यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday 15 September 2017

राज्य कहे अफस्पा हटाओ केंद्र कहे अफस्पा लगाओ

अफस्पा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) महज एक शब्द नहीं, बल्कि एक विवादास्पद कानून है, जिसकी आड़ में कई निर्दोष लोगों की जानें चली गईं. अफस्पा को लेकर समय-समय पर जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर के कई राज्यों से विरोध की आवाज उठती रही है. स्थानीय सरकारें एवं केंद्र सरकारों के बीच अफस्पा एक विवाद का मुद्दा रहा है. हाल में एक खबर आई कि असम सरकार केंद्र की सिफारिशों से पहले राज्य के कुछ इलाकों से विवादित आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट हटाने पर विचार कर सकती है. गौरतलब है कि असम को अशांत इलाका घोषित करते हुए केंद्र सरकार ने 27 नवंबर 1990 को इस अधिनियम को लागू किया था. केंद्र सरकार ने उल्फा के नेतृत्व में आतंकवाद पर काबू पाने के लिए पूरे राज्य में अफस्पा लगाने का फैसला लिया था.

असम सरकार इस कानून को पूरे राज्य से हटाने की कोशिश पहले से कर रही थी. गृह मंत्रालय के साथ हुई बैठक में राज्य सरकार ने यह मुद्दा उठाया था कि राज्य के कई हिस्सों से इस अधिनियम को हटाया जाए. राज्य के एडीजी (स्पेशल ब्रांच) पल्लब भट्टाचार्य ने बताया कि राज्य के किन-किन इलाकों से अफस्पा हटाया जाना चाहिए, यह फैसला चर्चा के बाद लिया जाएगा. उन्होंने बताया कि राज्य में बड़ी संख्या में सेना के जवान तैनात हैं. अगर इस अधिनियम को कुछ इलाकों से वापस लेना है तो राज्य सरकार को उन क्षेत्रों में वैकल्पिक सुरक्षा का इंतजाम करना होगा. इसके बाद इस अधिनियम के बजाय, उन क्षेत्रों में कार्रवाई करने के लिए आईपीसी का इस्तेमाल किया जाएगा.

यह खबर आने के 24 घंटे बाद ही केंद्र सरकार ने आदेश जारी किया कि अफस्पा कानून के तहत पूरे असम को और तीन महीनों के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया है. केंद्र ने यह कदम विद्रोही समूहों उल्फा (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम), एनडीएफबी (नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड) और अन्य विद्रोही समूहों की विभिन्न हिंसक गतिविधियों का हवाला देते हुए उठाया है. एक गजट अधिसूचना में गृह मंत्रालय ने कहा कि मेघालय से लगे सीमावर्ती क्षेत्रों के अलावा समूचे असम को अफस्पा के तहत तीन मई से तीन महीने के लिए अशांत घोषित कर दिया गया है. मंत्रालय ने कहा कि असम में 2016 में हिंसा की 75 घटनाएं हुईं, जिसमें चार

सुरक्षाकर्मियों सहित 33 लोग मारे गए और 14 अन्य लोगों का अपहरण किया गया. इसके अलावा 2017 में हिंसा की नौ घटनाएं हुई हैं जिसमें दो सुरक्षाकर्मी समेत चार लोग मारे गए. इन सभी हिंसा की वारदातों को विद्रोही गुटों यानी उल्फा और एनडीएफबी ने अंजाम दिया. एक दूसरे गजट नोटिफिकेशन में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों तिराप, चांगलंग और लोंगडिंग के अलावा असम की सीमा से लगते 16 पुलिस थानों में पड़ने वाले इलाकों को भी  तीन महीनों के लिए अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया है. गृह मंत्रालय ने इस फैसले को यह कहकर सही ठहराया है कि इन इलाकों में एनएससीएन (आईएम), एनएससीएन (के), उल्फा, एनडीएफबी जैसे गुट हिंसा फैला रहे हैं.
इन दो खबरों से एक आम पाठक भ्रमित जरूर हो सकता है. एक तरफ राज्य सरकार कह रही है कि राज्य में हिंसा कम हो रही है, इसलिए अफस्पा हटाने की कोशिश की जा रही है, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने विद्रोही समूहों की विभिन्न हिंसक गतिविधियों का हवाला देते हुए अफस्पा को पूरे राज्य में तीन महीने बढ़ाने के लिए कदम उठाया है. तीन जनवरी 2017 को नागालैंड में भी केंद्र सरकार ने अशांत राज्य बताकर अफस्पा छह महीने के लिए बढ़ाया था. पिछले कई दशक से असम समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक गतिविधियां होती रही हैं. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक पूर्वोत्तर के राज्यों को अशांत बताकर अफस्पा को बनाए रखेंगे. आजादी के इतने साल बाद भी देश के कुछ हिस्सों में वही दमनकारी नीति क्यों अपनाना पड़ा? जब कोई राज्य सरकार अपनी इच्छाशक्ति दिखाकर अफस्पा   हटाने की कोशिश करती है, तो केंद्र सरकार उसे बनाए रखने का प्रयास करती है. लेकिन असम में अब भाजपा की नवनिर्मित सरकार है. असम की भाजपा सरकार का यह निर्णय केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ कैसे हो सकता है? ऐसा तो नहीं कि अफस्पा को लेकर राज्य और केंद्र सरकार में मतभेद की स्थिति पैदा हो गई है.

गौरतलब है कि 2015 को त्रिपुरा से अफस्पा हटाया गया था. इससे यह बात साफ हो गई कि अगर राज्य सरकार मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय दे और कानून-व्यवस्था दुरुस्त हो, तो किसी भी राज्य से अफस्पा हटाया जा सकता है. यह स्थानीय सरकार की ईमानदार कोशिश का नतीजा है कि इतने विवादास्पद कानून को बिना रोक-टोक के राज्य से हटा लिया गया. 16 फरवरी 1997 को केंद्र सरकार ने त्रिपुरा में अफस्पा लगाया था, जब राज्य में विरोधी गुट नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स चरम पर था. दोनों गुट अब भी बांग्लादेश में सक्रिय हैं और वहीं हथियार का प्रशिक्षण ले रहे हैं. इन गुटों की मांग है कि त्रिपुरा को भारत से अलग किया जाए.

दूसरी तरफ मणिपुर में भी कई दशकों से इस कानून को हटाने को लेकर विरोध चल रहा है. इरोम शर्मिला इस कानून के खिलाफ 16 साल आमरण अनशन कर चुकी हैं. राज्य में अफस्पा को लेकर संतोष हेगड़े एवं जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी गठित की गई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस कानून को दोषपूर्ण बताया था. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2013 में राज्य में मुठभेड़ के छह मामलों को लेकर फैसला सुनाया था. फैसले में सभी मुठभेड़ को फर्जी बताया गया था. इतना कुछ होने के बाद भी राज्य में अफस्पा को लेकर स्थानीय सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है. राज्य की नव निर्मित भाजपा सरकार भी अबतक अफस्पा हटाने को लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती है.

क्या है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा)

आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट संसद में 11 सितंबर 1958 को पारित किया गया था. यह कानून पूर्वोत्तर के अशांत राज्यों जैसे असम, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम एवं नागालैंड में लागू है. यह कानून अशांत क्षेत्रों में सेना को विशेषाधिकार देने के लिए बनाया गया था. 1958 में अफस्पा बना तो यह राज्य सरकार के अधीन था, लेकिन 1972 में हुए संशोधन के बाद इसे केंद्र सरकार ने अपने हाथों में ले लिया. संशोधन के मुताबिक किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र घोषित कर वहां अफस्पा लागू किया जा सकता है. इस कानून के तहत सेना को किसी भी व्यक्ति को बिना कोई वारंट के तलाशी या गिरफ्तार करने का विशेषाधिकार है. यदि वह व्यक्ति गिरफ्तारी का विरोध करता है तो उसे जबरन गिरफ्तार करने का पूरा अधिकार सेना के जवानों को है. अफस्पा कानून के तहत सेना के जवान किसी भी व्यक्ति की तलाशी केवल संदेह के आधार पर ले सकते हैं. गिरफ्तारी के दौरान सेना के जवान जबरन उस व्यक्ति के घर में घुस कर तलाशी ले सकते हैं. सेना के जवानों को कानून तोड़ने वाले व्यक्ति पर इस कानून के तहत फायरिंग का भी पूरा अधिकार है. अगर इस दौरान उस व्यक्ति की मौत भी हो जाती है तो उसकी जवाबदेही फायरिंग करने या आदेश देने वाले अधिकारी पर नहीं होगी.

Tuesday 14 February 2017

हार नहीं मानूंगी, रार नई ठानूंगी: नजिमा बीबी

मुस्लिम संगठनों ने किया मुस्लिम महिला उम्मीदवार का विरोध
  
मणिपुर के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि कोई मुस्लिम महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरी हो. नजिमा बीबी मणिपुर की पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार हैं. चार मार्च को हो रहे राज्य के पहले चरण के चुनाव में नजिमा, इरोम शर्मिला की पार्टी पीपुल्स रिसर्जेन्स एंड जस्टिस एलाइन्स  पार्टी (प्रजा) से चुनाव लड़ने जा रही हैं. नजिमा प्रजा पार्टी की सह-संस्थापक भी हैं. उनका कहना है कि वह गरीबों और शोषितों की आवाज बनकर चुनाव मैदान में उतरी हैं. वह राज्य के अल्पसंख्यक समुदायों के बीच जाकर चुनाव चुनाव प्रचार कर रही हैं. हालांकि नजिमा के चुनाव मैदान में उतरने के ऐलान से मणिपुर के तमाम मुस्लिम संगठन खफा हैं. ये संगठन नजिमा को चुनाव मैदान से हटाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपना रहे हैं. इन संगठनों ने नजिमा को धमकी भी दी है कि मरने के बाद उनको दफनाने के लिए भी जमीन नहीं दी जाएगी. इस धमकी का विरोध करते हुए नजिमा ने उन मुस्लिम संगठनों से सवाल किया कि उनकी क्या गलती है और वे क्यों चुनाव नहीं लड़ें? नजिमा ने पूछा है कि क्या मैं महिला हूं इसलिए चुनाव नहीं लड़ सकती? यह विडंबना ही है कि एक तरफ पूरी दुनिया में महिला सशक्तिकरण के नाम पर आंदोलन हो रहे हैं और दूसरी तरफ महिलाओं के चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने पर पाबंदी लगाई जा रही है. नजिमा बीबी के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाने वाले संगठन महिलाओं को घर में कैद रखकर धर्म और समाज के प्रति क्या प्रतिमान स्थापित करना चाहते हैं.
मणिपुर में मुस्लिमों की आबादी कुल आबादी की छह प्रतिशत है. यहां दो मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र हैं, लिलोंग और वाबगाई. नजिमा दोनों मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगी. स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नजिमा के चुनाव मैदान में आने से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. राज्य के अल्पसंख्यक मुस्लिमों का झुकाव पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की तरफ ही रहा है. हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस ने अब तक सियासी फायदे के लिए ही इनका इस्तेमाल किया है, जमीनी स्तर पर इनके विकास के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है. नजिमा के चुनाव मैदान में उतरने का यह भी एक कारण है. नजिमा सत्ता में भागीदार होकर अपने समुदाय के पिछड़ेपन को दूर करना चाहती हैं.
29 जनवरी को नजिमा बीबी समेत प्रजा पार्टी के अन्य नेताओं ने मणिपुर की गवर्नर नजमा हेपतुल्ला से मुलाकात की. इन नेताओं ने राज्यपाल से मांग की कि मणिपुर के हित में अफ्सपा को तत्काल हटा देना चाहिए. मणिपुर यूनिवर्सिटी के कैंपस में बने असम रायफल्स के कैंप को भी हटाने की मांग की गई. मणिपुर की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मुद्दे पर इन्होंने राज्यपाल से बातचीत की. नजिमा बीबी ने राज्यपाल को इस बात से भी अवगत कराया कि उनके चुनाव लड़ने के ऐलान से राज्य के मुस्लिम संगठनों को ऐतराज है और उन्होंने नजिमा को धमकी दी है.
नजिमा बीबी के अब तक के सफर पर गौर करें, तो साफ समझा जा सकता है कि मणिपुर में महिला सशक्तिकरण की बात कितनी खोखली है. नजिमा को बचपन से ही विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है. वह जब छठी कक्षा में थीं, तो क्लास में अकेली लड़की थी. स्कूल के समय में भी उन्हें यौन उपहास झेलना पड़ा था. यही कारण भी था कि घर वालों ने छोटी उम्र में ही नजिमा की शादी कर दी. हालांकि यह शादी ज्यादा दिन नहीं चली और एक साल बाद ही नजिमा अपने पति से अलग हो गईं. नजिमा स्वाभिमानी और स्वावलंबी महिला हैं. तलाक के बाद वह अपने घर लौटीं और मोहल्ले की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर बचत कोष शुरू किया. इस बचत कोष में महिलाएं हर रोज एक मुट्‌ठी चावल इकट्‌ठा करतीं और एक महीने के बाद चावल को बेचकर उसी पैसे का इस्तेमाल पशुपालन में करती थीं. नजिमा ने स्थानीय महिलाओं के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप भी शुरू किया था. जब ये महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हुईं, तो इनमें घरेलू हिंसा से लड़ने के लिए भी बल मिला.

हालांकि पार्टी की संयोजक इरोम शर्मिला नजिमा के साथ मजबूती से खड़ी हैं. उन्होंने कहा भी है कि हमारी पार्टी महिलाओं को ज्यादा सशक्त बनाने पर बल दे रही है. यही कारण है कि प्रजा पार्टी की 40 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं हैं और कार्यकारी सदस्यों में भी अधिकतर महिलाएं ही हैं. हालांकि प्रजा पार्टी की संयोजक इरोम शर्मिला ने अपनी पार्टी की तरफ से सिर्फ 10 सीटों पर ही उम्मीदवार
उतारने का फैसला किया है. इन सामाजिक चुनौतियों के बीच शर्मिला और नजिमा के सामने एक बड़ी समस्या चुनावी फंड की भी है. शर्मिला ने मीडिया के सामने कहा भी कि नई पार्टी होने के कारण उनके सामने फंड का संकट है. प्रजा पार्टी चुनावी चंदे के द्वारा अब तक साढ़े लगभग चार लाख रुपए ही इकट्‌ठा कर पाई है. इसमें से भी ज्यादातर चंदे ऑनलाइन माध्यमों से मिले हैं. कैश या चेक के माध्यम में अब तक केवल 60-70 हजार ही इकट्‌ठा हो पाया है. चुनाव आयोग के अनुसार राज्य में एक केंडिडेट को 20 लाख तक खर्च करने की अनुमति है. लेकिन प्रजा पार्टी की तरफ से चुनावी मैदान में उतर रहे 10 उम्मीदवारों को चुनावी खर्च के लिए मात्र 40 हजार रुपये प्रति उम्मीदवार ही मिल पाएगा. इसी फंड की कमी के कारण चुनाव प्रचार के लिए शर्मिला और नजिमा इंफाल से 35 किमी दूर तक भी साइकल चलाकर ही जाती हैं. उनके साथ पार्टी के अन्य कार्यकर्ता भी साइकल से ही होते हैं.
 

