सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड में, तुम भी निकल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहां बदलती हैं तुम अपने आपको खुद ही बदल सको तो चलो
यहां किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो
यही है जिंदगी कुछ ख्वाब, चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो.
परिचय
Salam Singh
Bishnupur, Manipur, India
घर से पढने निकला था, मगर अखबारी दुनिया में आए। देवघर, सिलीगुडी, पटना, जालंधर व लुधियाना से भटकते-भटकते अब दिल्ली पहुंचा। दिल्ली में सबसे पहले देशबंधु में काम किया। मगर ज्यादा दिन रुकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। उसके बाद एचटी ने बहुत अच्छा मौका मुझ को दिया। बहुत कम दिन एचटी में रहा। किसी भी दुनिया में अपने आपको जंचा नहीं इसलिए अब चौथी दुनिया में आया। सोच रहा हूं कि चौथी दुनिया में मन लग जाए। वैसे मैं ईमानदारी चाहता हूं। मगर मिलती नहीं है। मैं अपने ऊपर भरोसा रखता हूं। सफलता की ऊंचाई छूने की तमन्न रखता हूं। हिंदी साहित्यकारों की रचनाऒं से हमेशा सीख मिलती है। और अपने आपको सुधारने की कोशिश करता हूं।
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अजनबी शहर में हम जहां हैं वह देश जैसा दिखाई देता है. पर है परदेश. सरकारी विज्ञप्तियां बताती हैं यह हमारा देश है. लेकिन आवाजों का संजाल कहीं न कहीं से कचोट कर हकीकत को सामने रख देता है. दुष्यंत होते तो कहते - हमको पता नहीं था हमे अब पता चला, इस मुल्क में हमारी हूकूमत नहीं रही. इसी परदेश और देश की संधि रेखा पर खडे होकर हम बात करेंगे. सीमाओं की जो हमने नहीं खींची. धरती पर आने के साथ हमें मिली हैं.
1 comments:
बढ़िया है और पेश करें.
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