कि न सिर्फ उत्तर भारत, बल्कि पूर्वोत्तर में मोदी लहर देखी गई. पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं. इनमें भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए गठबंधन ने 10 सीटें हासिल की. गौरतलब है कि 2009 के लोकसभा के चुनाव में भाजपा के पास असम के 14 सीटों में 4 सीटें ही थीं. इसके अलावा पूर्वोत्तर के बाकी सात राज्यों में भाजपा शून्य पर थी. इस बार यह स्थिति पूरी तरह बदली है. इस बार असम में सात, नगालैंड में 1, मेघालय में 1 और अरुणाचल प्रदेश में 1 सीट जीतने में एनडीए सफल रहा है. अगर 2009 के नतीजे से तुलना करें, तो इस बार एनडीए की सफलता पिछली बार से ढाई गुना अधिक है.

पूर्वोत्तर में मोदी लहर के पहुंचने की बड़ी वजह यह है कि पहली बार किसी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने अपनी रैलियों में विशेष ध्यान दिया. नरेंद्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान के दौरान कुल सात बार पूर्वोत्तर में रैली की और उनकी रैलियों में जनता काफी बड़ी संख्या में जुटी. यह इस बात का संकेत था कि पूर्वोत्तर के लोगों का झुकाव मोदी, उनके भाषणों और वादों के प्रति हो रहा है. अभी तक तमाम दलों के बड़े नेताओं के एजेंडे में पूर्वोत्तर महत्वपूर्ण स्थान नहीं रखता था. इसकी वजह यह है कि कांग्रेस हमेशा से यहां से जीतती आई है और वह इन क्षेत्रों सीटों के प्रति हमेशा आश्‍वस्त रहती थी. नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और वामदलों के इस मिथक को तोड़ने की पूरी कोशिश की और वे इसमें काफी हद तक सफल भी रहे. मोदी लहर की एक मिसाल यह भी है कि पूर्वोत्तर में भाजपा को अपने लिए उम्मीदवार तक के लाले पड़ जाते थे, लेकिन इस बार मणिपुर में ही वहां के नेताओं में भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ने की होड़ सी लग गई. यानी वहां के नेता से लेकर जनता तक इस बात से वाकिफ थे कि अगर मोदी किसी मुद्दे पर वादा कर रहे हैं, तो उसे पूरा भी करेंगे. उनके सामने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात में मोदी द्वारा किए गए कार्यों का उदाहरण था. दूसरी बात यह कि मोदी ने पूर्वोत्तर के लोगों के सम्मान की बात करके वहां की जनता का दिल जीत लिया. एक तरफ उन्होंने अरुणाचल में जाकर चीन को ललकारा, तो दूसरी तरफ त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर कड़ा रुख अपनाने की बात कही. इनके अलावा पूर्वोत्तर के विकास का भी जिक्र मोदी ने अक्सर किया. चाहे वह इंफाल में आईटी हब बनाने की बात हो या पूरे पूर्वोत्तर के महिलाओं के रोजगार की बात. इन सभी मुद्दों ने पूर्वोत्तर में मोदी के पक्ष में एक माहौल बनाने का काम किया, जो हमें लोकसभा के नतीजों में दिखता है. अगर नतीजों की बात करें, तो यहां का परिणाम चौंकाने वाला रहा. हालांकि, पूर्वोत्तर में आजादी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस का ही कब्जा रहा है. असम में 14 सीटें हैं. इनमें भाजपा को सात सीटें मिलीं. कांग्रेस को तीन सीट मिली.इस बार भी मणिपुर में दोनों सीटों पर, इनर और आउटर, में कांग्रेस का ही कब्जा रहा. इनर में एक लाख से अधिक वोटों से कांग्रेस ने जीत हासिल की. दूसरे नंबर पर सीपीआई और तीसरे नंबर पर भाजपा है. आउटर में पंद्रह हजार वोट से कांग्रेस ने नगा पीपुल्स फ्रंट को हराया. तीसरे पंबर पर भाजपा है. मिजोरम में एक सीट है. कांग्रेस ने 10 हजार वोट से निर्दलीय उम्मीदवार को हराया. तीसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी आई. मिजोरम में तो भाजपा की बुरी स्थिति बनी. त्रिपुरा में, त्रिपुरा ईस्ट और वेस्ट, दोनों सीटों पर सीपीआई (एम) का ही कब्जा रहा है. त्रिपुरा ईस्ट में सीपीआई (एम) 4 लाख से अधिक वोट से जीती. दूसरे नंबर पर कांग्रेस, तीसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस और चौथे पर भाजपा है. त्रिपुरा वेस्ट में भी दूसरा और तीसरा स्थान कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस रहा. मेघालय में दो सीट शिलांग और तूरा है. यहां पर एक दोनों पार्टियोंे ने एक-एक सीट हासिल की है. शिलांग में कांग्रेस ने एक लाख से अधिक वोट से जीत हासिल की. दूसरे और तीसरे पर निर्दलीय और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी है. तूरा में नेशनल पीपुल्स पार्टी 40 हजार वोट से जीती और कांग्रेस दूसरे स्थान पर आई. अरुणाचल में दो सीट अरुणाचल ईस्ट और वेस्ट में कांग्रेस और भाजपा ने एक-एक पर जीत दर्ज की. अरुणाचल ईस्ट में कांग्रेस ने भाजपा को 13 हजार से हराया. तीसरे नंबर पर पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल है. अरुणाचल वेस्ट में भाजपा 33 हजार वोट से जीती. दूसरे और तीसरे नंबर पर कांग्रेस और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल रहे. सिक्किम में एक सीट है. सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट यहां 44 हजार वोट से जीता. दूसरे और तीसरे नंबर पर सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा और कांग्रेस है. नगालैंड में एक सीट है. राज्य में नगा पीपुल्स फ्रंट ने कांग्रेस को 4 लाख वोटों से हराया. यहां क्षेत्रीय पार्टी हमेशा बुलंद रही है. इस बार भी नगा पीपुल्स फ्रंट आगे रहा. पार्टी का इस चुनाव में भाजपा से गठबंधन रहा.

आखिर, नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत से जीते. अबकी बार भाजपा की सरकार आ रही है. पूरे देश के लोगों ने उनको चुना. अब बारी है नरेंद्र मोदी की. जनता का विश्‍वास कितना जीत पाते हैं. साथ में पूर्वोत्तर लोगों को कितना आकर्षित कर पाते है. देश के इस हिस्से में की गई चुनावी रैलियों के दौरान किए गए वायदों को पूरा कर पाने में अगर मोदी सफल रहे तो शायद यहां की जनता उन्हें पूरी तरह स्वीकार करने से परहेज नहीं करेगी. और उनका असफल रहना कांग्रेस का अस्तित्व बचाए रख सकता है.

...जिन्हें अपने ही देश में वोट देने का हक़ नहीं


क्या मेघालय हिंदुस्तान का हिस्सा नहीं है? अगर यह सूबा इस देश का अंग है, तो मेघालय के क़रीब सात हज़ार लोगों को आज़ादी के 66 वर्षों बाद भी वोट देने का अधिकार क्यों नहीं है? आख़िर देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया क्यों नहीं कराई गई हैं?
मेघालय को संपूर्ण राज्य का दर्ज़ा मिले चालीस साल गुज़र गए, लेकिन राज्य के एक समूह को आज भी चुनावों में वोट देने का अधिकार नहीं है. इस साल गारो जनजातीय समूह के 272 लोग संसदीय चुनाव में पहली बार हिस्सा लेंगे, हालांकि वे इससे पहले राज्य विधानसभा और स्वायत्त परिषद के चुनावों में मताधिकार का प्रयोग कर चुके हैं. ग़ौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट देने जा रही गारो जनजाति पूर्वी खासी हिल्स ज़िले में बसी हुई है. इस समुदाय के 7000 लोगों ने आज़ादी के बाद से अभी तक किसी चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया, क्योंकि उनके नाम राज्य की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं. मताधिकार से वंचित उक्त सभी लोग भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित क़रीब 14 गांवों में पिछले कई वर्षों से रह रहे हैं. उनमें से स़िर्फ 272 लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल करके उन्हें मतदाता पहचानपत्र निर्गत किया गया है. बेशक वे पहली बार आम चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवारों के बारे में कुछ भी पता नहीं है.

राज्य निर्वाचन आयोग का कहना है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार है. आयोग के मुताबिक़, गारो जनजाति के 7000 लोगों को अभी तक मताधिकार नहीं मिला है, इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता. अगर सरकारी स्तर पर कोई लापरवाही है, तो उसे अविलंब दूर किया जाएगा, साथ ही मतदाताओं को जागरूक भी किया जाएगा. उल्लेखनीय है कि मेघालय में तीन प्रमुख जनजातियां हैं, गारो, खासी और जयंती. आबादी के लिहाज़ से गारो राज्य की दूसरी बड़ी जनजाति है. याद रखने वाली बात यह है कि वर्ष 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय क़रीब 1500 ग़ैर स्थानीय आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था. यही वजह है कि वे भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा के निकट बसे 14 गांवों में तबसे रह रहे हैं. वे शासन-प्रशासन की तरफ़ से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित हैं.