इन सबके बीच मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी की समस्या जस की तस बनी हुई है. 100 दिन से भी ज्यादा हो गए लेकिन हालात में सुधार देखने को नहीं मिल रहा है. लोगों की परेशानी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है. केंद्र, मणिपुर सरकार और यूएनसी के नेताओं के बीच बातचीत भी हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ रहा है. बिना नाकेबंदी हटाए आगामी 4 और 8 मार्च को विधानसभा चुनाव सफलतापूर्वक कराए जा सकेंगे, इसकी भी संभावना कम ही है.

Wednesday 1 February 2017

राजनीतिक मुठभेड़ के बीच फर्ज़ी मुठभेड़ का मुद्दा ग़ायब

मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह का कार्यकाल 18 मार्च 2017 को समाप्त हो रहा है. यह राज्य में उनकी तीसरी सरकार है. आगामी चार और आठ मार्च को दो चरणों में मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं. उनके कार्यकाल के इतिहास में फर्जी एनकाउंटरों में मौत की एक लंबी कहानी रही है. इन पंद्रह सालों में राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति शर्मसार कर दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी सरकार को फटकार लगाई थी. यूनाइटेड नेशन्स एवं मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर पुलिस, पैरामिलिट्री एवं आर्मी द्वारा फर्जी मुठभे़डों में मारे गए लोगों की एक रिपोर्ट तैयार की थी. जिसे उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में फर्जी मुठभेड़ों के मामले को देखने वाले विशेष दूत क्रिस्टोफ हेन्स को मार्च 2012 में सौंपी थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक 1979 से 2012 तक राज्य में 1528 लोग पुलिस, पैरामिलिट्री एवं आर्मी द्वारा कथित रूप से फर्जी एनकाउंटर में मारे गए थे. इन मुठभेड़ों में मारे गए लोगों को न्याय दिलाने के लिए एक्स्ट्रा ज्यूडिसियल एक्जिक्यूशन विक्टिम फैमिलिज एसोसिएशन (ईईवीएफएएम) मणिपुर एवं ह्‌यूमन राइट्‌स अलर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में उक्त आंकड़ों के आधार पर एक याचिका दायर की है. ईईवीएफएएम फर्जी मुठभे़ड में मारे गए लोगों के परिवार वालों का एक संगठन है, जो न्याय दिलाने के लिए विभिन्न मानवाधिकार संगठनों के साथ मिल कर काम कर रहा है.

एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्जीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज एसोसिएशन और ह्‌यूमन राइट्‌स अलर्ट की याचिका के आधार पर 15 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के छह मुठभेड़ों के मामले में एक फैसला सुनाया. ये सभी मुठभेड़ फर्जी थे. दो संस्थाओं एक्स्ट्रा ज्यूडिशिएल एक्जीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज एसोसिएशन और ह्‌यूमन राइट्‌स अलर्ट ने यह पीटिशन सितंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट में फाइल की थी. इस पीटिशन में लिखा था कि 1979 से 2012 तक मणिपुर में मुठभेड़ में 1528 लोग मारे गए, जिन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुईं. उन संस्थाओं की मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट की देख-रेख में इन मुठभेड़ों की जांच पड़ताल हो. पीटिशन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन लोगों का एक कमीशन बनाया था, जिसके चेयरमैन बने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़ेे. इस कमेटी में पूर्व चीफ इलेक्शन कमिश्नर जीएम लिंगदोह और कर्नाटक के पूर्व डीजीपी अजय कुमार सिन्हा भी शामिल थे. कमीशन ने इंफाल जाकर पहले छह केस की जांच की थी. इसके बाद इस कमीशन ने 12 सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

नेशनल ह्‌यूमन राइट्‌स कमीशन (एनएचआरसी) की एक टीम भी मणिपुर में हो रहे फर्जी मुठभेड़ मामलों की गहन तहकीकात के लिए 23 अक्टूबर 2013 को इंफाल गई थी. इंफाल से लौटने के बाद 19 नवंबर को एनएचआरसी के प्रतिनिधि सत्यव्रत पाल ने कहा था कि 2005-2010 के दौरान होने वाले 44 फर्जी मुठभेड़ के मामले एनएचआरसी के संज्ञान में आए हैं. अधिकतर मामलों में राज्य सरकार और उसकी मशीनरी ही दोषी पाई गई है. राज्य में तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा सेल्फ डिफेंस के नाम पर अधिकतर मुठभेड़ को अंजाम दिया गया है. पाल ने कहा कि राज्य सरकार दोषियों को सजा दिलाने में बिल्कुल भी संवेदनशील नहीं है. यह अधिकारियों के बीच सहयोग की कमी दिखाता है. एनएचआरसी ने यह भी कहा कि अधिकतर बड़े फर्जी मुठभेड़ में राज्य की पुलिस पर ही सवालिया निशान हैं. सरकारी मशीनरी द्वारा उनको बचाया जा रहा है. एनएचआरसी ने राज्य सरकार को फटकार लगाई कि मामले की सही सुनवाई होनी चाहिए. दोषियों को निष्पक्ष रूप से सजा दिलाना होगा. राज्य सरकार को कमीशन ने कठघड़े में खड़ा किया था. इसके बाद तत्काल प्रभाव से राज्य में तैनात 15 पुलिसकर्मियों को हटाया गया, जो फर्जी मुठभेड़ मामले में लिप्त थे. इनमें से 9 पुलिसकर्मी संजीत और रवीना कांड में भी शामिल थे. संजीत और रवीना फेक एनकाउंटर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था. दिल्ली से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका ने इस कांड से जुड़ी 12 तस्वीरें छाप कर राज्य के पुलिसकर्मियों की पोलपट्‌टी खोल दी थी. उन तस्वीरों में साफ-साफ दिखाया गया था कि कैसे इंफाल में तैनात पुलिस कमांडो द्वारा फर्जी एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था.

आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में 2003 में फर्जी मुठभेड़ों में 90 लोग मारे गए. वहीं 2008 में यह संख्या बढ़कर 355 हो गई. संजीत फर्जी एनकाउंटर मामले में तो हेड कांस्टेबल थौनाउजम हेरोजीत सिंह ने स्वीकार भी किया था कि 23 जुलाई 2009 को संजीत के एनकाउंटर के लिए उसे इंफाल ईस्ट के एएसपी डॉ. अकोइजम झलजीत सिंह का आदेश मिला था. ध्यान देने वाली बात यह है कि इससे पहले 9 सितंबर 2010 को ही सीबीआई इस मामले में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है. कांस्टेबल थौनाउजम की स्वीकृति के बाद इस मामले में फिर से सीबीआई जांच के लिए संजीत की मां ने ट्रायल कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया. इसके बाद उन्होंने सीबीआई डायरेक्टर को चिट्‌ठी लिखकर गुहार लगाई है कि हेरोजीत के खुलासे के आधार पर फिर से इस मामले की जांच करवाई जाए. अब देखना यह है कि सीबीआई उनके इस पत्र पर क्या कार्रवाई करती है.

इस मामले में भाजपा की मणिपुर इकाई ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर मांग की है कि इबोबी सिंह के अबतक के कार्यकाल में हुए सभी फर्जी मुठभेड़ों की जांच कराई जाए. पीएमओ को भेजी गई इस चिटठ्‌ी में मणिपुर भाजपा की तरफ से कहा गया है कि 2002 से 2012 तक जब इबोबी सिंह मुख्यमंत्री के साथ-साथ गृहमंत्री भी थे, इस दौरान कई फर्जी मुठभेड़ हुए जिसमें कई निर्दोष लोग मारे गए. उन लोगों के साथ न्याय हो, इसके लिए जरूरी है कि इबोबी सिंह को बर्खास्त कर के इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए. लेकिन इस चिटठ्‌ी का कोई असर होगा इसकी संभावना की ही है. क्योंकि संजीत की मां द्वारा सीबाआई को लिखी गई चिटठ्‌ी पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी है. सीबीआई केंद्र सरकार के ही अधीन है. भाजपा सरकार चाहती, तो इस मामले में फिर से सीबीआई जांच का आदेश दे चुकी होती. अब चुनाव सर पर आने के बाद प्रदेश के भाजपा नेताओं द्वारा पीएमओ को यह चिट्‌ठी भेजना केवल राजनीतिक फायदे की तरफ ही इशारा करता है. वहीं कांग्रेस का कहना है कि भाजपा चुनावी फायदे के लिए कांग्रेस को बदनाम कर रही है. स्थानीय पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स अफ्सपा की आड़ में ऐसे फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम देती रही है. केंद्र सरकार एक तरफ पूर्वोत्तर को मुख्यधारा में लाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ निर्दोष लोगों को मारने वाली कानूनें लागू करवाती है. फर्जी मुठभेड़ पर ज्यादा हो-हल्ला होने के बाद लोगों को शांत कराने के लिए सरकार की तरफ से एक कमिटी बना दी जाती है. यह सरकार का दोतरफा रवैया ही दिखाता है कि अपने ही कानून के गलत इस्तेमाल को स्वीकार न करके सरकार कमिटी बनाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती है. एक नहीं, कई कमेटियां बनाई गईं. जस्टिस जीवन रेड्‌डी मेटीजस्टिस वर्मा कमेटीसंतोष हेगड़े कमेटी आदि. बावजूद इसके आज तक कुछ नहीं हुआ और निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं.
अधिकारविहीन है मणिपुर मानवाधिकार आयोग
मणिपुर मानवाधिकार आयोग की स्थिति बिल्कुल दयनीय है. राज्य में इसका अस्तित्व न के बराबर है. गुवाहाटी हाईकोर्ट के आदेश के बाजवूद अबतक सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई है. इबोबी सरकार ने पिछले सात सालों से नियुक्ति प्रक्रिया को लटकाए रखा है. सदस्यों के अभाव और संसाधनों के गैर आवंटन के कारण मणिपुर मानवाधिकार आयोग लगभग मृतप्राय हो गया है. यही कारण भी है कि मणिपुर पुलिस पिछले 15 वर्षों से मुठभेड़ मामलों में कोई प्राथमिकी भी दर्ज नहीं कर रही है और इसपर कोई आवाज भी नहीं उठा रहा है. कानून व्यवस्था के मामले में मणिपुर की इस दयनीय स्थिति को देखते हुए सुुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि यह राज्य आंतरिक अशांति के दौर से गुजर रहा है. त्रासदी यह है कि यह स्थिति बीते 60 सालों यानी 1958 से लगातार जारी है.

Monday 23 January 2017

नाकेबंदी के बीच शांतिपूर्ण होगा चुनाव !

