यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Monday 20 June 2016

ध्वस्त होने को है मणिपुर का मशहूर महिला बाजार

ऐसे तो मिट जाएगा नारी शक्ति का संकेत-केंद्र 

यदि आप पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की राजधानी इंफाल जाते हैं, तो आप शहर के  बीचो-बीच स्थित ईमा कैथेल ज़रूर जाते हैं. स्थानीय भाषा में ईमा का मतलब होता है मां और कैथेल का मतलब होता है बाजार. यानी मांओं का बाजार. यह ऐसा बाजार है जहां दुकानों और यहां बिकने वाले सामानों में विविधता है, लेकिन एक चीज समान है और वह है दुकानदार. यहां के बाजार को महिलाएं ही संभालती हैं. इस बाजार के तीन हिस्से हैं, पहला लैमरेल शिदबी ईमा कैथेल (पुराना बाजार), दूसरा इमोइनु ईमा कैथेल (लक्ष्मी बाजार) और तीसरा फौउइबी ईमा कैथेल (न्यू मार्केट). ये तीनों हिस्से मिलकर बाजार के स्वरूप को व्यापक बनाते हैं. यह देश का इकलौता बाजार है, जिसका संचालन सिर्फ महिलाएं करती हैं. यही इस बाजार की खासियत भी है. यह अपने आप में महिला सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण है, जहां सभी महिलाएं एक दूसरे का हर तरह से सहयोग करती हैं.
लेकिन तकरीबन 600 साल पुराने इस बाजार को जनवरी 2016 में आए भूकंप के बाद एक नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. 4 जनवरी 2016 को आए भूकंप से इस बाजार के कॉम्प्लैक्स को बुरी तरह नुकसान पहुंचा. आज स्थिति यह है कि बाजार के इमोइनु ईमा कैथेल (लक्ष्मी बाजार) और फौउइबी ईमा कैथेल (न्यू मार्केट) के अधिकांश खंभे टूटने पर हैं. बाजार के फर्श पर दरारें आ चुकी हैं. लेकिन सरकार ने अब तक इस क्षतिग्रस्त बाजार को दुरुस्त करने के लिए किसी तरह के कदम नहीं उठाए हैं. इस वजह से यहां कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है. भूकंप के बाद इन दो क्षतिग्रस्त कॉम्प्लैक्सों को खाली करा दिया गया था. इन दोनों बाजारों में 1873 महिलाएं दुकानदार थीं, लेकिन मार्केट को खाली कराने के बाद ये अपनी दुकानें नहीं लगा पा रही हैं. इनके परिवार के समक्ष आजीविका की समस्या आ खड़ी हुई है.


गौरतलब है कि जनवरी 2010 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस बाजार के नवनिर्मित खंड की इमारत का उद्घाटन किया था. लेकिन केवल पांच साल के अंतराल में इमारत इतनी जर्जर कैसे हो गई कि उसके पिलर 6.7 तीव्रता के भूकंप के झटकों को नहीं झेल पाए. क्या इमारत के निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया था और निर्माण के दौरान गुणवत्ता के मानकों को दरकिनार कर दिया गया था. यदि ऐसा नहीं होता, तो बाजार के खंभों का यह हाल नहीं होता. एक ऐतिहासिक बाजार की इमारत के निर्माण में निश्ति तौर पर करोड़ों रुपये की हेरा-फेरी हुई होगी. लेकिन यहां के लोगों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं है. राज्य सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है. दूसरी तरफ बाजार की महिलाएं आजीविका के संकट का सामना कर रही हैं.


