यदि तोर डाक सुने केऊ ना आशे, तबे एकला चालो रे, एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो।

Friday, March 22, 2013

अपनों की ही गुगली से परेशान गोगोई


गैरों पे करमअपनों पे सितम...आजकल असम कांग्रेस के कई विधायक मन ही मन यह लाइन दोहरा रहे होंगे. उनके निशाने पर हैं हैटट्रिक बना चुके मुख्यमंत्री तरुण गोगोई. वजह है, कांग्रेस का एआईयूडीएफ की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना. नतीजतन, पहली बार गोगोई को अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है. 


असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अपने 12 साल के शासनकाल में पहली बार पार्टी विधायकों के विरोध का शिकार होना पड़ रहा है. गोगोई अब तक असम कांग्रेस के न केवल निर्विवाद नेता थे, बल्कि उनके विरोध में उंगली उठाने वाला कोई भी नहीं था. लेकिन हाल में उनकी पार्टी के नेताओं ने ही उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. यह मामला तब उठा, जब कांग्रेस एवं ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के बीच नज़दीकियां बढ़ीं. पार्टी के वरिष्ठ विधायक चंदन सरकार के आवास पर सीएम हटाओ खेमे की बैठक हुई, जिसमें 26 विधायकों ने हिस्सा लिया. इनमें शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, केंद्रीय मंत्री पवन सिंह घाटोवार आदि प्रमुख थे. इन विरोधियों में वे लोग भी हैं, जिन्हें राज्य मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है. सरकार खुद को मंत्री न बनाए जाने से नाराज चल रहे थे और मुख्यमंत्री बनाम हिमंत का मामला गरमाते ही वह सक्रिय हो गए और उन्होंने अपने आवास पर बैठक बुलाने का दुस्साहस तक कर डाला.

गोगोई विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों का कहना है कि वह उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं. यही नहीं, सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी उन्हें महत्व देने को तैयार नहीं हैं. विकास कार्यों के लिए पूंजी का आवंटन अभी तक नहीं हुआ है. राज्य की सभी योजनाएं राज्यमुखी न होकर गोगोईमुखी हो गई हैं. चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों की उपेक्षा सबसे अहम मुद्दा है. गोगोई जनजातियों की समस्याओं के निराकरण में दिलचस्पी नहीं लेते. जनजाति बहुल इलाकों में हाथियों एवं बाघों का उपद्रव जारी है. इस समस्या से गोगोई वाकिफ है, मगर वह हमेशा कन्नी काटते रहते हैं. बीते 11 मार्च को वित्तीय वर्ष 2013-14 का बजट पेश किए जाने के बाद से उक्त विधायक और भी नाराज हैं.

राज्य के चाय बगानों में काम करने वाले लोगों की संख्या 80 लाख से भी अधिक है, लेकिन बजट में उनके लिए केवल 24 करोड़ रुपये ही निर्धारित किए गए हैं, जबकि यह धनराशि अधिक होनी चाहिए. इस संदर्भ में विधायकों ने मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा है. वहीं अल्पसंख्यकों के लिए 500 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं. वरिष्ठ विधायक रामेश्‍वर धनवार ने कहा कि गोगोई को यह अच्छी तरह मालूम होना चाहिए कि चाय बगानों में काम करने वाली जनजातियों के लोग जन्म से ही कांग्रेस के साथ रहे हैं. गोगोई ने उनके साथ धोखाधड़ी की है. ऐसे कई मामलों को लेकर विधायकों में असंतोष है. विधायकों ने कहा कि वे अपनी नाराजगी के बारे में शीघ्र ही हाईकमान को भी अवगत कराएंगे. दूसरी बात, आरोप है कि गोगोई नए विधायकों को नज़रअंदाज करते हैं. नए विधायक कहते हैं कि मुख्यमंत्री गोगोई उनकी अनदेखी करते हैं, इसलिए आलाकमान से शिकायत के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है. 

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के समर्थन में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें 52 विधायकों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं. असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भुवनेश्‍वर कलाता सहित पार्टी के अधिकांश पदाधिकारी गोगोई के साथ हैं. पूर्व मंत्री अंजन दत्त ने गोगोई को अपना समर्थन देकर सबको चौंका दिया. बहरहाल, गोगोई बीते 11 मार्च को दिल्ली पहुंचे और उन्होंने सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल, असम प्रदेश कांग्रेस के केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह से मुलाकात भी की. हाईकमान से मुलाकात के बाद राज्य मंत्रिमंडल में बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, मगर ऐसा हुआ नहीं. केंद्रीय प्रभारी दिग्विजय सिंह ने स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा को कारण बताओ नोटिस भेजा है. वजह यह कि डॉ. शर्मा की पत्नी रिनिकी भुइयां शर्मा न्यूज लाइव की प्रबंध निदेशक हैं. कांग्रेसी नेताओं, मंत्रियों एवं विधायकों ने मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पिछले पंचायत चुनाव के दौरान इस चैनल ने राज्य सरकार और कांग्रेस के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार किया था. यही नहीं, निराधार और एक खास उद्देश्य से प्रेरित ख़बरें प्रसारित करके कांग्रेस को चुनाव में काफी नुकसान भी पहुंचाया गया था. 

न्यूज लाइव की भूमिका से मुख्यमंत्री तरुण गोगोई काफी क्षुब्ध हैं. इसलिए उन्होंने सोनिया गांधी को लिखे अपने एक पत्र में चैनल पर दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया था. मुख्यमंत्री के इस पत्र के बाद बीते 27 फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश के तहत राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने मंत्री डॉ. शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया. 

विरोधी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते
गोगोई कहते हैं कि सूबे की जनता और पार्टी हाईकमान का आशीर्वाद उनके साथ है. लोग उनके ख़िलाफ़ बगावत करके भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते. उन्होंने कहा कि उनकी नीयत साफ़ है और जब तक पार्टी एवं हाईकमान की मर्जी रहेगी, वह प्रदेश की जनता की सेवा करते रहेंगे. उन्होंने विरोधी मंत्रियों एवं विधायकों को चेतावनी देते हुए कहा कि वह साफ़ नीयत के साथ पार्टी हाईकमान के निर्देश पर अब तक प्रदेश के विकास एवं जनता के हितों की रक्षा के लिए सेवाभावना से काम करते आए हैं. ऐसे में, उनके ख़िलाफ़ अगर कोई मंत्री-विधायक षड्यंत्र रचता है, तो उससे उनके चेहरे पर किसी तरह की कोई शिकन आने वाली नहीं है. 