मणिपुर में 11वीं विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित हो चुकी है. राज्य में दो चरणों में 4 और 8 मार्च को चुनाव होंगे. मणिपुर में कुल 60 विधानसभा सीट हैं. पहले चरण में घाटी के 38 विधानसभा सीट और दूसरे चरण में पहाड़ के 22 विधानसभा सीट पर चुनाव होगा. 10वीं विधानसभा का कार्यकाल 18 मार्च 2017 को समाप्त हो रहा है. यहां फिलहाल कांग्रेस के मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह तीसरी बार अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं. मणिपुर में मुख्य नेशनल पार्टी कांग्रेस, भाजपा और सीपीआई (एम) है. स्थानीय पार्टियों में तृणमूल कांग्रेस, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, लोक जनशक्तिपार्टी, बहुजन समाज पार्टी, एनपीएफ, जदयू, आम आदमी पार्टी, पीपुल्स रिसर्जेन्स एंड जस्टिस एलाइन्स (प्रजा) आदि हैं.
इरोम शर्मिला के चुनाव में हिस्सा लेने के कारण इस बार मणिपुर का चुनाव काफी दिलचस्प होगा. शर्मिला अफस्पा के खिलाफ 16 वर्षों से आमरण अनशन कर रही थीं. अब उन्होंने अपने आंदोलन का माध्यम राजनीति को चुना है. सत्ता के जरिए अब वे अफस्पा की लड़ाई को आगे बढ़ाएंगी. उनकी प्रजा पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. मजे की बात तो ये है कि शर्मिला मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी के विधानसभा सीट से उनके खिलाफ चुनाव लड़ेंगी. शर्मिला के चुनाव में उतरने से कांग्रेस को नुकसान होना तय है. हालांकि, शर्मिला राजनीति में नई हैं और उनके राजनीति में आने के फैसले से लोग नाराज भी हैं, इसके बावजूद वे चुनाव में एक महत्वपूर्ण फैक्टर होंगी. एक राजनेता के रूप में देखने से ज्यादा उनको लोग एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं, इसलिए उनके राजनीति में आने के फैसले से लोग आहत हैं. सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर शर्मिला पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं, लेकिन उस लोकप्रियता को वे चुनाव में कितना भुना पाती हैं, इस पर लोगों की नजरें टिकी हैं. ये भी सच है कि शर्मिला की हार एक तरह से मणिपुरी जनता की हार होगी, क्योंकि अब तक वे जोशो-खरोश के साथ जनता की लड़ाई लड़ रही थीं. लेकिन जब उन्होंने इस लड़ाई को राजनैतिक रूप से जारी रखने की घोषणा की, तो वही जनता बिदक गई.  
भाजपा ने भी इस सियासी जंग में कोई कसर नहीं छोड़ी है. भाजपा मैरीकॉम को स्टार प्रचारक बनाने जा रही हैं. राज्य में मैरी की छवि शर्मिला से कमतर नहीं है. वे ट्राइवल समुदाय से हैं, इसलिए भाजपा को उम्मीद है कि मैरी को स्टार प्रचारक बनाने से कांग्रेस के विरोधी पहाड़ी क्रिश्चियन धर्म मानने वाले लोग भाजपा की तरफ खींचेंगे. वैसे भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई है. मणिपुर में पहले विधानसभा चुनावों में भाजपा को एक भी कैंडिडेट खड़ा करने के लिए लोग नहीं मिलते थे, लेकिन अब स्थितियां तेजी से बदली हैं. असम में भाजपा की सरकार बनने के बाद पूर्वोत्तर में भाजपा का मनोबल और भी मजबूत हुआ है. मणिपुर के निवासियों की भी भाजपा में रुचि बढ़ी है. राज्य में कांग्रेस की सरकार लंबे समय से होने के बाद भी भाजपा इस बार मुकाबले में होगी. भाजपा कार्यकर्ता केंद्र सरकार की नीतियों का मणिपुर के गांव-गांव जाकर प्रचार करने में जुटे हैं. केंद्रीय मंत्री भी हर दो माह में पूर्वोत्तर राज्योंं का दौरा कर लोगों का हालचाल ले रहे हैं. लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत रेल लाइनों पर खूब काम हो रहा है. त्रिपुरा और मिजोरम तक रेल पहुंच गया है. मणिपुर में भी जिरिबाम तक रेल लाइनें बिछ गई हैं. उम्मीद है कि दो तीन-साल में राजधानी इंफाल तक रेलवे ट्रैक पहुंच जाएंगे. राज्य में चल रहे इन विकास कार्यों को देखकर लोगों में भी एक बदलाव की लहर चल पड़ी है. लोग महसूस कर रहे हैं कि कांग्रेस की अपेक्षा भाजपा राज्य के लिए कुछ तो कर रही है. उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मणिपुर में स्पोट्‌र्स यूनिवर्सिटी का उद्घाटन करेंगे. साथ में मैरीकॉम की बॉक्सिंग इंस्टीट्यूट का भी उद्घाटन होगा. भाजपा का नया अध्यक्ष भवानंद के बनने के बाद इंफाल के म्यूनिसिपल चुनाव में चार जगहों पर भाजपा की जीत हुई है. कुल मिलाकर भाजपा की स्थिति राज्य में मजबूत दिख रही है.
कांग्रेस सरकार से राज्य के लोग खफा हैं. लोगों को नौकरी दिलाने के नाम पर जमकर भ्रष्टाचार हो रहा है. लोगों को लगता है कि कांग्रेस सरकार केवल वादे करती है, जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं दिखता है. हाल में नए सात जिलों की घोषणा भी चुनाव के नजदीक आने पर की गई. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घोषणा 2011 में ही की जा सकती थी, तब राज्य को ब्लॉकेड का सामना नहीं करना पड़ता. 2011 में 120 दिन की आर्थिक नाकेबंदी हुई थी, उसमें भी सरकार ने लूंज-पूंज तरीके से काम किया. आम लोगों को आज भी इसकी जानकारी नहीं दी गई कि यूएनसी के साथ किन शर्तों पर समझौता किया गया. वहीं, अफस्पा के मामले में भी कांग्रेस सरकार ने कोई ठोस कार्य नहीं किया. शर्मिला 16 सालों से भूख हड़ताल पर थीं, लेकिन राज्य का कोई मंत्री या मुख्यमंत्री उनसे मिलने नहीं गया. इसे लेकर भी लोगों में काफी नाराजगी थी. यहां पुलिस और टीचर की नौकरी के नाम पर भी खूब हंगामा होते रहा. इंटरव्यू होने के बाद भी नतीजों की घोषणा नहीं की गई. इसे लेकर युवाओं में खासी नाराजगी थी. हाल में जब लोग आर्थिक नाकेबंदी का सामना कर रहे थे, तब भी सरकार सोई रही. राजनीति के कुछ जानकारों का कहना है कि राज्य में भाजपा की टक्कर सिर्फ कांग्रेस से है. मणिपुर में आम आदमी पार्टी के पास कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं है, जिसके बूते चुनावी मैदान में उतरा जा सके. पिछले विधानसभा चुनाव में भी आप का परफॉर्मेंस बुरा रहा था. लोग आम आदमी पार्टी में पूरी तरह भरोसा नहीं कर रहे हैं, इसका एक कारण यह भी है कि मणिपुर की स्थिति बाकी राज्यों से अलग है. आम आदमी पार्टी राज्य में अभी शुरुआती स्टेज पर है. बाकी पार्टियां सीपीआई एम, तृणमूल कांग्रेस, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, लोक जन शक्ति पार्टी, बहुजन समाज पार्टी आदि की भी कोई मजबूत स्थिति नहीं है. इन दलों को कुछ सीटें भी मिल जाएंगी, लेकिन वे सरकार बनाने की स्थिति में कतई नहीं होंगी. इस मामले में मणिपुर में एक अनूठा समीकरण बनता है. यहां सभी राजनीतिक दल   कांग्रेस को हराने के लिए एकजुट हो जाते हैं. भाजपा और वाम दल भी एक साथ हो जाते हैं. एमपीपी, जो मणिपुर की स्थानीय पार्टी है, उसकी स्थिति भी कमजोर हुई है. अधिकतर स्थानीय पार्टियों के मजबूत दावेदार कांग्रेस और भाजपा में शामिल हो गए हैं. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मणिपुर के चुनाव की स्थिति सत्ता पाने और बचाने के लिए संघर्ष होगी. 
मणिपुर विधानसभा चुनाव की अनुसूची
                                फेज 1                  फेज 2
अधिसूचना की तारीख            8.2.2017 (बुधवार)        11.2.2017 (शनिवार)  
नामांकन की अंतिम तिथि         15.2.2017 (बुधवार)      18.2.2017 (शनिवार)
नामांकन की जांच               16.2.2017 (गुरुवार)       20.2.2017 (सोमवार)
उम्मीदवारी वापसी लेने की तारीख  18.2.2017 (शनिवार)      22.2.2017 (बुधवार)
चुनाव की तारीख                4.3.2017 (शनिवार)       8.3.2017 (बुधवार)
मतगणना की तारीख             11.3.2017 (शनिवार)      11.3.2017 (शनिवार)
समापन की तिथि                15.3.2017 (बुधवार)      15.3.2017 (बुधवार)

चुनाव की तिथि तय होने के बाद भी नाकेबंदी वापस नहीं लेंगे ः यूएनसी

इधर, चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद यूएनसी ने कहा है कि नेशनल हाईवे से ब्लॉकेड नहीं हटाया जाएगा.  मणिपुर में नगा बहुल इलाकों में अशांति को दूर किए बिना शांतिपूर्ण चुनाव संभव नहीं होगा. यूएनसी के पूर्व अध्यक्ष केएस पोल लियो ने कहा कि नाकेबंदी वापस लेने की अपील राज्य सरकार ने कभी नहीं की है. सरकार की तरफ से राजनीति तौर पर कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. चुनाव आयोग की तरफ से राज्य में चुनाव की तारीख तय की गई है. हमारे पास आर्थिक नाकेबंदी को और तेज करने के अलावा कोई चारा नहीं है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार राज्य में रह रहे नगाओं को उपेक्षा की नजर से देखती है. राज्य में सात नए जिले बनाने में नगाओं की राय नहीं ली गई. अब राज्य के नगा बहुल इलाकों में चुनाव शांति से हो पाएगा, यह प्रशासन के लिए भी चिंता की बात होगी.

Friday 13 January 2017

नोटबंदी के दौर में नाकेबंदी ने जीना मुहाल किया

जायज मांगों के लिए विरोध और प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन अगर इससे नागरिकअधिकार प्रभावित हों, तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता. यही काम इस वक्त मणिपुर में हो रहा है. मणिपुर पिछले एक नवंबर से ब्लॉकेड (नाकेबंदी) की मार झेल रहा है. मणिपुर को जोड़ने वाले दोनों नेशनल हाईवे 39 एवं 53 को यूनाइटेड नगा काउंसिल ने ब्लॉक कर रखा है. ट्रांस एशियन रेलवेज प्रोजेक्ट और अन्य नेशनल प्रोजेक्ट भी बंद हैं. दो महीने बाद भी इसका समाधान नहीं निकला है, वहीं सरकार व अधिकारियों की चिंता केवल राज्य में चुनाव जल्द कराने की है. मणिपुर के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और अन्य मंत्री चुनाव जल्दी कराने के लिए अक्सर दिल्ली आते-जाते रहते हैं, लेकिन ब्लॉकेड की वजह से ठप पड़े राज्य के बारे में सोचने की फुर्सत उन्हें नहीं है. ब्लॉकेड के कारण आम लोगों को रोजमर्रा की चीजें, जैसे एलपीजी, पेट्रोल-डीजल, खाने-पीने का सामान एवं दवा आदि की भारी कमी झेलनी पड़ रही है.