इतिहास गवाह है कि यहां की महिलाएं जीवट वाली हैं और उन्होंने कभी किसी के सामने घुटने नहीं टेके. ये महिलाएं अबला नहीं सबला हैं. यहां की महिलाओं ने विषम परिस्थितियों में भी मोर्चा संभाला है. यह बाजार सन्‌ 1535 के आसपास अस्तित्व में आया था. हालांकि अंग्रेजों द्वारा मणिपुर पर कब्जा करने के बाद इस बाजार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई. इस दौरान ब्रिटिश सेना और यहां की महिलाओं के बीच कई बार संघर्ष भी हुआ. 1904 में जब ब्रिटिश सरकार ने राज्य से चावल बाहर भेजना शुरू किया था. तब यहां की महिलाओं ने ब्रिटिश सरकार के इस अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज उठाई और कपड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के टुकड़े (तेम) को अपना हथियार बनाया. इन महिलाओं ने पुरुषों से एक क़दम आगे बढ़कर लड़ाई का मोर्चा संभाल लिया. इस संघर्ष के दौरान कई महिलाएं शहीद हो गईं, कुछ महिलाओं को जेल भी जाना पड़ा था. इस लड़ाई को मणिपुर के इतिहास में नुपी लाल यानी महिलाओं के युद्ध के रूप में जाना जाता है. उसके बाद भी 1939 में हुए दूसरे संघर्ष में इस बाजार की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. आज भी इस संघर्ष में शहीद महिलाओं को हर साल 12 दिसंबर को याद किया जाता है.

अब यहां की महिलाएं सरकार के साथ दो-दो हाथ करने को भी तैयार हैं. यहां की महिलाओं का मानना है कि पांच साल के अंदर इमारत इतनी कमजोर कैसे हो सकती है. इससे यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि इस कॉम्प्लैक्स निर्माण के दौरान बड़े स्तर पर घोटाला हुआ होगा. इसलिए यह आज धराशाई होने की कगार पर है. निर्माण कार्य कराने वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के ऊपर कई तरह के सवाल खड़े होते हैं. अब राज्य सरकार अपनी सफाई पेश करते हुए कह रही है इन कॉम्प्लैक्सों का निर्माण पीडब्लूडी ने नहीं किया था. इसका निर्माण एनबीसीसी (नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) ने किया था. हालांकि सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर दुकानदार महिलाओं को इंफाल के थांगाल बाजार के करीब विकल्प के तौर पर अस्थाई जगह देने की कोशिश की, लेकिन महिलाओं ने अस्थाई बाजार का जमकर विरोध किया. इस वजह से अस्थाई बाजार के निर्माण का काम भी रुक गया. राज्य सरकार ने आईआईटी रुड़की के तीन इंजीनियरों को बुलाकर बाजार का निरीक्षण कराया है, लेकिन 4 महीने बीत जाने के बाद भी कॉम्प्लैक्स के जर्जर खंभों की मरम्मत होगी या इसका दोबारा निर्माण किया जाएगा, यह स्थिति साफ नहीं हो सकी है. महिलाओं ने बिना गुणवत्ता के इस बाजार (कॉम्प्लैक्स) का निर्माण करने वाली ऐजेंसी को दंडित करने की मांग की है.

ईमा कैथेल के माध्यम से मणिपुर की महिलाओं ने व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में आर्थिक जिम्मेदारी ली है. इस बाजार में कार्यरत महिलाओं को समय-समय पर राजनीतिक और सैन्य हलचल का भी सामना करना पड़ता है. मणिपुरी जीवन शैैली को स्वदेशी बनाए रखने में इन महिलाओं की बड़ी भूमिका है. यहां हरी सब्जियों, खाद्य पदार्थ, लोहे के औजार, मछलियां, कपड़े, बांस निर्मित वस्तुएं एवं मिट्‌टी के बर्तन आदि का व्यवसाय होता है. अपने परिवार और समुदाय में यहां की महिलाएं आर्थिक स्तंभ की तरह खड़ी हैं. इनका अपने परिवार, राज्य और देश की अर्थव्यवस्था में एक अलग योगदान है. यहां की 5,000 से ज्यादा महिलाएं अपने बेहतर भविष्य के लिए हमेशा सजग, जागृत और एकजुट रहती हैं.

