यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Monday, August 3, 2009

मीर, मैं तुम्‍हारे सिरहाने बोल रहा हूं



उन तमाम बच्चों के लिए, जो अमरीकी आर्थिक प्रतिबंध के कारण मारे गए)

तुम्हारे दु:खों को मैं जानता हूं
तुम्हारे आंसू मेरे चेहरे को भींगो रहे हैं
मैं जानता हूं
तुम अभी-अभी रोते-रोते सोये हो
फिर भी
मैं तुम्हारे सिरहाने बैठ कर बोल रहा हूं, मीर!
बहुत उदास है रात,पसरा है मातमी सन्नाटा
कहीं से कोई आवाज नहीं,कोई पुकार भी नहीं
मैं बताना चाहता हूं
कल तक जहां घास के मैदान थे
अब वहां कब्रें हैं, (जहां सोये हैं बच्चे
जो कभी नहीं जागेंगे
वे इराकी हैं,फिलिस्ती नी हैं, सर्बियाई हैं, अफगानी हैं
मीर उन बच्चोंम की कब्रें उदास सी निर्जन पडी हैं
उन पर घास उग आए हैं
उन पर किसी ने फूलों के गुच्छे नहीं रखे
कहीं कोई मोमबत्ती नहीं जल रही
प्रार्थना का कोई स्विर नहीं सुनाई पड रहा है
कहीं उनके लिए एक मिनट का मौन नहीं रखा गया
उनके लिए मर्सिया नहीं पढा गया
उन्होंथने जो जीवन खोया
उसकी कोई पहचान बाकी नहीं है.
मीर! वे मरे नहीं, मारे गए.
उन्हेंथ उनकी मां की गोद से दूर कर दिया गया
उनकी धरती से दूर कर दिया
उनकी हवा से दूर कर दिया गया
उनकी रोटियां छीन ली गईं
दवाइयां छीन ली गईं
उनके खिलौने,उनकी धरती, उनकी हवा पर
प्रतिबंध लगाए गए.
मीर,आज जो लाखों बच्चे कब्रों में सोये पडे हैं
कल तक, उनका अपना आकाश था, अपने गीत थे,
अपना शहर था
घास के मैदान थे, घाटियां थीं, उनके घर थे, चूल्हें थे
उनकी नींद थी और उनके सपने थे
इस उदास रात में जागो, मीर!
देखो बच्चोंा की कब्रें हैं, जो दिख रही हैं
नहीं दिख रहे हैं तो वे जो इनके हत्याहरे हैं
जो प्रतिबंध लगाते हैं और मौत देते हैं.
मीर कितनी रातें कितने गम कितनी बातें बीत गईं
उनके दर्द की दास्तां कहते-कहते, बादल भी रो गए
भले ही उनकी मौत का जिक्र
शहंशाहों की गलियों में न हो
लेकिन अपने आंसुओं से तर, चेहरे के साथ जागो, मीर!
और एक दीप उन बच्चोंट की कब्रों पर जला दो
जो अभी-अभी रोते-रोते सो गए हैं.

-सत्येंद्र कुमार
सौजन्य - जन-ज्वार

1 comment:

निर्मला कपिला said...

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें