यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Thursday 20 February 2014

वादे हैं, वादों का क्या?

अरुणाचल के छात्र नीडो तानिया की मौत और फिर उसके बाद जिस तरह पूर्वोत्तर के लोगों पर जानलेवा हमले हो रहे हैं, उसके मद्देनज़र यदि नरेंद्र मोदी या किसी अन्य बड़े नेता द्वारा अपनी रैलियों में की गई घोषणाओं पर लोगों को सहज विश्‍वास न हो तो इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं होगा. अब पूर्वोत्तर के लोग जागरूक हो गए हैं. अब स़िर्फ घोषणाओं से कुछ नहीं होने वाला, उन्हें परिणाम चाहिए, ताकि पूर्वोत्तर का परिदृश्य बदले और आने वाले दिनों में उनके साथ किसी भी तरह की कोई नाइंसाफी न हो.

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव से पहले पूर्वोत्तर में भी पार्टी की पैठ बनाने के लिए तत्पर दिख रहे हैं. हाल में मोदी ने मणिपुर एवं असम में रैलियां की हैं. केंद्र की उपेक्षा झेल रहे पूर्वोत्तर को देश के अन्य राज्यों की तरह बराबरी का हक़ दिलाने के लिए उन्होंेने कई वादे किए. हालांकि, भाजपा आज तक पूर्वोत्तर में कोई खास जगह नहीं बना सकी है. हाल में अरुणाचल के छात्र नीडो की मौत के बाद देश की सभी बड़ी पार्टियों में गंभीरता देखने को मिली, मगर उसका प्रभाव कहीं दिखाई नहीं पड़ा, क्योंकि नीडो की मौत केे बाद भी पूर्वोत्तर के लोगों पर लगातार जानलेवा हमले हो रहे हैं. नीडो की मौत के एक सप्ताह के अंदर ही पूर्वोत्तर की एक किशोरी से दुष्कर्म की घटना सुर्खियों में आई. सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?

नरेंद्र मोदी ने इंफाल की रैली में पूर्वोत्तर में आईटी हब बनाने की बात कही. भले ही लोगों ने मोदी की बातों में दम महसूस किया हो, लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर है, क्योंकि जिस पूर्वोत्तर में आज तक बिजली, पानी, रोज़गार और सड़क जैसी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध न हो पाई हों, वहां आईटी हब की कल्पना भी बेमानी लगती है. पूर्वोत्तर में स़िर्फ दो घंटे बिजली आपूर्ति की जाती है. प्रति लीटर पेट्रोल 250 से 300 रुपये में मिलता है. एलपीजी सिलेंडर की क़ीमत 2 से 3 हज़ार रुपये तक है. क्या ऐसे हालात में मोदी की आईटी हब की कल्पना या घोषणा साकार हो सकती है? क्या मोदी के ये वादे मात्र चुनाव पूर्व के वादे हैं?

जब तक पूर्वोत्तर के नागरिकों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी, तब तक न तो वहां कोई आईटी हब बनाया जा सकता है और न वहां के पढ़े-लिखे नौजवानों को अपने राज्य में नौकरी मिल सकती है. आधारभूत सुविधाओं की कमी के चलते ही पूर्वोत्तर के लोगों को दूरदराज नौकरी की तलाश में भटकना पड़ता है. इसी वजह से कई अप्रिय घटनाएं पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ घटती रहती हैं. जब वे नौकरी की तलाश में बाहर जाते हैं, तो वहां के स्थानीय लोगों से सामंजस्य न बैठा पाने की वजह से किसी न किसी हादसे के शिकार बन जाते हैं. पूर्वोत्तर में अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी नहीं हैं, इसलिए यहां के छात्रों को पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. अगर राज्य में अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी खुलें, तो नौजवानों को पढ़ाई-लिखाई के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. मोदी द्वारा आईटी हब और अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोलने की बात सराहनीय है, बशर्ते पहले लोगों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं. मोदी की बातों पर पूर्वोत्तर को इसलिए संदेह है कि इससे पहले भी कई नामी-गिरामी नेता आए और गए, जिन्होंने बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन उन वादों को निभाया किसी ने भी नहीं. मतलब यह कि पूर्वोत्तर में वादे करना और वहां के भोले-भाले नागरिकों को मूर्ख बनाकर किसी तरह चुनाव जीत लेना इन राजनीतिज्ञों का शगल बन गया है. क्या नरेंद्र मोदी भी कुछ ऐसा ही करने वाले हैं या उनके वादों का आने वाले समय में कोई मतलब होगा?

