यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Saturday, May 14, 2011

खांडू की मौत से उपजे सवाल

बीते 30 अप्रैल को हेलीकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की असामयिक मृत्यु हो गई. इससे भी ज़्यादा दु:ख की बात यह है कि इस तरह की दुर्घटनाएं बार-बार हो रही हैं. इस हादसे से पहले भी कई वीवीआईपी हेलीकॉप्टर दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं, लेकिन यह दुर्घटना एक साथ कई सवाल खड़े कर रही है. मालूम हो कि अरुणाचल की सीमा चीन से लगी हुई है. चीन सीमा से सटे होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं का अभाव है. अपने कड़े रुख के कारण खांडू चीन की आंखों की किरकिरी बने हुए थे. खांडू ने बीते 30 अप्रैल की सुबह पवन हंस हेलीकॉप्टर कंपनी के यूरोकाप्टर बी-8 से उड़ान भरी थी. उड़ान भरने के 20 मिनट बाद ही यह हेलीकॉप्टर लापता हो गया और उसका संपर्क नियंत्रण कक्ष से टूट गया. इसी बीच किसी अज्ञात सेटेलाइट फोन से ़खबर आई कि खांडू को ले जा रहा हेलीकॉप्टर भूटान के सीमावर्ती क्षेत्र में उतर गया है, लेकिन बाद में इसकी पुष्टि नहीं हुई. यह किसका सेटेलाइट फोन था, इस पर भी अभी रहस्य बना हुआ है. अरुणाचल जैसे दुर्गम क्षेत्र में पवन हंस कंपनी के हेलीकॉप्टरों के बार-बार दुर्घटनाग्रस्त होने के बावजूद सरकार सबक क्यों नहीं ले रही है? पिछले दिनों तवांग में पवन हंस का एक और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें 17 लोगों की मौत हो गई थी. उसके बाद पवन हंस कंपनी की सेवा और लापरवाही को लेकर कई सवाल भी उठे थे. यही नहीं, पूूर्वोत्तर की विभिन्न राज्य सरकारें भी कई बार शिकायत कर चुकी थीं. बावजूद इसके इस इलाक़े में पवन हंस कंपनी की हेलीकॉप्टर सेवा जारी रहना कई तरह के संदेह पैदा करता है. तवांग जैसे बीहड़ क्षेत्र में मुख्यमंत्री को ले जाने वाले पवन हंस हेलीकॉप्टर में केवल एक इंजन लगा होना लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण है. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि पवन हंस कंपनी का रिकॉर्ड इतना खराब होने के बावजूद उसके एक इंजन वाले हेलीकॉप्टर की सेवा क्यों ली गई? लगातार पांच दिनों तक सेना, सीमा सड़क संगठन, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, एसएसबी और अरुणाचल पुलिस के क़रीब 3 हज़ार जवान हेलीकॉप्टर खोजने के अभियान में जुटे रहे. यही नहीं, वायुसेना के सुखोई-30 विमानों-हेलीकॉप्टरों और इसरो ने भी इस अभियान में का़फी मेहनत की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. सारे प्रयास धरे के धरे रह गए. बाद में ग्रामीणों ने शवों और हेलीकॉप्टर के मलवे को देखा और उन्होंने ही अरुणाचल नियंत्रण कक्ष को इसकी सूचना दी. उसके बाद सुरक्षाबल वहां पहुंचे और शवों की पहचान हुई. दोरजी का शव क्एला और लोबोथांग के बीच पाया गया. इस दुुर्घटना में जान गंवाने वालों में खांडू के अलावा पायलट जे एस बब्बर, कैप्टन टी एस मामिक, खांडू के सुरक्षा अधिकारी एशी कोडक और तवांग के विधायक त्सेवांग धोंडप की बहन एशी ल्हामू भी शामिल थे. अरुणाचल की जनता द्वारा पवन हंस कंपनी के कार्यालय में तोड़फोड़ करना स्वाभाविक था. केंद्र सरकार को तत्काल प्रभाव से पवन हंस की सेवा बंद कर देनी चाहिए, साथ ही इस कंपनी को काली सूची में डाल देने की ज़रूरत है. इस बात की जांच होनी चाहिए कि अनुभवहीन पायलटों के कारण तो ऐसी घटना नहीं हुई? केंद्र सरकार को इस दिशा में गंभीरता से क़दम उठाना होगा. खांडू से पहले भी विभिन्न विमान दुर्घटनाओं में अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की मौत हो चुकी है. वर्ष 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी भी नल्लामल्ला की पहाड़ियों में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से मारे गए थे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधवराव सिंधिया, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जी एम सी बालयोगी, कांग्रेस के युवा नेता संजय गांधी और पूर्व केंद्रीय इस्पात मंत्री मोहन कुमार मंगल की मौत भी इसी प्रकार हुई थी.

बांग्लादेश युद्ध और दोरजी


56 वर्षीय दोरजी खांडू मोनपा जनजाति के थे. उनके परिवार में चार पत्नियां, चार पुत्र और दो पुत्रियां हैं. दोरजी एक ज़मीनी कार्यकर्ता थे. वह अपनी मेहनत के बल पर राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. खांडू ने अपना राजनीतिक सफर राज्य के दूरदराज इलाक़ों में स्कूल खोलने और पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित कराने में मदद करने वाले स्थानीय नेता के रूप में शुरू किया था. वह बौद्ध धर्म मानते थे. दो-दो बार मुख्यमंत्री पद संभालने वाले खांडू सात साल तक सेना की ़खु़िफया शाखा से जुड़े रहे. 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान उल्लेखनीय सेवा के लिए उन्हें स्वर्ण पदक से नवाजा गया. तीन मार्च, 1955 को तवांग में जन्मे खांडू 1980 में अंचल समिति के सदस्य बने. इसके बाद उन्होंने दूरदराज के गांवों में सामाजिक कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया. उन्होंने अपने गृह ज़िले में पेयजल, बिजली एवं संचार सुविधाएं पहुंचाने और स्कूल स्थापित कराने में अहम भूमिका निभाई. 1983 में वह वेस्ट कामेंग डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के उपाध्यक्ष बने और 1990 में मुक्तो क्षेत्र से निर्विरोध विधायक चुने गए. 2007 में वह गेगांग अपांग की जगह मुख्यमंत्री बने.

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