गोगोई विरोधी नेता
डॉ. हिमंत विश्‍वशर्मा, मंत्री
राजू साहू, संसदीय सचिव
जीवनतारा घटोवार, संसदीय सचिव
आबू ताहेर बेपानी, संसदीय सचिव
बलिन चेतिया, संसदीय सचिव
ओकिबुद्दीन अहमद, संसदीय सचिव
प्रदान बरुआ, संसदीय सचिव
चंदन सरकार, संसदीय सचिव
सुमित्रा पातिर, संसदीय सचिव
राजेंद्र प्रसाद सिंह, संसदीय सचिव
हेमंत ताल्लुकदार, विधायक
पीयूष हजारिका, विधायक
पल्लवलोचन दास, विधायक
जयंतमल्ल बरुआ, विधायक
राजेन बरठाकुर, विधायक
हाबुल चक्रवर्ती, विधायक
जावेद इस्लाम, विधायक
शिवचरण बसुमतारी, विधायक
कमललाक्ष दे पुरकायस्थ, विधायक
संजयराज सुब्बा, विधायक
रूपज्योति कुर्मी, विधायक
सुष्मिता देव, विधायक
विनोद सैकिया, विधायक
कृपानाथ मल्लाह, विधायक

Monday, March 11, 2013

ज़िंदगी से प्यार करती हूं, जीना चाहती हूं


अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की ज़रूरत है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों से अनशन कर रहीं शर्मिला अपने लिए नहीं, बल्कि आपके लिए लड़ रही हैं. आपके लिए, यानी उस समूची मानव जाति की गरिमा बचाने के लिए, जो आज हर ताकतवर की नज़र में इंसान से कमतर बन चुकी है.

 इरोम शर्मिला चनु किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, क्योंकि वह पिछले 12 वर्षों से आमरण अनशन पर हैं. वजह, आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट 1958 को मणिपुर से हटाने की मांग. सरकार शर्मिला को किसी तरह जिंदा रखने की कोशिश कर रही है, नाक के जरिए उनके शरीर में खाना पहुंचाया जा रहा है. शर्मिला लगातार जेल में बंद हैं, आरोप है, आत्महत्या का प्रयास. अब इसे सरकार और समाज की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा, क्योंकि हर एक साल के बाद शर्मिला को अदालत में पेश किया जाता है. बीते 3 मार्च को सरकार ने शर्मिला को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया. यह मामला 5 अक्टूबर, 2006 को सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफसपा) हटाने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए उनके आमरण अनशन से संबंधित है. उस दौरान मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट आकाश जैन ने 40 वर्षीय शर्मिला के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत एफआईआर दर्ज की थी. शर्मिला ने कोई अपराध करने से इंकार करते हुए कहा कि उनका अहिंसक प्रदर्शन था. उन्होंने अदालत से कहा, मैं आत्महत्या नहीं करना चाहती हूं. मेरा प्रदर्शन अहिंसक है. मानव की तरह जीवन जीना मेरी मांग है. मैं ज़िंदगी से प्यार करती हूं, अपनी ज़िंदगी लेना नहीं चाहती, लेकिन न्याय और शांति भी चाहती हूं. सरकार मेरे ऊपर इस तरह का आरोप क्यों लगा रही है? मैं तो गांधी जी के मार्ग पर चल रही हूं, मगर आश्‍चर्य! गांधी के ही देश में अहिंसा को जगह नहीं दी जा रही है! अदालत ने इस मामले में अभियोजन पक्ष को सबूत पेश करने के लिए 22 मई की तारीख तय की है. गौरतलब है कि मणिपुर में भी उन्हें इसी आरोप के तहत जेल में रखा जाता है.

बहरहाल, जिन क्षेत्रों में अफसपा लागू है, वहां के निवासियों को हिंसा नहीं, बल्कि शांति चाहिए और सरकार एवं राजनीतिक नेताओं को उनके अहिंसक विरोध की आवाज़ सुननी चाहिए. सवाल यह उठता है कि सरकार उन्हें एक इंसान के मौलिक अधिकार देने से खौफ क्यों खाती है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का पालन करने वाली शर्मिला एक साधारण महिला हैं. वह एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के लिए ज़रूरी अधिकारों की मांग कर रही हैं. शर्मिला का अनशन 2 नवंबर, 2000 से तब शुरू हुआ था, जब इंफाल से 10 किलोमीटर दूर स्थित नंबोल नामक स्थान पर एक बस स्टैंड पर सवारी का इंतज़ार कर रहे 10 लोगों को भारतीय सेना ने बेरहमी के साथ गोलियों से भून दिया था. मारे गए लोगों में दो बच्चे और औरतें भी शामिल थे. यह ख़बर अगले दिन अख़बारों में छायाचित्रों के साथ शर्मिला ने पढ़ी. दिन था गुरुवार. हर गुरुवार को शर्मिला उपवास करती थीं. उस दिन जो संकल्प लेकर शर्मिला ने उपवास शुरू किया, वह आज तक जारी है.

शर्मिला ने चाणक्यपुरी स्थित मणिपुर टिकेंद्रजीत भवन में मणिपुर से आकर दिल्ली में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि जीवन में पढ़ाई बहुत ज़रूरी है. आप इतनी दूर से आकर यहां पढ़ाई कर रहे हैं. मां-बाप तमाम कष्ट झेलकर आपको पैसा भेजते हैं, इसलिए पढ़ाई केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि एक योग्य इंसान बनने के लिए करनी चाहिए. उन्होंने अपनी अधूरी रह गई पढ़ाई के बारे में कहा कि मैं ठीक से पढ़ाई नहीं कर सकी. मणिपुर के राजनीतिक नेतृत्व पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि वह केवल वोटबैंक की राजनीति करता है. पैसा कमाना नेताओं का धर्म बन गया है. हाल में इंफाल एयरपोर्ट पर एक नेता पुत्र बीस करोड़ रुपये के ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था. उन्होंने मणिपुर की स्थिति पर निराशा जताई. शर्मिला को सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.

अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में लोगों की आलोचना को नकारते हुए शर्मिला ने कहा, मैं भी औरों की तरह इंसान हूं. अपने बारे में सोचने और अपनी निजी ज़िंदगी जीने का मुझे पूरा अधिकार है. अपने मन की मैं खुद मालिक हूं. आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के बारे में उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा काला क़ानून है, जिसने लोगों से जीने का अधिकार छीन लिया है. एक तरफ़ तो केंद्र सरकार पूर्वोत्तर के राज्यों को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश करती है, तो वहीं दूसरी तरफ़ अफसपा जैसा काला क़ानून लागू करके दोहरी नीति अपनाती है. अगर सचमुच पूर्वोत्तर में शांति कायम करने के लिए अफसपा ज़रूरी है, तो फिर बीते 12 सालों में पूर्वोत्तर, खासकर मणिपुर में शांति क्यों नहीं स्थापित हो सकी, सिवाय अलगाव की भावना को बढ़ावा
देने के.

Tuesday, March 5, 2013

क्या इस समर्पण से शांति आएगी

यूं तो पूर्वोत्तर में कार्यरत अधिकतर अलगाववादी संगठन धीरे-धीरे शांति के रास्ते पर आने के लिए तैयार हो रहे हैं और सच तो यह है कि केंद्र और राज्य सरकार इसका स्वागत भी कर रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि इन छिटपुट संगठनों के समर्पण से क्या मणिपुर में शांति स्थापित हो जाएगी, क्या सरकार ने कभी इस समस्या की जड़ तलाशने की कोशिश की है? अलगाववादियों के समर्पण से क्या इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि अब नए लोग आतंकवाद के रास्ते पर नहीं चलेंगे?


पिछले कई सालों से गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा मणिपुर में सक्रिय अलगाववादी संगठनों के साथ शांति वार्ता की जा रही है और उसके परिणाम भी अब दिखने लगे हैं. बीती 13 फरवरी को तीन अलगाववादी संगठनों ने इंफाल में त्रिपक्षीय सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. ये संगठन हैं यूआरएफ, केसीपी (लम्फेल) और केवाईकेएल (एमडीएफ). इन तीनों संगठनों के कुल 197 कैडर हैं, जिनमें यूआरएफ के 90, केसीपी (लम्फेल) के 40 और केवाईकेएल (एमडीएफ) के 67 शामिल हैं. इस मौ़के पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ़ से ज्वाइंट सेक्रेटरी-मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स नार्थ-ईस्ट इंचार्ज शंभू सिंह, प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम सुरेश बाबू, राज्य के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, कई मंत्री एवं अधिकारी मौजूद थे. यूआरएफ की तरफ़ से चेयरमैन ख्वाइराकपम गोपेंद्रो उर्फ लानहैबा एवं सेक्रेटरी पुयाम मंगियाम्बा मैतै एलाइज रुहिनी मैतै, केसीपी (लम्फेल) की तरफ़ से चीफ ऑफ आर्मी ब्रोजेन मैतै उर्फ सिटी मैते एवं ज्वाइंट सेके्रटरी ताइबंगानबा उर्फ दिलीप और केवाईकेएल (एमडीएफ) की तरफ़ से प्रेसिडेंट मैस्नाम अथौबा एवं जनरल सेक्रेटरी लाइमयुम रोनेल शर्मा उर्फ अचौबा ने हस्ताक्षर किए. 


सहमति
ज्ञापन के अनुसार कैडरों को सही रास्ते पर चलने और नई ज़िंदगी शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. हर कैडर को दो साल तक प्रतिमाह 4000 रुपये बतौर वेतन दिए जाएंगे और हर कैडर के नाम ढाई लाख रुपये का फिक्स डिपॉजिट किया जाएगा, उन्हें न केवल वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार उन्हें क़र्ज़ भी देगी. उनकी क्षमता-योग्यता के अनुसार उन्हें पैरामिलिट्री फोर्स में नौकरी भी दी जाएगी. इससे उनकी चरमराई हुई ज़िंदगी दोबारा पटरी पर आ सकेगी. उक्त कैडर किसी असामाजिक एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे. अगर वे ऐसा करेंगे, तो क़ानून के अनुसार उन्हें दंड दिया जाएगा. मुख्यमंत्री ओक्रम इबोबी सिंह ने कहा कि भटके हुए युवा फिर शांति के रास्ते पर वापस आ रहे हैं, उनका स्वागत है. उन्होंने बाक़ी अलगाववादी गुटों से भी अपील की कि वे मुख्य धारा में वापस आएं. एमपी टी मैन्य ने कहा कि राज्य में शांति स्थापित करके ही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता है. 

तीनों
संगठनों ने समर्पण के वक्त कई हथियार भी सौंपे, जिनमें 3 एके-56 रायफल्स, 12 एके-47 रायफल्स, 3 नाइन एमएम रायफल्स, एक प्वाइंट-32 रायफल, 11 नाइन एमएम कारबाइन, 35 नाइन एमएम पिस्टल, 34 7.65 पिस्टल , आठ प्वाइंट-32 पिस्टल, एक नाइन एमएम रिवाल्वर, आठ लेथोट गन, सात एसबीएल, एक एयर पिस्टल, एक शार्ट गन, तीन आरपीजी, दो एम-16, दो एम-4, एक एसलर, पांच गे्रनेड और बंदूक. हथियारों की कुल संख्या 138 है. 

मणिपुर
की समस्याएं अलग हैं. राज्य के युवाओं को रोज़गार चाहिए, लेकिन सरकार रोज़गार मुहैया नहीं करा रही है, जिसके चलते युवाओं को सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल करना आसान हो गया है. बेरोज़गार युवा जल्द ही अलगाववादियों के झांसे में आ जाते हैं. एक दूसरी बात, जो मणिपुर के लोगों को सबसे ज़्यादा खलती है, वह है आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा). वर्षों से इसे हटाने की मांग की जा रही है. इसके लिए इरोम शर्मिला पिछले 12 सालों से अनशन पर बैठी हैं. जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी ने इस एक्ट को आपत्तिजनक बताया था, बावजूद इसके सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है. राज्य के लोगों का मानना है कि सरकार उनके साथ दोहरा रवैया अपना रही है. दिल्ली में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता दो-चार दिन अनशन करता है, तो सरकार उसके साथ बात करने के लिए तैयार हो जाती है, लेकिन मणिपुर में बारह साल से अनशन जारी है. अगर सरकार के पास इस एक्ट को लागू करने का सही तर्क है, तो वह उस पर भी चर्चा करा सकती है. जब सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी ही इस एक्ट को हटाने की सिफारिश करती है, तो फिर भी सरकार उसे क्यों नहीं मानती? बहरहाल, जब तक मणिपुर के युवाओं को रोज़गार नहीं मिलेगा, तब तक कुछ लोगों द्वारा समर्पण कर देने मात्र से शांति स्थापित नहीं हो सकती. सरकार को सबसे पहले रोज़गार का सृजन करना चाहिए. अगर युवाओं को रोज़गार मिलेगा, तो अलगाववादी संगठन ख़ुद-ब-ख़ुद कमज़ोर हो जाएंगे, लोगों का नज़रिया बदलेगा और सरकार पर विश्‍वास और बढ़ेगा. मणिपुर के विकास के लिए सरकार को विशेष योजनाएं बनानी होंगी, क्योंकि विकास ही समस्याओं का समाधान कर सकता है.

केंद्र एवं राज्य सरकार ने अगर एमओयू में शामिल बातों का सही तरीके से पालन न किया, तो फिर हमारा संगठन भूमिगत भी हो सकता है. इसलिए सरकार ईमानदारी बरते.  
अथौबा, चेयरमैन, केवाईकेएल (एमडीएफ).