यहां दुकान लगाने वाली 30 वर्षीय पुष्पा तीन बच्चों की मां है. 9 वर्ग फुट की दुकान में वह चावल और आटे से बने लड्‌डू बेचती हैं. उन्हें प्रतिमाह 90 रुपये दुकान का किराया देना होता है. उनकी यह दुकान परिवारिक विरासत की तरह है, पहले उनकी सास यहां दुकान चलाती थीं. उनके देहांत के बाद पुष्पा ने दुकान की जिम्मेदारी संभाल ली. सास के देहांत के बाद घर की आर्थिक स्थिति कुछ डांवाडोल हुई थी, लेकिन जब से उन्होंने यहां काम करना शुरू किया और परिवार की आर्थिक स्थिति फिर से सुदृढ़ हो गई है. बाजार में इस तरह की हजारों पुष्पा हैं, जो न केवल खुद को सशक्त बना रही हैं, बल्कि  अपने परिवार के साथ-साथ राज्य की प्रगति में योगदान दे रही है. पैंतालीस वर्षीय नुंगशीतोम्बी लाइश्रम हर महीने लगभग चार से पांच हजार रुपये कमाती हैं, जिससे वह अपने पांच लोगों के परिवार का पेट पालती हैं. उनके तीन बच्चे पढ़ाई करते हैं. नुंगशीतोम्बी ताजा सब्जियां बेचती हैं. उनकी शादी 18 साल की उम्र में हो गई थी, तब से वह यहां सब्जी बेचकर अपना परिवार चलाती हैं. उनके पति एक साधारण किसान हैं. ईमा कैथेल एक अद्भुत बाजार है. इस बाजार में काम करने वाली लगभग 5000 से ज्यादा महिलाएं अपने परिवार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. यह बाजार न केवल भारत में बल्कि, विश्व स्तर पर भी अपनी पहचान कायम बनाए हुए है.

इस बाजार में व्यवसाय करने वाली सरोजनी कहती हैं कि नई इमारतें बनने से पहले यहां किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन सरकार के हस्तक्षेप और सही योजनाओं न होने की वजह से हमारे लिए परेशानियां बढ़ गईं. उनका कहना है कि सरकार तो केवल दिखावे या कहें कि बाहरी सौंदर्य पर ध्यान दे रही है. लेकिन आंतरिक तौर पर यहां की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उसने कुछ नहीं किया है. यहां पर काम करने वाली महिलाओं के पास अपना बैंक अकाउंट तक नहीं है, जिसकी वजह से उन्हें ऋृण की सुविधा भी नहीं मिल पाती है. इन महिलाओं और उनकी समस्याओं पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है. देश के इस गौरवशाली बाजार को जहां सहायता की बेहद जरूरी है, तो अनावश्यक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है. मणिपुर नगर निगम ने नई इमारतों के निर्माण के बाद यहां दुकान के लिए लाइसेंस दिए, जिसमें कई महिलाओं को लाइसेंस नहीं मिल पाया. जिन महिलाओं के लाइसेंस नहीं मिला पाया, जिसमें बहुत सारी वे महिलाएं हैं, जिनके पति सेना, पुलिस और अलगाववादियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं.

इस बाजार की सबसे बड़ी खासियत है यहां का अनुशासन और अलिखित नियम, जो कई दशकों से बदस्तूर चले आ रहे हैं. महिलाएं यहां के अलिखित नियम-कानून का पालन करने में गर्व महसूस करती हैं. इन महिलाओं को पता है कि उनकी एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. यहां की महिलाएं राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय हैं. वे किसी भी तरह के अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने में नहीं झिझकती हैं. यह बाजार कई तरह की बहसों और चर्चाओं का केंद्र बिंदु है. यह बाजार लोगों के बीच नई जानकारियों के प्रचार-प्रसार के लिए भी कार्य करता है. इस बाजार में बैठी महिलाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना पहले भी करना पड़ा है और वे आगे भी करती रहेंगी. लेकिन इस बाजार की संरचना में परिवर्तन के माध्यम से इन महिलाओं को समस्याओं से बचाया जा सकता है.
दुनिया के एकमात्र महिलाओं के बाजार को भूकंप से नुकसान पहुंचना दुःखद बात है. इस भूकंप में पुराने जमाने के घर और बिल्डिंग को कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन मात्र पांच साल पहले बने इस मार्केट को नुकसान होना अफसोस की बात है. इस मार्केट की स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कर प्रधानमंत्री और संबंधित मंत्रियों को सूचित किया जाएगा. जितना हो सकेगा, सरकार मदद करने के लिए तैयार है.
-प्रकाश जावड़ेकर, केंद्रीय मंत्री 
भूकंप से मार्केट को नुकसान होने की वजह हम लोग पिछले कई महीनों से इस मार्केट  में बैठ नहीं पा रही हैं. इस वजह से जीवन यापन में संकट पैदा हो गया है. क्योंकि कई महिलाओं के परिवारों के लिए आमदनी का एकमात्र जरिया यह मार्केट ही है. इसलिए सरकार समय रहते इस मार्केट (कॉम्प्लैक्स) को बनाकर हमारे पुराने दिन वापस नहीं करती है, तो हम इस टूटे हुए मार्केट में ही बैठेंगे. यदि इस दौरान कोई बड़ा हादसा होता है, तो इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार की होगी. 
-टीएच शांति देवी, अध्यक्ष, ईमा कैथेल महिला संगठन 

