यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday 23 February 2013

भारी पड़ सकती है पूर्वोत्‍तर की अनदेखी


आम तौर पर चुनावों से जुड़ी हर छोटी-बडी खबर अनायास सुर्खियों में जगह बना लेती है, पर इस बार पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के चुनाव इसका अपवाद नजर आ रहे हैं. हमारे विद्वान विश्‍लेषक मित्र हमें यह समझाने का प्रयास करते रहे हैं कि यह तर्कसंगत है, क्‍योंकि आखिर लोकसभा में इस इलाके से पहुंचने वाले सांसदों की संख्‍या नगण्‍य है. केवल असम की बात इस संदर्भ में भिन्‍न है और वहां चुनाव नहीं हो रहे. यह दलील हमारे गले के नीचे नहीं उतर रही. क्‍या देश की सामरिक सुरक्षा के संबंध में अति संवेदनशील माने जाने वाले इन सीमांती प्रदेशों के प्रति ऐसी उदासीनता उपेक्षा बुद्धिमानी है? क्‍या जनतंत्र का अर्थ हमारे लिए मात्र लोकसभा का बहुमत बचा रहा है जो अल्‍पमत वाली साझा सरकार के जीवन-मरण का प्रश्‍न है? क्‍या राष्‍ट्रपति की एकमात्र कसौटी यही है? अब तक कुल जमा एक छोटी-सी खबर पढने को मिली है कि इस बार त्रिपुरा में रिकार्ड 93 फीसद मतदान हुआ है और इसका मतलब हे कि मार्क्‍सवादियों को संभवत: चौथी बार सरकार बनाने का मौका मिल जाएगा. इसके साथ ही राहुल गांधी के चुनाव अभियान के चिरपरिचित बडबोलेपन का चलते-चलते उल्‍लेख था कि उन्‍होंने हुंकार भरते दिलेरी से यह ऐलान किया है – इस बार वामपंथ को त्रिपुरा से कांग्रेस वैसे ही बाहर खदेड देगी जैसे उसने पिछले चुनावों में केरल तथा पश्‍चिम बंगाल से कर दिया. कांग्रेस के नव-नियुक्‍त उपाध्‍यक्ष के बारे में किसी को यह भ्रम नहीं कि उन्‍हें इस महान देश के इतिहास या समाज के बारे में सार्थक जानकारी है. हां, अपने पुरखों का आजादी की लडाई और स्‍वाधीनता प्राप्ति के बाद राष्‍ट्रनिर्माण में योगदान वह सदा सर्वत्र याद दिलाते रहते हैं.

इसके अलावा उनका भाषण तैयार करवाने वाले सलाहकार केंद्र से भेजे धन के अपव्‍यय का आरोप उस सूबे पर लगाने पर जोर देते हैं, जहां गैरकांग्रेसी सरकार का राज हो. इस रणनीति का दिवालियापन अब तक कई जगह जाहिर हो चुका है और जहां तक मार्क्‍सवादियों को धूल चटाने की बात है, पश्चिम बंगाल में यह कमाल ममता ने कर दिखाया था, कांग्रेस के आलाकमान ने नहीं। केरल का हाल सबके सामने है, जहां एक के बाद दूसरा कांग्रेसी दिग्‍गज धराशायी होता जा रहा है. जघन्‍य अपराधों के आरोपों के कटघरे में खडे कांग्रेसी नेतागण यह आशा नहीं जगाते कि वे विपक्षियों को पटखनी देने की हालत में हैं. बहरहाल मेघालय के बारे में दिल्‍ली में बैठे हाकिम यह सोचते हैं कि वहां कोई चुनौती नहीं है. कांग्रेस ने अपनी जीत का पुख्‍ता इंतजाम कर लिया है; हालांकि पूर्व लोकसभा अध्‍यक्ष पीए संगमा को अब भी गारो बिरादरी में पिटी गोट नहीं समझा जा सकता. उनकी पुत्री को भले ही केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया है, लेकिन उनके पुत्र मेघालय में खासे ताकतवर समझे जाते हैं. साधन-संपन्‍न यह परिवार कांग्रेसी अरमानों पर पानी फेर सकता है. इस सब से कहीं अधिक महत्‍वपूर्ण बात इस राज्‍य की बिगडती शांति तथा सुव्‍यवस्‍था है. खासी तथा जैंतिया पहाडियां शांत हैं, पर गारो इलाके में अलगाववादी हिंसा निरंतर चिंताजनक रूप से बढी है. उपद्रवी बाहुबलियों का इस्‍तेमाल सभी राजनेता खतरनाक तरीके से करते रहे हैं.