हम लोग हथियार छोड़ चुके हैं और चाहते हैं कि शांति के साथ केंद्र एवं राज्य सरकार के विकास कार्यों में अपनी भागीदारी सुनिश्‍चित करें.  सिटी मैतै उर्फ नाउरेम ब्रोजेन मैतै, आर्मी चीफ, केसीपी (लम्फेल).

शांति हम सभी के अंदर है. इसे आपसी सामंजस्य के द्वारा ही क्रियान्वित किया जा सकता है.  लानहैबा उर्फ ख्वाइराकपम गोपेंद्रो,चेयरमैन, यूनाइटेड रिवोल्यूशनरी फ्रंट (यूआरएफ).


अलगाववादी बनने के कारण
कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे, तब मणिपुर को भी आज़ाद किया गया था, लेकिन यह आधा सच है. पूरा सच यही है कि भारत सरकार ने 21 सितंबर, 1949 को एक बंद कमरे में मणिपुर के राजा बोधचंद्र से मर्जर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करा लिए थे. 1964 में यूएनएलएफ नामक एक संगठन बनाया गया, जिसका मकसद एक स्वतंत्र राज्य की मांग करना था. 1978 में पीएलए का गठन हुआ. उसके बाद प्रीपाक, केवाईकेएल, केसीपी एवं एमपीएलएफ आदि कई संगठन निकल कर सामने आए. इनमें से यूएनएलएफ, पीएलए एवं प्रीपाक आदि आज भी एक स्वतंत्र राज्य के पक्षधर हैं. कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं, जो भटकाव के शिकार लोगों से मिलकर बनी हैं. युवाओं द्वारा अलगाववाद की ओर रुख़ करने के पीछे कई कारण हैं. राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है, जिसकी वजह से पढ़े-लिखे युवक गलत रास्ता अपनाने के लिए बाध्य हो जाते हैं. दरअसल, छोटी और साधारण सरकारी नौकरी के लिए भी कम से कम तीन से पांच लाख रुपये की रिश्‍वत देनी पड़ती है, थोड़ा बड़ा पद हो तो 15 से 20 लाख रुपये तक. यह भी कोई ज़रूरी नहीं कि नौकरी मिलेगी. इंफाल शहर में बीए-एमए पास किया हुआ युवक चेहरा ढककर रिक्शा चलाता है. बेरोजगारी से हताश होकर पढ़े-लिखे नौजवान अलगाववाद के रास्ते पर चलने लगते हैं. उनके हाथों में कलम की जगह बंदूक आ जाती है. तीसरा कारण, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) के तहत शक के आधार पर किसी की भी तलाशी ली जा सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और ऐसा होता भी है. इस एक्ट की आड़ में राज्य में कई फर्जी मुठभेड़ें हुईं. आज भी देश में सरकारी और ग़ैर सरकारी दबाव के कारण कई मामले खुलकर सामने नहीं आ पाए, लेकिन एक सच यह भी है कि कई राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं ने सच्चाई बताने की हिम्मत दिखाई. ज़ाहिर है, बिना गुनाह के गिरफ्तार या प्रताड़ना के शिकार हुए युवाओं में बदले की भावना पनपती है. चौथा कारण यह कि केंद्र सरकार केवल मणिपुर ही नहीं, पूरे पूर्वोत्तर से कटी हुई है. दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनाने के सिवाय कुछ नहीं होता. आज भी कई योजनाएं कागजों पर तो हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के गांवों में उनका कोई नामोनिशान नहीं है. प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री एवं अन्य महत्वपूर्ण नेता विदेश यात्राओं में तो लगातार व्यस्त रहते हैं, लेकिन वे पूर्वोत्तर में साल में एक बार भी दौरा करना उचित नहीं समझते. इससे राज्य के लोगों को उपेक्षा का एहसास होता है.

Saturday, February 23, 2013

भारी पड़ सकती है पूर्वोत्‍तर की अनदेखी


आम तौर पर चुनावों से जुड़ी हर छोटी-बडी खबर अनायास सुर्खियों में जगह बना लेती है, पर इस बार पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के चुनाव इसका अपवाद नजर आ रहे हैं. हमारे विद्वान विश्‍लेषक मित्र हमें यह समझाने का प्रयास करते रहे हैं कि यह तर्कसंगत है, क्‍योंकि आखिर लोकसभा में इस इलाके से पहुंचने वाले सांसदों की संख्‍या नगण्‍य है. केवल असम की बात इस संदर्भ में भिन्‍न है और वहां चुनाव नहीं हो रहे. यह दलील हमारे गले के नीचे नहीं उतर रही. क्‍या देश की सामरिक सुरक्षा के संबंध में अति संवेदनशील माने जाने वाले इन सीमांती प्रदेशों के प्रति ऐसी उदासीनता उपेक्षा बुद्धिमानी है? क्‍या जनतंत्र का अर्थ हमारे लिए मात्र लोकसभा का बहुमत बचा रहा है जो अल्‍पमत वाली साझा सरकार के जीवन-मरण का प्रश्‍न है? क्‍या राष्‍ट्रपति की एकमात्र कसौटी यही है? अब तक कुल जमा एक छोटी-सी खबर पढने को मिली है कि इस बार त्रिपुरा में रिकार्ड 93 फीसद मतदान हुआ है और इसका मतलब हे कि मार्क्‍सवादियों को संभवत: चौथी बार सरकार बनाने का मौका मिल जाएगा. इसके साथ ही राहुल गांधी के चुनाव अभियान के चिरपरिचित बडबोलेपन का चलते-चलते उल्‍लेख था कि उन्‍होंने हुंकार भरते दिलेरी से यह ऐलान किया है – इस बार वामपंथ को त्रिपुरा से कांग्रेस वैसे ही बाहर खदेड देगी जैसे उसने पिछले चुनावों में केरल तथा पश्‍चिम बंगाल से कर दिया. कांग्रेस के नव-नियुक्‍त उपाध्‍यक्ष के बारे में किसी को यह भ्रम नहीं कि उन्‍हें इस महान देश के इतिहास या समाज के बारे में सार्थक जानकारी है. हां, अपने पुरखों का आजादी की लडाई और स्‍वाधीनता प्राप्ति के बाद राष्‍ट्रनिर्माण में योगदान वह सदा सर्वत्र याद दिलाते रहते हैं.

