यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Wednesday 26 October 2016

आदिवासियों का हक छीनने का कुचक्र

मणिपुर विश्‍वविद्यालय आरक्षण मुद्दा
देश के अन्य हिस्सों की तरह आरक्षण का मुद्दा अब पूर्वोत्तर भारत में भी उठने लगा है. हाल में मणिपुर विश्‍वविद्यालय में आरक्षण को लेकर एक तनावपूर्ण स्थिति बनी है. उपद्रवियों ने विश्‍वविद्यालय के रिक्रिएशन हॉल, तीन डीटीपी हॉल और कैंटीन को जला दिया है. मणिपुर विश्‍वविद्यालय ट्राइवल स्टूडेंट्स यूनियन की मांग है कि आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के नॉर्म्स द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रिजर्वेशन इन एडमिशन) एमेंडमेंट एक्ट 2012 लागू हों. राज्य सरकार के नॉर्म्स के अनुसार एसटी को 31 प्रतिशत, एससी को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 17 प्रतिशत आरक्षण मिला है, लेकिन विश्‍वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मणिपुर यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल चुका है, इसलिए यूजीसी के आरक्षण नॉर्म्स द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रिजर्वेशन इन एडमिशन) एक्ट 2006 के हिसाब से होने चाहिए. यूजीसी नॉर्म्स के अनुसारएसटी को 7.5 प्रतिशत, एससी को 15 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत का आरक्षण मिलता है. प्रशासन के इस निर्णय को लेकर ट्राइवल स्टूडेंट्स ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है. यूनिवर्सिटी का नया सत्र इस विरोध-प्रदर्शन की भेंट चढ़ गया. नया सत्र जून में शुरू होना था, जो अब तक शुरू नहीं हो सका है. यहां तक कि पिछली परीक्षाओं का परिणाम भी अभी तक घोषित नहीं किया गया है.

पुलिस प्रशासन ने भी तत्परता दिखाते हुए विश्‍वविद्यालय के कुछ हिस्सों को जलाने के मामले में 18 छात्रों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है. इसके बाद मणिपुर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट् यूनियन पकड़े गए छात्रों को जल्द से जल्द छोड़ने की मांग कर रही है. वहीं विश्‍वविद्यालय में आगजनी की घटना के बाद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर इन चार्ज प्रोफेसर एम धनेश्‍वर ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को इस्तीफा सौंप दिया है. प्रोफेसर धनेश्‍वर को पूर्व वाइस चांसलर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कुछ समय के लिए प्रभार सौंपा गया था, लेकिन यूनिवर्सिटी में अशांत माहौल व शैक्षणिक वातावरण में सुधार नहीं होने के कारण उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा. 

गौरतलब है कि मणिपुर विश्‍वविद्यालय की स्थापना 5 जून 1980 को हुई थी. तबसे विश्‍वविद्यालय में नामांकन व टीचिंग और नन टीचिंग स्टाफ की नौकरी में आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के नॉर्म्स ही चले आ रहे थे. 13 अक्टूबर 2005 को मणिपुर यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलने के बाद से यानी 2006-07 के सत्र से यहां सेंट्रल यूनिवर्सिटी का नॉॅर्म्स शुरू होना था. फिर भी विश्‍वविद्यालय प्रशासन कुछ समय तक राज्य सरकार के आरक्षण नॉर्म्स का ही पालन करता रहा. दो साल गुजर जाने के बाद 2008-09 में यहां सेंट्रल का आरक्षण नॉर्म्स चलाना शुरू किया गया था. इसी समय से ट्राइवल स्टूडेंट्स ने विरोध शुरू किया था, जो अबतक जारी है. फिर 2012 में बिल एमेंडमेंड हुआ. द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एमेंडमेंट एक्ट 2012 को 2012 से लेकर 2015 तक विश्‍वविद्यालय में चलाया जा चुका है. ट्राइवल स्टूडेंट्स ने इस मामले को लेकर कोर्ट की शरण ली.  इस मामले में कोर्ट ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को यह सुझाव दिया कि दोनों एक्ट में से जो उचित लगे, उसे चलाया जाए. इसके बाद विवि प्रशासन ने 4 अप्रैल 2016 को ऐलान किया कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी के नॉर्म्स ही फिर से विश्‍वविद्यालय के 2016-2017 एडमिशन में लागू होंगे. इस निर्णय से नाखुश मणिपुर यूनिवर्सिटी ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया.

ट्राइवल स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बोस्को जायचे खरम ने कहा कि जो आरक्षण के नियम चलाए जा रहे थे, उसे छोड़कर दूसरा नियम तत्काल लागू करना छात्रों को मंजूर नहीं है. उन्होंने कहा कि हम लोग जो चीज नहीं है, उसकी मांग नहीं कर रहे हैं. जो नियम था, उसी को बरकरार रखने की मांग कर रहे हैं. हमारी मांग केवल गु्रप सी और डी में ही इस नियम को लागू करवाने की है. 23 मार्च 2016 को यूजीसी की तरफ से एक सख्त निर्देश विश्‍वविद्यालय प्रशासन को दिए गए थे. इसके कुछ दिनों बाद रिजर्वेशन के नियम बदल देना ट्राइवल स्टूडेंट्स की उपेक्षा करना है. खरम ने कहा कि अगर सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनकर भी छात्रों को उनका उचित हक नहीं मिल रहा है, तो राज्य के विवि रहना ही ज्यादा अच्छा है. उन्होंने कहा कि 2012 के एमेंडमेंड बिल लागू होने के बावजूद ट्राइवल स्टूडेंट्स की उपेक्षा होती रही. ऐसे में 2006 वाला कानून अगर लागू होगा, तो हम लोगों के यहां पढ़ाई करने का कोई मतलब नहीं है. इसलिए ट्राइवल छात्रों ने विश्‍वविद्यालय का छात्रावास 10 अक्टूबर को छोड़ दिया. जो बाकी छात्र बचे रह गए उन्होंने भी कक्षा के बहिष्कार करने का एलान किया. मुत्सू (मणिपुर ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन) ने चेतावनी दी है कि विवि प्रशासन ने अगर अपने निर्णय वापस नहीं लिए तो यूनिवर्सिटी के बाहर भी विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे.
दूसरी तरफ, मुसू ( मणिपुर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन) के अध्यक्ष ओइनाम प्रेमसागर ने मांग की है कि विवि में अशांति के माहौल को तत्काल खत्म किया जाए. साथ में यह भी मांग की कि जो प्रशासन ने निर्णय लिया है, उसे जल्द चालू कराकर प्रवेश प्रक्रिया शुरू की जाए. मुसू छात्रों की एक सामूहिक संस्था है, जिसमें ट्राइवल छात्र (ईसाई धर्म मानने वाले), हिंदू (जो जनरल कैटेगरी के हैं) एवं मुसलमान छात्र भी शामिल हैं. लेकिन मुत्सू (मणिपुर ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन) केवल ट्राइवल छात्रों का संगठन है, जो एसटी में आता है.