विकास की राह में बंदूक


मोदी सरकार भले ही पूर्वोत्तर भारत को विकास की दौड़ में शामिल करवाने की कोशिश कर रही हो, विकास की बहुत सारी योजनाएं शुरू कर रही हो, लेकिन ऐसा लगता है कि वहां के चरमपंथी गुटों को विकास की यह राह रास नहीं आ रही है. इसलिए वे समय-समय पर सरकार का विरोध करते रहते हैं. गत 13 अप्रैल को मणिपुर के तमेंगलोंग जिले के नूंगबा सब-डिवीजन के लेंगलोंग में मणिपुरी नगा चरमपंथी संगठन जेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट (जेडयूएफ) और भारतीय सेना के बीच हुई मुठभेड़ में मेजर अमित देसवाल शहीद हो गए. अमित देसवाल हरियाणा के झज्जर के रहने वाले थे. वह इंफाल स्थित सेना की 21वीं पैरा (स्पेशल फोर्स ) में पदस्थ थे. पिछले दिनों ख़बर आई कि तमेंगलोंग जिले के नूंगबा सब डिवीजन के लेंगलोंग में हथियारबंद चरमपंथी गुट इकट्ठा हो रहे हैं. इसी सिलसिले में मेजर अमित देसवाल के नेतृत्व में 21वीं पैरा की एक टीम को लेंगलोंग भेजा गया. यह टीम लेंगलोंग पहुंचने ही वाली थी लेकिन वहां पहले से छिपे अत्याधुनिक हथियारों से लैस चरमपंथियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. इस मुठभेड़ में मेजर देसवाल को गोलियां लगीं और वह घटना स्थल पर ही शहीद हो गए. इस घटना में मेजर देसवाल के अलावा अन्य दो लोगों की भी मौत हो गई. जिनमें से एक स्थानीय व्यक्ति और दूसरा चरमपंथी गुट का सदस्य था.

दूसरी घटना है 14 अप्रैल की, जब ईस्ट इंफाल के मिनुथोंग स्थित असम रायफल्स के ट्रांजिट कैंप में रात में बम फेंका गया. इस घटना में 32 वर्षीय जवान गोकुलचंद यादव शहीद हो गया और तीन जवान घायल हुए. इस घटना की जिम्मेदारी यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) की सेना एमपीए ने ली. राजस्थान के सीकर जिले के नीम का थाना सालावली गांव के रहने वाले गोकुल चंद असम राइफल्स में तैनात थे. गोकुल होली की छुट्टिुयां बिताकर अपनी यूनिट में वापस लौटे थे. इससे पहले, 31 मार्च की रात लिलोंग स्थित 40 असम रायफल्स के कैंप में बम फेंका गया था. इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन इस घटना की जिम्मेदारी पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कंगलैपाक (प्रीपाक)  ने ली थी.

मणिपुर के चरमपंथी संगठनों का मानना है कि मणिपुर कभी भी भारत का हिस्सा नहीं रहा है, उसे जबरदस्ती भारत में शामिल किया गया है. मणिपुर मर्जर एग्रिमेंट-1949 के तहत मणिपुर के राजा बोधचंद्र सिंह से बंद कमरे बंदूक की नोक पर हस्ताक्षर कराए गए थे. इसके विरोध में तब से लेकर आज तक मणिपुर में सशस्त्र आंदोलन चल रहा है. इन लोगों का मानना है कि उन्हें भारत से आजादी नहीं मिलेगी, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा. इसी वजह से समय-समय पर चरमपंथी गुट भारतीय सेना या अर्ध सैन्य बलों के जवानों और उनके कैंप में हमला करके अपना विरोध दर्ज कराते रहते हैं. ऐसे हमलों में मेजर देसवाल जैसे कई जवान शहीद हो चुके हैं.