इसके अलावा उनका भाषण तैयार करवाने वाले सलाहकार केंद्र से भेजे धन के अपव्‍यय का आरोप उस सूबे पर लगाने पर जोर देते हैं, जहां गैरकांग्रेसी सरकार का राज हो. इस रणनीति का दिवालियापन अब तक कई जगह जाहिर हो चुका है और जहां तक मार्क्‍सवादियों को धूल चटाने की बात है, पश्चिम बंगाल में यह कमाल ममता ने कर दिखाया था, कांग्रेस के आलाकमान ने नहीं। केरल का हाल सबके सामने है, जहां एक के बाद दूसरा कांग्रेसी दिग्‍गज धराशायी होता जा रहा है. जघन्‍य अपराधों के आरोपों के कटघरे में खडे कांग्रेसी नेतागण यह आशा नहीं जगाते कि वे विपक्षियों को पटखनी देने की हालत में हैं. बहरहाल मेघालय के बारे में दिल्‍ली में बैठे हाकिम यह सोचते हैं कि वहां कोई चुनौती नहीं है. कांग्रेस ने अपनी जीत का पुख्‍ता इंतजाम कर लिया है; हालांकि पूर्व लोकसभा अध्‍यक्ष पीए संगमा को अब भी गारो बिरादरी में पिटी गोट नहीं समझा जा सकता. उनकी पुत्री को भले ही केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया है, लेकिन उनके पुत्र मेघालय में खासे ताकतवर समझे जाते हैं. साधन-संपन्‍न यह परिवार कांग्रेसी अरमानों पर पानी फेर सकता है. इस सब से कहीं अधिक महत्‍वपूर्ण बात इस राज्‍य की बिगडती शांति तथा सुव्‍यवस्‍था है. खासी तथा जैंतिया पहाडियां शांत हैं, पर गारो इलाके में अलगाववादी हिंसा निरंतर चिंताजनक रूप से बढी है. उपद्रवी बाहुबलियों का इस्‍तेमाल सभी राजनेता खतरनाक तरीके से करते रहे हैं.

चुनावी हार-जीत के बाद इन पर अंकुश लगाना किसी के लिए भी असंभव रहेगा. बांग्‍लादेश से आए नाजायज शरणार्थियों की समस्‍या यहां आज भले त्रिपुरा या असम जैसी विकट न हो, पर राज्‍य के कई इलाकों में देशी-विदेशी आगंतुक अल्‍पसंख्‍यकों ने आबादी का मूल स्‍वरूप बदल सामाजिक तनावों को जन्‍म दिया है तथा राजनीतिक अस्थिरता को विस्‍फोटक बना दिया है. कोयले की खदानों के लालची दोहन ने पर्यावरण के लिए भीषण संकट खडा कर दिया है.
बहुत कम लोगों को इस बात का अहसास है कि मेघालय की सरहद बांग्‍लादेश से सटी है. वहां की उथल-पुथल उसे प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती. पर हमारे आकाओं को लगता है कि अगर उनको समर्थन देने वाला कोई कुनबापरस्‍त कबाइली नेता मुख्‍यमंत्री पद संभालता है तो उनकी दया से सब ठीकठाक है. चुनाव के बाद जो कुछ जनता पर गुजरती है या देश को इस जनतांत्रिक सौदेबाजी से जो नुकसान होता है, उसकी फिक्र किसी को नहीं. असम इस अदूरदर्शिता का दुर्भाग्‍यपूर्ण उदाहरण है. गोगोई ने भले ही अपना राज्‍य कांग्रेस की झोली में डाल दिया, पर वहां हालात सुधरे नहीं, बिगडे ही हैं. कभी चाय, तेल, इमारती लकडी जैसे संसाधनों से समृद्ध यह राज्‍य आज केंद्रीय सहायता-अनुदान का भी सदुपयोग नहीं कर पा रहा. जनजातीय तथा सांप्रदायिक हिंसा को घटाने में सरकार नाकामयाब रही है. केंद्र लाख लीपापोती की कोशिश करे, यह बात छिपाई नहीं जा सकती कि पूर्वोत्‍तर का सबसे बडा सूबा लाइलाज मरीज बनता जा रहा है. चुनाव में जीतने के बाद उसकी तरु नजर डालने की जरूरत न सरकार को है, न प्रतिपक्ष को.

मणिपुर भी तभी चर्चित-विवादास्‍पद होता है जब वहां मानवाधिकारों के बर्बर उल्‍लंघन का मुद्दा उछलता है या तस्‍करी अथवा एड्स जैसी महामारी के संक्रमण का जोखिम परेशान करता है. सेना के कानूनी कवच अफसपा को समाप्‍त करने की मांग की अनसुनी को लेकर इस सूबे में जनाक्रोश दशकों से है. पर इस विषय में सार्वजनिक बहस हमेशा कश्‍मीर तक सिमट जाती है. मणिपुर के लोग इस दोहरे मानदंड से भी पीडित है. विडंबना यह है कि इस राज्‍य में जहां हिंदू संस्‍कार सबसे गहरा रहा है, अलगाववाद भी सबसे अधिक दिखाई देता है. आतंकवादी-अलगाववादियों और भ्रष्‍टाचारी अफसरों तथा अपराधियों के गठजोड में अंतर करना कठिन होता जा रहा है. मणिपुर भी सांप्रदायिक तनाव से मुक्त नहीं. नागा कूकी तथा मैतेई समुदायों का ऐतिहासिक वैमनस्‍य बरकरार है. चुनाव के वक्‍त जो वादा नगाओं से किया जाता है, उसे निभाने की पेशकश करते ही मणिपुर खौलने लगता है. यह रेखांकित करना आवश्‍यक है कि मणिपुर का पडोसी म्‍यांमार से आत्‍मीय रिश्‍ता है. भारत सरकार इसे अनदेखा नहीं कर सकती. सीमापार कर शरण लेने की सुविधा उपद्रवी तत्‍वों को निर्भय बनाती है. पूर्वोत्‍तर राज्‍यों की इन आंतरिक दरारों को अनदेखा करने के दुष्‍परिणाम सामने आ चुके हैं, पर समाधान की चिंता किसी को नहीं. बस किसी भी तरह अपना दल या आदमी तख्‍तनशीं हो जाए. इस परिणाम को सुनिश्चित करने के सिलसिले में जो कुछ किया जाता है, वहीं आत्‍मघातक भ्रष्‍टाचार को पनपाता रहा है. निरापद रहने एवं केंद्र से मुंहमांगी घूस पाने के लिए पूरी सरकार ही दल-बदल कर लेती है. पूरे पूर्वोत्‍तर में ईसाई मिशनरी सक्रिय रहे हैं. असम को छोड एक सदी में ही धर्म प्रवर्तन से उन्‍होंने कबाइली आबादी का संस्‍कार बदल दिया है. अपनी जन्‍मभूमि में बहुसंख्‍यक होने के बावजूद अल्‍पसंख्‍यकों को संरक्षण प्रदान करने वाली व्‍यवस्‍था का राजनीतिक लाभ नेता बखूबी उठाते रहे हैं. जो आलोचक पूर्वोत्‍तर की सामरिक संवेदनशीलता के नाम पर चुप हो जाते हैं अथवा भारत की सांस्‍कृतिक बहुलता-विविधता के हिमायती होने की वजह से सब कछ बर्दाश्‍त कर लेते हैं, उन सबको यह याद रखना चाहिए कि इस आचरण से वे पूर्वोत्‍तर का और देश का अहित ही कर रहे हैं. चुनाव से इतर भी इस दिशा में हर जिम्‍मेदार नागरिक की पैनी नजर रहनी चाहिए. 