मणिपुर युनिवर्सिटी का आरक्षण मुद्दा ट्राइवल और घाटी में रह रहे सभी जातियों (हिंदू, मुसलमान व मैतै), जो एससी और ओबीसी हैं, के बीच संघर्ष का कारण बन सकता है. राज्य में 2011 की जनगणना के अनुसार, मणिपुर की 25 लाख आबादी में से करीब   9 लाख ट्राइवल्स हैं, जो पहाड़ों में रहते हैं, जबकि बाकी हिस्से के लोग घाटी में. मणिपुर में पहले भी पहाड़ बनाम घाटी का विवाद चलता रहा है. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि शहर के कुछ हिस्सों को छोड़कर, बाकी ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मैतै समुदाय के लोग गरीब और पिछड़े हैं. वे अधिकतर ओबीसी में आते हैं. ऐसे में अगर 2006 का कानून विवि में अगर लागू नहीं होगा, तो ट्राइवल स्टूडेंट्स के अलावा बाकी समुदाय के छात्र भी आंदोलन कर सकते हैं. वहीं विश्‍वविद्यालय प्रशासन को इस बात की चिंता सता रही है कि छात्रों के इस विरोध-प्रदर्शन के चक्कर में कहीं यूजीसी ग्रांट न बंद हो जाए. अगर समय रहते विश्‍वविद्यालय प्रशासन व छात्र संगठनों के बीच विवाद को नहीं सुलझा लिया गया, तब आने वाले समय में जातीय व सांप्रदायिक टकराव का रूप ले सकता है. इस मुद्दे पर यूजीसी और राज्य सरकार को पहल कर विश्‍वविद्यालय में आरक्षण मुद्दे का समाधान निकाल लेना चाहिए.

अपनों ने ठुकराया

जेल वार्ड ही बना नया घर
सियासी हलचल तेज़
  
आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) के खिलाफ लंबे समय से इरोम शर्मिला का अनशन समाप्त हो गया. केंद्र सरकार ने सोलह साल के सत्याग्रह का सम्मान न कर निश्‍चित तौर पर लोकतंत्र में अन्याय के खिलाफ अहिंसक संघर्ष की परंपरा को कमजोर किया है. शर्मिला ने मणिपुर के आने वाले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय लड़ने का निर्णय लिया है. शर्मिला के राजनीति में कदम रखने के फैसले से राजनीतिक पार्टियों में भी खलबली मची है. आम आदमी पार्टी ने शर्मिला को अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के लिए ऑफर किया है. शर्मिला ने यह ऑफर अभी स्वीकारा नहीं है. अभी वे इस फैसले पर कायम हैं कि आनेवाले विधानसभा में निर्दलीय चुनाव लड़ेंगी. आम आदमी पार्टी मणिपुर के अध्यक्ष टीएच मणिहार सिंह ने कहा कि शर्मिला सोच-विचार कर आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री कैंडिडेट के रूप में चुनाव लड़ने का निर्णय बताएंगी, हमें उनके फैसले का इंतजार है. आम आदमी पार्टी ने इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भी शर्मिला को चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था.

हालांकि, राजनीति में आने के उनके इस निर्णय से स्थानीय लोग नाखुश हैं. लोगों का कहना है कि शर्मिला की सामाजिक शख्सियत पर उनके निजी फैसले ज्यादा हावी हो गए. लोगों में गुस्सा इस बात पर भी है कि राजनीति में कदम रखने का फैसला लेने से पहले उन्होंने लोगों से बातचीत नहीं की. शर्मिला के करीबियों को भी यह पता नहीं था कि वे क्या कदम उठाने वाली हैं? शर्मिला की मां और भाई भी उनके इस निर्णय से खुश नहीं हैं. उनके भाई सिंगजीत ने शर्मिला को चिट्ठी लिखकर उनके फैसले का विरोध किया.

विडंबना है कि शर्मिला हॉस्पिटल के जिस जेल वार्ड में 16 साल तक रहीं, दोबारा उन्हें वहीं रहना पड़ रहा है. उन्हें रहने के लिए कोई जगह नहीं मिली. जिस मणिपुर के लिए उन्होंने 16 साल तक संघर्ष किया, उन्होंने पनाह तक देने से इनकार कर दिया. उनके समर्थन में कोई भी आगे नहीं आया. शर्मिला के अनशन खत्म करने पर स्थानीय लोगों को लगता है कि उनको मुक्ति की राह दिखाने वाला मसीहा अचानक खुद राह से भटक गया है. उन्हें ऐसा लगता है कि इसके आगे कुछ और नहीं है, अब सब कुछ खत्म हो गया है. शर्मिला के चुनाव लड़ने के निर्णय के बाद प्रदेश की महिलाओं का संगठन शकल (शर्मिला कनबा लूप) ने भी उनके समर्थन में आंदोलन खत्म कर दिया है. शकल के ऑफिस के आगे टांगे बैनर उतार दिए गए हैं. शकल के कन्वेनर सोइबम मोमोन ने कहा कि शर्मिला का निर्णय सुनने के बाद यह संगठन भंग कर दिया गया है. आगे शकल इस ऑफिस में अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर अफस्पा के विरोध में आंदोलन जारी रखेगा. मोमोन ने आगे कहा कि राजनीति और सामाजिक आंदोलन एक साथ नहीं चल सकते हैं इसलिए हमने शर्मिला से अलग होने का निर्णय लिया है.
इतने लंबे अनशन के बाद शर्मिला अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में जिस तरह से विफल रहीं और अपने समाज में ही अलग-थलग पड़ गई हैं, वह स्थिति चिंताजनक है. दूसरी तरफ शर्मिला को मणिपुर के लोग एक देवी स्वरूप देखने लगे थे कि जैसे शर्मिला उनकी समस्या का समाधान चंद दिनों में कर देंगी. मणिपुर के उग्रवादी संगठनों ने शर्मिला को धमकी तक दे दी. शर्मिला के करीबी इससे भी नाराज हैं कि उन्होंने ब्रिटिश मूल के डेसमंड कोतिन्हो से शादी करने का फैसला किया है. दूसरा आरोप यह भी है कि सरकार ने उन्हें जेल में लैपटॉप देकर और उनसे वार्ताएं कर मणिपुर के लोगों के मन में संदेह पैदा कर दिया है. मणिपुर के लोग नहीं चाहते थे कि अफस्पा हटे बिना उनका अनशन टूटे.

दूसरी तरफ ऑर्गेनाइजेशन फॉर इंडियन विमेन अगेन्स्ट क्राइम की फाउंडर सेक्रेटरी अराम्बम रोबिता ने शर्मिला के बदले में अफस्पा के खिलाफ आमरण अनशन करने का ऐलान किया है. 32 वर्षीय रोबिता दो बच्ची की मां हैं. सामाजिक संगठनों ने उनको अनशन करने से रोकने का प्रयास किया कि उनके छोटी-छोटी बच्चियों के लिए यह कदम उचित नहीं होगा.  हालांकि, रोबिता का अनशन कहां तक चलेगा, यह कहना अभी जल्दी होगी.