मणिपुर सहित पूूर्वोत्तर भारत के अन्य राज्यों में आंदोलन कई चरमपंथी सशस्त्र गुट सक्रिय हैं. पूर्वोत्तर भारत के राज्य सिलीगुड़ी गलियारे या चिकन्स नेक से शेष भारत से जुड़े हैं. यहां के कई चरमपंथी गुट समय-समय पर अलग राज्य की मांग करते रहे हैं  है, कुछ गुटों को क्षेत्रीय स्वायत्ता चाहिए तो कुछ अतिवादी समूहों को पूर्ण स्वतंत्रता. पूर्वोत्तर भारत के राज्यों स्थानीय आदिवासी समुदायों और बाहरी लोगों के बीच तनाव और संघर्ष काफी पहले से चला आ रहा है. हालांकि साल 2013 में इस संघर्ष में थोड़ी कमी देखने को मिली थी लेकिन साल 2014 में यह तनाव एक बार फिर से बढ़ गया और आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा बाहरी लोगों पर हमले किए जाने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई. इस तरह के हमले असम, मणिपुर, नगालैंड और त्रिपुरा में सबसे ज्यादा हुए. पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे कम चरमपंथी गुट अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम में हैं. मिजोरम में तो चरमपंथी न के बराबर हैं. इन दोनों राज्यों में स्वाभाविक तौर पर चरमपंथी घटनाएं भी बेदह कम होती हैं.

2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर राज्यों में 80 फीसदी मतदान हुआ था. इसके बाद विभिन्न राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि मतदान प्रतिशत यह बताता है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों का भारतीय लोकतंत्र में विश्वास बढ़ा है. लेकिन 2015 में एनएससीएन (के) के प्रमुख एसएस खपलांग, उल्फा प्रमुख डॉ अभिजीत असोम, केएलओ के प्रमुख जीवन सिंघा और एनडीएफबी के प्रमुख बी साउरायगवरा ने संयुक्त रूप से यूनाइटेड नेशन लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेसी (यूएनएलएफडब्लू) के गठन की घोषणा की. यह संगठन पूर्वोत्तर भारत की वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया के रूप में मान्यता चाहता है. इन चरमपंथी गुटों के आपसे में मिलने और एक नए संगठन का गठन करने की वजह से पूर्वोत्तर भारत में अशांति का माहौल बन गया. नए संगठन के गठन के बाद नए संगठन ने मणिपुर के चांदेल की घटना को अंजाम दिया गया था जिसमें भारतीय सेना के 18 सैनिक शहीद हुए थे. इसके बाद भारतीय सेना ने म्यांमार में इनके कैंप पर जवाबी हमला भी किया था.

आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट-1958 (अफसपा) पूर्वोत्तर  भारत के अशांत राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और नगालैंड में लागू है. पिछले साल त्रिपुरा से इस कानून को हटाया गया था. यह कानून अशांत क्षेत्रों में सेना को विशेषाधिकार देता है ताकि चरमपंथी संगठनों के खिलाफ प्रभावशाली तरीके से कार्रवाई की जा सके. अफसपा के लागू होने के बाद पूरे पूर्वोत्तर भारत में फर्जी मुठभेड़, बलात्कार, लूट एवं हत्या जैसी घटनाओं की बाढ़ आ गई. जब 1958 में अफसपा बना था तब यह कानून राज्य सरकार के अधीन था, लेकिन साल 1972 में इस कानून में हुए संशोधन के बाद इसे केंद्र सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. संशोधन के मुताबिक देश के किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र (डिस्टर्ब एरिया) घोषित कर वहां अफसपा लागू किया जा सकता है. इस कानून के खिलाफ कई लोग समय-समय पर विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं. मणिपुर की आयरन लेडी के नाम से विख्यात इरोम शर्मिला पिछले 15 वर्षों से इस कानून को खत्म करने के खिलाफ आमरण अनशन कर रही हैं. ग़ौरतलब है कि जीवन रेड्‌डी समिति ने भी सरकार को यह संकेत दिया था कि यह क़ानून दोषपूर्ण है और इसमें संशोधन की ज़रूरत है. लेकिन उपरोक्त घटनाओं में कमी होने के बजाए इनमें इज़ाफा हो रहा है ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि पूर्वोत्तर राज्यों से अफसपा हटाना कितना जायज होगा. हालांकि, लोग अफसपा के खिलाफ तो हैं, लेकिन चरमपंथी संगठनों द्वारा लगातार पूर्वोत्तर सेना और अर्ध-सैन्य बलों के खिलाफ हो रहे हमले को देखकर केंद्र सरकार द्वारा अफसपा लगाने का निर्णय तार्किक लगता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना एक्ट ईस्ट पॉलिसी के  तहत मणिपुर की 84 किमी लंबी जिरिबाम-तुपुल रेलवे लाइन का काम भी इन चरमपंथी संगठनों के  विरोध की वजह से निर्धारित समय से पीछे चल रहा है. इस रेलवे लाइन के निर्माण में छह बड़े पुल,  112 छोटे पुल, तीन सड़क ओवरब्रिज का बनने हैं. पहले चरण में 39,401 मीटर लंबी 34 सुरंगें बनानी हैं. इस कार्य को साल 2016 के अंत तक पूर्ण होना था. केंद्र सरकार इस नीति के तहत दक्षिण-पूर्व और पूर्व-एशिया की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का कार्य कर रहा है. नगा चरमपंथी गुट जेलियांगरोंग यूनाइटेड फ्रंट (जेडयूएफ) ने कई सप्ताह तक निर्माण कार्य को बाधित रखा. साथ ही इस रेल योजना के प्रोजेक्ट मैनेजर का इस साल जनवरी में अपहरण कर लिया गया था. इसके अलावा भी अन्य कई संगठन हैं जो इस योजना के कार्य को बाधित कर रहे हैं. राज्य सरकार भी सुरक्षा के नाम पर कुछ कर नहीं पा रही है. जेडयूएफ के पीछे नगा चरमपंथी गुट एनएससीएन (आईएम) मदद कर रहा है. एनएससीएन (आईएम) की केंद्र सरकार के साथ वार्ता चल रही है. बावजूद इसके वह जेडयूएफ के साथ मिलकर राष्ट्रीय राजमार्ग-37 में दिनदहाड़े लूटपाट की घटना को अंजाम दे रहा है. बहरहाल, सरकारी आंकड़े तो यह बताते हैं कि पूर्वोत्तर भारत के चरमपंथी गुट शांति की तरफ लौट रहे हैं. बावजूद इस तरह की घटनाओं पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है.

शांति प्रक्रिया की स्थिति क्या है
  • असम 
  • यूपीडीएस (यूनाइटेड पीपुल्स डेमोक्रेटिक सोलिडैरिटी) के साथ 25 सितंबर 2011 को शांति समझौता हुआ था जो बाद में टूट गया. 
  • डीएचडी (डिमा हालामडाउगाह) के साथ 8 अक्टूबर 2012 को समझौता हुआ था. फिलहाल, भंग हो चुका है. 
  • उल्फा के साथ वार्ता जारी है. 
  • कार्बीलोंगरी एनसी हिल्स लिबरेशन फ्रंट (केएलएनएलएफ) की सरकार के साथ वार्ता जारी है.
  • मेघालय 
  • प एएनवीसी (अचिक नेशनल वोलंटीयर काउंसिल) का केंद्र और राज्य सरकार के साथ शांति समझौता 24 सितंबर 2014 को हुआ था जो टूट चुका है.
  • मणिपुर
  • केएनओ (कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन) के साथ शांति समझौता अगस्त 2008 को हुआ था जो 21 जुलाई 2016 तक वैध है. 
  • 19 भूमिगत संगठनों के साथ समझौता 13 फरवरी 2013 को हुआ था. यूपीपीके के 80काडरों ने आत्मसमर्पण कर दिया था और समझौता ज्ञापन पर 24 मई 2013 को हस्ताक्षर हुआ था. 1 जनवरी से 31 दिसंबर 2014 के अंदर 593 भूमिगत लोगों ने आत्मसमर्पण किया गया.
  • नगालैंड
  • एनएससीएन (खोले-कितोवी) और एनएससीएन (रिफॉर्मेशन) के साथ संघर्ष विराम समझौता हुआ था जो कि 27 अप्रैल 2016 तक वैध है. एनएससीएन (आईएम) ने अनिश्चितकालीन संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए.
  • त्रिपुरा
  • एनएलएफटी (बी) के नेताओं के साथ त्रिपुरा में शांति बहाली के लिए वार्ता प्रगति पर है.