-पुष्‍पेश पंत
 

Monday, November 5, 2012

मैंने इरोम को नहीं देखा



मैंने इरोम को नहीं देखा. मैंने देखी है एक तस्वीर. उलझे बाल. नाक में पाइप. फूली हुई आंखें. लेकिन चेहरे पर एक अजीबोगरीब दृढता मानो हिमालय टकराए तो चूर चूर हो जाए.

एक और तस्वीर जो ज़ेहन में बार बार उभरती है जब कभी उत्तर पूर्व के बारे में सोचता हूं. कई निर्वस्त्र औरतें विरोध करतीं. ये सुरक्षा बलों के अत्याचारों का विरोध कर रही थीं. कोई औरत किसी मुद्दे के लिए अपने कपड़े उतार दे. ऐसा न पहले देखा था न सुना था.

अखबारों की रद्दी में कहीं दब गई है वो तस्वीर भी वैसे ही जैसे राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप में दब जाते हैं असल मुद्दे. असल लोग, आम आदमी और उसका असल विरोध.

रह जाते हैं बयान. पश्चाताप और इधर उधर बिखरे कुछ पन्ने जो हर साल पढ़े जाते हैं. याद किए जाते हैं. जिन पर ब्लॉग लिखे जाते हैं और कोई टटपूंजिया नारा दिया जाता है कि इरोम तुम संघर्ष करो.

इरोम के साथ संघर्ष करने की ज़रुरत किसी को नहीं है. इरोम अकेले काफी है. 12 साल से वो लगातार संघर्ष कर रही है. सरकार कहती है कि वो शर्मिंदा है. (बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै ने यही कहा था कि इरोम की भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण है)

बात सही है शर्मिंदा सरकारें कदम नहीं उठातीं. अपनी शर्मिंदगी के बोझ में लोगों को मरने के लिए छोड़ देती है.
इरोम ने 12 साल पहले आज के ही दिन ये संघर्ष शुरु किया था. हो सकता है कि 2024 में भी कोई लिखे कि ठीक 24 साल पहले इरोम ने इसी दिन संघर्ष शुरु किया था.

मैं इरोम जैसे लोगों से डरता हूं. उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा से डरता हूं. पता नहीं सरकार क्यों नहीं डरती है. सरकार को शर्मिदा होने की बजाय डरना चाहिए. कहीं देश के और लोग भी इरोम शर्मिला न हो जाएं.

लिखते लिखते याद आया अतुल्य भारत (incredible India) के प्रचार में पूर्वोत्तर छाया रहता है....लेकिन पता नहीं इस अतुल्य भारत में इरोम की जगह है या नहीं.

-सुशील्‍ा झा
सौजन्‍य - बीबीसी हिंदी

Tuesday, September 25, 2012

मैरी कॉम पर बनने वाली फिल्म दिलों को जोड़ पाएगी ?


मणिपुर में पीपुल लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की राजनीतिक शाखा रिबोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) ने हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन और हिंदी चैनल पर हिंदी फिल्मों के प्रसारण पर सितंबर 2000 से प्रतिबंध लगाया हुआ है. उनका मानना है कि हिंदी फिल्में मणिपुरी कल्चर को बिगाड़ती हैं. इससे यहां के लोगों की मानसिकता दूषित होती है. इसी प्रतिबंध के कारण 15-18 अप्रैल, 2012 को इंफाल में आयोजित इंटरनेशनल सोर्ट फिल्म फेस्टिवल में 18 हिंदी फिल्मों को नहीं दिखाया गया था. चूंकि यह एकमात्र बहाना है. वहां के उग्रवादी संगठन शुरू से ही भारत के प्रति अपनी उग्रता दिखाते रहे हैं. उनको लगता है कि भारतीय होना एक थोपी गई साज़िश है. दूसरी ओर आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट की आड़ में सेना की करतूत ने भी इस बग़ावत को हिंदी से जोड़ दिया है. उनका मानना है कि हिंदी का मतलब हिंदुस्तान.

मणिपुर में हिंदी भाषा और फिल्मों पर प्रतिबंध लगाना भारत से विरोध करने का एक प्रतीक है. हद तो तब हो गई, जब कहीं हिंदी गाना बजते हुए सुन लेने पर गाना बजाने वाले को पकड़ कर पीटना, ब्लैड से चेहरे पर काटना और गोली तक मार देना शुरू हो गया. यहां हिंदी गानों और फिल्मों के प्रति इतना हिंसक विरोध है. क्या ऐसे में संजय लीला भंसाली द्वारा मैरी कॉम पर बनने वाली फिल्म इस खाई को पाटने में सफल होगी? बहरहाल, हिंदी फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने से मणिपुर में कोरिया फिल्म की धमक बढ़ती जा रही है. युवा पीढ़ी कोरिया फिल्म में का़फी दिलचस्पी ले रही है. इसका नतीजा इस रूप में सामने आ रहा है कि मणिपुरी युवा कोरियन हेयर स्टाइल रखना पसंद करने लगे हैं. वहां के परिधान अब इन युवाओं की पसंद बन गए हैं. वैसे मणिपुर फिल्म इंडस्ट्री कई मायनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है. ओइनाम गौतम द्वारा निर्देशित फीचर फिल्म फीजीगी मणि को 2011 में आयोजित 59वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में क्षेत्रीय फिल्म का पुरस्कार मिला था.


मणिपुरी भाषा को अगस्त 1992 में आठवीं सूची में शामिल किया गया था. इसके बाद भी प्राथमिक कक्षा से आठवीं कक्षा तक हिंदी की पढ़ाई होती है. मणिपुर बोर्ड के सिलेबस में हिंदी विषय अनिवार्य कर दिया गया. मणिपुर में गांव-गांव में लोग हिंदी गाना गुनगुना लेते हैं. हिंदी नहीं जानने के बावजूद बच्चा-बच्चा हिंदी गाना गाता है. पुष्पारानी मणिपुर की एक प्लेबैक सिंगर है. वह 1997 में सारेगामापा सांग कंपिटीशन में गाती थी. इसका कार्यक्रम का संचालन कर रहे सोनू निगम ने कहा था कि पुष्पारानी को न अंग्रेजी आती है और न हिंदी, मगर उसने इतनी ब़खूबी से लता जी के ऐ मेरे वतन के लोगों गाया. मंच पर उपस्थित लोग अवाक रह गए थे. मणिपुर के लोग हिंदी नहीं जानने के बावजूद टीवी पर हिंदी फिल्में देखते हैं. सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को हर कोई चाहता है. हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन और प्रसारण पर रोक लगाने से लोगों की हिंदी फिल्मों में रुचि कम नहीं हुई. पाइरेटेड फिल्में गुवाहाटी, कोलकाता और दिल्ली से आती हैं. साथ में दूरदर्शन और डीटीएच पर प्रसारित हिंदी फिल्में और कार्यक्रम भी यहां ़खूब देखे जाते हैं. भले ही मणिपुर में हिंदी फिल्में प्रतिबंधित हों, लेकिन वहां के लोगों के दिल में रचे-बसे हिंदी गाने और हिंदी फिल्मों को कभी प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता.