मणिपुर और म्यांमार की सीमा पर फेंसिंग का काम चल रहा है. म्यांमार ने भारतीय सीमा में 10 किलोमीटर बढ़ाकर फेंसिंग तार लगाए हैं. भारत सरकार ने लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यांमार सरकार से इंडो-म्यांमार बॉर्डर ट्रेड समझौता किया है. इस वजह से केंद्र सरकार म्यांमार पर नरम पड़ रही है. इस मामले में नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोई भी आए, हमारा सामान लूटकर चला जाए, कोई रोक-टोक नहीं है. ऐसे में देश कैसे चलेगा? वैसे, बॉर्डर फेंसिंग भाजपा का चुनावी एजेंडा है, जिसे लेकर वह मणिपुर में चुनाव लड़ेगी. मणिपुर की जनता कांग्रेस सरकार से ऊब चुकी है. वर्षों से शासन कर रही कांग्रेस इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि जनता का उससे विश्‍वास उठ गया है. जनता अब बदलाव चाहती है. नरेंद्र मोदी की रैली में एक लाख से अधिक लोग शामिल हुए. लोगों में मोदी को लेकर एक उम्मीद देखने को मिली. दरअसल, भाजपा के साथ एक दिक्कत यह है कि वह राज्य से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) हटाने की मांग से इत्तेफाक़ नहीं रखती, जो पूर्वोत्तर के लोगों को पसंद नहीं है. पूर्वोत्तर की प्रमुख एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला यह एक्ट हटाने की मांग को लेकर कई वर्षों से अनशन पर हैं. नागरिकों का कहना है कि अफसपा जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर से हर हाल में हटा लेना चाहिए. राजनीतिक पार्टियां भी अक्सर प्रचार करती हैं कि राज्य से अफसपा हटाने का विरोध करने वाले दलों को वोट नहीं देना चाहिए.

आने वाले लोकसभा चुनाव में राज्य के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बॉर्डर फेंसिंग और अफसपा जैसे मुद्दों पर जनता नरेंद्र मोदी को किस रूप में लेती है? अगर मोदी कल देश के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो इन मुद्दों पर उनका क्या रुख होता है? क्या वह बीच का रास्ता निकाल पाएंगे और दोनों मुद्दों पर जनता को संतुष्ट कर सकेंगे? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के असम में भी मोदी ने हुंकार भरी. गुवाहाटी रैली में उन्होंने कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आई, तो अवैध ढंग से रह रहे विदेशियों को वापस भेजा जाएगा. इस मामले में किसी भी तरह की कोताही या नरमी नहीं बरती जाएगी. उन्होंने कहा, असम समझौते पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि बाहरी लोगों को पहचान कर उन्हें देश से बाहर किया जाएगा, मगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी उनकी यह बात पूरी नहीं होने देना चाहते. मोदी ने कहा कि भाजपा यह कतई बर्दाश्त नहीं करेगी कि भारत की ज़मीन बांग्लादेश को दे दी जाए. यदि भाजपा सत्ता में आई, तो एक इंच ज़मीन भी बांग्लादेश को नहीं दी जाएगी. उन्होंेने पूूर्वोत्तरवासियों से भाजपा के लिए कांग्रेस के 60 वर्षों की अपेक्षा 60 महीने का समय मांगा. मोदी ने पूर्वोत्तर के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने केंद्र सरकार के सभी विभागों को अपने बजट का 10 फ़ीसद हिस्सा खर्च करने का आदेश देकर क्षेत्र के सर्वांगीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठाया था. यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो हम उपयुक्त नीति बनाएंगे और सभी समस्याएं हल करेंगे, ताकि क्षेत्र के लोग विकास का लाभ प्राप्त कर सकें.


