यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Sunday 2 November 2008

भैया दूज और शर्मिला की मांग


इस्पात से बुलंद इरादे वाली मणिपुर की लड़की इरोम शर्मिला चनु को आप पहचानते हैं? मणिपुर की पर्याय कही जानेवाली यह लड़की अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है. लोग किसी मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठते हैं और कुछ ,
आश्वासनों के बाद अनशन तोड़ देते हैं, लेकिन पिछले सात साल से आमरण अनशन कर रही एक लड़की के बारे में क्या कहा जाएगा.
पूरे देश में भैया दूज का माहौल है. देश के भाइयों से एक मांग करती हुई उनकी कलम से यह कविता लिखी है-
प्यारे भाई!
ये मत कहो कि खानदान बदलो
असमय गुजरे उन लोगों के लिए
वादा कर लिया कि रास्ता नहीं बदलूं
बहन के दुख को मिटाना चाहो तो
एक दायित्व सौंप रही हूं
जब तक दाना खत्म न हो जाए
तब तक वापस चले आना
मशाल उठा कर स्वागत करूंगी
घर-घर जा कर
हर बहनों का हाल पूछना
अगर दुश्मन मिले तो सर्तक होना
उन बहनों के हर भाई हो तब
तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा
नहीं तो,
जिस रास्ते पर चल रही हूं
उस रास्ते पर चलने देना
मंजिल आने तक।
- अनुवाद

पिछले 2000 के 2 नवंबर का दिन था. इंफाल से 15 किमी की दूरी में मालोम नामक एक जगह पर असम रायफल्स की गाड़ियां आ रही थीं. अचानक उसी जगह पर बम धमाका हुआ था. घटनास्थल से 200 मीटर की दूरी पर स्थित एक बस सेड पर गाड़ी इंतजार कर रहे 10 आम जनों को असम रायफल्स के जवानों ने मार दिया. इसके विरोध में पहाड़ सी दृढ़ इराम शर्मिला चनु संघर्ष कर रही है. मणिपुर में लागू 'आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट' अफसपा के विरुद्ध शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का यह विरल उदाहरण है. उनका मानना है कि भिन्न-भिन्न प्राणियों एक साथ रह रही इस दुनिया में मनमानी से किसी को मार नहीं सकता. यह सोचने-समझने वाले मनुष्य की दुनिया है, जानवरों का नहीं. शर्मिला देश के अभिभावक और शासक वर्ग से उम्मीद के सवाल करती रही है कि इस जंगल शासन के भीतर कब तक आम जनता बिना डर के जी सकता है.
वह दिन गुरुवार था. शर्मिला व्रत पर थी और उपवास कर रही थी. आठ वर्ष बीतने को है, लेकिन उसका वह उपवास आज तक टूटा नहीं है. इस दौरान पुलिस ने चनु को ÷आत्महत्या' के प्रयास के आरोप में जेल में भी बंद कर दिया. प्रशासन के निर्देश पर चनु को जबर्दस्ती नाक में नली लगा कर शरीर के अंदर खाना पहुंचाया गया, ताकि जिंदा रहे. एक वर्ष बाद उसको रिहा किया गया. फिर उसे दुबारा गिरफ्‌तार किया गया था. लेकिन इतने पर भी शर्मिला का संकल्प नहीं टूटा.
30 लाख की आबादी वाले इस राज्य में 1980 से ही भारतीय सेना पर कोई तरह के आरोप लगते रहे. खास कर आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट 1958 को तो पूरे राज्य में विरोध होता रहा है. इतना ही नहीं 2004 में कथित तौर पर असम रायफल्स के जवानों ने हवालात में सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी के साथ बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी थी. उसके विरोध में समूचे प्रदेश में आग लग गई, जो अभी भी सुलग रही है.

4 अक्टूबर, 06 बुधवार को चनु अपने समर्थकों की मदद से दिल्ली पहुंची. उल्लेखनीय है कि शर्मिला ने दिल्ली पहुंच कर पहले गांधी की समाधि पर श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के बाद ही जंतर-मंतर पर अपना अनशन शुरू किया. शायद ही किसी गांधीवादी के लिए शर्मिला की इस गांधीगीरी का कोई महत्व हो. शर्मिला मणिपुर की राजनीति से उठ कर दिल्ली की गलियों में एक मुद्दा बन चुकी है. एक ऐसा मुद्दा जिस पर आम आदमी अब बहस कर रहे हैं. मणिपुर के सीएम ओक्रम इबोबी सिंह ने दिल्ली में शर्मिला के पास जा कर हाल-चाल पूछा था. शर्मिला ने यह अफसपा एक्ट को मणिपुर से हटाने का प्रस्ताव सीएम को दिया था. लेकिन सीएम कोई निश्चित जवाब नहीं दे पाए. शर्मिला कहती है कि यह भूख-हड़ताल तभी खत्म होगी, जब सरकार बगैर किसी शर्त के आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावल एक्ट को हटाएगी. 4 मार्च 07 को शर्मिला मणिपुर वापस गई. मणिपुर पहुंच कर फिर शर्मिला को गिरफ्‌तार किया गया.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिला ने अहिंसक संघर्ष को परिचित किया. एक लौह महिला की तरह डटे रही कि मानव समुदाय के हक के लिए तभी उनकी मिशाल को समझते हुए दक्षिण कोरिया ने शर्मिला को ग्वांजू पुरस्कार 2007 को दिया गया. सरकार ने उसको जाकर वह पुरस्कार प्राप्त करने की इजाजत नहीं दी. उसके भाई ने शर्मिला के बदले लिया था. शर्मिला के शब्दों में मैंने सैकड़ों लोगों की जिंदगी बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया है.
क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि शर्मिला के इस अनथक संघर्ष से सारा देश अनभिज्ञ है? क्या कथित मुख्यधारा के राजनीतिक दलों संगठनों या मीडिया की नजर में मणिपुर या अन्य पूर्वोत्तर राज्य देश के अंग नहीं है? यह केंद्र का सौतेला व्यवहार नहीं है कि यदि देश के एक बड़े इलाके के लोगों को ऐसा लगता है कि पुलिस या सेना-सुरक्षा बल मानवाधिकार का हनन कर रहे हैं, अलगाववाद को कुचलने के नाम पर निर्दोष लोगों पर जुल्म कर रहे हैं और लोगों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को भी बलपूर्वक कुचल रहे हैं तो इससे चिंताजनक स्थिति क्या हो सकती है जो कानून ही आमजन के अमनचैन छिन रहा हो उसे लागू रखना किस प्रकार केंद्र को सही लग रहा है. फिर भी हम इन इलाकों के निवासियों से देश के प्रति लगाव व देशभक्ति की अपेक्षा रखते हैं.
भैया दूज के अवसर पर इरोम चनु शर्मिला देश के भाइयों को शुभकामना देते हुए दुआ मांगती है कि उनका संघर्ष एक दिन सूरज की तरह मानवता की दुनिया को रौशन करे.

शर्मिला को समर्पित मेरी कविता
अनवरत यातना