इस ब्लॉकेड का कारण है मणिपुर सरकार द्वारा सात नए जिले की घोषणा. सरकार की इस घोषणा का विरोध करते हुए यूएनसी ने नेशनल हाईवे को ब्लॉकेड कर दिया है. यूएनसी एक मणिपुरी नगा संगठन है, जो नगालैंड और मणिपुर में सक्रिय रूप से काम करता है. यूएनसी, एनएससीएन-आईएम के सहयोग से चलने वाली संस्था है, जबकि एनएससीएन-आईएम की केंद्र सरकार के साथ वार्ता चल रही है. मणिपुर में नौ जिले थे, अब सात नए जिले मिलाकर कुल 16 जिले हो गए हैं. इन नए सात जिलों में जिरिबाम, कांगपोकपी, काकचिंग, तेंगनौपल, कामजोंग, नोने एवं फरजॉल हैं. जिरिबाम एवं कांगपोकपी नगा बहुल जिले हैं और सबसे अशांत क्षेत्र भी. पहले भी इन दोनों जगहों पर नाकेबंदी होती रही है. दोनों जगहों को जिला बनाने की घोषणा पर यूएनसी एतराज जता रही है. यूएनसी का मानना है कि नए जिले की घोषणा से नगा लोग अलग-अलग टुकड़ों में बंट जाएंगे. वे चाहते हैं कि एक ही जगह पर, एक ही प्रशासनिक क्षेत्र के अंदर वे रहें. लेकिन नए जिले बनने से एक ही गांव के अलग-अलग हिस्से, अलग-अलग जिलों में बंट जाएंगे. वैसे भी मणिपुर में बसे नगा समुदाय एनएससीएन-आईएम के नगालिम राज्य की मांग का समर्थन करते हैं. उनको ये लगता है कि सरकार उनको बांटने का काम कर रही है, जबकि मणिपुर की सरकार का मानना है कि सात नए जिले बनाना किसी खास जाति या समुदाय के खिलाफ नहीं है. यह केवल एक प्रशासनिक रूप से किया गया विभाजन है. इससे लोगों को प्रशासनिक काम-काज में सुविधा होगी. इससे इतर यूएनसी को एतराज है कि उनके अपने लोगों को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया है. राज्य सरकार उनको तोड़ने की साजिश कर रही है.
बहरहाल, राज्य में ब्लॉकेड का इतिहास बहुत लंबा और जटिल भी है. इसके पीछे कई कहानियां छुपी हैं. इसमें राज्य सरकार को निर्दोष नहीं माना जा सकता है. 2011 में भी सदर हिल्स डिस्ट्रिक की मांग को लेकर ब्लॉकेड हुआ था. उसके विरोध में यूएनसी ने 120 दिन का ब्लॉकेड कर आम जनता का जीना दुष्वार कर दिया था. मणिपुर के इस ब्लॉकेड के समाधान में केंद्र से ज्यादा जिम्मेदारी राज्य सरकार की है. 2011 में जब इन संगठनों के साथ सरकार का समझौता हुआ था, तो उस समझौते के शर्तों की जानकारी आज तक लोगों को नहीं दी गई. इतने लंबे समय का ब्लॉकेड कैसे खत्म हुआ था और क्या-क्या शर्तें मानी गईं, यह किसी को नहीं पता चल सका. तुलनात्मक विश्लेषण करें, तो आज यह ब्लॉकेड वैसा ही, जैसा उस वक्त लोग सदर हिल्स डिस्ट्रीक की मांग कर रहे थे. सरकार ने सही निर्णय लेकर क्यों नहीं उसी वक्त समाधान निकाला. सदर हिल्स (जिरिबाम) को एक जिला घोषित करने की रूप-रेखा उसी समय तैयार हो चुकी थी, फिर भी राज्य सरकार ने घोषित नहीं किया. अगर उस वक्त तत्काल घोषणा की गई होती, तो अब यह समस्या पैदा नहीं होती. अब राज्य में चुनाव नजदीक आने के बाद राज्य सरकार ने सात नए जिलों की घोषणा कर लोगों में अशांति का माहौल पैदा कर दिया है.

इस समय राज्य में हालत ये है कि ढाई सौ से तीन सौ रुपए प्रति लीटर पेट्रोल भी लोगों को नहीं मिल रहा है. गांवों में आलू-दाल जैसे आसानी से मिलने वाले सामान भी नहीं मिल रहे हैं. पेट्रोल-डीजल की भारी कमी की वजह से गाड़ियों का आना-जाना बंद हो गया है. जो गाड़ियां चल भी रही हैं, तो उसका भाड़ा दोगुना कर दिया गया है. इस दौरान दो सप्ताह तक इंटरनेट सेवा बंद रखा गया था. एक तरफ लोग नोटबंदी की मार झेलने को मजबूर थे, तो वहीं  ब्लॉकेड ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया. 



यूएनसी द्वारा मणिपुर में किया जा रहा इकोनॉमी ब्लॉकेड असंवैधानिक है. यह ब्लॉकेड मणिपुर के 28 लाख लोगों के पेट पर लात मारता है. यह राज्य सरकार की नाकामी है. नए जिले बनाने से सरकार नगाओं के हक नहीं छीन रही है. उनको जो भी स्टेटस पहले से मिल रहा था, वही स्टेटस और सुविधाएं इन नए जिलों में भी सुरक्षित रहेंगे.
एलांगबम जोनसन, अध्यक्ष, यूनाइटेड कमेटी मणिपुर (यूसीएम)

जमीन से नगाओं का अटूट संबंध रहा है. पूर्वजों की परंपरा, संस्कृति और एकता से जुड़ी व्यवस्था और नियम का हमेशा सम्मान करना नगाओं की जिम्मेदारी है. इसपर अगर हमें कोई बांटने की कोशिश करता है, तो हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे.
पीए थेको (नगा), सोशल एक्टिविस्ट

Monday 28 November 2016

बनने से पहले ही विवादों में मणिपुर स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी


मणिपुर में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाना मोदी सरकार के पहले 100 दिन के एजेंडे में शामिल था. इसके लिए यूनियन बजट में 100 करोड़ रुपये का प्रावधान भी कर दिया गया. लेकिन अब तक यूनिवर्सिटी के लिए जमीन तय करने का काम भी पूरा नहीं हो पाया है. स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी में पढ़कर खिलाड़ी बनने का सपना पाले बच्चों का भविष्य केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेदों में उलझ कर रह गया है. पहले सौ दिन क्या, मोदी सरकार ने अपने दो साल पूरे कर लिए लेकिन स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वादा अभी तक अधर में लटका पड़ा है.
स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के लिए राज्य सरकार से केंद्र की मांग 200 एकड़ जमीन की थी. लेकिन राज्य सरकार ने इसके लिए निर्धारित जमीन से ज्यादा ही एलॉट कर दिया. मणिपुर सरकार ने 27 अगस्त 2015 को याइथिबी लौकोल में 336.93 एकड़ जमीन स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री को दे दी थी. याइथिबी लौकोल, थौबाल जिले में पड़ता है. हालांकि जमीन मालिक शुरू से ही इसका विरोध कर रहे थे. राज्य सरकार के द्वारा जमीन एलॉट किए जाने के एक साल बाद चार नवंबर 2016 को इंफाल दौरे पर आए केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने उस जगह को स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के लिए नापसंद कर दिया.