देर से ही सही, अगर स्थानीय गारो जनजाति के 272 लोगों को मतदान का अधिकार मिला है, तो उसका स्वागत होना चाहिए. स्थानीय प्रशासन को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए. गारो जनजाति बहुल सभी चौदह गांवों के लोगों को मनरेगा के तहत काम मिलना चाहिए, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो. राज्य एवं केंद्र सरकार को चाहिए कि वे उनके लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य की सुविधाएं प्रदान करें. बहरहाल, इस बीच पी ए संगमा के नेतृत्व वाली एनपीपी ने गारोलैंड राज्य की मांग का समर्थन किया है. गारो हिल्स स्टेट मूवमेंट कमेटी (जीएचएसएमसी) ने संगमा के इस ़फैसले का स्वागत किया है. उसके मुताबिक़, एनपीपी का यह ़फैसला क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. ग़ौरतलब है कि गारो जनजाति की समस्याओं के मद्देनज़र एनपीपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इस समुदाय के हितों को शामिल किया है. गारो हिल्स स्टेट मूवमेंट कमेटी की मानें, तो पी ए संगमा का यह निर्णय क्षेत्र की जनता के लिए सही साबित होगा. उसके अनुसार, संगमा बतौर सांसद काफ़ी अच्छा काम करेंगे. वहीं दूसरी तरफ़ पी ए संगमा के इस समर्थन पर मेघालय के मुख्यमंत्री डॉ. मुकुल संगमा ने नाराज़गी ज़ाहिर की है. उनके अनुसार, यह स़िर्फ राजनीतिक फ़ायदे के लिए किया गया एक ़फैसला है और यह गारो जनजाति के हितों के ख़िलाफ़ है. उन्होंने कहा कि पी ए संगमा गारो जनजाति के लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं. मुख्यमंत्री ने पी ए संगमा को भाजपा का एजेंट तक क़रार दे दिया. उनके इस बयान से प्रदेश भाजपा नेताओं में गहरी नाराज़गी है. ग़ौरतलब है कि मेघालय में एनपीपी का भाजपा के साथ गठबंधन है. वर्ष 2012 में पी ए संगमा को एनसीपी से निलंबित कर दिया गया था. उसके बाद उन्होंने एनपीपी नामक पार्टी का गठन किया.  

बू्र शरणार्थियों के लिए बेमानी है लोकतंत्र का यह महापर्व

चुनाव में जनता के लिए मतदान से बढ़कर कुछ भी नहीं होता, लेकिन जिन्हें मतदान से वंचित कर दिया जाए उनके लिए लोकतंत्र के महापर्व का क्या अर्थ रह जाता है? दरअसल, मिजोरम के बू्र जनजाति पिछले पंद्रह वर्षों से अपनी पहचान और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. ग़ौरतलब है कि वर्ष 1997 में एक मिजो वन अधिकारी की हत्या के बाद शुरू हई जातीय हिंसा के बाद ब्रू आदिवासी त्रिपुरा के कंचनपुर और पानिसागर के शरणार्थी शिविरों में अपना जीवन काट रहे हैं. इस घटना के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी ब्रू जनजाति अपने ही देश में परायेपन के शिकार हैं. ग़ौरतलब है कि सोलहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के मद्देनज़र चुनाव आयोग ने यह निर्णय लिया है कि ब्रू आदिवासी शरणार्थियों को पोस्टल मतपत्रों के ज़रिए मत देने का अधिकार दिया जाएगा. हालांकि चुनाव आयोग के इस निर्णय पर मिजोरम के कुछ एनजीओ और युवा संगठनों ने विरोध किया है. इस बाबत उन्होंने रैलियां भी निकाली. इन रैलियों का नेतृत्व यंग मिजो एसोसिएशन (वाइएमए) ने किया.

इस बारे में यंग मिजो एसोसिएशन का कहना है कि, हमने अपना विरोध संदेश निर्वाचन आयोग के समक्ष भेजा है, लेकिन उनकी ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. इस बाबत मिजो जिरलाई पॉल (एमजेडपी) के अध्यक्ष, पांच ग़ैर सरकारी संगठनों और युवा निकायों के समन्वय समिति के सदस्यों ने भी इस मुद्दे पर विरोध करने का ऐलान कर दिया है. इन संगठनों की मांग है कि राहत शिविरों में रह रहे सभी शरणार्थियों को लोकसभा चुनाव से पहले मिजोरम वापस भेजा जाए और जो नहीं जाना चाहते हैं, उन लोगों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाए. एमजेडपी के मुताबिक़ब्रू जनजाति शरणार्थियों ने अपनी मर्जी से वर्ष 1997 और 2009 में मिजोरम छोड़ा था. मिजोरम सरकार द्वारा चलाए गए कई प्रत्यावर्तन कार्यक्रमों के बावजूद भी इन शरणार्थियों ने बिना कोई उचित कारण बताए वापस जाने से इंकार कर दिया. ब्रू जनजाति शरणार्थियों की मानें, तो उस समय वे त्रिपुरा के शिविरों से घर लौटने के लिए मना कर दिया था, जब तक कि उनकी सुरक्षा की गारंटी न दी जाए. हालांकि मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथनहावला ने भी एक महीने पहले चुनाव आयोग से आग्रह किया था कि सात राहत शिविरों में रहने वाले ब्रू जनजाति शरणार्थियों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जाए. उन्होंने यह बात भी कही थी कि राज्य की एकमात्र लोकसभा सीट के भाग्य का फैसला पोस्टल वोटिंग के ज़रिए नहीं किया जाना चाहिए.
वहीं, दूसरी तरफ त्रिपुरा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आशुतोष जिंदल का कहना है कि पिछले चुनावों की तरह इस बार भी उत्तरी त्रिपुरा में राहत शिविरों में रह रहे शरणार्थियों को वोट डालने का अधिकार दिया जाएगा. उनके मुताबिक़, अप्रैल के पहले सप्ताह तक उत्तरी त्रिपुरा के सात शरणार्थी शिविरों में कम से कम एक सुविधा केंद्र स्थापित किया जाएगा, ताकि यहां के लोग लोकसभा चुनाव में पोस्टल वोटिंग के ज़रिए अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें. वैसे इस संबंध में चुनाव आयोग ने राज्य सरकार से यह जानकारी मांगी थी कि क्या ब्रू विस्थापितों के संगठन राहत शिविरों में मतदान कराने के पक्ष में हैं. हालांकि एमबीडीपीएफ ने चुनाव आयोग से यह शिकायत की थी कि कई योग्य मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया है. दरअसल, 36000 से अधिक रियांग आदिवासी शरणार्थियों को स्थानीय भाषा में ब्रू कहते हैं. इनमें से 11,500 मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया था, लेकिन विधानसभा की 40 सीटों में से महज़ 10 निर्वाचन क्षेत्रों में ही इनका नाम शामिल है.

बहरहाल, मिजोरम के मम्मित ज़िले से आए ब्रू जनजाति अल्पसंख्यक है. मिजो वन्य अधिकारी ललजाउमलियाना की हत्या के बाद ये लोग पलायन करने को मजबूर हुए थे. हालांकि इस घटना के पीछे भूमिगत ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट(बीएनएलएफ) का हाथ था. उस समय बीएनएलएफ पश्‍चिमी मिजोरम के ब्रू बहुल क्षेत्रों में एक स्वायत्त ज़िला परिषद के निर्माण के लिए और मिजोरम के अंदर एक विद्रोही आंदोलन की अगुवाई कर रहा था. उत्तर त्रिपुरा के सब-डिविजन कंचनपुर में छह कैंपों में 35000 शरणार्थी हैं. इतना ही नहीं, ब्रू आदिवासी दक्षिणी असम में भी शरण लिए हुए हैं. राहत शिविरों में रहने वाले इन जनजातियों की हालत काफ़ी दयनीय है, लेकिन उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई है. इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इन लोगों को न तो राजनीतिक अधिकार मिला है और न ही सामाजिक अधिकार. ऐसी सूरत में ब्रू जनजातियों के लिए लोकसभा चुनाव का कोई महत्व नहीं है. स्थानीय ब्रू जनजातियों के अनुसार, अपने ही देश में उन्हें पराया समझा जाता है.


उल्लेखनीय है कि वर्ष 1999 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद त्रिपुरा के राहत शिविरों में रह रहे ब्रू शरणार्थियों ने पहली बार डाक मतपत्र के ज़रिए अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. पिछले  मिजोरम विधानसभा चुनाव में भी उन लोगों ने इसी तरी़के से मतदान किया था. तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अपनी मिजोरम यात्रा के दौरान यह कहा था कि वर्ष 2010 तक ब्रू शरणार्थियों के घर वापसी का अभियान पूरा कर लिया जाएगा.