शर्मिला ने सत्याग्रह के हथियार का अधिकतम उपयोग कर  दुनिया में यह साबित कर दिया कि किसी संकल्पवान व्यक्ति और विशेषकर स्त्री का आत्मबल कितना प्रबल होता है और राज्य की प्रचंड शक्ति के आगे भी किस हद तक टिका रहा जा सकता है. अब देखना यह है कि अगर मणिपुरी समाज उनके साथ नहीं खड़ा होगा तो उनके साथ सरकार और शेष भारत के लोगों की सहानुभूति का क्या मतलब होगा?

अनशन खत्‍म, संघर्ष जारी

लोकतंत्र में जब कोई व्यक्ति व्यवस्था से हताश निराश हो जाता है, तो उसके पास बहुत सीमित विकल्प होते हैं. वह अपनी मांगों को लेकर धरना, भूख हड़ताल या सत्याग्रह करता है, लेकिन क्या इसके बावजूद उसे न्याय मिल पाता है? देश की लोकतांत्रिक सरकार ने 16 वर्षों से भूख हड़ताल कर रही इरोम शर्मिला की मांगें नहीं सुनीं. इन 16 सालों में सरकार ने शर्मिला से बात करने की जरूरत भी नहीं समझी. अब शर्मिला भूख हड़ताल छोड़कर चुनाव लड़ेंगी. ऐसे में इस देश में किसी अहिंसक आंदोलन का कितना महत्व रह जाएगा? इरोम राजनीति के जरिए कितना बदलाव ला पाएंगी, ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो आम जन को भीतर तक कुरेद रहे हैं.

आयरन लेडी के नाम से चर्चित इरोम शर्मिला ने 9 अगस्त को 16 साल से जारी अनशन तोड़ दिया. जेल से छूटने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि लोग उनको संत या देवी मान बैठे हैं, जबकि मैं एक सामान्य महिला हूं. इरोम को लगता है कि लोग उनको शहीद होना देखना चाहते हैं इसलिए वे उनके आंदोलन के तरीके बदलने से इत्तेफाक नहीं रखते. शर्मिला मणिपुर की मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं ताकि अफस्पा के मुद्दे को जिंदा रखा जा सके. उनका मानना है कि लोग राजनीति से घृणा करते हैं, लेकिन समाज में भी तो गंदगी है. उन्होंने कहा कि अगर 20 निर्दलीय प्रतिनिधि उनके साथ आएं तो वे चुनाव के बाद सीएम इबोबी की सत्ता पलट सकती हैं. उनका आंदोलन जारी है, वे कभी पीछे नहीं हटेंगी. शर्मिला मणिपुर से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट-1958 (अफस्पा) हटाने की मांग कर रही थीं. 2017 को राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में शर्मिला निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मुख्यमंत्री इबोबी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगी. राज्य के लोग उनके इस कदम का विरोध कर रहे हैं. भूमिगत संगठनों ने भी शर्मिला को चिट्ठी लिखकर इसका विरोध किया है. हर वर्ग से विरोध की आवाज उठी. गौरतलब है कि शर्मिला ने 2 नवंबर 2000 से भूख हड़ताल शुरू किया था, जब इंफाल से नौ किलोमीटर दूर मालोम में असम रायफल्स के जवानों ने 10 लोगों को मार गिराया था. उनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे.

शर्मिला का मानना है कि वे अनशन से बदलाव नहीं ला पाईं. इन 16 सालों में उनके संघर्ष से सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. अब वे एक नए तरीके से संघर्ष करेंगी. उन्होंने कहा कि संघर्ष वही है, केवल रणनीति बदला है. शर्मिला को इस बात का अफसोस है कि मणिपुर में हुई एक फर्जी मुठभेड़ में शामिल हेड कांस्टेबल हेरोजीत द्वारा कोर्ट के सामने अपनी गलती माने जाने के बाद भी प्रदेश की जनता चुप है. हेरोजीत ने कोर्ट के सामने कहा था कि अधिकारियों के ऑर्डर पर ही उन्होंने गोली मारी थी. इसके बाद अफस्पा के विरोध में चारों तरफ से आवाज उठनी चाहिए थी. उन्हें सबसे ज्यादा निराश इस बात से है कि इस आंदोलन में वे अकेली पड़ गई हैं. उनका मानना है कि जबतक लोग जनता के सच्चे प्रतिनिधि नहीं चुनेंगे, तबतक समाज में बदलाव नहीं आएगा. इसलिए उन्होंने अफस्पा को मुद्दा बनाकर निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. उन्होंने खुराई विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने और गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की इच्छा जाहिर की. शर्मिला किसी राजनीतिक पार्टी का मुखौटा नहीं बनना चाहतीं. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने उन्हें पहले भी चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था.
शर्मिला अफस्पा विरोधी संघर्ष की नायिका रही हैं. 16 साल की भूख हड़ताल से शर्मिला ने मानवाधिकार हनन को चर्चा के केंद्र में ला दिया. ये 16 साल भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं. ये उन्हीं के प्रयासों की जीत है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1500 फर्जी मुठभेड़ मामले में संतोष हेगड़े कमेटी का गठन किया था. हालांकि, ये अलग बात है कि स्थानीय राजनीतिक पार्टियों ने उनका कभी समर्थन नहीं किया. शर्मिला के इस घोषणा से मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह और उनकी सरकार को सबसे ज्यादा राहत मिला है. अगर इन 16 सालों में शर्मिला को जेल वार्ड में कुछ हो जाता तो शायद मणिपुर को संभालना मुश्किल था. सरकार ने इन 16 सालों में शर्मिला को जिंदा रखने के लिए न जाने कितने पैसे खर्च किए? सरकार में शर्मिला को लेकर सपोर्ट कम दबाव ज्यादा था. शर्मिला के इस मौन अनशन के कारण ही इंफाल म्युनिसिपल एरिया से अफस्पा हटाना पड़ा था.
इन 16 सालों में शर्मिला के समर्थन और अफस्पा के विरोध में कई जन संगठन तो बन गए, फिर भी यह जनांदोलन का रूप नहीं ले सका. शर्मिला के इस संघर्ष में कोई सांगठनिक ताकत नहीं है. वे हॉस्पिटल जेल के एक वार्ड में बैठकर चुपचाप अनशन करती रहीं. जब महात्मा गांधी ने अनशन किया था, तो उनके पीछे पूरे देश की ताकत थी. लेकिन शर्मिला के इस अनशन के साथ न तो शुरू में कोई संगठन था और न ही अब है. शुरू में छात्र संगठन भी उनके अनशन में शामिल होने से कतराते थे. 2004 के बाद शर्मिला के अनशन पर लोगों का समर्थन मिलने लगा. तबतक ग्वांजू ह्यूमन राइट्स एवार्ड एवं रवींद्रनाथ टैगोर पीस अवॉर्ड शर्मिला को मिल चुका था. इसी दौरान शर्मिला को एक विदेशी युवक से प्यार हुआ, तब लोगों में इसे लेकर विरोध और गुस्सा था. इस बात पर मणिपुर की ईमा यानी महिलाओं से भी शर्मिला के मतभेद हो गए थे. उनके इस निजी फैसले से लोग आहत थे. शर्मिला एक साधारण महिला की तरह इस आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहती थीं. शर्मिला अपने आपको आंदोलन का नेता मानने से इनकार करती रहीं. शर्मिला के मना करने की वजह से फेस्टिवल ऑफ होप जस्टिस एंड पीस कैंपेन आगे नहीं बढ़ सका. यही कारण है कि शर्मिला से प्यार और समर्थन करने के बाद भी यह आंदोलन, एक राजनीतिक आंदोलन में नहीं बदल सका. 