स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के लिए राज्य सरकार ने थौबाल जिले के सोरा गांव स्थित याइथिबी लौकोल की जो जमीन एलॉट की थी, वह उपजाऊ खेतीहर जमीन है. सोरा दो पहाड़ों के बीच बसा एक गांव है, जिसकी आवादी 7500 के करीब है. लगभग 300 जमीन मालिकों ने उस जमीन पर स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने का विरोध किया था. सोरा निवासी इफेक्टेड लैंड एसोसिएशन के जॉइंट सेक्रेटरी एमडी नजीमुद्दीन का कहना है कि यह विरोध लैंड एक्यूजिशन से पहले हुआ था. हम लोग भी विकास चाहते हैं. मणिपुर में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने का हम स्वागत करते हैं. लेकिन इस जमीन पर लोगों की रोजी रोटी चल रही है. अगर यहां स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनता है, तो हमारा घर और खेती की जमीन बर्बाद हो जाएंगे. हमें ऐसा विकास पसंद नहीं, जो हमें बेघर बनाकर किया जा रहा है. इसलिए हम लोग विरोध करते हैं. राज्य सरकार के द्वारा लोगों को जानकारी नहीं देने की वजह से जमीन पर विवाद बढ़ा. विजय गोयल के इंफाल दौरे में याइथिबी लौकोल में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने के फैसले से नाखुश ग्रामीणों ने जमकर विरोध किया. भीड़ को काबू कर रही पुलिस और ग्रामीणों में तीखी नोक-झोक भी हुई, जिसमें 22 लोग घायल हुए.
अब सोरा के लोगों के विरोध को केंद्र सरकार की तरफ से इस जगह को नापसंद करने की वजह बताया जा रहा है. राज्य के लोगों ने आरोप लगाया कि सोरा की जनता ने भाजपा से मिलकर यहां से यूनिवर्सिटी को शिफ्ट करवाया है. लोगों को इस बात का भी डर है कि जमीन विवाद को देखते हुए कहीं इस यूनिवर्सिटी को मणिपुर से असम शिफ्ट न कर दिया जाए. पूर्व खेल मंत्री, असम के सीएम सर्वानंद सोनोवाल पहले भी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी को असम में खुलवाने की बात कह चुके हैं. जमीन चिन्हित करते समय ही अगर राज्य सरकार ने इस बारे में जानकारों से राय-मशवरा लिया होता, तो यह विवाद नहीं होता. अब विवाद बढ़ गया, तब मुख्यमंत्री ने बयान जारी किया कि राज्य सरकार को राज्य में कहीं पर भी यूनिवर्सिटी बनाने में कोई एतराज नहीं है. अगर उन्होंने यह बयान पहले दिया होता, तो सब सामान्य होता. राज्य सरकार को अब भी जमीन विवाद को लेकर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए, ताकि जल्द से जल्द यूनिवर्सिटी का कार्य शुरू हो सके. राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है. ऐसे में राज्य की कांग्रेस सरकार और विपक्षी भाजपा इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेना चाह रही हैं. दोनों एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं. होना यह चाहिए कि केंद्र और राज्य की सरकारें एकमत होकर स्थानीय जनता के सहयोग से एक जगह तय करें, ताकि पूर्वोत्तर के युवाओं ने इस स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के सहारे खिलाड़ी बनने का जो सपना देखा है, वह सच साबित हो सके.

याइथिबी लौकोल की जगह कौक्रूक में बने स्पोर्ट्स यूनिवसिर्टीः विजय गोयल

राज्य सरकार याइथिबी लौकोल में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाना चाहती हैलेकिन केंद्र सरकार इस जगह को पसंद नहीं करती. खेल मंत्री के इंफाल दौरे के दौरान उन्होंने पत्रकारोंे से बताया कि मणिपुर एक छोटा राज्य होने के बाद भी खेलकूद के क्षेत्र में आगे है. मणिपुर के खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रौशन किया है. आगे भी मणिपुर से और भी खिलाड़ी देश का नाम कमाएंगेइसी मकसद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणिपुर में एक स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने का एलान किया था. उन्होंने कहा कि खेल के क्षेत्र में सबसे आगे रहने वाले राज्य में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने में देरी होना सही नहीं है. कहां जमीन देना हैयह राज्य सरकार की मर्जी है. राज्य सरकार ने जमीन देने में दो साल लगा दिया. उसके बाद भी जो जमीन मिली हैवह विवादित होने के साथ-साथ लो लैंड जमीन भी है. यह जगह राजधानी इंफाल से ज्यादा दूरी पर हैजो कानून व्यवस्था के लिहाज से भी सही नहीं है. यह यूनिवर्सिटी केवल देश के लिए नहीं विदेशों से भी कोच और खिलाड़ी आनेवाले हैं. इसलिए हम चाहते हैं कि यह स्पोटर्स यूनिवसिर्टी याइथिबी लौकोल की जगह इंफाल वेस्ट स्थित कौक्रूक में बने. 

राज्य ने नहीं केंद्र ने तय की थी जमीन : मुख्यमंत्री
राज्य के मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह ने कहा कि मणिपुर में नेशनल स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने की जगह राज्य ने तय नहीं किया था. यह निर्णय केंद्र सरकार का था. जमीन फाइनल करने से पहले हमने उसे केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों को दिखाया था. अगर यह जमीन पसंद नहीं आई, तो उन्हें पहले ही कहना चाहिए था. सबकुछ तय होने के बाद अब इस तरह का बयान आना आश्‍चर्यजनक बात है. केंद्र के आदेश पर राज्य सरकार ने कुछ जगहों को स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री के सेक्रेटरी को दिखाया था. उन जगहों में कौक्रूक, याइथिबी लौकोल, नारानसैना और ताकमू आदि शामिल था. उन जगहों में याइथिबी लौकोल को सबसे ज्यादा पसंद किया था. अब एक साल बाद केंद्र सरकार की तरफ से याइथिबी लौकोल को नापसंद करने की बात समझ से परे है. राज्य सरकार की तरफ से राज्य की किसी भी जगह पर स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने में कोई आपत्ति नहीं है.

Wednesday 26 October 2016

आदिवासियों का हक छीनने का कुचक्र

मणिपुर विश्‍वविद्यालय आरक्षण मुद्दा
देश के अन्य हिस्सों की तरह आरक्षण का मुद्दा अब पूर्वोत्तर भारत में भी उठने लगा है. हाल में मणिपुर विश्‍वविद्यालय में आरक्षण को लेकर एक तनावपूर्ण स्थिति बनी है. उपद्रवियों ने विश्‍वविद्यालय के रिक्रिएशन हॉल, तीन डीटीपी हॉल और कैंटीन को जला दिया है. मणिपुर विश्‍वविद्यालय ट्राइवल स्टूडेंट्स यूनियन की मांग है कि आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के नॉर्म्स द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रिजर्वेशन इन एडमिशन) एमेंडमेंट एक्ट 2012 लागू हों. राज्य सरकार के नॉर्म्स के अनुसार एसटी को 31 प्रतिशत, एससी को 2 प्रतिशत और ओबीसी को 17 प्रतिशत आरक्षण मिला है, लेकिन विश्‍वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मणिपुर यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल चुका है, इसलिए यूजीसी के आरक्षण नॉर्म्स द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रिजर्वेशन इन एडमिशन) एक्ट 2006 के हिसाब से होने चाहिए. यूजीसी नॉर्म्स के अनुसारएसटी को 7.5 प्रतिशत, एससी को 15 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत का आरक्षण मिलता है. प्रशासन के इस निर्णय को लेकर ट्राइवल स्टूडेंट्स ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है. यूनिवर्सिटी का नया सत्र इस विरोध-प्रदर्शन की भेंट चढ़ गया. नया सत्र जून में शुरू होना था, जो अब तक शुरू नहीं हो सका है. यहां तक कि पिछली परीक्षाओं का परिणाम भी अभी तक घोषित नहीं किया गया है.