चौंकाने वाले होंगे चुनाव परिणाम

सोलहवीं लोकसभा के लिए पूर्वोत्तर के राज्यों में चुनाव बेहद नज़दीक हैं. सभी राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान भी कर चुके हैं. अगर देखा जाए, तो पूर्वोत्तर शुरू से ही कांग्रेस का गढ़ रहा है. हालांकि, हर चुनाव के समय विभिन्न सियासी पार्टियां कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए पूरी ताकत झोंक देती हैं, लेकिन विपक्षी एकजुटता की कमी और ठोस रणनीति के अभाव में वे सफल नहीं हो पाती हैं. वैसे भी पूर्वोत्तर के विकास की दिशा में कांग्रेस नीत सरकारों ने कोई विशेष काम नहीं किया है, बावजूद इसके इन राज्यों में अधिकतर समय कांग्रेस की ही सरकार रही है. सियासी जानकारों की मानें, तो इस बार पूर्वोत्तर में बेहद दिलचस्प चुनावी मुक़ाबला होगा. अब तक विपक्षी पार्टियों की चुनौती से बेपरवाह रहने वाली कांग्रेस इस बार ज़्यादा परेशान दिख रही है. पूर्वोत्तर के राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का कोई ख़ास जनाधार नहीं रहा है, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की सक्रियता और पूर्वोत्तर में उनकी रैली होने से हालात काफी बदल चुके हैं. पूर्वोत्तर में मोदी की लहर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले जहां पार्टी का टिकट पाने के लिए मारामारी नहीं थी, वहीं इस बार नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में पूर्वोत्तर से आए टिकटार्थियों की लंबी कतार देखी गई.

भाजपा के शीर्ष नेताओं का मानना है कि पूर्वोत्तर में यह बदलाव नरेंद्र मोदी की वजह से आया है. राजनीतिक विश्‍लेषकों की मानें, तो इस बार पूर्वोत्तर के चुनावी नतीज़े बेहद चौंकाने वाले होंगे. इस बार असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश एवं नगालैंड में भाजपा अच्छी स्थिति में दिख रही है. अगर ऐसे ही हालात बने रहे, तो यहां भाजपा को कुछ सीटों का फ़ायदा हो सकता है. भाजपा के स्थानीय नेताओं का कहना है कि पूर्वोत्तर में नरेंद्र मोदी की जनसभाओं से पार्टी कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं. ग़ौरतलब है कि पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय पार्टियों का कोई वजूद नहीं है, सिवाय नगालैंड के. प्रदेश के सियासी अतीत की बात करें, तो यहां शुरू से ही क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा रहा है, लेकिन पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों में कांग्रेस के सामने दूसरी पार्टियां बौनी दिखती हैं. मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम एवं असम की सत्ता पर अब तक कांग्रेस का दखल रहा है, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपना किला बचा पाएगी, यह कहना मुश्किल है. देशव्यापी भ्रष्टाचार एवं महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस चौतरफ़ा हमले की शिकार है. प्रदेश के पार्टी नेताओं की मानें, तो यही एक ऐसा मुद्दा है, जिसे लेकर कांग्रेस बैकफुट पर नज़र आ रही है.

त्रिपुरा में सभी पार्टियों ने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. वाममोर्चा ने भी पश्‍चिम त्रिपुरा एवं पूर्वी त्रिपुरा से अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतार दिए हैं. वाममोर्चा ने पश्‍चिम त्रिपुरा से शंकर प्रसाद दत्त और पूर्वी त्रिपुरा से जीतेंद्र प्रसाद चौधरी को उम्मीदवार बनाया है. वहीं तृणमूल कांग्रेस ने पश्‍चिम त्रिपुरा से रतन चक्रवर्ती और पूर्वी त्रिपुरा से भृगुराम रियांग को अपना प्रत्याशी बनाया है. पूर्वोत्तर के चुनावी समर में आम आदमी पार्टी भी शामिल है. पार्टी की ओर से कर्ण विजोय जमातिया एवं डॉ. सालिल साहा क्रमश: पूर्वी और पश्‍चिम त्रिपुरा से उम्मीदवार बनाए गए हैं. भाजपा ने यहां सुधींद्र सीएच दासगुप्ता और परीक्षित देव वर्मा को उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस की ओर से प्रो. अरुणोदय साहा एवं सचित्रा देव वर्मा को पूर्वी और पश्‍चिमी त्रिपुरा से प्रत्याशी बनाया गया है. हालांकि, त्रिपुरा में वाममोर्चा की सरकार काफी मजबूत है. राज्य के चुनावी इतिहास पर नज़र दौड़ाएं, तो यहां वाममोर्चा का मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस से ही रहा है. सियासी जानकारों के मुताबिक़, इस बार कमोबेश यही स्थिति रहने वाली है. अगर त्रिपुरा के मतदाताओं की बात करें, तो यहां के मूल निवासी आदिवासी हैं, जो पहाड़ों पर रहते हैं, जबकि शहरी इलाक़ों में ग़ैर त्रिपुरा के लोग रहते हैं. त्रिपुरा के स्थानीय लोगों के साथ बरती जा रही ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ इंडिजीनस नेशनलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा जैसे दल हमेशा आवाज़ उठाते रहे हैं. बहरहाल, आगामी लोकसभा चुनाव में यह तय माना जा रहा है कि त्रिपुरा में स्थानीय मुद्दे ही हावी रहेंगे.
अब बात करते हैं मणिपुर की. यहां क्षेत्रीय पार्टियों की स्थिति बेहद कमजोर रही है. आज़ादी से लकर आज तक सूबे की सत्ता पर कांग्रेस की पकड़ मजबूत बनी हुई है. हालांकि, वर्षों तक कांग्रेसी शासन रहने के बाद भी मणिपुर की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इससे तकलीफ़देह बात और क्या होगी कि आज़ादी के 66 वर्षों बाद भी मणिपुर की जनता बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. राज्य की लाइफ लाइन कहे जाने वाले नेशनल हाईवे 39 की हालत बेहद खराब है. यहां बिजली और पानी की भी गंभीर समस्या है. राज्य के ग्रामीण इलाकों में महज दो घंटे के लिए ही बिजली आती है. मणिपुर में अफसपा, भारत-म्यांमार सीमा फेंसिंग एवं इनर लाइन परमिट आदि कई समस्याओं का हल अबतक नहीं हो पाया है. मणिपुर में आम आदमी पार्टी भी सक्रियता दिखा रही है, लेकिन चुनाव में उसे किसी तरह की सफलता नहीं मिलने वाली है. आम आदमी पार्टी ने यहां से डॉ. केएच इबोमचा सिंह और एम खामचिनपौ जऊ को अपना उम्मीदवार बनाया है.

कांग्रेस पार्टी ने अपने मौजूदा सांसदों टी मैन्य और थांगसो बाइते को ही उम्मीदवार बनाया है. वहीं भाजपा ने डॉ. आरके रंजन एवं प्रो गांगुमै कामै को इनर और आउटर संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने यहां से एस मनाउबी सिंह और किम गांते को प्रत्याशी बनाया है. मणिपुर डेमोक्रेटिक पीपुल्स फ्रंट की ओर से डॉ. जी तोनसना शर्मा और नगा पीपुल्स फ्रंट की ओर से सोरो लोरहो मैदान में हैं. जेडीयू ने लीन गांते, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने लामललमोइ, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने चूंगखोकाई दौंगेल को अपना उम्मीदवार बनाया है.

अरुणाचल प्रदेश की बात करें, तो यहां हाबुंग पायेंग आम आदमी पार्टी के बड़े नेता हैं. माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस को कड़ी चुनौती देंगे. कांग्रेस ने इस बार अरुणाचल प्रदेश से सात नए चेहरों को टिकट दिया है, जिसमें कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मुकुल मिथि का पुत्र भी शामिल है. हालांकि, कांग्रेस के वर्तमान विधायक अतुम वेल्ली पिछले दिनों भाजपा में शामिल हो गए. ख़बरों के मुताबिक, वह पाक्के केस्सांग संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे. नगालैंड में क्षेत्रीय पार्टी सबसे मजबूत है. नगा पीपुल्स फ्रंट यहां की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी है. यह पार्टी नगालैंड में कई वर्षों से सत्ता में है. यहां लोकसभा की महज एक सीट है. वर्तमान मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो भाजपा से गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरेंगे. हालांकि, रियो पर सांप्रदायिकता के गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं, लेकिन माना जा रहा है कि भाजपा से गठबंधन होने के बाद यहां का चुनाव परिणाम बदल सकता है. पंद्रहवीं लोकसभा में पूर्वोत्तर से भाजपा के कुल चार सांसद थे, लेकिन इस बार यह संख्या बढ़ सकती है, जैसा कि पार्टी नेताओं का मानना है.

बहरहाल, सोलहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव पर देश भर की निगाह लगी हुई है. पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस समेत सभी स्थानीय पार्टियां चुनाव प्रचार में जुटी हैं. भाजपा ने भी यहां पूरी ताकत लगा दी है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पूर्वोत्तर का चुनाव परिणाम इस बार किस पार्टी के पक्ष में जाता है.

बदल सकता है पूर्वोत्तर का सियासी समीकरण

पश्‍चिम बंगाल, जिसे वामदलों का अभेद्य दुर्ग समझा जाता था, लेकिन वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने जीत हासिल कर इस मिथक को तोड़ दिया था. इस कामयाबी से उत्साहित तृणमूल कांग्रेस ने न सिर्फ बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है, बल्कि उसे उम्मीद है कि बंगाल के जादू का असर पूर्वोत्तर में भी पड़ेगा.


कांग्रेस के गढ़ पूर्वोत्तर में कोई भी बड़ी राजनीतिक पार्टी आज तक अपनी जगह नहीं बना पाई है. पिछले साल दिसंबर 2013 को पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिजोरम छोड़कर सभी राज्यों में सत्ता खोनी पड़ी. ऐसी स्थिति में भी बड़ी पार्टियां पूर्वोत्तर में अपनी जड़ें मजबूत नहीं कर पाईं. चूंकि अब लोकसभा चुनाव के तारीख़ों का ऐलान हो गया है. ऐसे में हर राजनीतिक दल पूर्वोत्तर राज्यों में अपने उम्मीदवारों उतार रही हैं. तृणमूल कांग्रेस ने भी इन राज्यों में अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है. पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को ऐसा लगता है कि पश्‍चिम बंगाल की तरह पूर्वोत्तर राज्यों में भी उनके सुशासन का फ़ायदा पार्टी को मिलेगा.

ग़ौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस ने त्रिपुरा से दो उम्मीदवारों भृगुराम रियांग और रतन चक्रवर्ती को क्रमशः पूर्वी त्रिपुरा और पश्‍चिम त्रिपुरा से उतारा है. तृणमूल कांग्रेस की मानें तो त्रिपुरा में वाम विरोधी मतदाताओं को कांग्रेस वर्षों से धोखा दे रही है. ऐसी स्थिति में तृणमूल कांग्रेस ही राज्य में वाम मोर्चे का विकल्प बन सकता है. तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने त्रिपुरा की जनता को यकीन दिलाया है कि पार्टी की ओर से जनप्रिय और सक्षम उम्मीदवारों को खड़ा किया जाएगा, ताकि वे जनता की सेवा कर सकें. ग़ौरतलब है कि प्रदेश तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष रतन चक्रवर्ती पहले कांग्रेस में थे, लेकिन कांग्रेस की नीतियों से नाराज़ होकर उन्होंने ममता बनर्जी का साथ देने का ़फैसला लिया. उल्लेखनीय है कि त्रिपुरा प्रगतिशील ग्रामीण कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठबंधन था, लेकिन पिछले दिनों उम्मीदवारों के घोषणा के बाद यह गठबंधन टूट गया. राजनीतिक रूप से त्रिपुरा प्रगतिशील ग्रामीण कांग्रेस का राज्य में अच्छा ख़ासा जनाधार है. ऐसे में गठबंधन टूटने से तृणमूल कांग्रेस को राज्य के ग्रामीण इलाक़ों में नुक़सान हो सकता है. हालांकि, त्रिपुरा प्रगतिशील ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष सुबल भौमिक ने गठबंधन टूटने के बाद टीएमसी पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में कोई अंतर नहीं है. भौमिक ने आरोप लगाया कि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र राज्य में वाम विरोधी फ्रंट बनाने के लिए उनकी ओर से ईमानदार पहल की गई थी, बावजूद इसके तृणमूल कांग्रेस ने मुझे नज़रअंदाज़ कर दिया. उनके मुताबिक, पश्‍चिम त्रिपुरा से वह बतौर निर्दलीय लड़ेंगे और पूर्वी त्रिपुरा सीट के लिए वह दूसरे दल से गठबंधन करेंगे.

बात अगर मणिपुर की राजनीति की करें, तो राज्य के भीतरी इला़के से सरांगथेम मनाउबी सिंह और बाहरी से कीम गांते है. मणिपुर से तृणमूल कांग्रेस का पुराना नाता रहा है. हालांकि, प्रदेश की सत्ता पर कई वर्षों से कांग्रेस का ही क़ब्ज़ा रहा है. इसके बावजूद  तृणमूल कांग्रेस की स्थिति यहां ठीक-ठाक कही जा सकती है. ममता बनर्जी जब मणिपुर आई थीं, तब उन्होंने आर्म्ड फोर्सेस स्पशेल पावर एक्ट को लेकर अनशन कर रही इरोम शर्मिला से भी मिली थीं. उन्होंने मणिपुर की जनता को भरोसा दिया था कि वह उनकी आवाज़ बुलंद करेगी. हालांकि अब देखना यह है कि सोलहवीं लोकसभा में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को पूर्वोत्तर के राज्यों में कितनी सफलता मिलती है.

बहरहाल, तृणमूल कांग्रेस आगामी लोगसभा चुनाव में एकला चलो की नीति पर चलते हुए पश्‍चिम बंगाल की सभी 42 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. पार्टी की ओर से मशहूर फुटबॉल खिलाडी बाइचुंग भूटिया और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी समेत 26 नए चेहरे को चुनावी मैदान में उतारा गया है. अभिषेक बनर्जी तृणमूल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. तृणमूल कांग्रेस ने जिन नए चेहरे पर दांव लगाया है, उनमें फिल्म अभिनेत्री मुनमुन सेन, बंगाली सिनेमा से जुड़े देव और गुजरे जमाने की अभिनेत्री संध्या रॉय भी शमिल हैं. सुचित्रा सेन की बेटी मुनमुन सेन बांकुड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी, जबकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पौत्री सुगता बोस जादवपुर सीट से अपना किस्मत आजमाएंगी. वहीं ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी 24 दक्षिण परगना ज़िले के डायमंड हार्बर सीट से चुनाव लड़ेंगे. यहां दिलचस्प बात यह है कि सिक्किम के नामची निवासी बाइचुंग भूटिया दार्जिलिंग लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे. फ़िलहाल यहां जसवंत सिंह भाजपा के सांसद हैं, जिन्हें गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन हासिल है.


ग़ौरतलब है कि बीती 25 फरवरी को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असम में एक रैली को संबोधित किया था. राज्य में यह उनकी पहली रैली थी. ममता ने अपने संबोधन में यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि आज पूरा देश भ्रष्टाचार, महंगाई और अपराध से त्रस्त है, लेकिन मनमोहन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है. उनके मुताबिक़, तृणमूल कांग्रेस यूपीए और एनडीए को किसी भी क़ीमत पर अपना सर्मथन नहीं देगी. गुवाहाटी की सरुसजाई स्टेडियम में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जनता देशव्यापी भ्रष्टाचार, महंगाई और महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध से परेशान है, लेकिन यूपीए सरकार इस मामले में संवेदनहीन बनी हुई है. उनके मुताबिक़, पूर्वोत्तर से राज्यों से उनका काफ़ी पुराना नाता रहा है. इस मौ़के पर उन्होंने शंकरदेव अजान फ़कीर, डॉ. भूपेन हजारिका समेत कई महापुरुषों की प्रशंसा की. बहरहाल, पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह बंगाल की सत्ता पर चौंतीस वर्षों से क़ाबिज़ वाम दलों को चुनावी मैदान में पटखनी दी है, उससे पार्टी का मनोबल काफ़ी ऊंचा है. क्या ममता और उनकी पार्टी पूर्वोत्तर के राज्यों में यही दम-खम दिखा पाएंगी, यह लोकसभा चुनाव के नतीज़ों से ही साफ हो पाएगा.

Tuesday, March 18, 2014

मोदी की टोपी राजनीति

देश को इस तस्वीर का इंतज़ार है

राजनीति में टोपी पहनने और पहनाने का चलन तबसे है, जब से खुद राजनीति का अस्तित्व है. कभी जनता नेता को टोपी पहनाती है तो कभी नेता जनता को. टोपी किसी भी धर्म या जाति की हो, नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसको पहनने से इंकार कर दे, तो कई सवाल उस नेता की नीति और नीयत को ले कर खड़े हो जाते हैं.













ये फोटो असली नहीं है, बल्कि हमने अपनी कल्पना से इसे तैयार किया है, इस उम्मीद से, इस आशा से कि शायद नरेंद्र मोदी एक दिन इस टोपी को जरूर पहनेंगे, क्योंकि देश को इस तस्वीर का भी इंतजार रहेगा.

इन दिनों भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी 16वीं लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिए देश के विभिन्न राज्यों में  रैली कर रहे हैं. जहां-जहां जाते हैं, वहां-वहां की सांस्कृतिक और पारंपरिक  टोपी पहने हुए देखे जाते हैं. 8 फरवरी को मणिपुर की राजधानी इंफाल में उन्होंने वहां के राजा-महाराजाओं का मुकुट निंगखम समजी पहना. असम में  रैली के दौरान उन्होंने वहां की पारंपरिक टोपी अजापी पहनी. 22 फरवरी को अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट में हुई विजय संकल्प अभियान रैली में वहां की पारंपरिक टोपी दुमुलूक पहनी. सिलचर में हुई रैली में उन्होंने मणिपुर के मैतै समुदाय के एक हिस्सा, जो अब सिलचर में बसा हुआ है, की टोपी कोयेत पहनी. 16 फरवरी को हिमाचल प्रदेश के सुजानपुर तिरा में हुई परिवर्तन रैली में हिमाचली पहाड़ी टोपी पहनी तो 23 फरवरी को पंजाब के जगरांव, लुधियाना की फतेह रैली में पंजाबी पगड़ी पहनी. पिछले साल मोदी के 63 वें जन्मदिवस के मौके पर गांधी नगर में भिन्न-भिन्न तरह की पारंपरिक टोपी और पोषाक उनके शुभचिंतकों ने पहनाया. सितंबर 2011 में अहमदाबाद में एक सम्मेलन के दौरान मोदी ने बंधानी (एक टाई के रूप) पहनी.
3 फरवरी 2014 को नरेंद्र मोदी अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे की यात्रा के दौरान एक फैंसी टोपी पहने हुए थे, लेकिन सवाल है कि किस्म-किस्म की टोपी पहनने वाले मोदी को एक खास किस्म की टोपी से इतनी नफरत क्यों है