ऐसे में शर्मिला अगर राजनीति में आईं तो उनको राजनीति की सच्चाइयों से रूबरू होना पड़ेगा. एक तरफ शर्मिला का निजी फैसला शादी व चुनाव लड़ना है, दूसरी तरफ सेना है. सेना हमेशा से अफस्पा के समर्थन में है. सेना की मर्जी के खिलाफ सरकार भी अफस्पा हटा नहीं सकती है. चुनाव के मैदान में शर्मिला कितनी सफल होंगी या अपनी मांग को लेकर कितना आगे जा पाएंगी यह अभी से कहना मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि उनके लिए राजनीति की डगर इतनी आसान नहीं होगी. वे किसी राजनीतिक पार्टी की प्रतिनिधि नहीं हैं, वे अकेली निर्दलीय चुनाव लड़ेंगी. वे चुनाव में जीत-हार का सामना तो करेंगी ही, लेकिन उनकी दूसरी चुनौती यह होगी कि वे अफस्पा के मुद्दे को विधानसभा में जोरदार तरीके से उठा पाती हैं या नहीं. इससे पूर्व नगालैंड विधानसभा ने अफस्पा हटाने का फैसला सर्वसम्मति से पास कर दिया था, लेकिन केंद्र सरकार ने नगालैंड सदन के फैसले को मंजूर नहीं किया. ऐसे में शर्मिला के राजनीति में आने का फैसला कितना कारगर होगा, इस पर लोगों की नजर टिकी है.

राज्य की ईमानदार कोशिश से ही हटेगा अफस्पा

लोकसभा सांसद सीएन जयदेवान के एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि मणिपुर में अफस्पा राज्य सरकार की वजह से लागू है. मणिपुर को अशांत क्षेत्र (डिस्टर्ब एरिया) की घोषणा राज्य सरकार ने ही की है. अफस्पा के मुद्दे पर राज्य सरकार समय-समय पर सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर समीक्षा करती है. गृह राज्य मंत्री के इस बयान के बाद जनता ने सोशल मीडिया पर एक अभियान छ़ेड दिया. उन्होंने मांग रखी कि मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को इस मामले में अहम निर्णय लेना चाहिए. फिर भी अभी तक सरकार की तरफ से कोई बयान नहीं आया है. त्रिपुरा जैसे राज्य में मजबूत स्थानीय सरकार की वजह से मई 2015 को अफस्पा हटा लिया गया था. राज्य में कानून-व्यवस्था दुरुस्त होने पर राज्य सरकार ने अफस्पा हटाने का निर्णय लिया था. लेकिन नगालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और मेघालय की अशांत स्थिति को देखकर वहां अब भी अफस्पा लागू है. नगालैंड विधानसभा ने सर्व-सम्मति से फैसला लेकर अफस्पा हटाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, फिर भी केंद्र सरकार ने इसे खारिज कर दिया था. नगालैंड डिस्टर्ब एरिया घोषित है. नगालैंड में एनएससीएन (आईएम) के साथ केंद्र सरकार से वार्ता चल रही है इसलिए वहां का राजनीतिक परिदृश्य अलग है. मणिपुर में भी 16 वर्षों से इरोम शर्मिला यह मांग करती रही है. लेकिन राज्य सरकार ने इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं ली. यह सच है कि राज्य की कानून-व्यवस्था के मद्देनजर केंद्र सरकार अफस्पा को लेकर राज्य सरकार के फैसले पर हस्तक्षेप कर सकती है. केंद्र की स्वीकृति के बिना किसी भी राज्य से अफस्पा हटाना संभव नहीं है.


आखिर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के इस बयान सेे पूरी तरह से इनकार भी नहीं किया जा सकता. मणिपुर राज्य सरकार ने लापरवाही जरूर बरती है. इतने लंबे समय से अफस्पा को लेकर लोग मर रहे हैं, कई अप्रिय हिंसा हुई, 2004 में असम रायफल्स के जवानों ने थांगजम मनोरमा से दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी, 2004 में ही मनोरमा की हत्या के खिलाफ पेबम चितरंजन ने अपने ऊपर तेल छिड़ककर आग लगाकर आत्महत्या कर ली. असम रायफल्स के गेट पर मणिपुर की महिलाओं ने नंगा प्रदर्शन किया. बैनर में लिखा था कि इंडियन आर्मी रेप अस. यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक काला अध्याय था. इतना सब होने के बाद भी राज्य सरकार 16 साल से मौन है. ऐसे में किरण रिजिजू का बयान गलत नहीं है. हो सकता है चुनाव के मद्देनजर यहां की जनता इसे एक राजनीतिक बयानबाजी माने. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि केवल सिविल ऑर्गेनाइजेशन्स और शर्मिला के चिल्लाने भर से केंद्र सरकार भला क्या करेगी? केंद्र सरकार कितनी मदद करती है यह तो राज्य सरकार की ईमानदार कोशिश पर निर्भर है.

ऐसे समझौते का क्या मतलब!

हाल में एक खबर सोशल मीडिया पर छाई रही कि केंद्र सरकार और नगा विद्रोही गुट नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के बीच एक समझौता हुआ है. इसके तहत केंद्र सरकार ने नगालैंड के लिए अलग झंडा और अलग पासपोर्ट की मांग स्वीकार कर ली है. पूर्वोत्तर से इतर देश की मुख्य मीडिया में इस खबर को प्रमुखता नहीं दी गई. नतीजतन, इस मुद्दे पर एक सप्ताह तक अफवाहों का बाजार गर्म रहा. इसके बाद केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने एक ट्वीट कर इतना भर कहा कि यह खबर गलत है. ऐसी कोई भी मांग सरकार ने नहीं स्वीकार की है. लेकिन इन दौरान केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई आधिकारिक बयान (प्रेस रीलिज के तौर पर न कि ट्वीट के तौर पर) नहीं आया, जो इन अफवाहों पर विराम लगा सके. बहरहाल, हम यहां पूर्वोत्तर की मीडिया में छपी रिपोर्टों को देखकर यह जानने की कोशिश करते हैं कि दरअसल यह मामला है क्या और इसमें कितनी सच्चाई है?