चुनावी हार-जीत के बाद इन पर अंकुश लगाना किसी के लिए भी असंभव रहेगा. बांग्‍लादेश से आए नाजायज शरणार्थियों की समस्‍या यहां आज भले त्रिपुरा या असम जैसी विकट न हो, पर राज्‍य के कई इलाकों में देशी-विदेशी आगंतुक अल्‍पसंख्‍यकों ने आबादी का मूल स्‍वरूप बदल सामाजिक तनावों को जन्‍म दिया है तथा राजनीतिक अस्थिरता को विस्‍फोटक बना दिया है. कोयले की खदानों के लालची दोहन ने पर्यावरण के लिए भीषण संकट खडा कर दिया है.
बहुत कम लोगों को इस बात का अहसास है कि मेघालय की सरहद बांग्‍लादेश से सटी है. वहां की उथल-पुथल उसे प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती. पर हमारे आकाओं को लगता है कि अगर उनको समर्थन देने वाला कोई कुनबापरस्‍त कबाइली नेता मुख्‍यमंत्री पद संभालता है तो उनकी दया से सब ठीकठाक है. चुनाव के बाद जो कुछ जनता पर गुजरती है या देश को इस जनतांत्रिक सौदेबाजी से जो नुकसान होता है, उसकी फिक्र किसी को नहीं. असम इस अदूरदर्शिता का दुर्भाग्‍यपूर्ण उदाहरण है. गोगोई ने भले ही अपना राज्‍य कांग्रेस की झोली में डाल दिया, पर वहां हालात सुधरे नहीं, बिगडे ही हैं. कभी चाय, तेल, इमारती लकडी जैसे संसाधनों से समृद्ध यह राज्‍य आज केंद्रीय सहायता-अनुदान का भी सदुपयोग नहीं कर पा रहा. जनजातीय तथा सांप्रदायिक हिंसा को घटाने में सरकार नाकामयाब रही है. केंद्र लाख लीपापोती की कोशिश करे, यह बात छिपाई नहीं जा सकती कि पूर्वोत्‍तर का सबसे बडा सूबा लाइलाज मरीज बनता जा रहा है. चुनाव में जीतने के बाद उसकी तरु नजर डालने की जरूरत न सरकार को है, न प्रतिपक्ष को.

मणिपुर भी तभी चर्चित-विवादास्‍पद होता है जब वहां मानवाधिकारों के बर्बर उल्‍लंघन का मुद्दा उछलता है या तस्‍करी अथवा एड्स जैसी महामारी के संक्रमण का जोखिम परेशान करता है. सेना के कानूनी कवच अफसपा को समाप्‍त करने की मांग की अनसुनी को लेकर इस सूबे में जनाक्रोश दशकों से है. पर इस विषय में सार्वजनिक बहस हमेशा कश्‍मीर तक सिमट जाती है. मणिपुर के लोग इस दोहरे मानदंड से भी पीडित है. विडंबना यह है कि इस राज्‍य में जहां हिंदू संस्‍कार सबसे गहरा रहा है, अलगाववाद भी सबसे अधिक दिखाई देता है. आतंकवादी-अलगाववादियों और भ्रष्‍टाचारी अफसरों तथा अपराधियों के गठजोड में अंतर करना कठिन होता जा रहा है. मणिपुर भी सांप्रदायिक तनाव से मुक्त नहीं. नागा कूकी तथा मैतेई समुदायों का ऐतिहासिक वैमनस्‍य बरकरार है. चुनाव के वक्‍त जो वादा नगाओं से किया जाता है, उसे निभाने की पेशकश करते ही मणिपुर खौलने लगता है. यह रेखांकित करना आवश्‍यक है कि मणिपुर का पडोसी म्‍यांमार से आत्‍मीय रिश्‍ता है. भारत सरकार इसे अनदेखा नहीं कर सकती. सीमापार कर शरण लेने की सुविधा उपद्रवी तत्‍वों को निर्भय बनाती है. पूर्वोत्‍तर राज्‍यों की इन आंतरिक दरारों को अनदेखा करने के दुष्‍परिणाम सामने आ चुके हैं, पर समाधान की चिंता किसी को नहीं. बस किसी भी तरह अपना दल या आदमी तख्‍तनशीं हो जाए. इस परिणाम को सुनिश्चित करने के सिलसिले में जो कुछ किया जाता है, वहीं आत्‍मघातक भ्रष्‍टाचार को पनपाता रहा है. निरापद रहने एवं केंद्र से मुंहमांगी घूस पाने के लिए पूरी सरकार ही दल-बदल कर लेती है. पूरे पूर्वोत्‍तर में ईसाई मिशनरी सक्रिय रहे हैं. असम को छोड एक सदी में ही धर्म प्रवर्तन से उन्‍होंने कबाइली आबादी का संस्‍कार बदल दिया है. अपनी जन्‍मभूमि में बहुसंख्‍यक होने के बावजूद अल्‍पसंख्‍यकों को संरक्षण प्रदान करने वाली व्‍यवस्‍था का राजनीतिक लाभ नेता बखूबी उठाते रहे हैं. जो आलोचक पूर्वोत्‍तर की सामरिक संवेदनशीलता के नाम पर चुप हो जाते हैं अथवा भारत की सांस्‍कृतिक बहुलता-विविधता के हिमायती होने की वजह से सब कछ बर्दाश्‍त कर लेते हैं, उन सबको यह याद रखना चाहिए कि इस आचरण से वे पूर्वोत्‍तर का और देश का अहित ही कर रहे हैं. चुनाव से इतर भी इस दिशा में हर जिम्‍मेदार नागरिक की पैनी नजर रहनी चाहिए. 

-पुष्‍पेश पंत