आपको याद होगा कि 2011 में अहमदबाद में सद्भावना उपवास के दौरान जब नरेंद्र मोदी को एक  मुस्लिम धर्मगुरु ने टोपी पहनानी चाही, तो नरेंद्र मोदी ने टोपी पहनने से इनकार कर दिया. मौलवी सैयद इमाम शाही सैयद ने मोदी को टोपी पहना कर स्वागत करना चाहा, मगर उन्होंने टोपी पहनने से इंकार किया. सवाल है कि दूसरे जाति या धर्म की पारंपरिक टोपी पहनने में नरेंद्र मोदी को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मुस्लिम टोपी से क्यों परहेज है? जाहिर है, वे ऐसा कर इस देश की एक बड़ी आबादी के महत्व को नकारने की कोशिश कर रहे हैं. क्या इसकी उम्मीद देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार से की जा सकती है

Wednesday, March 12, 2014

अनब्रिकेबल:एन ऑटोबायोग्राफी

संघर्ष की एक ईमानदार कथा

32 वर्षीय एम सी मैरी कोम की आत्मकथा-अनब्रिकेबल:एन ऑटोबायोग्राफी पढ़ने के बाद मुझे बहुत खुशी हुई. आश्‍चर्य भी महसूस हुआ, क्योंकि मैरी कोम ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं. वह केवल बॉक्सिंग की विश्‍व प्रसिद्ध खिलाड़ी हैं, कोई लेखिका नहीं, जिसने साहित्य के क्षेत्र में कभी काम किया हो. बावजूद इसके, कई यादगार लम्हों को समेट कर उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी, जो क़ाबिले तारीफ है. इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता ईमानदार लेखन, साहस के साथ अपनी बात कहना, बॉक्सिंग को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करना और उसे आने वाली पीढ़ियों की खातिर लोकप्रिय बनाने की उनकी कोशिश है. एक बॉक्सर बनने के लिए उन्होंने कितना संघर्ष किया, यह बात किताब पढ़ते समय बखूबी मालूम हुई. उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

मैरी कोम मानती हैं कि खेल ही सबको प्यार में बांध सकता है. वह अपनी जाति कोम और जन्मस्थल मणिपुर को बेहद प्यार करती हैं. एक मां होने की ज़िम्मेदारियां, पति के साथ ईमानदार रिश्ते, खेल में राजनीतिक दबाव, मणिपुर का अशांत माहौल एवं समस्याएं उनकी आत्मकथा के हिस्से हैं. यह किताब पढ़कर पता चलता है कि उनके अंदर कितना साहस, सकारात्मक सोच और धैर्य है. वह विश्‍व महिला बॉक्सिंग में पांच बार चैंपियन रहीं और लंदन ओलंपिक 2012 में उन्हें कांस्य पदक मिला. अर्जुन अवॉर्ड एवं पद्मभूषण से सम्मानित मैरी कोम के जीवन पर आधारित यह किताब युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करेगी, उन्हें मेहनत करने की प्रेरणा देगी. मैरी कोम की सफलता की यह कहानी अभी अंग्रेजी में आई है, इसे अन्य भाषाओं में भी प्रकाशित करने की ज़रूरत है, ताकि लोगों को प्रेरणा मिले.

मैरी कोम मणिपुर के चुड़ाचांदपुर जिले के सागां नामक स्थान पर 22 नवंबर, 1982 को जन्मी थीं. कोम उनकी जाति है. ईसाई धर्म को मानने वाली मैरीकोम की सफलता का मंत्र है, आई मस्ट विन दिस बाउट, आई मस्ट विन, आई मस्ट विन. इस मंत्र को जपते हुए वह पहले प्रार्थना करती हैं, तब खेलना शुरू करती हैं. हर बार खेलने से पहले वह सोचती हैं कि विरोधी खिलाड़ी भी इंसान है. मेरी तरह उसके भी दो हाथ और दो पांव हैं, इसलिए मैं क्यों डरूं. मैरी कोम का बचपन बहुत संघर्षपूर्ण रहा. एक निर्धन परिवार में जन्म होने की वजह से उन्हें अभाव में रहना पड़ता था. लेकिन, इंसान अभाव में ही बहुत कुछ कर सकता है, यह बात मैरी कोम ने साबित कर दिखाई. वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं. उनके पिता मांगते तोनपा कोम एक भूमिहीन किसान हैं. बाद में मैरी कोम की नौकरी लगने के बाद जमीन खरीदी गई. मैरी कोम के पिता पारिवारिक स्थिति अच्छी न होने के कारण मोइरांग के कांगाथै के मुखिया के पास काम करने आ गए. उस वक्त मैरी कोम केवल पांच महीने की थीं. उनके पिता वहां 10 साल से काम कर रहे थे. मुखिया ने थोड़ी सी जमीन उन्हें दी, जिस पर उन्होंने एक झोंपड़ीनुमा घर बनाया. मैरी कोम खेती-बारी का काम भी करती थीं.

उनके पिता ने लोकताक क्रिश्‍चियन मॉडल स्कूल में उनका दाखिला कराया. यह वहां का सबसे अच्छा स्कूल था. रोज एक घंटा पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था. उसके बाद सेंट जेवियर्स स्कूल में सातवीं कक्षा में दाखिला लिया. स्कूल के खेलकूद में हमेशा आगे रहती थीं. खेलों में उनकी विलक्षण प्रतिभा स्कूल के अध्यापकों को पता थी. बाद में 1999 में इंफाल के साई स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में आकर खेलने लगीं. 16-17 की उम्र में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह खेलना शुरू किया. उस वक्त राज्य में महिलाओं का बॉक्सिंग में आना भी शुरू नहीं हुआ था. मैरी कोम को शुरुआती शिक्षक मिले इबोमचा, जिन्होंने उन्हें प्रारंभिक शिक्षा दी.

मैरी कोम की शादी ओनलर के साथ मार्च 2005 में हुई. दोनों के रिश्ते और शादी किसी परिकथा से कम नहीं हैं. मैरी तो केवल खेलने में व्यस्त थी. ट्रेनिंग लेने में अधिकतर समय बिताती थी. शादी के बारे में कभी सोचा भी नहीं था. लोगों से घुलने-मिलने, दोस्ती करने का भी समय नहीं मिलता था. ट्रेनिंग में शामिल खिलाड़ियों को ही वह अपना दोस्त मानती थीं. ओनलर के साथ दिल्ली में पहली मुलाकात हुई. ओनलर विधि के विद्यार्थी और दिल्ली के कोम-रेम स्टूडेंट्स यूनियन के प्रेसिडेंट हैं. ट्रेनिंग के दौरान एक दिन ओनलर मैरी से मिलने आए. उसी दिन जान-पहचान हुई. कुछ दिनों बाद ओनलर ने मैरी से शादी का प्रस्ताव रखा. मैरी को आश्‍चर्य हुआ. ओनलर मैरी के जीवनसाथी बनना चाहते थे. ओनलर ने कहा, आई वांट टू प्रोटेक्ट योर करियर एंड डेट इस वन ऑफ द मेइन रीजन्स फॉर माई प्रोपजल. मैरी अस्वीकार नहीं कर सकती थीं. मैरी ने हां कह दी. दोनों की शादी हो गई. यह शादी एक आदर्श शादी थी. अब तीन बच्चे भी हैं. यही सब कुछ उन्होंने अपनी आत्मकथा में समेटा है.

मैरी कोम ने अपने खेल के माध्यम से मणिपुर, भारत और अपनी जाति कोम का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया. मणिपुर की एक साधारण महिला का साहस पूरी दुनिया ने अपनी आंखों से देखा. खेल के क्षेत्र में मैरी कोम का एक बड़ा हिस्सा है. मैरी कोम का एकमात्र सपना है, उनके द्वारा पूर्वोत्तर के लिए स्थापित बॉक्सिंग एकेडमी (एम सी मैरी कोम रीजनल बॉक्सिंग फाउंडेशन) को विकसित करना. सरकार ने उन्हें जमीन दी है और देश-विदेश से सहायता भी मिल रही है. इस एकेडमी में ग़रीब खिलाड़ियों को बॉक्सिंग नि:शुल्क सिखाई जाती है. इस समय 30 से ज़्यादा छात्र एकेडमी में हैं. एक छात्र को 600 रुपये महीने वजीफा दिया जाता है. मैरी कोम को 2016 में रिओ (ब्राजील) में होने वाले वर्ल्ड ओलंपिक में गोल्ड मेडल मिलने की उम्मीद है और वह इसके लिए खूब मेहनत भी कर रही हैं. मैरी, हमें तुम्हारी सफलता का इंतजार है. 