पिछले 18 जून को पूर्वोत्तर के स्थानीय अखबारों में यह खबर छपी कि भारत सरकार ने नगाओं के लिए अलग पासपोर्ट और ध्वज की मंजूरी दे दी है. मणिपुर का एक स्थानीय अखबार द संगाई एक्सप्रेस ने यह छापा कि मणिपुर के फुंगरैतांग में एक सार्वजनिक बैठक में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-आईएम) के नेता आरएच राइजिंग ने घोषणा की कि नगाओं के लिए अलग पासपोर्ट और ध्वज की अनुमति अब केंद्र सरकार ने दे दी. दूसरी रिपोर्ट द नॉर्थ इस्ट टूडे में लिखा गया है कि भारत सरकार ने नगाओं के लिए अलग पासपार्ट और ध्वज के लिए मंजूरी दे दी है. हालांकि नगालैंड के स्थानीय अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्रों ने इस घटना को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया. स्थानीय अंग्रेजी दैनिक नगालैंड पेज की संपादक टी मोनालिसा का मानना है कि विभिन्न गुटों के कई नेता इस तरह की घोषणाएं समय-समय पर करते रहते हैं. हमारे लिए या स्थानीय लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ी घोषणा नहीं है. उनका मानना है कि जबतक भारत सरकार इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं देती, तबतक विश्‍वास करना गलत है. उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों में आम राय है कि लोगों ने किसी भी गुट को आम लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जनादेश नहीं दिया है.
अब यह खबर सही है या गलत, यह एक अलग विषय है. लेकिन इन खबरों ने कहीं न कहीं समाज में एक अंतर्विरोध तो पैदा किया ही है. एक तरफ मणिपुर में हुई उस सार्वजनिक बैठक में एनएससीएन-आईएम के स्वघोषित गृह मंत्री ने बेझिझक ऐलान किया कि नगाओं के लिए केंद्र सरकार ने अलग पासपोर्ट और ध्वज की मंजूरी दी, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार के मंत्री इस बात से इंकार कर रहे हैं. यह बात आम लोगों में शक पैदा कराता है. अगस्त 2015 की शुरुआत में केंद्र और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (आईएम) के बीच बातचीत शुरू हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताया था. लेकिन अब पूर्वोत्तर के कुछ समाचार पत्रों ने इस समझौते पर सवाल खड़े कर दिए. यह तो तय है कि नगालैंड में शांति समझौते के अनुसार नगा अपना अलग झंडा और पासपोर्ट की मांग रखेंगे. इस बात का खुलासा आश्‍चर्यजनक रूप से समझौता होने के लगभग एक साल बाद हुआ है और केंद्र सरकार ने भी इस पर चुप्पी साध ली है. मुख्यधारा की मीडिया ने भी इस पर कोई समाचार प्रकाशित नहीं किया, जबकि उत्तर पूर्व के स्थानीय समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है.

गौरतलब है कि एनएससीएन-आईएम नगा विद्रोहियों का सबसे बड़ा ग्रुप है, जिसका केंद्र सरकार के साथ संघर्ष विराम चल रहा है. इसी ग्रुप का दूसरा गुट एनएससीएन-के एसएस खपलांग के नेतृत्व में है, जो लगातार हिंसा का रास्ता अपनाए है. जून 2015 को मणिपुर में हुई मुठभेड़ में 18 जवान शहीद हुए थे. इसमेंें भी खपलांग का हाथ था. एनएससीएन-आईएम का मानना है कि नगाओं के लिए अलग ध्वज जरूर होना चाहिए. जम्मू-कश्मीर का अलग ध्वज हो सकता है, तो नगाओं के लिए क्यों नहीं?

इस युद्ध विराम समझौते की नींव 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल के कार्यकाल में पड़ी थी. केंद्र सरकार ने इस समझौते को एक ऐतिहासिक क़दम बताया है और मुइवा भी इससे खुश नज़र आ रहे हैं. मुइवा की मांग एक वृहत नगालैंड की है, जिसमें पड़ोसी राज्य मणिपुर के चार ज़िले, अरुणाचल प्रदेश के दो ज़िले और असम के दो पहाड़ी ज़िले भी शामिल हैं. इस मामले को लेकर तीनों राज्यों में विरोध के स्वर शुरू से उठते रहे हैं. केंद्र सरकार की तरफ से गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने स़िर्फ इतना बताया है कि इस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में पड़ोसी राज्यों का पूरा ख्याल रखा गया है.

एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मुइवा की ग्रेटर नगालैंड की मांग क्या पूरे नगा समुदाय की मांग है? क्या इससे सारे नगा खुश हैं? नगाओं में और भी कई सशस्त्र विद्रोही संगठन हैं. मुइवा का प्रमुख विरोधी गुट है, एनएससीएन (के), जिसकी कमान खपलांग के हाथ में है. इतना ही नहीं, एमएनपीएफ (मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट), जिसकी सशस्त्र शाखा एमएनपीए (मणिपुर नगा पीपुल्स आर्मी) है, का मानना है कि इस समझौते के पीछे केंद्र सरकार का उद्देश्य एनएससीएन (आईएम) के दोनों नेताओं ईसाक चिसी और टीएच मुइवा की ढलती उम्र का फ़ायदा उठाना भर हैै, यह जनता के हित में नहीं है और नगा जनता इन दोनों नेताओं से ऊपर है. एनएससीएन (आईएम) नगाओं का एकमात्र प्रतिनिधि नहीं है. इन संगठन का कहना है कि छह दशकों से चला आ रहा नगाओं का संघर्ष केवल आर्थिक पैकेज या ग्रेटर ऑटोनोमी के लिए नहीं है. इस दौरान नगाओं ने बड़ी संख्या में अपनी जान गंवाई. इस समझौते के अंतिम रूप लेने से पहले आईएम के नेताओं को गंभीरता से सोचना चाहिए. बहरहाल, एनएससीएन (आईएम) और केंद्र सरकार के बीच जारी वार्ता तभी शांति वार्ता कहलाएगी, जब इसमें पड़ोसी राज्यों का समुचित ख्याल रखा जाएगा, अन्यथा आशंका है कि इस क्षेत्र में माहौल और बिगड़ सकता है. केंद्र सरकार को एक ऐसा रास्ता निकालना चाहिए, जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

एनएससीएन-आईएम अध्यक्ष ईसाक चिसी सू का निधन
केंद्र सरकार से वार्ता कर रहे नगा विद्रोही गुट एनएससीएन-आईएम के अध्यक्ष ईसाक चिसी सू का निधन 28 जून को दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में ऑर्गन फेल्योर की वजह से हो गया. 87 वर्षीय ईसाक का पिछले एक साल से दिल्ली में इलाज चल रहा था. नगालैंड के जूनहेबोटो जिले में जन्मे ईसाक सूमी (नगा) आदिवासी थे. नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) और केंद्र सरकार के बीच हुए शिलांग समझौते के विरोध में ईसाक और मुइवा के साथ मिलकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (आईएम) 1980 में बना था. 1997 में एनएससीएन आईएम केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता शुरू हुआ था. इन 16 सालों में लगभग 80 बैठकें हो चुकी हैं. ईसाक

1950 में एनएनसी में शामिल हुए थे. 1980 में एनएनसी में रहते हुए कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य संभालते रहे. उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि ईसाक को नगा शांति वार्ता में उनके ऐतिहासिक भूमिका के लिए याद किया जाएगा. वे नगा समुदाय की शांति चाहते थे. उनके निधन का असर नगा शांति वार्ता पर पड़ना तय है.