अपने जवाबी हमले में असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि नरेंद्र मोदी ग़ैर-ज़िम्मेदार हैं और ग़लत बयानबाजी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के दौरान असम को कुछ नहीं मिला. गोगोई ने कहा कि भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़, 2012-13 में असम का सकल घरेलू उत्पाद 13 फ़ीसद था, जबकि गुजरात का 8.52 फ़ीसद. गोगोई ने कहा कि विकास पर उनका व्यय अधिक है. 11वें वित्त आयोग में राजग के शासनकाल के दौरान असम को 13280.86 करोड़ रुपये मिले थे. 13वें वित्त आयोग के दौरान यह धनराशि 57832.7 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. उन्होंने कहा कि असम पर 29200 करोड़ रुपये का क़र्ज है, जबकि गुजरात पर 176500 करोड़ रुपये का. मनरेगा के बारे में उन्होंने कहा कि मोदी ने इस संबंध में गलत आंकड़े दिए. असम में 40.92 लाख जॉब कार्ड दिए गए और 13.08 लाख लोगों को काम मिला, वहीं गुजरात में 36.6. लाख लोगों को जॉब कार्ड मिले, लेकिन काम स़िर्फ 1.75 लाख लोगों को मिला. गोगोई ने दावा किया कि शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में असम की स्थिति गुजरात से बेहतर है. अपराध के मामले में हत्या को छोड़कर चोरी, डकैती, छिनैती एवं अन्य अपराधों में गुजरात असम से बहुत आगे है. चाहे मामला मोदी के दावों का हो या गोगोई के जवाबी हमले का, यह कटु सत्य है कि इन सबके बावजूद पूर्वोत्तर के राज्य सबसे अधिक पिछड़ेपन के शिकार हैं और इसका एकमात्र कारण यह है कि तमाम राजनीतिक पार्टियां पूर्वोत्तर के हितों को लेकर गंभीर नहीं हैं.

महिला पुलिसकर्मियों की मांग

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह पूर्वोत्तर की अंग्रेजी बोलने वाली महिला पुलिसकर्मियों को अपने राज्य में विदेशी पर्यटकों से बात करते हुए देखना चाहते हैं. मोदी ने कहा कि दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में उन्होंने पूर्वोत्तर के सभी आठ (सिक्किम मिलाकर) राज्यों से दो-दो सौ महिला पुलिसकर्मियों को उनके राज्य में दो वर्षों के लिए प्रतिनियुक्ति पर भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन किसी ने उनकी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. मोदी ने कहा कि उन्होंने एक बार फिर गुजरात में पूर्वोत्तर की 1600 महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती का अनुरोध किया है.

Tuesday 11 February 2014

आख़िर हम जाएं तो कहां जाएं

देश में समय-समय पर पूर्वोत्तर के लोगों के साथ जिस तरह से सौतेला व्यवहार होता आया है, उससे वे खुद को शेष भारत से कटा हुआ महसूस करते हैं. अरुणाचल प्रदेश निवासी छात्र नीडो की मौत इसका ताजा प्रमाण है कि अपने ही देश में पूर्वोत्तर के लोग किस कदर बेगाने और असुरक्षित हैं.

हाल ही में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र की जिस तरह से पीट-पीटकर नृशंस हत्या कर दी गई, वह पूर्वोत्तर के साथ हो रही नाइंसाफी की पोल खोलने के लिए काफी है. अगर राजधानी या उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में पूर्वोत्तर के लोगों, खासकर छात्र-छात्राओं से भेदभाव का अपना लंबा इतिहास नहीं होता, तो यह घटना साधारण अपराध मानी जाती. नीडो ताबयो अरुणाचल प्रदेश का रहने वाला था. उम्र महज 19 साल. ऊंची अट्टालिकाओं के शहर दिल्ली में नीडो अंजान था. किसी के घर जाना था. उसने लाजपत नगर में एक पनीर की दुकान पर पता पूछा. उसका रंग-रूप देखकर पनीर वाले दुकानदार ने नीडो का मजाक उड़ाया. नीडो और दुकानदार के बीच बात जब हद से ज़्यादा ब़ढने लगी, तो नीडो ने दुकान के शीशे तोड़ दिए. दुकान वालों ने उसकी पिटाई की. मामला पुलिस थाने पहुंचा. नीडो ने कांच तोड़ने के एवज में 10,000 रुपये भी दिए. आरोप यह भी है कि थाने से वापस आने पर रास्ते में दोबारा उसकी पिटाई की गई. इसके बाद नीडो वापस अपने कमरे पर लौट गया और सो गया. ऐसा सोया कि हमेशा-हमेशा के लिए सो गया. नीडो की मौत मानवता के समक्ष एक सवाल है, जिसका कोई जवाब नहीं दे सकता.