Tuesday, March 11, 2014

15वीं लोकसभा और पूर्वोत्तर

उपेक्षा का सिलसिला जारी है 

पूर्वोत्तर के लोग सड़क, शिक्षा, बिजली, पानी एवं रोज़गार के मामले में आज भी सौ साल पीछे हैं. गांवों में 24 घंटों में दो घंटे बिजली, पीने का अच्छा पानी नहीं. बारिश में पोखर का जमा हुआ पानी पीना. स्कूलों में अध्यापक नहीं. उच्च शिक्षा पाने के लिए पलायन की मजबूरी, क्योंकि यहां के राज्यों में अच्छे विश्‍वविद्यालय नहीं हैं. पूर्वोत्तर इतने दुर्गम पहाड़ों से भरा है कि आने-जाने का मार्ग नहीं है. बीमार होने पर लोग सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते. ऐसी स्थिति में, यह देखना काफी ज़रूरी है कि यहां के सांसदों ने संसद के भीतर क्या किया? जनसमस्याओं के समाधान के लिए क्या किया? उनकी आवाज़ ने सरकार का ध्यान यहां की ओर खींचा या नहीं या फिर वे केवल कोरम पूरा करने के लिए संसद में बैठे रहे?
15वीं लोकसभा में नेशनल फूड सिक्योरिटी बिल जैसे कई महत्वपूर्ण बिल पास हुए. कई बिल पेंडिंग भी हैं. पूर्वोत्तर के लिए मिजोरम यूनिवर्सिटी एमेंडमेंट बिल 2007, द नॉर्थ ईस्टर्न एरियाज (रिऑर्गेनाइजेशन) एमेंडमेंट बिल 2011 आदि महत्वपूर्ण बिल पास हुए और द नॉर्थ ईस्टर्न काउंसिल (एमेंडमेंट) बिल 2013 पेंडिंग रहा. पूर्वोत्तर के कुल 25 सांसद हैं, जिन्होंने संसद के भीतर पूर्वोत्तर की मूलभूत समस्याओं पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए. अपने क्षेत्र की आवाज़ बुलंद की और दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगों पर हुए अत्याचार का एक स्वर से विरोध किया. हाल में दिल्ली में अरुणाचल के छात्र नीडो तानिया की हत्या पर अरुणाचल प्रदेश (पूरब) के कांगे्रसी सांसद निनोंग इरिंग ने संसद में आवाज़ उठाई. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में गैस आपूर्ति के लिए पाइप लाइन बिछाने की मांग करते हुए कहा कि इंडस्ट्रियल जोन में भी गैस पहुंचाने के लिए पाइप लाइन बिछाई जाए. पूर्वोत्तर भारत में उल्फा जैसे संगठनों ने कई बार पाइप लाइन को क्षति पहुंचाई है.

त्रिपुरा (पश्‍चिम) के सीपीआई (एम) के सांसद खगेन दास ने रियांग शरणार्थियों के पुनर्वास, त्रिपुरा में एक स्वतंत्र हाईकोर्ट की स्थापना, रोजमर्रा की ज़रूरत की वस्तुओं की क़ीमतों में वृद्धि, रेल, बिजली, पानी एवं परिवहन संबंधी मुद्दे संसद में उठाए. सबसे अहम सवाल उन्होंने संसद में किया कि 2005 में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन किया हुआ नेशनल हाईवे-44 अभी तक अधूरा पड़ा है. यह त्रिपुरा के लिए लाइफलाइन है, लेकिन 10 सालों से अभी तक काम चल ही रहा है. मेघालय (तुरा) से एनसीपी की युवा सांसद अगाथा संगमा जब लोकसभा में पहली बार चुनकर आईं, तब उन्होंने लोगों को खूब आकर्षित किया. केंद्र में ग्रामीण विकास मंत्री भी बनीं. अपने कार्यकाल में उन्होंने पूर्वोत्तर के ग्रामीण विकास को लेकर काम किया, लेकिन कई काम अधूरे रह गए. अगाथा ने आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) को लेकर सवाल उठाया था कि यह क़ानून पूर्वोत्तर में लागू न हो. उन्होंने यह एक्ट हटाने के लिए कई वर्षों से भूख हड़ताल कर रहीं इरोम शर्मिला से मुलाकात कर उनकी मांग का समर्थन किया.
मणिपुर (इनर) के कांग्रेसी सांसद थोकचोम मैन्य ने भी अफसपा जैसे सवाल संसद में उठाए, भले ही उन्हें मीडिया के सामने तीखी आलोचना झेलनी पड़ी. ग़ौरतलब है कि जब नेशनल हाईवे-39 दो महीने से ज़्यादा समय तक बंद रहा, तब लोगों का जीना दुश्‍वार हो गया था. एलपीजी सिलेंडर, पेट्रोल, दवाइयों एवं खाद्य पदार्थों के दाम दोगुने हो गए थे. उन्होंने फर्जी मुठभेड़, आतंकी संगठनों, एनएससीएन (आईएम) प्रमुख मुइवा की जन्मस्थल वापसी, नेशनल हाईवे (इंफाल-जीरी), ऑटोनोमस डिस्ट्रिक काउंसिल आदि मामलों पर आवाज़ बुलंद की. लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यांमार और पूर्वोत्तर से जुड़ने वाला रोडमैप तैयार कराने की बात कही. इंफाल तक रेल पहुंचने से रोज़गार बढ़ेगा, इसलिए वहां जल्द से जल्द रेल पहुंचाने की मांग की. नगालैंड के नगालैंड पीपुल्स फ्रंट के सांसद सीएम चांग नगा राजनीतिज्ञ हैं. वह नगाओं की समस्याएं संसद में उठाते रहे. असम से पूर्वोत्तर के सबसे ज़्यादा यानी कुल 14 लोकसभा सदस्य हैं, जिनमें डिब्रूगढ़ से इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) के पवन सिंह घटोवार प्रमुख हैं. वह डेवलपमेंट ऑफ नॉर्थ ईस्टर्न रीजन एंड पार्लियामेंट्री अफेयर्स (स्वतंत्र प्रभार) मंत्री हैं. उन्होंने कई महत्वपूर्ण सवाल संसद में उठाए. उन्होंने असम में बाढ़ की स्थिति में लोगों की सहायता की मांग उठाते हुए संसद में बहस भी की. स्वतंत्रता सेनानियों, ब्रह्मपुत्र बोर्ड, असम चाय अनुसंधान, झूम कल्टीवेशन एवं पूर्वोत्तर के नेशनल हाईवे को 4 लेन करने संबंधी मुद्दे उन्होंने संसद में उठाए. 

पूर्वोत्तर के सांसदों ने सदन के भीतर स्थानीय समस्याएं उठाने का काम ज़रूर किया, लेकिन उनकी आवाज़ पर 15वीं लोकसभा ने कितना ध्यान दिया, सरकार उनकी मांगों के प्रति कितनी गंभीर रही, यह तब पता चलता है, जब हम पूर्वोत्तर की लगातार बदतर हो रही स्थिति को देखते हैं. प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी रस्मी तौर पर पूर्वोत्तर की यात्राएं करते रहे, लेकिन उनकी घोषणाओं एवं आश्‍वासनों पर अमल नहीं हुआ. ज़ाहिर है, पूर्वोत्तर के सांसदों को अब पार्टी लाइन से ऊपर उठकर न स़िर्फ संसद के भीतर आवाज़ उठानी होगी, बल्कि अपनी मांगें पूरी कराने के लिए उन्हें सड़क पर आने से भी परहेज नहीं करना चाहिए.

संसद में पूर्वोत्‍तर के सांसदों की उपस्थिति 
  • राज्य                   सांसद                    पार्टी                                   संसद में उपस्थिति (प्रतिशत)  
  • मणिपुर                थांगसो बाइते           इंडियन नेशनल कांग्रेस             98%
  • मणिपुर                थोकचोम मैन्य         इंडियन नेशनल कांग्रेस             99%
  • मेघालय                अगाथा संगमा         नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी            49%
  • मेघालय                विंसेंट एच पाला       इंडियन नेशनल कांग्रेस             83%
  • त्रिपुरा                    बाजु बान रियान      माकपा                                    85%
  • त्रिपुरा                    खगेंद दास               माकपा                                    74%
  • मिजोरम               सीएम रौला             इंडियन नेशनल कांग्रेस             95%
  • नगालैंड                 सीएम चांग              नगालैंड पीपुल्स फ्रंट                 78%
  • सिक्किम               प्रेमदास राय           सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट           87%
  • अरुणाचल प्रदेश     निनोंग इरिंग          इंडियन नेशनल कांग्रेस              88%
  • अरुणाचल प्रदेश     टकम संजय            इंडियन नेशनल कांगे्रस            63%
  • असम                   बद्रूडिन अजमल       असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  48%
  • असम                   विजोय कृष्ण हनडिक  इंडियन नेशनल कांग्रेस           92%
  • असम                   विजोया चक्रवर्ती      भारतीय जनता पार्टी                   84%
  • असम                   विरेन सिंह इंगटी       इंडियन नेशनल कांग्रेस              95%
  • असम                   दीप गोगोई                इंडियन नेशनल कांग्रेस              79%
  • असम                   इस्माइल हुसैन         इंडियन नेशनल कांग्रेस              94%
  • असम                   जोसेप टोप्पो             असम गण परिषद                     76%
  • असम                   काबिंद्र पुरकायस्थ     भारतीय जनता पार्टी                 89%
  • असम                   ललित मोहन सुक्लवैद्य  इंडियन नेशनल कांग्रेस         95%
  • असम                   पवन सिंह घटोवार      इंडियन नेशनल कांग्रेस            91%
  • असम                   राजेन गोहैन               भारतीय जनता पार्टी                54%
  • असम                   रामेन डेका                  भारतीय जनता पार्टी               84%
  • असम                   रानी नराह                   इंडियन नेशनल कांग्रेस           83%
  • असम                   संसुमा खंगर बासुमतारी  बोडोलैंड पीपुल फ्रंट              63%

Thursday, February 20, 2014

वादे हैं, वादों का क्या?