सत्ता पाने और बचाने के बीच जनता के मुद्दे गायब

हाल में मणिपुर के दो विधानसभा क्षेत्र इंफाल वेस्ट और इंफाल ईस्ट के म्यूनिस्पल कॉरपोरेशन के चुनाव हुए. इंफाल म्यूनिस्पल कॉरपोरेशन वेस्ट इंफाल से 20 वार्ड और ईस्ट इंफाल से सात वार्डों का समूह है. 27 सीट के इस चुनाव में सत्ता पक्ष कांग्रेस ने 12 सीटें जीतीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने 10 सीटें और पांच निर्दलीय. यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के बीच शक्ति परीक्षण जैसा था. इस जीत से कांग्रेस को लगता है कि अब भी आम जनता कांग्रेस पार्टी के समर्थन में है. कांग्रेस पार्टी, मणिपुर के अध्यक्ष टीएन हाउकिप को विश्‍वास है कि इस जीत के बाद कांग्रेस पार्टी को 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी लोगों का समर्थन मिलेगा और जीत उन्हीं की होगी. लेकिन हकीकत इससे कहीं कोसों दूर है. कांग्रेस को लेकर आम लोगों में असंतोष है. जनता की सोच है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार और कुशासन कांग्रेस की नियति बन गई है. कांग्रेस आम जनता की जान-माल की रक्षा नहीं कर पा रही है. कांग्रेस सरकार पर लगातार प्रदेश में एनकाउंटर कराने के आरोप लगते रहे हैं, जिसे हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है. हर मोर्चे पर कांग्रेस सरकार विफल साबित हो रही है. इनर लाइन परमिट को लेकर एक महीने से ज्यादा समय तक स्कूली बच्चे सड़क पर प्रदर्शन करते रहे. उनपर लाठियां गोलियां और पानी की बौछारें की गईं. कई छात्र घायल हुए फिर भी सरकार  चुपचाप तमाशा देखते रही. जब राजनीतिक पार्टियां सामाजिक मुद्दों पर चुप रहेंगी, तब जनता का मुखर होना स्वाभाविक है. वही हाल मणिपुर का है. जिस मुद्दे पर सरकार, पार्टियों और नेताओं को आगे आना था, उसके लिए आम जनता को प्रदर्शन करना पड़ रहा है. सड़क पर लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, नारे लगा रहे हैं. इन मामलों पर चाहे कोई भी नेता किसी भी पार्टी का क्यों न हो, उनकी ओर से न कोई बयान आया और न ही लोगों के बीच जाकर उन्होंने अपनी बातें रखीं. दूसरा, इरोम शर्मिला 15 साल से भूख हड़ताल पर हैं. कांग्रेस सरकार का कोई नेता या मंत्री आजतक शर्मिला से मिलने नहीं गया.
ये अलग बात है कि कांग्रेस 15 साल से शासन कर रही है, इसलिए उसकी पैठ अब भी प्रदेश के कोने-कोने में है. पार्टी के कार्यकर्ता आम लोगों की बात सुनने तक को तैयार नहीं हैं. मणिपुर में चाहे नेशनल पार्टी हो या स्थानीय पार्टी, सभी यहां की समस्याओं को सुलझाने में विफल रहे हैं. कांग्रेस पार्टी भूमिगत संगठनों से शांति वार्ता कर अपनी वाहवाही लूटने में मगन है, तो वहीं अफस्पा को लेकर सरकार अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है. 

दूसरी तरफ, भाजपा ने भी लोकसभा चुनाव के पहले अफस्पा को मुद्दा बनाया था, लेकिन केंद्र में सरकार आने के बाद हाथ खड़े कर दिए. एमपीपी (मणिपुर पीपुल्स पार्टी) एक स्थानीय पार्टी है. इस पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं. लेकिन यह पार्टी भी दूसरी पार्टियों की तरह साबित हुई. मणिपुर की स्थानीय समस्याओं पर अपनी आवाज बुलंद करने के बजाय कार्यकर्ता चुपचाप आंख-कान बंद कर बैठे हैं.

प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने अभी से चुनावी रणनीति की तैयारी शुरू कर दी है. सबसे पहले राज्य के अध्यक्ष टीएच चाउबा सिंह को बदला गया. चाउबा सिंह ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभा में सांसद रह चुके हैं. 1999 में वे यूनियन मिनिस्टर ऑफ स्टेट, कल्चर, यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स मंत्री थे. चाउबा प्रदेश में एक मजबूत भाजपा नेता हैं, इसके बावजूद उनकी जगह पर आरएसएस कार्यकर्ता केएच भवानंद को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया. चाउबा को राज्य चुनाव प्रबंधन कमेटी का संयोजक बनाया गया है. भवानंद एक दशक पहले 1995 में भाजपा में शामिल हुए थे. पहले वे संघ प्रचारक के तौर पर राज्य में काम कर रहे थे. भवानंद प्रदेश भाजपा में कोषाध्यक्ष, महासचिव और उपाध्यक्ष आदि पद पर कार्य करते रहे हैं.
केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद पूर्वोत्तर खास कर मणिपुर में भी भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा है. भाजपा मणिपुर में सोशल मीडिया के जरिए कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाने पर जोर दे रही है. भाजपा कार्यकर्ता प्रदेश में जगह-जगह घूमकर पार्टी का प्रचार करते देखे जा रहे हैं. वहीं वे स्थानीय समस्याओं पर भी लोगों की मदद कर रहे हैं. पिछले साल जब प्रदेश में बाढ़ आई थी, तब सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी से अधिक बाढ़ पीड़ित परिवारों की मदद भाजपा कार्यकर्ताओं ने की. असम चुनाव की जीत के बाद भाजपा की उम्मीदें और बढ़ गई हैं.

बहरहाल, राज्य की प्राथमिकता है अशांत राजनीतिक और सामाजिक माहौल को बदलना, भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना, रोजगार के अवसर प्रदान करना और बिजली, पानी, सड़क व शिक्षा की समस्या को दूर करना. इस दिशा में कांग्रेस विफल रही है. शेष भारत से जोड़ने वाली सड़क नेशनल हाईवे 53 के बंद होने से मणिपुरियों की रोजी-रोटी छिन जाती है. इस हाईवे की स्थिति दयनीय हो चुकी है. बारिश के मौसम में यहां अक्सर लैंड स्लाइड होता है, जिससे राहगीरों को आने-जाने में बाधा होती है. लूट-खसोट, यात्रियों को जान से मारना, नगा चरमपंथियों की मांगें पूरी नहीं करने पर ड्राइवरों को मारना-पीटना, लोगों को धमकी देना यहां आम बात है. इसे दूर करने के लिए हाईवे फोर्स रखने की जरूरत है. यहां बिजली-पानी की समस्याएं भी गंभीर हैं. प्रदेश में आज भी लोगों के पास पीने का पानी नहीं है. 80 प्रतिशत लोग तालाब का पानी पीने को मजबूर हैं. गांवों में बिजली दो से चार घंटे ही मिल पाती है. शिक्षा के क्षेत्र में भी हाल बेहाल है. अशांत माहौल के चलते प्रदेश में अक्सर बंद की स्थिति रहती है. इस वजह से साल में छह महीने ही स्कूल, कॉलेज खुल पाते हैं. बच्चे शिक्षा से वंचित होने के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड़ रहे हैं. राज्य के अलग-अलग संप्रदाय के लोगों में हमेशा तनाव का माहौल रहता है. पहाड़ बनाम घाटी के मुद्दे पर हमेशा टकराव की स्थिति बनी रहती है. इस टकराव को राजनीतिक पार्टियां अपने निहित स्वार्थ के लिए और भी खाद-पानी देती रहती हैं. इसका समाधान तभी संभव है, जब प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक शांति कायम हो. इसके लिए हर राजनीतिक पार्टियों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है. अपने हित छोड़कर काम करने पर ही इन समस्याओं का समाधान होगा. राज्य में राजनीतिक टक्कर कांग्रेस और भाजपा में ही है. देखना है कि इस टक्कर में जनता की समस्याओं का कितना समाधान निकल पाता है. 
 