समय रहते अगर पुलिस और प्रशासन ने क़दम उठाए होते, तो नीडो आज जीवित होता, लेकिन हमेशा की तरह प्रशासन ने अकर्मण्यता का परिचय दिया, जो नीडो की मौत का कारण बना. नीडो की मौत के बाद पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राएं आंदोलन पर उतर आए, क्योंकि उनका मानना है कि राष्ट्रीय राजधानी में उनके साथ न्यायपूर्ण और समानता का व्यवहार नहीं होता है. क्या एक संप्रभु राष्ट्र के लिए यह शोभनीय है? पूर्वोत्तर का हो या देश के किसी अन्य हिस्से का, है तो वह इंसान ही. ऐसे में मारपीट या झगड़े में किसी की जान चली जाए, तो कोई देश खुद को सभ्य कैसे कह सकता है? किसी देश की राजधानी में इस तरह की घटना का होना शर्मनाक और दु:खद है. दिल्ली किसी की जागीर नहीं है. यहां देश के विभिन्न हिस्सों के लोग आकर रहते हैं. यह मल्टी-कल्चर सिटी है. यहां हर कल्चर को स्पेस दिया जाता है. ऐसे में दूसरों के रूप-रंग, हाव-भाव, भाषा, रहन-सहन, मान्यताओं और आस्थाओं के प्रति सम्मान बरतना चाहिए. किसी खास वर्ग को निशाना बनाकर भद्दे मजाक और टिप्पणियां नहीं करने चाहिए. किसी ने अपने बालों का रंग पीला किया हो, नीला या फिर लाल, किसी ने अपनी मूंछें कटा ली हों या दा़ढी ब़ढाई हो, किसी ने अपने कान मेंे ईयर रिंग पहना हो या कुछ और, किसी को क्या फर्क प़डता है? हम औरों पर क्यों टिप्पणी करेंगे?

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राओं के प्रति उत्तर भारत में एक खास तरह का पूर्वाग्रह है. पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी कहा जाता है और इन राज्यों से आई लड़कियों के साथ छेड़खानी की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं, लेकिन आज तक उनकी सुरक्षा के लिए सरकार या प्रशासन की तरफ़ से कुछ नहीं किया गया. जब कोई घटना घटती है, उस समय सरकार खुद को काफी गंभीर दिखाती है, लेकिन कुछ दिनों के बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है. ये है पूर्वोेत्तर के लोगों के प्रति उदासीनता का आलम. आप अक्सर पूरी दिल्ली में पोस्टर पर लिखा हुआ पाएंगे और लोगों से या टीवी चैनलों पर भी सुनेंगे या देखेंगे कि दिल्ली दिलवालों की है, लेकिन सच्चाई कुछ और है. विदेशों और अपने देश में भी दिल्ली को रेप कैपिटल कहा जाता है. क्या दिल्लीवासियों को नहीं लगता कि इस कलंक को धोना चाहिए? अगर लगता है तो अपने से भिन्न रूप-रंग वालों से कैसे व्यवहार किया जाए, उनके साथ सामाजिक संबंध कैसे कायम किया जाए, उन्हें दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन की मुख्य धारा में कैसे जोड़ा जाए, यह दिल्ली वालों को सीखना होगा. अन्यथा दिल्ली को मेरी दिल्ली, प्यारी दिल्ली के नारे से नहीं, बल्कि वहशी दिल्ली के नारे से नवाजा जाएगा.

दरअसल, मैं मूल रूप से पूर्वोत्तर यानी मणिपुर का निवासी हूं. मैं पिछले 10 सालों से बिहार, झारखंड, पंजाब एवं दिल्ली में रह रहा हूं. इतने सालों में आज तक मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं हुई. मेरे कई दोस्त उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब से हैं. कुछ बातों पर मैं उनसे असहमति ज़रूर व्यक्त करता हूं और वे भी मुझे कई मुद्दों पर टोकते हैं, मगर आज तक कभी उन्होंने मुझ पर तंज नहीं कसे, न मैं उन पर कसता हूं. मैं दोस्तों से अपनी बात शेयर करता हूं. उनके दु:ख-दर्द का हिस्सा बनता हूं और वे भी मेरे दु:ख-सुख में भागीदार बनते हैं. इरोम शर्मिला के कैंपेन में जितना पूर्वोत्तर के लोगों का समर्थन है, उससे कहीं ज्यादा हिंदीभाषी राज्यों के लोगों का. जैसे देश के अन्य हिस्से के लोग अपने समूह में रहते हैं, वैसे ही पूर्वोत्तर के छात्र-छात्राएं अपने समूह में रहते हैं. हालांकि पूर्वोत्तर के लोगोें को चाहिए कि वे अपने आसपास के लोगों से घुलें-मिलें, बातें करें, ताकि लोग उनकी सभ्यता-संस्कृति को जानें-समझें और उन्हें भी अपने बीच का मानें. समाज से कटकर रहना हमेशा दूसरों के मन में जिज्ञासा जगाता है, जो अपराध को ब़ढावा देता है. अगर हम एक-दूसरे को नहीं समझेंगे, एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंेगे, एक-दूसरे की सभ्यता-संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो याद रखिए, आने वाले दिनों में नीडो जैसे और भी मामले हमारे सामने से गुजरते रहेंगे.

