यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Tuesday, August 5, 2008

गोर्की की मां


मुर्झाया हुआ चेहरा। रोज एक मोची के पास बैठता है। कौन है वह बच्चा? यह सवाल चारों तरफ से उठता है। वह जूता पालिश करता है। थोड़ी देर बाद फटी हुई अपनी जेब से कलम निकाल कर कुछ लिख भी रहा है। वह क्या लिख रहा है? क्या सोच रहा है? वह किसका बेटा है?
लिखते-लिखते ही वह मुस्कराने लगता है। अगले पल में फिर रोने लगता है। इस मासूम चेहरे के पीछे वह एक पहेली छिपा रहा है। निर्मल जल की तरह बह रहे आंसू से क्या कहना चाह रहा है? यह सवाल पसीने बेचने गए श्रमिकों की जुबान से निकला है। सूरज अपनी किरणें समेट कर निशा के सागर में कूदते समय फूटी हुई थाली पर रोटी रख कर बुजुर्ग उस मोची के साथ हंसते हुए रोटी खा रहा है। जीने के लिए, रात की भूख मिटाने के लिए। शाम जब घर वापस जा रहा होता है, तो जेब में हाथ डाल कर देखता है कि उसकी कलम कहीं न छूट गई हो। जूता पालिश करते-करते जो पर्ची में लिखा था, वह पर्ची बहुत संभालकर रखता है। यह बालक कौन है? जूता बनाने वाले उस बुजुर्ग की छत्रछाया में जवानी के वक्त का इंतजार कर रहा वह बालक और कोई नहीं, विश्वविख्यात लेखक मेक्सिम गोर्की हैं।
मेक्सिम गोर्की 28 मार्च 1868 को रूस के निजान नोभागोरोद शहर में जन्मे थे। जब वे इस धरती पर आए तो रूस की जनता की स्थिति बहुत नाजुक थी। उस समय कोई भी बच्चा खुलकर रो नहीं सकता था। निर्मम जारों के जुल्म से रूस के मर्द, औरत और बच्चे सभी खुले सांस नहीं ले सकते थे। इस विश्वविख्यात लेखक की जिंदगी भी बहुत ही दुख-दर्द से भरी थी। बचपन में ही अपने मां-बाप खो दिया था उन्होंने। अनाथ होकर उनका पूरा जीवन बीता। उनकी क्रञंतिकारी कलम कई बार परीक्षा की अग्निकुंड से बाहर निकलकर बाहर आई थी।

दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होते थे उन्हें। उनका बचपन जार और पूंजीपतियों द्वारा किसान व श्रमिकों की जिंदगी को कोल्हू में बार-बार पिसते, पसीने का उचित दाम नहीं देते, कम उम्र के बच्चों से तब तक काम करवाते जब तक वे पूरी तरह थक न जाते। इसके बाद भी वे थकने पर आराम नहीं कर सकते थे, इसी तरह के निर्मम दृश्यों को देख कर और दांत पीस कर सहते हुए बीता। क्रञंति लाने वाले एक सिपाही होकर बेचारे व बेसहारे जानों को फिर से स्वतंत्र कराने की उन्होंने मन में ढान ली थी। कौन सा सिपाही! कलम के सिपाही बन कर समर के मैदान में कूद कर सोया हुआ रूस के शेरों की आत्मा को जगाने के लिए उन्होंने सोचा। रोटी के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता है, इसलिए पेट पालने के लिए उन्होंने पत्थर तोडऩे का काम किया। जारों के बोझ उठाते थे। दिल में सोचा था कि आज मैं जो बोझ उठा रहा हूं, यह एक दिन पूंजीपति, आदमी बेचने वाले तुम लोगों के ऊपर पहाड़ की तरह गिरेगा। मत भूलो। छोटे दिल के अनकही विचार है उस बच्चे का। मजदूर से मिली छोटी रकम से कागज खरीद कर पर्चे हाथ से लिख कर रास्ते में फेंकता था। शासन कर रहे जारों ने खोजबीन शुरू की। किसने लिखा? वह बालक गिरफ्तार किया गया। जेल में रख कर अत्याचार किया। उसके दिल के पर्चे से सोई हुई रूस की जनता जग गई। शोषितों के दिल में लहर उठने लगी। हम इंसान है। इंसान इंसान पर अत्याचार क्यों रहा है ? गुलामी की कड़ी को तोडऩे की कोशिश शुरू हुई। रूस की जनता ने सोचना शुरू किया कि अपने पास से डर दूर भगाएं, आने वाले कल के लिए लडऩा चाहिए। मगर मां के बिना कोई लड़ाई सफल नहीं हो सकता। उनके आशीर्वाद से ही लड़ाई सफल होगी। लाखों बेटों को लड़ाई के मैदान में भेजने के लिए गोर्की की कलम से निकली 'मां'। 'मां' में लेखक की जिंदगी की छवि झलकती थी। उस समय समाज में नारियों को बेजुबान पेड़-पौधों की तरह समझा जाता था। पूंजिपतियों के फैक्ट्री के सुनसान कमरे में औरतों को गुडिय़ा की तरह नचाया जाता था। यह अत्याचार किसी भी औरत के बर्दाश्त की सीमा के बाहर था। 'मां' में गोर्की की मां कम उम्र में विधवा हो गई थी। उस समय के समाज में एक विधवा को कितनी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं, यह 'मां' में दर्शाया गया है। नारी तो अबला की तरह है। कोमल व शांत। मां अग्निपरीक्षा देकर बाहर निकली मूर्ति की तरह लगी। अत्याचार झेले हुए लोगों के प्रतिनिधि के रूप में निकला। मजदूर का बेटा, मजदूर पालभेन! फैक्ट्री में काम कर रहे इस बच्चे ने वादा किया कि अत्याचारियों के खिलाफ लड़ूंगा। वह बालक अपनी मां की जान है। मां उसके सहारे ही जी रही है। पालभेन अन्य बच्चों की तरह नहीं लगता। उसका विचार अलग हैं। उस बालक के चेहरे से मां को शक हो रहा है। एकांत रात में जो गीत वो गुनगुना रहा है, जाने किससे पहेली पूछ रहा है? जवान बेटे को कौन सी बात परेशान कर रही है जो उसका कमल जैसा मासूम चेहरा मुरझाया हुआ है। बार-बार मां अपने आप से यह सवाल कर रही है। मां ने अपने बेटे से पूछा- बेटे तुम क्या सोच रहे हो? बालक मुस्कुरा कर जवाब देता है- मां मैं इस पिंजरे से कब बाहर निकल पाउंगा। इस पिंजरे में मेरे जैसे कई लोग सो रहे हैं। बेटे के जवाब से मां चौक गई। मेरे बाप भी इस पिंजरे में ही मर गए थे। मुझे इस पिंजरे को तोड़ कर निकालने वाला कोई नहीं है, इसलिए आंख खोल कर सो रहा हूं। इस जवाब से मां को बहुत बेचैनी होती है। मां से बेटा न जाने कितनी बार सवाल करता था कि हम वही हैं न जो मनुष्य नाम के जीव हैं? वे भी इंसान हैं? मुझे नहीं मालूम...। उस बालक के सवाल मां केञ् लिए सरदर्दी के बराबर था। वह कम उम्र का बालक अपनी मां से बार-बार यही सवाल पूछता था। मां सच्चाई क्यों कमजोर होती है? मैं सिपाही बनना चाहता हूं। सच्चाई के साथ गले लगा कर चलने वाला सिपाही! यह कह कर पालभेन का सिर झुक गया। वह सोचने लगा कि जो मैं सोच रहा हूं या जो मेरी उम्मीदें हैं, उस संसार में अपनी मां को कैसे लाऊं? अपने बेटे के प्यार के आसपास में घूम रहे विचार। पालभेन नामक बेटा मुझ पर लगी प्यार की सुगंध, मेरे जैसे कितने बेटों को बांट सकूं? वही प्यार जो मां अपने बेटे को करती है, वह प्यार कितने दिलों को जगाएगा। मां अपने सगे बेटे से जो प्यार करती है वह प्यार कम उम्र में फैक्ट्री में मजदूर कर रहे, कड़ी धूप में अपने चेहरे के पसीने तक पोंछ नहीं सके कई बेटों को बांटना शुरू कर दिया। पालभेन की मां खाली पालभेन की ही मां नहीं रहीं। पालभेन जैसे हजार-हजारों बेटों पर अपनी ममता न्योछावर कर रही है। केवल बेटों से नहीं हम माएं भी लड़ेंगी। हम भी सिपाही बनेंगी। कौन सी सिपाही? सत्य-अहिंसा चाहने वाली। मातृभूमि को समर्पित अपने बेटों की मां।
समाज और देश की शांति और विकास के लिए निकले संगठनों के सामने गोर्की की मां की तरह कई मांओं को खडा होना होगा। मां के आशीर्वाद के बिना जो भी क्रांति के लड़ाई लड़ेगा, वो कभी भी सफल नहीं होता।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

माँ का हिन्दी संस्करण नेट पर उपलब्ध होना चाहिए।

Shiv Kumar Mishra said...

शानदार पोस्ट है...आज पहली बार आपका ब्लॉग देखा. बहुत खुशी हुई.

jeetendra said...

bahut acha likh tumny. padh kar acha laga.