यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Thursday 13 October 2011

क्रांति को प्रेम से क्या खतरा है


क्रांति और प्रेम एक सिक्के के दो पहलू हैं. क्रांति प्रेम से ही पनपती है. दुनिया की बड़ी-बड़ी क्रांतियां प्रेम की वजह से ही हुई हैं. चाहे देश प्रेम हो या फिर किसी के प्रति प्रेम. ऐसे में एक क्रांतिकारी को प्रेम हो जाए तो इसमें ग़लत क्या है? जबसे यह ख़बर आई है कि आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को मणिपुर से हटवाने के लिए पिछले 11 सालों से आमरण अनशन कर रहीं 39 वर्षीय इरोम शर्मिला को ब्रिटिश मूल के देसमोंड कोटिंहो से प्यार है, मानो भूचाल आ गया हो. मणिपुर के लोग इस ख़बर से ख़़फा हैं. आख़िर क्यों?
मामले की शुरुआत तब हुई, जब कोलकाता से प्रकाशित होने वाले एक अख़बार ने शर्मिला के उस बयान को सार्वजनिक किया, जिसमें उन्होंने यह स्वीकार किया था कि उन्हें ब्रिटिश मूल के देसमोंड कोटिंहो से प्यार है. यह ख़बर बीते 5 सितंबर को आई थी. 48 वर्षीय देसमोंड लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं. शर्मिला ने कहा था, जिसे मैं प्यार करती हूं, वह मेरा बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है. वह यहां मुझसे मिलने आया था, मगर मेरे समर्थकों ने मना कर दिया. एक साल से पत्र द्वारा उनका देसमोंड  से संपर्क चल रहा है. पिछले 9 मार्च को शर्मिला और देसमोंड के बीच एक अल्प समय की मुलाक़ात हुई थी. देसमोंड द्वारा लिखे पत्र शर्मिला ने अपने बेड के बगल में एक कॉर्ड बॉक्स में संभाल कर रखे हैं. शादी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में शर्मिला कहती हैं, मैं तभी शादी करूंगी, जब मेरी मांग पूरी हो जाएगी. उन्होंने कहा कि वह (देसमोंड) ब्रिटिश सिटीजन होने के नाते हमारे रिश्ते को मना कर रहे हैं. शर्मिला नाराज़गी मिश्रित लहज़े में कहती हैं, वह बहुत एकपक्षीय और निर्दयी हैं.
इधर शर्मिला के समर्थक अख़बार में छपी यह ख़बर देखते ही भड़क गए और उन्होंने उक्त अख़बार की प्रतियां जलाते हुए इस ख़बर का विरोध किया. शर्मिला के समर्थकों का मानना है कि 11 सालों से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट-1958 को लेकर आमरण अनशन कर रहीं शर्मिला के बारे में मुख्य धारा के किसी भी अख़बार ने जब आज तक कोई पॉजिटिव स्टोरी नहीं छापी, तो उनके निजी जीवन की बातों को इतना उछालने की क्या ज़रूरत है. जस्ट पीस फाउंडेशन ऑफ मणिपुर के अध्यक्ष एवं शर्मिला के भाई इरोम सिंहजीत ने कहा कि शर्मिला भी एक इंसान हैं और कोई भी इंसान प्रेम कर सकता है. इसमें ग़लत क्या है? उनके संघर्ष पर फोकस न करके उसकी निजी ज़िंदगी पर ज़्यादा फोकस किया जा रहा है. गृहमंत्री पी चिदंबरम द्वारा अफसपा क़ानून में संशोधन से संबंधित ताजा बयान पर सिंहजीत ने कहा कि शर्मिला की मांग साफ है, अफसपा हटाया जाना चाहिए, न कि उसमें संशोधन हो. सिंहजीत ने कहा कि अगर अन्ना हजारे मणिपुर में पैदा होते तो उनकी मांगों को भी सरकार न सुनती, चुप रहती.  हालांकि मणिपुर में प्रेम विवाह के 95 प्रतिशत मामलों को समर्थन मिलता है, बावजूद इसके इस राज्य में किसी सामाजिक कार्यकर्ता को प्यार होने पर आपत्ति जताना अटपटा लगता है. क्या शोषित और पीड़ित लोगों की सेवा में अपना जीवन बिताने वाली शर्मिला को एक आम इंसान की तरह किसी से प्यार नहीं हो सकता? यह एक निजी मामला है. इंसान प्यार न करे तो कौन करेगा. यह एक इंसानी फितरत है. शर्मिला कहती है कि ग़रीब, शोषित और पीड़ितों के लिए लड़ना और आवाज़ उठाना एक अलग चीज है और प्यार एक अलग चीज है. दोनों अलग-अलग काम हैं. इससे मेरे संघर्ष पर कोई असर नहीं पड़ेगा. मेरी मांग जब तक पूरी नहीं होगी, तब तक मेरा अनशन जारी रहेगा. देेसमोंड और हमारे बीच दोस्ती है, यह मैं मानती हूं, मगर इससे मेरे संघर्ष पर कोई ़फर्क़ नहीं पड़ने वाला. मैं भी एक मनुष्य हूं, मुझे एक मनुष्य की नज़र से देखिए, शर्मिला के रूप में देखिए.

यह मणिपुरवासियों का अपमान है : अपुनबा लुप

बीते पांच सितंबर को मणिपुर प्रेस क्लब में अपुनबा लुप ने एक प्रेस कांफ्रेंस की, जिसमें संगठन के को-ऑर्डिनेटर लांगदोन अयेकपम ने कहा कि इस ख़बर से केवल शर्मिला का ही नहीं, मणिपुरवासियों का भी अपमान हुआ है. राज्य और केंद्र सरकार यह नहीं कह रही है कि शर्मिला अफसपा हटवाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, उल्टे उन पर भारतीय दंड विधान की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया. शर्मिला को सजिवा जेल द्वारा संचालित जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के कस्टडी वार्ड में रखा गया. अपुनबा लुप मणिपुर के कई सारे क्लबों का एक संगठन है. लुप ने आरोप लगाया कि यह सरकार और उक्त अख़बार की मिलीभगत है, ताकि शर्मिला के संघर्ष को कमजोर किया जा सके. 11 सालों से चल रही शर्मिला की संघर्ष गाथा को नकारते हुए उनकी निजी ज़िंदगी पर ज़्यादा फोकस करना एक दु:खद बात है. अपुनबा लुप ने कहा कि उक्त अख़बार के संपादक या उनके समकक्ष किसी व्यक्ति को माफी मांगनी होगी. जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक अख़बार पर प्रतिबंध जारी रहेगा. मुख्य धारा के अख़बारों के राज्य प्रतिनिधियों को मणिपुर के संवेदनशील मसलों पर खबर लिखते समय सावधानी बरतनी चाहिए. ऐसे मसलों पर स्थानीय प्रतिनिधियों से संपर्क करने की भी अपील की गई. शर्मिला के समर्थन में श्र्ृंखला उपवास कर रही सकल संस्था की संयोजक ए के जानकी देवी ने कहा कि इस तरह की ख़बरों का प्रकाशन शर्मिला के संघर्ष को नकारने जैसा है.