मणिपुर की राजनीतिक तस्वीर

पूर्वोत्तर भारत का राज्य मणिपुर एक अशांत प्रदेश है, जिसकी आबादी 22 लाख है. अगले साल 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं. राज्य के कुल 60 विधानसभा सीटों में से 20 विधानसभा सीट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं. यानी पहाड़ी क्षेत्र के राजनेता ही इन 20 सीटों पर खड़े हो सकते हैं. असम विधानसभा चुनाव होने के बाद राष्ट्रीय पार्टियां अब मणिपुर पर नजर गड़ाए हैं. राज्य में मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार पिछले 15 सालों से है. मणिपुर की मुख्य राजनीतिक पार्टियों में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय जनता दल एवं नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी हैं. प्रमुख स्थानीय पार्टियों में मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी, लोक जन शक्ति पार्टी, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, फेडरल पार्टी ऑफ मणिपुर, नगा पीपुल्स फ्रंट, निखिल मणिपुरी महासभा आदि हैं. मणिपुर में दो लोकसभा सीट हैं. इनर और आउटर. आउटर लोकसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. इनर लोकसभा के अंदर 32 विधानसभा सीट है और आउटर में 28 विधानसभा सीट.

मणिपुर की हालत

जो दिल्ली से नहीं दिखती
दिल्ली की सड़कों पर घूमता एक मणिपुरी देश के बाकी लोगों के लिए कभी नेपाली होता है, कभी नॅार्थ-ईस्ट का रहने वाला तो कभी-कभी उसे ऐसे संबोधनों से गुजरना पड़ता है, जिसे यहां नहीं लिखा जा सकता है. देश का पूर्वोत्तर हिस्सा हमारे प्रधानमंत्री की नजर में भले देश की भुजा हो या मणिपुर देश का एक मणि हो, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है. पूरे नॉर्थ-ईस्ट की बात छोड़ सिर्फ मणिपुर की ही बात करें तो यह खूबसूरत पहाड़ी राज्य आज अशांत है. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी. राजनीतिक अस्थिरता, इनर लाइन परमिट का मसला हो, अफस्पा या फिर पहाड़ बनाम तराई के निवासियों की आपसी लड़ाई. इन सब ने मिलकर इस खूबसूरत राज्य को स्थानीय लोगों के लिए एक दुस्वप्न में बदल दिया है. जाहिर है, देश के सुदूर हिस्से में होने के कारण ये खबरें राष्ट्रीय मीडिया के एजेंडे में शामिल नहीं हो पातीं. इस स्टोरी के जरिए हम जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर मणिपुर के अंतर्कलह और अंतर्विरोध की वजहें क्या हैं?

पिछले साल 31 अगस्त को राज्य विधानसभा में मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 पारित हुआ था. मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015 बाहरी लोगों के आने और वहां रहने के लिए परमिट पर बल देता है, ताकि कोई बाहरी स्थाई तौर पर यहां न बस सके. दूसरा मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015, मणिपुर के किसी भी क्षेत्र में जमीन खरीद-फरोख्त में बाहरी लोगों का हक न हो, से संबंधित है. स्थानीय लोगों को कहीं भी जमीन खरीद-फरोख्त में समान अधिकार प्राप्त हो. तीसरा मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 में बाहर से आए लोगों को दुकान और मकान किराये पर लेने के लिए एक लिखित पत्र देना होगा जिसपर जिलाधिकारी का हस्ताक्षर हो.

दरअसल, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 पर झमेला खड़ा हो गया है. पहाड़ पर रहने वाले लोग नहीं चाहते कि राज्य के सभी निवासियों को जमीन खरीदने का समान अधिकार मिल जाए. उन्हें इस बात का डर है कि इससे उनकी जमीन पर तराई में रहने वाले लोग कब्जा कर लेंगे. इस बिल के विधानसभा में पास होते ही मणिपुर की जनता दो हिस्सों में बंट गई. जेसीआईएलपी (ज्वाइंट कमेटी ऑफ इनर लाइन परमिट), जो इनर लाइन परमिट की मांग करने वाली संस्था है और जिसमें घाटी में रहने वाले मैतै समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा है, उनका कहना है कि राज्य में बाहरी लोगों की संख्या बढ़ने से मैतै समुदाय अल्पसंख्यक हो जाएगा. उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. राज्य में मैतै बहुसंख्यक समुदाय है. वे हिंदू धर्म मानते हैं. लेकिन उनकी इस मांग से पहाड़ी क्षेत्र के लोग नाखुश हैं. वे उनकी इस मांग का विरोध करते हैं. पहाड़ी क्षेत्र के लोग ईसाई धर्मावलंबी हैं. वे नहीं चाहते कि मैतै को भी जमीन खरीदने का समान अधिकार मिले. इसी विरोध की आग में प्रदेश जल रहा है. जेसीआईएलपी (ज्वाइंट कमेटी ऑफ इनर लाइन परमिट) के नेतृत्व में राज्य के छात्र-छात्राएं समेत कई सामाजिक संगठन राज्य सरकार के विरोध में सड़क पर उतर आए. छात्र-छात्राओं पर लाठी चार्ज, आंसू गैस, रबर बुलेट और वाटर कैनन की बौछार से कई घायल हो गए. संपूर्ण राज्य में बंद का एलान किया गया. राज्य में कई जगहों पर इस बंद के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए. यातायात बंद होने से लोगों की जिंदगी नरक बन गई है.

दरअसल राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 20 आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि राज्य की जनसंख्या में आदिवासी 40 से 45 प्रतिशत हैं. गौरतलब है कि छठी अनुसूची के तहत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्रों को ऐसे मामलों का निपटारा करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता मिली है. हालांकि मणिपुर में पहले से छह ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल कार्यरत हैं. इसके अलावा एक पहाड़ी क्षेत्र कमेटी का भी गठन किया गया है. लेकिन स्थानीय पहाड़ी लोगों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं है. वे कहते हैं कि जब विधेयक पारित हो रहा था तब पहाड़ी क्षेत्र के ज्यादातर विधायक चुप रहे. वे आदिवासियों की आवाज उठाने में नाकाम रहे. इन विधेयकों के विरोध में जनजातीय छात्र संगठनों का कहना है कि मणिपुरी निवासी सुरक्षा विधेयक 2015 (प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल्स बिल-2015) और अन्य दो संशोधन विधेयक राज्य के उन पहाड़ी जिलों में जमीन की खरीद और बिक्री की इजाजत देते हैं, जहां नगा और कुकी रहते हैं.
इन आदिवासियों को डर है कि नया कानून आने के बाद पहाड़ी क्षेत्र में गैर आदिवासी बसने लगेंगे. जबकि वहां जमीन खरीदने पर अब तक पाबंदी थी. सरकार द्वारा लाए गए तीनों विधेयकों के विरोध में चल रहे आंदोलन की अगुवाई कर रही ज्वॉइंट एक्शन कमेटी के संयोजक एच मांगचिनख्ाुप गाइते का मानना है कि पहले विधेयक से हमारी आदिवासी पहचान का उल्लंघन होता है. यह विधेयक भूमि संबंधी हमारे अधिकारों की अवहेलना करता है जबकि तीसरा हमारे जीवनयापन को नुकसान पहुंचाता है. पहाड़ी क्षेत्र को सरकार ने कभी मणिपुर का हिस्सा नहीं माना. हमारा विकास नहीं किया. हमेशा पहाड़ के लोगों के साथ भेदभाव किया गया, जो अब भी जारी है. इन विधेयकों को देखने के बाद यह बात साफ हो जाती है कि अब घाटी में जमीन को लेकर बढ़ता दबाव इस कानून को पास करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है. इस विधेयक में मणिपुर के मूल निवासी को सही तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है.
वास्तव में देखें तो मणिपुर का यह मामला भावनात्मक और संवेदनशील होने के साथ जटिल भी है. घाटी में रह रहे मैतै समुदाय का तर्क है कि जनसंख्या का सारा दबाव उनकी जमीन पर है. उनके अनुसार घाटी में संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने पर मनाही है. साथ में बाहर से आए लोगों की इतनी भीड़ बढ़ गई कि वहां रहना मुश्किल हो गया है. वहीं पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदाय के नुमाइंदे आरोप लगाते हैं कि सरकार ने कभी आदिवासियों से इस बारे में बात कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश नहीं की है और विधेयक पास कर लिया. मणिपुर के चूराचांदपुर, चंदेल, उख्रूल, सेनापति और तमेंगलोंग जिले पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं. वहीं थौबाल, इंफाल ईस्ट और इंफाल वेस्ट जिले घाटी में आते हैं. लैंड बिल में कहा गया है कि क्षेत्रफल के हिसाब से मणिपुर का 10 फीसदी हिस्सा घाटी का है. हालांकि राज्य की 60 प्रतिशत जनता घाटी में रहती है. इस कारण मैतै समुदाय पहाड़ी क्षेत्र में जमीन दिए जाने की मांग करता रहा है. मणिपुर के साथ समस्या यह है कि करीब 90 प्रतिशत जमीन पहाड़ी क्षेत्र में है और 60 प्रतिशत आबादी घाटी में रहती है. अब घाटी में रहने वाले मैतै समुदाय को पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने की अनुमति नहीं है जबकि घाटी में किसी को भी जमीन खरीदने की अनुमति है. मैतै समुदाय को लगता है कि उसके साथ भेदभाव हो रहा है. इसी तरह पहाड़ी क्षेत्र की आबादी, जो राज्य की कुल आबादी का 40 प्रतिशत है, चाहती है कि बाहरी लोगों को पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने की अनुमति न दी जाए. इससे उनकी आबादी में बदलाव आएगा साथ ही उनकी निजता का हनन होगा.
राज्य में नगा-कुकी जाति के अलावा मैतै, मणिपुरी मुस्लिम (पांगल), ईसाई आदि जातियां भी रहती हैं. मैतै मणिपुर राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है. राज्य में सबसे बड़ी समस्या है असुरक्षा की भावना. चाहे बात मैतै, नगा, कुकी या किसी और समुदाय की हो. इस विधेयक का मैतै समुदाय समर्थन कर रहा है जबकि कुकी और नगा इसके विरोध में हैं. हालत यह है कि पहाड़ी क्षेत्र के लोग कुछ कहते हैं तो घाटी के लोग उसका विरोध करते हैं और अगर घाटी के लोग कुछ कहते हैं तो पहाड़ी क्षेत्र के लोग उसका विरोध करते हैं. इस मामले में दोनों पक्षों को बातचीत के टेबल पर लाकर ही समाधान निकाला जा सकता है. दूसरी बात, इस समस्या को सुलझाने में केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भी अहम भूमिका है. क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र और घाटी के लोगों के लिए यह संभव नहीं है वे इस मामले को अपने स्तर पर सुलझा सकें. वैसे मणिपुर में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके बावजूद राज्य सरकार व विपक्षी दल गतिरोध दूर करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं. सरकार को इस मामले को आदिवासी बनाम गैर आदिवासी, पहाड़ी क्षेत्र बनाम घाटी, हिंदू बनाम ईसाई या फिर फायदे नुकसान से ऊपर उठकर देखना होगा. 


क्या है तीन विधेयक और क्यों है विवाद ?

31 अगस्त 2015 को मणिपुर विधानसभा में मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 पारित किए गए थे. लेकिन इन विधेयकों के पास होने के बाद मणिपुर के आदिवासी समूह असंतुष्ट हो गए. जनजातीय छात्र संगठनों का दावा है कि मणिपुरी निवासी सुरक्षा विधेयक-2015 (प्रोटेक्शन ऑफ मणिपुर पीपुल्स बिल-2015) और अन्य दो संशोधन विधेयक राज्य के उन पहाड़ी जिलों में जमीन की खरीद और बिक्री की इजाजत देते हैं जहां नगा और कुकी रहते हैं. उनका कहना है कि इन विधेयकों के  कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 371 (सी) और मणिपुर हिल पीपुल एडमिनिस्ट्रेशन रेगुलेशन एक्ट-1947 का हनन करते हैं, जिन्हें मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में बसने वाले जनजातीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था. इनके  तहत राज्य के पहाड़ी जिलों को विशेष क्षेत्र का दर्जा मिला है यानी गैर-अनुसूचित जातियां यहां जमीन नहीं खरीद सकतीं. बाहरी लोगों के आने के कारण कुल आबादी में मूल निवासियों की तेजी से घटती संख्या की वजह से उन्हें अपनी पुश्तैनी जगह से बेदखल होने का डर पैदा हो गया है. इन तीनों विधेयकों में साल 1951 की समय सीमा ने जनजातियों में डर का एक माहौल पैदा कर दिया कि इस तारीख के बाद राज्य में आने वाले नगा और कुकी जनजातियों को अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी. नए कानून के मुताबिक मणिपुर में जो लोग 1951 से पहले बसे हैं उन्हें ही संपत्ति का अधिकार होगा. इसके बाद बसे लोगों का संपत्तियों पर कोई हक नहीं होगा. ऐसे लोगों को राज्य से जाने के लिए भी कहा जा सकता है. नया कानून बनाने की मांग मणिपुर के बहुसंख्यक मैतै समुदाय ने की थी. आदिवासी समूह इसका विरोध कर रहे हैं. आदिवासियों को आशंका थी कि उन्हें नए कानून का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. यह अलग बात है कि नया कानून बनने के बाद बाहरी राज्यों से मणिपुर आने वाले लोगों के लिए परमिट लेना जरूरी होगा.