पुलिस प्रशासन ने भी तत्परता दिखाते हुए विश्‍वविद्यालय के कुछ हिस्सों को जलाने के मामले में 18 छात्रों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है. इसके बाद मणिपुर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट् यूनियन पकड़े गए छात्रों को जल्द से जल्द छोड़ने की मांग कर रही है. वहीं विश्‍वविद्यालय में आगजनी की घटना के बाद यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर इन चार्ज प्रोफेसर एम धनेश्‍वर ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को इस्तीफा सौंप दिया है. प्रोफेसर धनेश्‍वर को पूर्व वाइस चांसलर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कुछ समय के लिए प्रभार सौंपा गया था, लेकिन यूनिवर्सिटी में अशांत माहौल व शैक्षणिक वातावरण में सुधार नहीं होने के कारण उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा. 

गौरतलब है कि मणिपुर विश्‍वविद्यालय की स्थापना 5 जून 1980 को हुई थी. तबसे विश्‍वविद्यालय में नामांकन व टीचिंग और नन टीचिंग स्टाफ की नौकरी में आरक्षण को लेकर राज्य सरकार के नॉर्म्स ही चले आ रहे थे. 13 अक्टूबर 2005 को मणिपुर यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलने के बाद से यानी 2006-07 के सत्र से यहां सेंट्रल यूनिवर्सिटी का नॉॅर्म्स शुरू होना था. फिर भी विश्‍वविद्यालय प्रशासन कुछ समय तक राज्य सरकार के आरक्षण नॉर्म्स का ही पालन करता रहा. दो साल गुजर जाने के बाद 2008-09 में यहां सेंट्रल का आरक्षण नॉर्म्स चलाना शुरू किया गया था. इसी समय से ट्राइवल स्टूडेंट्स ने विरोध शुरू किया था, जो अबतक जारी है. फिर 2012 में बिल एमेंडमेंड हुआ. द सेंट्रल एडुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एमेंडमेंट एक्ट 2012 को 2012 से लेकर 2015 तक विश्‍वविद्यालय में चलाया जा चुका है. ट्राइवल स्टूडेंट्स ने इस मामले को लेकर कोर्ट की शरण ली.  इस मामले में कोर्ट ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को यह सुझाव दिया कि दोनों एक्ट में से जो उचित लगे, उसे चलाया जाए. इसके बाद विवि प्रशासन ने 4 अप्रैल 2016 को ऐलान किया कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी के नॉर्म्स ही फिर से विश्‍वविद्यालय के 2016-2017 एडमिशन में लागू होंगे. इस निर्णय से नाखुश मणिपुर यूनिवर्सिटी ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया.

ट्राइवल स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बोस्को जायचे खरम ने कहा कि जो आरक्षण के नियम चलाए जा रहे थे, उसे छोड़कर दूसरा नियम तत्काल लागू करना छात्रों को मंजूर नहीं है. उन्होंने कहा कि हम लोग जो चीज नहीं है, उसकी मांग नहीं कर रहे हैं. जो नियम था, उसी को बरकरार रखने की मांग कर रहे हैं. हमारी मांग केवल गु्रप सी और डी में ही इस नियम को लागू करवाने की है. 23 मार्च 2016 को यूजीसी की तरफ से एक सख्त निर्देश विश्‍वविद्यालय प्रशासन को दिए गए थे. इसके कुछ दिनों बाद रिजर्वेशन के नियम बदल देना ट्राइवल स्टूडेंट्स की उपेक्षा करना है. खरम ने कहा कि अगर सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनकर भी छात्रों को उनका उचित हक नहीं मिल रहा है, तो राज्य के विवि रहना ही ज्यादा अच्छा है. उन्होंने कहा कि 2012 के एमेंडमेंड बिल लागू होने के बावजूद ट्राइवल स्टूडेंट्स की उपेक्षा होती रही. ऐसे में 2006 वाला कानून अगर लागू होगा, तो हम लोगों के यहां पढ़ाई करने का कोई मतलब नहीं है. इसलिए ट्राइवल छात्रों ने विश्‍वविद्यालय का छात्रावास 10 अक्टूबर को छोड़ दिया. जो बाकी छात्र बचे रह गए उन्होंने भी कक्षा के बहिष्कार करने का एलान किया. मुत्सू (मणिपुर ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन) ने चेतावनी दी है कि विवि प्रशासन ने अगर अपने निर्णय वापस नहीं लिए तो यूनिवर्सिटी के बाहर भी विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे.
दूसरी तरफ, मुसू ( मणिपुर यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन) के अध्यक्ष ओइनाम प्रेमसागर ने मांग की है कि विवि में अशांति के माहौल को तत्काल खत्म किया जाए. साथ में यह भी मांग की कि जो प्रशासन ने निर्णय लिया है, उसे जल्द चालू कराकर प्रवेश प्रक्रिया शुरू की जाए. मुसू छात्रों की एक सामूहिक संस्था है, जिसमें ट्राइवल छात्र (ईसाई धर्म मानने वाले), हिंदू (जो जनरल कैटेगरी के हैं) एवं मुसलमान छात्र भी शामिल हैं. लेकिन मुत्सू (मणिपुर ट्राइवल स्टूडेंट यूनियन) केवल ट्राइवल छात्रों का संगठन है, जो एसटी में आता है.

मणिपुर युनिवर्सिटी का आरक्षण मुद्दा ट्राइवल और घाटी में रह रहे सभी जातियों (हिंदू, मुसलमान व मैतै), जो एससी और ओबीसी हैं, के बीच संघर्ष का कारण बन सकता है. राज्य में 2011 की जनगणना के अनुसार, मणिपुर की 25 लाख आबादी में से करीब   9 लाख ट्राइवल्स हैं, जो पहाड़ों में रहते हैं, जबकि बाकी हिस्से के लोग घाटी में. मणिपुर में पहले भी पहाड़ बनाम घाटी का विवाद चलता रहा है. एक सवाल यह भी उठ रहा है कि शहर के कुछ हिस्सों को छोड़कर, बाकी ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मैतै समुदाय के लोग गरीब और पिछड़े हैं. वे अधिकतर ओबीसी में आते हैं. ऐसे में अगर 2006 का कानून विवि में अगर लागू नहीं होगा, तो ट्राइवल स्टूडेंट्स के अलावा बाकी समुदाय के छात्र भी आंदोलन कर सकते हैं. वहीं विश्‍वविद्यालय प्रशासन को इस बात की चिंता सता रही है कि छात्रों के इस विरोध-प्रदर्शन के चक्कर में कहीं यूजीसी ग्रांट न बंद हो जाए. अगर समय रहते विश्‍वविद्यालय प्रशासन व छात्र संगठनों के बीच विवाद को नहीं सुलझा लिया गया, तब आने वाले समय में जातीय व सांप्रदायिक टकराव का रूप ले सकता है. इस मुद्दे पर यूजीसी और राज्य सरकार को पहल कर विश्‍वविद्यालय में आरक्षण मुद्दे का समाधान निकाल लेना चाहिए.