अरुणाचल के छात्र नीडो तानिया की मौत और फिर उसके बाद जिस तरह पूर्वोत्तर के लोगों पर जानलेवा हमले हो रहे हैं, उसके मद्देनज़र यदि नरेंद्र मोदी या किसी अन्य बड़े नेता द्वारा अपनी रैलियों में की गई घोषणाओं पर लोगों को सहज विश्‍वास न हो तो इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं होगा. अब पूर्वोत्तर के लोग जागरूक हो गए हैं. अब स़िर्फ घोषणाओं से कुछ नहीं होने वाला, उन्हें परिणाम चाहिए, ताकि पूर्वोत्तर का परिदृश्य बदले और आने वाले दिनों में उनके साथ किसी भी तरह की कोई नाइंसाफी न हो.

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव से पहले पूर्वोत्तर में भी पार्टी की पैठ बनाने के लिए तत्पर दिख रहे हैं. हाल में मोदी ने मणिपुर एवं असम में रैलियां की हैं. केंद्र की उपेक्षा झेल रहे पूर्वोत्तर को देश के अन्य राज्यों की तरह बराबरी का हक़ दिलाने के लिए उन्होंेने कई वादे किए. हालांकि, भाजपा आज तक पूर्वोत्तर में कोई खास जगह नहीं बना सकी है. हाल में अरुणाचल के छात्र नीडो की मौत के बाद देश की सभी बड़ी पार्टियों में गंभीरता देखने को मिली, मगर उसका प्रभाव कहीं दिखाई नहीं पड़ा, क्योंकि नीडो की मौत केे बाद भी पूर्वोत्तर के लोगों पर लगातार जानलेवा हमले हो रहे हैं. नीडो की मौत के एक सप्ताह के अंदर ही पूर्वोत्तर की एक किशोरी से दुष्कर्म की घटना सुर्खियों में आई. सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?

नरेंद्र मोदी ने इंफाल की रैली में पूर्वोत्तर में आईटी हब बनाने की बात कही. भले ही लोगों ने मोदी की बातों में दम महसूस किया हो, लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है, क्योंकि जिस पूर्वोत्तर में आज तक बिजली, पानी, रोज़गार और सड़क जैसी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध न हो पाई हों, वहां आईटी हब की कल्पना भी बेमानी लगती है. पूर्वोत्तर में स़िर्फ दो घंटे बिजली आपूर्ति की जाती है. प्रति लीटर पेट्रोल 250 से 300 रुपये में मिलता है. एलपीजी सिलेंडर की क़ीमत 2 से 3 हज़ार रुपये तक है. क्या ऐसे हालात में मोदी की आईटी हब की कल्पना या घोषणा साकार हो सकती है? क्या मोदी के ये वादे मात्र चुनाव पूर्व के वादे हैं?

जब तक पूर्वोत्तर के नागरिकों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी, तब तक न तो वहां कोई आईटी हब बनाया जा सकता है और न वहां के पढ़े-लिखे नौजवानों को अपने राज्य में नौकरी मिल सकती है. आधारभूत सुविधाओं की कमी के चलते ही पूर्वोत्तर के लोगों को दूरदराज नौकरी की तलाश में भटकना पड़ता है. इसी वजह से कई अप्रिय घटनाएं पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ घटती रहती हैं. जब वे नौकरी की तलाश में बाहर जाते हैं, तो वहां के स्थानीय लोगों से सामंजस्य न बैठा पाने की वजह से किसी न किसी हादसे के शिकार बन जाते हैं. पूर्वोत्तर में अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी नहीं हैं, इसलिए यहां के छात्रों को पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. अगर राज्य में अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी खुलें, तो नौजवानों को पढ़ाई-लिखाई के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. मोदी द्वारा आईटी हब और अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोलने की बात सराहनीय है, बशर्ते पहले लोगों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं. मोदी की बातों पर पूर्वोत्तर को इसलिए संदेह है कि इससे पहले भी कई नामी-गिरामी नेता आए और गए, जिन्होंने बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन उन वादों को निभाया किसी ने भी नहीं. मतलब यह कि पूर्वोत्तर में वादे करना और वहां के भोले-भाले नागरिकों को मूर्ख बनाकर किसी तरह चुनाव जीत लेना इन राजनीतिज्ञों का शगल बन गया है. क्या नरेंद्र मोदी भी कुछ ऐसा ही करने वाले हैं या उनके वादों का आने वाले समय में कोई मतलब होगा?

मणिपुर और म्यांमार की सीमा पर फेंसिंग का काम चल रहा है. म्यांमार ने भारतीय सीमा में 10 किलोमीटर बढ़ाकर फेंसिंग तार लगाए हैं. भारत सरकार ने लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यांमार सरकार से इंडो-म्यांमार बॉर्डर ट्रेड समझौता किया है. इस वजह से केंद्र सरकार म्यांमार पर नरम पड़ रही है. इस मामले में नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोई भी आए, हमारा सामान लूटकर चला जाए, कोई रोक-टोक नहीं है. ऐसे में देश कैसे चलेगा? वैसे, बॉर्डर फेंसिंग भाजपा का चुनावी एजेंडा है, जिसे लेकर वह मणिपुर में चुनाव लड़ेगी. मणिपुर की जनता कांग्रेस सरकार से ऊब चुकी है. वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि जनता का उससे विश्‍वास उठ गया है. जनता अब बदलाव चाहती है. नरेंद्र मोदी की रैली में एक लाख से अधिक लोग शामिल हुए. लोगों में मोदी को लेकर एक उम्मीद देखने को मिली. दरअसल, भाजपा के साथ एक दिक्कत यह है कि वह राज्य से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) हटाने की मांग से इत्तेफाक़ नहीं रखती, जो पूर्वोत्तर के लोगों को पसंद नहीं है. पूर्वोत्तर की प्रमुख एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला यह एक्ट हटाने की मांग को लेकर कई वर्षों से अनशन पर हैं. नागरिकों का कहना है कि अफसपा जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर से हर हाल में हटा लेना चाहिए. राजनीतिक पार्टियां भी अक्सर प्रचार करती हैं कि राज्य से अफसपा हटाने का विरोध करने वाले दलों को वोट नहीं देना चाहिए.

आने वाले लोकसभा चुनाव में राज्य के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बॉर्डर फेंसिंग और अफसपा जैसे मुद्दों पर जनता नरेंद्र मोदी को किस रूप में लेती है? अगर मोदी कल देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो इन मुद्दों पर उनका क्या रुख होता है? क्या वह बीच का रास्ता निकाल पाएंगे और दोनों मुद्दों पर जनता को संतुष्ट कर सकेंगे? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के असम में भी मोदी ने हुंकार भरी. गुवाहाटी रैली में उन्होंने कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आई, तो अवैध ढंग से रह रहे विदेशियों को वापस भेजा जाएगा. इस मामले में किसी भी तरह की कोताही या नरमी नहीं बरती जाएगी. उन्होंने कहा, असम समझौते पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि बाहरी लोगों को पहचान कर उन्हें देश से बाहर किया जाएगा, मगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी उनकी यह बात पूरी नहीं होने देना चाहते. मोदी ने कहा कि भाजपा यह कतई बर्दाश्त नहीं करेगी कि भारत की ज़मीन बांग्लादेश को दे दी जाए. यदि भाजपा सत्ता में आई, तो एक इंच ज़मीन भी बांग्लादेश को नहीं दी जाएगी. उन्होंेने पूूर्वोत्तरवासियों से भाजपा के लिए कांग्रेस के 60 वर्षों की अपेक्षा 60 महीने का समय मांगा. मोदी ने पूर्वोत्तर के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने केंद्र सरकार के सभी विभागों को अपने बजट का 10 फ़ीसद हिस्सा खर्च करने का आदेश देकर क्षेत्र के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठाया था. यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो हम उपयुक्त नीति बनाएंगे और सभी समस्याएं हल करेंगे, ताकि क्षेत्र के लोग विकास का लाभ प्राप्त कर सकें.