मैरी कॉम मणिपुर की राजधानी इंफाल से 35 किमी दूर चुराचांदपुर ज़िले के गांव कांगाथेल में जन्मी थीं. चारों भाई बहनों में सबसे बड़ी मैरी कॉम का परिवार बहुत ही ग़रीब था. उनकी मां मांगते अखम कॉम और बाप मांगते तोनपा कॉम पहाड़ में खेतीबा़डी करके परिवार चलाते थे. मैरी कॉम भी पहाड़ से लकड़ी काटती और मां-बाप के साथ झुमिंग फार्मिंग में सहायता करती थीं. प्राथमिक स्कूली शिक्षा लोकताक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल मोइरांग से शुरू कर आठवीं कक्षा सेंजेबीयर कैथोलिक स्कूल मोइरांग में ख़त्म  की. नौवीं और दसवीं कक्षा की प़ढाई आदिम जाति इंफाल के स्कूल से की, मगर दसवीं कक्षा पास नहीं कर पाईं. इसलिए उन्होंने ओपन स्कूल से दसवीं पास की और चुराचांदपुर कॉलेज से बीए पास किया. उन्होंने के उनलर कॉम से शादी की. उनके जुड़वां बच्चे रेचुंगवर और खुपनेवर हैं. मैरी कॉम को बॉक्सिंग के अलावा गिटार बजाना भी पसंद है. शाहरु़ख खान उनके पसंदीदा बॉलीवुड हीरो हैं.

मणिपुर में हिंदी फिल्मों पर प्रतिबंध है, मगर मैं विश्वास करती हूं कि इस फिल्म के रिलीज होने पर बेहतर बदलाव आएगा. यह फिल्म मेरी ज़िंदगी और संघर्ष पर आधारित है. मैं आशा करती हूं कि इस फिल्म का मेरी मातृभूमि में स्वागत होगा. -मैरी कॉम

Thursday, September 13, 2012

ज़मीन की एक लड़ाई यहां भी

क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आ़खिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? 


                                                   Oil Extraction Can Spell Doom 

17 अगस्त, 2012. मणिपुर के तमेंगलोंग जिले का नुंगबा कम्युनिटी हॉल. सरकार द्वारा एक जन सुनवाई का आयोजन किया गया था, ताकि लोग अपनी आपत्तियां सरकार के समक्ष रख सकें.  मणिपुर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने इस जन सुनवाई का आयोजन किया था. उसमें स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया. लोग हाथों में बैनर लिए हुए थे और तेल खनन के  खिला़फ  नारे लगा रहे थे. इस वजह से जन सुनवाई नहीं हो पाई. विरोध कर रहे 15 ग्रामीणों के  खिला़फ  नुंगबा पुलिस ने एफआईआर संख्या 23/8/2012, आईपीसी की धारा 148, 149, 341, 353 एवं 506 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया है. यानी संगठित रूप से हथियार बंद लोगों द्वारा सरकारी काम में बाधा पहुंचाने और दंगा फैलाने का आरोप लगाया गया है. इनमें से कुछ लोग सरकारी कर्मचारी भी हैं, जिन्हें संबंधित विभागों ने आत्मसमर्पण करने के  लिए कहा है. उक्त घटना भारत सरकार और नीदरलैंड की कंपनी के बीच हुए एक अनुबंध का नतीजा है. भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस के अनुदान पर नीदरलैंड की जुबिलियंट ऑयल एंड गैस प्राइवेट लिमिटेड (जेओजीपीएल) को 2009 में मणिपुर के दो खंडों जिरिबाम (इंफाल ईस्ट), तमेंगलोंग और चुराचांदपुर जिले में पेट्रोलियम पदार्थ ढूंढने और खुदाई करने (ड्रिलिंग) का काम दिया गया था. अब कंपनी यहां तेल का उत्पादन करना चाहती है. मणिपुर का क्षेत्रफल 22327 वर्ग किमी है. तेल निकालने के लिए बोरिंग वाले इलाके का क्षेत्रफल 4000 वर्ग किमी है यानी प्रदेश के छठवें हिस्से का इस्तेमाल तेल उत्पादन के लिए किए जाने की योजना है. यह कहा गया है कि मणिपुर में 5000 बिलियन क्यूबिक फीट तेल उपलब्ध है. फिलहाल तेल के 30 कुओं से तेल उत्खनन के लिए काम चल रहा है.

दरअसल, एसईएनईएस कंसल्टेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने एक सर्वे किया था, जिसकी एनवायरमेंट एसेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर 17 अगस्त को उक्त जन सुनवाई हो रही थी. इसकी अध्यक्षता एडिशनल डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट जिरिबाम वाई इबोयाइमा ने की. अजय विसेन कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. उत्पादन के बंटवारे के अनुबंध पर हस्ताक्षर भारत सरकार और नीदरलैंड के जुबिलियंट ऑयल एंड गैस प्राइवेट लिमिटेड के बीच 19 जुलाई, 2010 को हुए थे. प्रोडक्शन शेयरिंग के पहले खंड (एए-ओएनएन 2009/1) के लिए हस्ताक्षर 30 जून, 2010 को किए गए थे और उसका लाइसेंस मणिपुर सरकार ने 23 सितंबर, 2010 को दिया था. दूसरे खंड (एए-ओएनएन 2009/2) के लिए हस्ताक्षर 19 जुलाई, 2010 को हुए और लाइसेंस 20 सितंबर, 2010 को दिया गया. एक्सप्लोरेशन लाइसेंस की डीड पर हस्ताक्षर 15 नवंबर, 2010 को स्थानीय लोगों को जानकारी दिए बिना करा लिए गए. इंफाल के चुराचांदपुर और जिरिबाम सब डिवीजन के लोगों को उन नियम-कायदों के बारे में जानकारी नहीं है, जिनके तहत केंद्र सरकार, राज्य सरकार और जुबिलियंट ऑयल एंड गैस प्राइवेट लिमिटेड के बीच तेल खनन के लिए सहमति बनी है. इसके अलावा पर्यावरण संबंधी रिपोर्ट भी स्थानीय भाषाओं जैसे जेमी, लियांगमै एवं कुकी आदि में नहीं है, जो कि जन सुनवाई की प्रक्रिया के लिए बहुत ज़रूरी है. अभी तक मणिपुर में खोजे गए पेट्रोलियम ऑयल की मात्रा का खुलासा प्रभावित होने वाले और प्रदेश के अन्य लोगों के सामने नहीं किया गया. अभी तक मणिपुर के स्थानीय लोगों को औपचारिक रूप से यह सूचित नहीं किया गया है कि वहां पेट्रोलियम ऑयल मिला है और उसे निकालने का ठेका एक विदेशी कंपनी को दिया गया है.