Monday 3 February 2014

पूर्वोत्तर की पीड़ा


पिछले हफ्ते दिल्ली के लाजपत नगर में अरुणाचल प्रदेश के युवक नीडो तानिया की हत्या केवल कानून व्यवस्था की विफलता का मामला नहीं है. इस घटना ने दिल्ली पुलिस की काहिली के साथ-साथ सामाजिक संवेदनहीनता पर भी सवाल उठाए हैं. अपने रंगे हुए बालों पर एक दुकानदार की टिप्पणी का विरोध करने पर तानिया को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया. बाद में उसकी मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अंदरूनी चोटों की वजह से उसकी मृत्यु हुई. इस मामले में अगर पुलिस ने पर्याप्‍त सतर्कता और तत्परता दिखाई होती, तो शायद इस घटना के इतना त्रासद मोड़ लेने से बचा जा सकता था. मगर मौके पर मौजूद लोगों ने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया. वे चुपचाप तमाशबीन बने रहे. सवाल है हम कैसे समाज में जी रहे हैं. सामाजिक संवेदनहीनता के ढेर सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं. हाल में उत्तर प्रदेश में अवैध रूप से लकड़ी की कटाई की शिकायत करने पर एक आदमी को दिनदहाड़े पीट-पीट कर मार दिया गया. पर तानिया की मौत ने पूर्वोत्तर के लोगों के साथ बाकी देश में हो रहे बर्ताव पर भी सवाल उठाया है. दिल्ली राष्‍ट्रीय राजधानी है और यहां देश के तमाम हिस्सों से लोग नौकरी और पढ़ाई-लिखाई आदि के लिए आते और रहते हैं. इसलिए स्वाभाविक ही दिल्ली को एक लघु भारत के तौर पर देखा जाता है. पर क्या भारत की विविधता का सम्मान करना दिल्ली का संस्कार बन पाया है. यों तो पूर्वोत्‍तर के लोगों के प्रति पराएपन का भाव देश के बहुत से हिस्सों में देखा जाता है. पर दिल्ली में उनके प्रति असहिष्‍णुता की घटनाएं दूसरे महानगरों से ज्यादा होती हैं. उन पर छींटाकशी की जाती है. अपमानजनक फिकरे कसे जाते हैं. उनकी नागरिकता या राष्‍ट्रीयता पर शक किया जाता है. कई बार अधिकारी या कर्मचारी भी ऐसे प्रश्‍न करते हैं जैसे वे किसी और देश के रहनेवाले हों.

हाल में आए एक सर्वेक्षण से भी यह हकीकत उजागर हुई कि दिल्‍ली में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ भेदभाव होता है उनके रहन-सहन या कुछ अलग तरह के पहनावे आदि को लेकर ताने कसे जाते हैं. मखौल उड़ा वाली टिप्पणियां की जाती हैं. इसलिए यह हैरत की बात नहीं कि मणिपुर, नगालैंड या अरुणाचल के दिल्ली में रह रहे लोग दूसरों से घुलने-मिलने में हिचकते हैं और हमेशा असुरक्षा के भाव में जीते हैं. तिब्बतियों के साथ भी यह होता है. तानिया की मौत ने दिल्ली के संवेदनशील लोगों को स्तब्ध किया है और इस घटना पर हुए विरोध प्रदर्शनों में उन्होंने भी अपनी आवाज मिलाई है. दिल्ली सरकार ने घटना की मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं. पर यह काफी नहीं है. दिल्ली पुलिस यह दावा करती रही है कि उसने अपने महकमे को और संवेदनशील और जवाबदेह बनाने के उपाय किए हैं. उसके इस दावे पर एक बार फिर सवालिया निशान लगा है. पर पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति कई बार निमर्मता की हद तक जो पूर्वग्रह बाकी देश में दिखते हैं, उनसे कैसे निपटा जाएगा. 

पूर्वोत्तर के प्रति न हमारी राजनीति में अपनत्व और चिंता का भाव दिखता है न शिक्षा-दीक्षा में. बाकी देश के पढ़े-लिखे लोग भी पूर्वोततर की संस्कृति के बारे में कुछ जानना तो दूर वहां के बारे में सामान्य भौगोलिक जानकारी भी नहीं रखते. क्या यह त्रासद घटना हमारे लिए कोई ऐसा सबक बन पाएगी, जिससे पूर्वोततर के लोग देश में कहीं भी परायापन और असुरक्षा महसूस न करें!

साभार-जनसत्‍ता