अपने जवाबी हमले में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि नरेंद्र मोदी ग़ैर-ज़िम्मेदार हैं और ग़लत बयानबाजी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के दौरान असम को कुछ नहीं मिला. गोगोई ने कहा कि भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, 2012-13 में असम का सकल घरेलू उत्पाद 13 फ़ीसद था, जबकि गुजरात का 8.52 फ़ीसद. गोगोई ने कहा कि विकास पर उनका व्यय अधिक है. 11वें वित्त आयोग में राजग के शासनकाल के दौरान असम को 13280.86 करोड़ रुपये मिले थे. 13वें वित्त आयोग के दौरान यह धनराशि 57832.7 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. उन्होंने कहा कि असम पर 29200 करोड़ रुपये का क़र्ज है, जबकि गुजरात पर 176500 करोड़ रुपये का. मनरेगा के बारे में उन्होंने कहा कि मोदी ने इस संबंध में गलत आंकड़े दिए. असम में 40.92 लाख जॉब कार्ड दिए गए और 13.08 लाख लोगों को काम मिला, वहीं गुजरात में 36.6. लाख लोगों को जॉब कार्ड मिले, लेकिन काम स़िर्फ 1.75 लाख लोगों को मिला. गोगोई ने दावा किया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में असम की स्थिति गुजरात से बेहतर है. अपराध के मामले में हत्या को छोड़कर चोरी, डकैती, छिनैती एवं अन्य अपराधों में गुजरात असम से बहुत आगे है. चाहे मामला मोदी के दावों का हो या गोगोई के जवाबी हमले का, यह कटु सत्य है कि इन सबके बावजूद पूर्वोत्तर के राज्य सबसे अधिक पिछड़ेपन के शिकार हैं और इसका एकमात्र कारण यह है कि तमाम राजनीतिक पार्टियां पूर्वोत्तर के हितों को लेकर गंभीर नहीं हैं.

महिला पुलिसकर्मियों की मांग

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह पूर्वोत्तर की अंग्रेजी बोलने वाली महिला पुलिसकर्मियों को अपने राज्य में विदेशी पर्यटकों से बात करते हुए देखना चाहते हैं. मोदी ने कहा कि दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में उन्होंने पूर्वोत्तर के सभी आठ (सिक्किम मिलाकर) राज्यों से दो-दो सौ महिला पुलिसकर्मियों को उनके राज्य में दो वर्षों के लिए प्रतिनियुक्ति पर भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन किसी ने उनकी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. मोदी ने कहा कि उन्होंने एक बार फिर गुजरात में पूर्वोत्तर की 1600 महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती का अनुरोध किया है.

Tuesday, February 11, 2014

आख़िर हम जाएं तो कहां जाएं

देश में समय-समय पर पूर्वोत्तर के लोगों के साथ जिस तरह से सौतेला व्यवहार होता आया है, उससे वे खुद को शेष भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं. अरुणाचल प्रदेश निवासी छात्र नीडो की मौत इसका ताजा प्रमाण है कि अपने ही देश में पूर्वोत्तर के लोग किस कदर बेगाने और असुरक्षित हैं.

हाल ही में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र की जिस तरह से पीट-पीटकर नृशंस हत्या कर दी गई, वह पूर्वोत्तर के साथ हो रही नाइंसाफी की पोल खोलने के लिए काफी है. अगर राजधानी या उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में पूर्वोत्तर के लोगों, खासकर छात्र-छात्राओं से भेदभाव का अपना लंबा इतिहास नहीं होता, तो यह घटना साधारण अपराध मानी जाती. नीडो ताबयो अरुणाचल प्रदेश का रहने वाला था. उम्र महज 19 साल. ऊंची अट्टालिकाओं के शहर दिल्ली में नीडो अंजान था. किसी के घर जाना था. उसने लाजपत नगर में एक पनीर की दुकान पर पता पूछा. उसका रंग-रूप देखकर पनीर वाले दुकानदार ने नीडो का मजाक उड़ाया. नीडो और दुकानदार के बीच बात जब हद से ज़्यादा ब़ढने लगी, तो नीडो ने दुकान के शीशे तोड़ दिए. दुकान वालों ने उसकी पिटाई की. मामला पुलिस थाने पहुंचा. नीडो ने कांच तोड़ने के एवज में 10,000 रुपये भी दिए. आरोप यह भी है कि थाने से वापस आने पर रास्ते में दोबारा उसकी पिटाई की गई. इसके बाद नीडो वापस अपने कमरे पर लौट गया और सो गया. ऐसा सोया कि हमेशा-हमेशा के लिए सो गया. नीडो की मौत मानवता के समक्ष एक सवाल है, जिसका कोई जवाब नहीं दे सकता.

समय रहते अगर पुलिस और प्रशासन ने क़दम उठाए होते, तो नीडो आज जीवित होता, लेकिन हमेशा की तरह प्रशासन ने अकर्मण्यता का परिचय दिया, जो नीडो की मौत का कारण बना. नीडो की मौत के बाद पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राएं आंदोलन पर उतर आए, क्योंकि उनका मानना है कि राष्ट्रीय राजधानी में उनके साथ न्यायपूर्ण और समानता का व्यवहार नहीं होता है. क्या एक संप्रभु राष्ट्र के लिए यह शोभनीय है? पूर्वोत्तर का हो या देश के किसी अन्य हिस्से का, है तो वह इंसान ही. ऐसे में मारपीट या झगड़े में किसी की जान चली जाए, तो कोई देश खुद को सभ्य कैसे कह सकता है? किसी देश की राजधानी में इस तरह की घटना का होना शर्मनाक और दु:खद है. दिल्ली किसी की जागीर नहीं है. यहां देश के विभिन्न हिस्सों के लोग आकर रहते हैं. यह मल्टी-कल्चर सिटी है. यहां हर कल्चर को स्पेस दिया जाता है. ऐसे में दूसरों के रूप-रंग, हाव-भाव, भाषा, रहन-सहन, मान्यताओं और आस्थाओं के प्रति सम्मान बरतना चाहिए. किसी खास वर्ग को निशाना बनाकर भद्दे मजाक और टिप्पणियां नहीं करने चाहिए. किसी ने अपने बालों का रंग पीला किया हो, नीला या फिर लाल, किसी ने अपनी मूंछें कटा ली हों या दा़ढी ब़ढाई हो, किसी ने अपने कान मेंे ईयर रिंग पहना हो या कुछ और, किसी को क्या फर्क प़डता है? हम औरों पर क्यों टिप्पणी करेंगे?

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राओं के प्रति उत्तर भारत में एक खास तरह का पूर्वाग्रह है. पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी कहा जाता है और इन राज्यों से आई लड़कियों के साथ छेड़खानी की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं, लेकिन आज तक उनकी सुरक्षा के लिए सरकार या प्रशासन की तरफ़ से कुछ नहीं किया गया. जब कोई घटना घटती है, उस समय सरकार खुद को काफी गंभीर दिखाती है, लेकिन कुछ दिनों के बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है. ये है पूर्वोेत्तर के लोगों के प्रति उदासीनता का आलम. आप अक्सर पूरी दिल्ली में पोस्टर पर लिखा हुआ पाएंगे और लोगों से या टीवी चैनलों पर भी सुनेंगे या देखेंगे कि दिल्ली दिलवालों की है, लेकिन सच्चाई कुछ और है. विदेशों और अपने देश में भी दिल्ली को रेप कैपिटल कहा जाता है. क्या दिल्लीवासियों को नहीं लगता कि इस कलंक को धोना चाहिए? अगर लगता है तो अपने से भिन्न रूप-रंग वालों से कैसे व्यवहार किया जाए, उनके साथ सामाजिक संबंध कैसे कायम किया जाए, उन्हें दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन की मुख्य धारा में कैसे जोड़ा जाए, यह दिल्ली वालों को सीखना होगा. अन्यथा दिल्ली को मेरी दिल्ली, प्यारी दिल्ली के नारे से नहीं, बल्कि वहशी दिल्ली के नारे से नवाजा जाएगा.

दरअसल, मैं मूल रूप से पूर्वोत्तर यानी मणिपुर का निवासी हूं. मैं पिछले 10 सालों से बिहार, झारखंड, पंजाब एवं दिल्ली में रह रहा हूं. इतने सालों में आज तक मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं हुई. मेरे कई दोस्त उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब से हैं. कुछ बातों पर मैं उनसे असहमति ज़रूर व्यक्त करता हूं और वे भी मुझे कई मुद्दों पर टोकते हैं, मगर आज तक कभी उन्होंने मुझ पर तंज नहीं कसे, न मैं उन पर कसता हूं. मैं दोस्तों से अपनी बात शेयर करता हूं. उनके दु:ख-दर्द का हिस्सा बनता हूं और वे भी मेरे दु:ख-सुख में भागीदार बनते हैं. इरोम शर्मिला के कैंपेन में जितना पूर्वोत्तर के लोगों का समर्थन है, उससे कहीं ज्यादा हिंदीभाषी राज्यों के लोगों का. जैसे देश के अन्य हिस्से के लोग अपने समूह में रहते हैं, वैसे ही पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राएं अपने समूह में रहते हैं. हालांकि पूर्वोत्तर के लोगोें को चाहिए कि वे अपने आसपास के लोगों से घुलें-मिलें, बातें करें, ताकि लोग उनकी सभ्यता-संस्कृति को जानें-समझें और उन्हें भी अपने बीच का मानें. समाज से कटकर रहना हमेशा दूसरों के मन में जिज्ञासा जगाता है, जो अपराध को ब़ढावा देता है. अगर हम एक-दूसरे को नहीं समझेंगे, एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंेगे, एक-दूसरे की सभ्यता-संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो याद रखिए, आने वाले दिनों में नीडो जैसे और भी मामले हमारे सामने से गुजरते रहेंगे.