बहरहाल, इस कार्य से वहां के पर्यावरण पर भी गहरा असर पड़ेगा. पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को भी भारी नुकसान होगा. यह इलाका पर्यावरण की दृष्टि से बहुत संपन्न है. दवाओं के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले पेड़-पौधे भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं. वैसे भी तमेंगलोंग पर्यावरण के हिसाब से संवेदनशील क्षेत्र है. वन्य जीवन के अस्तित्व के स्रोतों और समुदायों को नज़रअंदाज किया गया है. बहुत सारे ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे यह मालूम हुआ है कि तेल के रिसाव, उसकी जांच, खुदाई (ड्रिलिंग), दुर्घटना और पाइप लाइन फटने के कारण नदियों एवं अन्य जल स्रोतों का पानी दूषित हो जाता है. तेल की खोज के दौरान मिट्टी, पानी एवं खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो जाते हैं और वनों एवं जलवायु को भी नुकसान होता है. बराक, इरंग, मक्रू और अन्य सहायक नदियों पर पेट्रोलियम की खोज और ड्रिलिंग का प्रभाव सबसे पहले पड़ेगा. यह प्रोजेक्ट इस क्षेत्र की जैव विविधता, हॉट स्पॉट जोन और भारत एवं पड़ोसी देशों के बीच स्थित जलीय आवास को नष्ट कर देगा, जिसके चलते कई जीव विलुप्ति की कगार पर पहुंच जाएंगे.


तेल की खुदाई नहीं होने देंगे : सिविल सोसायटी
मणिपुर प्रेस क्लब में इस मामले को लेकर सामाजिक संस्थाओं ने बैठक की, जिसमें ऑल जेलियांगरोंग स्टूडेंट यूनियन, जेलियांगरोंग बावड़ी, नगा वुमेंस यूनियन, नॉर्थ-ईस्ट डायलॉग फोरम, लाइफवाच, जोमी ह्यूमन राइट्‌स फाउंडेशन, सेंटर फॉर ऑर्गेनाइजेशन रिसर्च एंड एजुकेशन, सिनलुंग इंडिजिनस पीपुल्स ह्यूमन राइट्‌स ऑर्गेनाइजेशन, एक्शन कमेटी अगेंस्ट टिपाइमुख प्रोजेक्ट, सिटीजन कोसेन फॉर डैम एंड डेवलपमेंट, टमेंगलोंग विलेज अथॉरिटी, नगा पीपुल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्‌स एमोंग अदर्स आदि संगठनों ने कहा कि विकास के नाम पर विध्वंसात्मक कार्य नहीं होने देंगे. राज्य सरकार, केंद्र सरकार एवं जुबिलियंट ऑयल प्राइवेट लिमिटेड को मणिपुर में तेल की खोज और उत्खनन कार्य तब तक नहीं करना चाहिए, जब तक स्थानीय लोगों से चर्चा करके सहमति नहीं ली जाती. उन्होंने कहा कि यूएन द्वारा घोषित स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए.

एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट रिपोर्ट
एसईएनईएस (सेंस, हैदराबाद) कंसल्टेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने एक सर्वे किया था, जिसकी एनवायरमेंट एसेसमेंट रिपोर्ट कहती है कि दो खंडों में तेल के कुल 30 कुएं हैं, जो 4000 वर्ग फीट में फैले हैं, जिनसे तेल की खुदाई की जाएगी. पहले खंड में 17 कुएं हैं और दूसरे खंड में 13. प्रत्येक कुआं 7 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है. तेल एक्सप्लोरेशन का उद्देश्य संभावित कच्चे तेल का भंडार निर्धारित करना, खोदना और परीक्षण करना है. साथ ही यह भी पता लगाना कि आगे पर्यात तेल भंडार है या नहीं. हर कुएं की गहराई का लक्ष्य 2500-4500 मीटर रखा गया है. रिपोर्ट कहती है कि खुदाई प्रक्रिया में प्रतिदिन 41 क्यूबिक मीटर अपशिष्ट जल निकाला जाएगा. रिपोर्ट में लिखा है कि इन जिलों (चुराचांदपुर, तमेंगलोंग एवं इंफाल ईस्ट) में जंगल का क्षेत्र क्रमश: 90.96 प्रतिशत, 88.11 प्रतिशत और 34.08 प्रतिशत है. साथ में वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी भी शामिल है. सबसे अहम बात यह कि इस जंगल  में से 9.76 प्रतिशत रिजर्व फॉरेस्ट है. यह अति संवेदनशील क्षेत्र है. यहां लोगों का प्रवेश वर्जित है. इसमें होल्लोक, गीब्बोन एप और हिमालियन भालू पाए जाते हैं. तमेंगलोंग जिला चीतों और गोल्डन बिल्लियों का भी घर है. अब सवाल यह है कि वन विभाग किसी निजी कंपनी को वहां तेल की खुदाई करने की अनुमति कैसे दे सकता है? 



मणिपुर पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा आयोजित जन सुनवाई में हिस्सा लेने वाले और तेल निकालने का विरोध करने वाले नुंगबा के ग्रामीणों के  खिला़फ  एफआईआर दर्ज करना बिल्कुल गलत है. इसका मतलब है मणिपुर सरकार, केंद्र सरकार और जुबिलियंट ऑयल एंड गैस प्राइवेट लिमिटेड मिलकर इस प्रदेश के आदिवासियों का हक छीनना चाहते हैं. यह ग्रामीणों के साथ सरासर धोखा है. वे अपने जंगल और ज़मीन की रक्षा करते हुए शांति से रहना चाहते हैं. 
-पामै तिंगेनलूंग, संयोजक, सीपीएनआर.

जन सुनवाई के दौरान इस प्रोजेक्ट के केवल फायदे ही ग्रामीणों को बताए गए, नुकसान नहीं. हम इस तरह तेल खुदाई का विरोध करते हैं. 
-जिरि ईमा मैरा पाइबी अपुनबा लुप (जीआईएमपीएएल). 


राज्य सरकार और जुबिलियंट ऑयल के बीच हुए एग्रीमेंट में यह नहीं लिखा है कि तेल के फैलाव और अन्य नुकसान की ज़िम्मेदारी कौन लेगा.
-राम वांगखैराकपम, पर्यावरण कार्यकर्ता.